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25 Apr 2010
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बेग़म परवीन सुल्ताना-ठुमरी -तुम राधे बनो श्याम

ये आवाज़ - मानो नदी की कोई महीन धारा, कलकल करती, मधुर ध्वनि से आहिस्ता-आहिस्ता पहाड़ उतर रही हो.... एक तारों भारी रातमेरी अपनी यादों में सिक्किम की हल्की, पिस्तई तीस्ता सदा हरहराती है या फिर बाड़गंगा का धीमा मद्धम बहाव जो पहाड़ी की ओट होते ही कभी कानो तक
 
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राग बहार-विलायत खाँ साहब-पल्लवी पोटे

राग बहार का संक्षिप्त परिचय -थाट- काफीजाति-षाडव-षाडवस्वर-गंधार कोमल ,दोनों निषादों का प्रयोग ,आरोह में रे ,अवरोह में ध स्वर वर्ज्यवादी स्वर-मसंवादी स्वर-सागायन-वादन समय -मध्य रात्रिन्यास के स्वर- सा,म और पसम्प्रकृति राग-मियाँ मल्हारविशेषता -प्राचीन
 
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विचित्र वीणा--यमन

आज सुनते हैं राग यमन विचित्र वीणा पर । वादक हैं कन्नौज के श्री कृष्ण चन्द्र गुप्ता जो आकाशवाणी के बी हाई ग्रेड कलाकार हैं । आपने विचित्र वीणा की शिक्षा पं गोपाल कृष्ण जी से प्राप्त की । इसके इलावा बनारस घराने के पं गणेश प्रसाद जी मिश्र से समय समय पर
 
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दरबारी कान्हड़ा--उस्ताद राशिद खाँ

दरबारी कान्हड़ा राग परिचय - प्राचीन संगीत ग्रन्थों मे राग दरबारी कान्हड़ा के लिये भिन्न नामों का उल्लेख मिलता है । कुछ ग्रन्थों मे इसका नाम कणार्ट,कुछ मे कणार्टकी तो अन्य ग्रन्थों मे कणार्ट गौड़ उपलब्ध है। वस्तुत: कन्हण शब्द कणार्ट शब्द का ही अपभ्रन्श र
 
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Dec 29 2009 11:58 AM
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रागों मे जातियां

वर्ष शेष हो रहा है,लोगों से मिलना जुलना व घूमना फ़िरना इन सभी कारणों से इधर "सरगम" पर कुछ भी लिखा नहीं गया । चलिये आज बात करते है रागों मे प्रयोग होने वाले "जाति " शब्द की । राग विवरण मे सुनते है अमुक राग अमुक जाति का है। "जाति" शब्द राग मे प्रयोग किय
 
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Dec 29 2009 11:58 AM
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अलंकार

आज चर्चा करते हैं संगीत मे अलंकारों के प्रयोग की । शास्त्रीय गायन तथा वादन के क्षेत्र मे विद्यार्थियों को सर्वप्रथम अलंकारो का अभ्यास करवाया जाता है । { संगीत रत्नाकर } के अनुसार-" विशिष्ट-वर्ण-सन्दर्भमलंकार प्रचक्षते" अर्थात, नियमित वर्ण समूह को अलं
 
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हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया…राग बागेश्री

भारतीय शास्त्रीय संगीत की मेरी पिछ्ली पोस्ट पर सभी मित्रों के उपयोगी सुझाव,सराहनाओं व बहुमूल्य टिप्पणियों से इस प्रयास को बहुत बल मिला है। आप सबका बहुत बहुत आभार ।जैसा की सब चाहते हैं ……तो आज रागों मे प्रयोग होने बाले बेसिक शब्दों की परिभाषाओं की सर्
 
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टेस्ट पोस्ट

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राग हंसध्वनि-लागी लगन पति सखी संग,-राग हंसध्वनि

एक लम्स हल्का सुबुक और फिर लम्स-ए-तवील दूर उफ़क़ के नीले पानी में उतरे जाते हैं तारों के हुजूम और थम जाते हैं सय्यारों की गर्दिश के क़दम ख़त्म हो जाता है जैसे वक़्त का लंबा सफ़र तैरती रहती है इक ग़ुंचे के होंटों पे कहीं एक बस निथरी हुई शबनम की बूँद तेरे होट
 
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Dec 29 2009 11:58 AM
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राग ललित-राशिद ख़ाँ

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे ज़र्द सा चेहरा लिये चाँद उफ़क़ पर पहुँचे दिन अभी पानी में हो,रात किनारे के क़रीब न अँधेरा,न उजाला हो,न ये रात न दिन…… गुलज़ार की इस नज़्म के समय ही बजता है राग ललित । ये तो ख़ैर मेरी अपनी बात है जिसका कोई प्रमाण नही
 
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Dec 29 2009 11:58 AM
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मारू बिहाग -झूला -शुभामुदगल

राग मारू बिहाग के संक्षिप्त परिचय के साथ आज सरगम पर प्रस्तुत हैं शुभा मुद्गल ( मुदगल) के स्वर मे सावनी झूला । झूला ,कजरी आदि विधायें हिन्दुस्तानी संगीत मे उपशास्त्रीय अंग के रूप मे जाने जाते हैं । कजरी के मूलतः तीन रूप हैं- बनारसी, मिर्जापुरी और गोरख
 
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Dec 29 2009 11:58 AM
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कैसी लगन लागी उन संग/संजीव अभयंकर/जौनपुरी

मै ना जानू रे मै ना जानू कैसी लगन लागी उन संग री मै ना जानु कछु न कियो बात मै तो उन साथ जब मिले नैन सो नैन तब लगन लागि उन संग । 2- मोसे न करो बात दिखावत मोपे प्रीत औरन को चाहत तुम कछु न मोहे समुझावो कछु न सुनावो काहे ऐसी करत प्रीत पिया संजीव अभयंकर क
 
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अजय पोहनकर-बागेश्री-सखी मन लागे ना

राग बागेश्री कई दिनों से अलग अलग आवाज़ों में सुन रही हूँ ....बार -बार यही ख़्याल आता है - जो कोई हूक हो "जी" में तो गूँज उठ्ठेंगे .. ये बिरही सुर कोशिशों से साधे नहीं जाते.... ******** ***** **** *** ** * सुनें राग बागेश्री में प्रारम्भिक आलाप के बाद द
 
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धमार/राग मारवा

धमार गायकी का संक्षिप्त परिचय-धमार भारतीय संगीत का एक अत्यंत प्राचीन अंग है। ऐसी मान्यता है कि पंद्रहवीं शताब्दी के अंत और सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में मानसिंह तोमर और नायक बैजू ने धमार गायकी की नींव डाली। धमार की बंदिश १४ मात्राओं वाली धमार ताल में ही
 
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Aug 17 2009 09:45 PM
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मोरा संइया बुलावे आधी -राशिद खान-ठुमरी

राग देश का संक्षिप्त परिचय- राह देश की उत्त्पत्ति खमाज थाट से मानी गयी है । यह औडव-सम्पूर्ण जाति के रागों के अन्तर्गत आता है कारण इसके आरोह में गंधार तथा धैवत स्वर वर्ज्य हैं अर्थात नहीं प्रयोग किये जाते हैं व अवरोह में सातों स्वरों का प्रयोग होता है
 
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राग बिहाग-वीणा सहस्त्र बुधे

मजलिस-ए-शाम उठे देर हुई साज़ मुँह ढाँपके सब सो भी चुके शामियाने में लटकते हैं अभी रात के जाले दामन-ए-शब पे लटकता है अभी चाँद का पैवंद गुलज़ार राग बिहाग का संक्षिप्त परिचय- थाट- बिलावल जाति-औड़व सम्पूर्ण ( आरोह मे में 5 स्वर,अवरोह मे-7 स्वर ) वादी स्वर-ग
 
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