उम्मीदों की मचान
03-Jul-2009 07:42 AM
उम्मीदों की मचान, मैंने बांध ली है, पर टूटकर कुछ गिरा, उम्मीद का एक टुकड़ा, नेत्र सजल हुए, धारा अविरल बही, जल-कण संचित करुं, उम्मीद ही न रही। -harminder singh posts related to बूढ़ी काकी : * अब यादों का सहारा है * अनुभव अहम होते हैं * बुढ़ापा भी सुन्दर
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