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युं ही, निट्ठल्ला...

http://binavajah.blogspot.com/
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11 Jan 2010
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मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है

एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो  वहू  ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर
 
डा. अमर कुमार
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चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो

जब कौल कर ही लिया है, तो मैं आज कुछ न लिखूँगा.. तो आप भी कुछ न पढ़ना । आपको ब्लागवाणी पर यह ज़ब्बर टाइप शीर्षक दिखला कर यूँ ही फुसला कर बुला लूँ, और यहाँ एक वाह-वाह आलेख पकड़ा दूँ... यह  हमसे  न होगा ! अपने  मुँह मियाँ  मिट्ठू... वाः वाः
 
डा. अमर कुमार
Sep 08 2009 11:51 PM
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माडरेशन की प्रतीक्षा में

इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी, दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी । पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !" दूसरा उखड़ गया, " भला ऎसा कैसे हो
 
डा. अमर कुमार
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हिल्ले पठनीयता बहाने जन्मदिन

फ़िलहाल कुछ नहीं लिखने का मन था । अब  तो  एक धड़का और लग गया है, पठनीयता का !  भला बताइये, आपका निट्ठल्ला अपने टैग को सार्थक करने कहाँ जाये ?  मेरी पठनीयता  बिन सोचे ही आती है ! इधर उधर से पोस्ट उधार ले लेकर अच्छा ख़ासा
 
डा. अमर कुमार
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चले जाना नहीं, होश उड़ाय के

मेरे मित्र डा. एस.एम. सिंह, यहाँ एक सफल आर्थोपेडिक सर्ज़न हैं । कभी वह कार्टूनिंग में दखल रखा करते थे । पर जैसा कि इस पेशे में होता है , अधिकाँश जन अपने शौक, ललित प्रतिभा और मनोलालसा को इस पेशे की बलि देने से रोक नहीं पाते । लगातार उकसाये जाने पर वह पिछले
 
डा. अमर कुमार
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मैं मोटा क्यों हूँ...मैं मोटा क्यूँ हूँ ?

समीर भाई टिप्पणीशाह लालउड़नतश्तरीवाला कुछ लिखें, और हम कन्फ़्यूज़ियायें भी न ? ऎसा कम ही होता है.. ज़रूर कहीं कोई निहितार्थ रहा करता है । चतुर सुजान ऎंवेंई ही टाइम खोटी नहीं किया करते.. कुछेक जन ही ऎसे हैं, जिनकी पोस्ट मैं सहेज कर रख छोड़ता हूँ.. और 
 
डा. अमर कुमार
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भईया, तनि हमारौ एकु फोटू चीन्ह देयो

पहेली बूझाने मैं तो आयी.. कहते हैं इसको चीन्हा-चिन्हाई ! चीन्हा-चिन्हाई ... चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू ब्लागिंग भई है, बमचिकाचिक...  त हमहूँ भये हैं, बमचिकाचिक । बमचिकाचिक देखो फोटू बमचिकाचिक ! चीन्हा-चिन्हाई ... चीन्हा-चिन्हाईऽऽ..
 
डा. अमर कुमार
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हाहा ही ही.. बजट्ट अली बजट्ट अली, हो बजट्ट अली

सोचा कुछ - हुआ कुछ और ही है निट्ठल्लों सँग ही ऎसा होता क्यूँ है सोचा कि कम्पू बेबी को हाथ न लगाऊँगा अपने सड़े विचारों का अचार पक न जाये जब तक शब्दों की खटास में तनिक मिठास न आये तब तक बेटी को फोन लगाया, उछल पड़ी " पापा सच्चीऽऽ ? बेटे को मेसेज़ किया
 
डा. अमर कुमार
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Amar Kumar has sent you a cold drink

पहिले निट्ठल्ला फोटुओं का इन्ट्राडेक्सन देगा : उसके बाद लिक्खेंगा .. लीखने का कुछ नेंईं जी, ईहाँ की तो पँच लाइन ही है.. “ सोचेला नहीं.. बस ठेलेला “ और   जब सर पे ख्याल ही न मंडराएं, और बिल्कुल रहा ना जाए , तो ? तो क्या, यदि आप भी कोल्ड ड्रिंक दे
 
डा. अमर कुमार
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बच्चा बच्चा... बूढ़ा बूढ़ा... हाल तुम्हारा जाने है

कितनी दुर्गन्ध फैल रही है ? क्या इतनी कि, बच्चा बच्चा नाक पर रूमाल रखने लगा है ? आज पर्यावरण दिवस पर यह एक रस्मी पोस्ट नहीं है, क्योंकि मेरे रिशि जी, ( इनसे आप  यहाँ पहले मिल चुके हैं ) एक अलग तरह का सवाल पूछ बैठे । आज ही सुबह बगीचे में एक साँप
 
डा. अमर कुमार
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लै भाई, मन्नैं बी इक पहेल्ली पूछ लैण दे ।

धन्यवाद भाई जी , तन्नैं होश दिलायी के बिन पहेल्ली पुच्छै इह निट्ठल्ले को ब्लागर मानता ए कोण्या ? भाई, आप बात तो ठीक कहवै सौं, बुरी सँगत में पड़कै, मैं भी बड्डी बड्डी पोस्ट लिखण लाग्यै लग सै । जे पहेल्ली ना पुच्छी ते फेर ब्लागर किस्सा ? आज रस्म अदा कैण
 
डा. अमर कुमार
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आज बड़े खुश लग रहे हो ?

डिस्क्लेमर : यह पोस्ट श्री बज्राँग बली के नाम पर आरँभ किया जा रहा है, अनायास बिजली गुल हो जाने की दशा में पोस्ट पूरी न हो पाने का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व केन्द्र व निष्कामी राज्य सरकार का होगा । इसका मायाराज से कोई लेना देना नहीं है ! रायबरेलीवासी मतदा
 
डा. अमर कुमार
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विरोध का यह तरीका, न जाने क्यों परिभाषित न हो सका

शहीद की अगली कड़ी देनी है । साथ ही अपना भी कुछ लिखने का मन बन रहा है, पर विरोध या अंतर्विरोध का कोई स्वर निकल ही नहीं पा रहा । क्या करें ?  सा रे गा से  उठाने पर  मा पर जाकर टिक जा रहा है ! यहीं से एक मुरकी लगाकर मा पर ही बिलँबित होना ठ
 
डा. अमर कुमार
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He is obselete, who is he ?

यूँ तो अपन को किसी लफ़ड़े में पड़ने की आदत तो है, नहीं ? अब तक तक तो आप भी जान गये होंगे,कि, मैं अपना दामन बचा कर दूर से तमाशा देखने वाला एक आम शहरी आदमी हूँ । चाहें तो, मुझे शरीफ़ भी कह लीजिये, तो भी मैं बुरा न मानने का ! इसलिये मैं डा. अरविन्द के यहाँ
 
डा. अमर कुमार
May 15 2009 11:48 AM
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आख़िरी ज़रूरत – µ पोस्ट

एक सफल मनुष्य, जो अपने जीवन में हर कुछ हासिल कर चुका हो, अब और क्या चाह सकता है ? अपने जीवित रहने के चँद ज़रूरतें, और कुछ नहीं !  यानि  एक डाक्टर, एक वकील और ज़ेड सेक्यूरिटी ! Technorati Tags: ज़रूरतें , Z catagory , मस्ती , Micro Post , माइक्
 
डा० अमर कुमार
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टिपेर तंत्र के अघोरी

टिप्पणी , Controversy , चिट्ठाचर्चा , Blogger , निट्ठल्ला , Comments , Hindi Satire , Cartoon
 
डा० अमर कुमार
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अमारा मौसी का बेटी

स्पीच का बात को पिरेस वाला इतना मच मच मचायेला कि मामला सीरियस हो रैली है, मैडम का वास्ते ! झप्पी बोले तो.. झप्पी ! अक्खा इंडिया में देखो.. पिरेस में गँदा लोग भरेला है, बाप ! तू जा के मैडम को सारी बोल दे , सरकिट ! सरकिट गोल ? अमर सिंग अपुन को इच सरकिट
 
डा० अमर कुमार
Apr 22 2009 07:34 AM
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हे पार्थ ! दो कप चाय पर.. लिखता रह तू ब्लाग

पिछले शनिवार को कुछ.. और इस शनिवार को इनपर इतने लहालोट हुये जा रहे हो.. तुम भी उमा भारती हो क्या .. ? या फिर इनसे कोई सौदा सेट हो गया है ?  भईया, ई पंडितइनिया हमका जिये न देई.. लेयो टोंकि दिहिन ! भगवान इनका मुँह चीरते समय कुछ ज़्यादा ही उदार हो ग
 
डा० अमर कुमार
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देसी मायने-ज़मेन्ट गुरु, आज किये खुलासा

सुना है, आज शाम IIM के पुरफ़ेसर लोगों को भी चारा चटा देने वाले श्रीयुत लालू प्रसाद यादव ’ जी ’ ने अपना चुनाव प्रचार ख़त्म होने के बाद एक प्रौस-कानफ़िरेन्स बुलाया था । जिसमें उन्होंने जेपी अन्दौलन में अपने जेल जाने के अलावा.. देश के लिये किये गये अन्य त्
 
डा० अमर कुमार
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ऎई , आज फिर निट्ठल्ले पर हो क्या ?

शिवभाई का मेसेज़ आया.. यदि मैंनें कुछ लिखा नहीं, तो वह कवितायें लिख लिख कर ब्लागजगत में तबाही मचा देंगे ! सो,  मैं सनद्ध हुआ, कि यह यंत्रणा मेरे को ही झेल लेने दो, भाई !  नीलक्ण्ठ बन जा ब्लागर अमर कुमार ! कविता ही तो लिखना है.. कुछ लिख मार,
 
डा० अमर कुमार
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एक शाम अपने कुकूर जी के नाम A / U

आज शाम मैं अपना कुत्ता चराने निकला.. वह मुझे रोज ही शाम को घुमाने ले जाता है ! कोई चारा न देख मैं बेचारा टिगीड़ टिगीड़ चाल से उसको फ़ालो करता रहता हूँ ! इस दौरान मन ही मन कई पोस्ट लिख चुका होता हूँ, लौटते समय टिप्पणियाँ समेटते समेटते घर के पास वाले नुक्
 
डा० अमर कुमार
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मेरे राहत का सबब है, मेरा पाकिस्तान

कोई इसे ग़द्दारी न समझ लेना, मेरे ख़ातिर तो राहत का सबब है, मेरा पाकिस्तान ! यह सरज़मीं मानो ज़न्नत की सिफ़त रखता, जो कहलाता है पाकिस्तान ! कितनी ग़लतफ़हमियाँ बनी रहतीं जो मैं कभी न जा पाता अपने पाकिस्तान !   मेरे हालिया पाकिस्तान यात्रा की तस्वीरें यह
 
डा० अमर कुमार
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यह आख़िरी बार बताता, तुमकूँ

वनगमन से लौट आने की व्यथाकथा जारी रहेगी, इससे पहले वहाँ मिला एक महत्वपूर्ण स्कूप बता देना राष्ट्रहित में है ! इसलिये आमोद प्रमोद की इस दुनिया में ’ देशहित ’ का एक ब्रेक लेने की अनुमति चाहूँगा ! अईयो साईं आला रे आला ने बहुसंख्यक राष्ट्रीय पशुवत जनता क
 
डा० अमर कुमार
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अनूप जी लताड़े गये – बिहार की जनता को राहत

आम तौर पर पोस्ट लिखने बाद इनको टिप्पणी देखने गिनने की ज़रूरत नहीं पड़ती ( या कहिये कि इतनी फ़्लाप पोस्टों के बाद शर्म और डर से न जाते होगे ! )  कल रात की पोस्ट प्रकाशित होने में नेटवर्क बहुत दोस्ताने तरीके व्यवहार नहीं कर रहा था ! कारण जो भी हो, यह
 
डा० अमर कुमार
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जाते थे वनगमन को, हेरन लागे जुगाड़

यूँ ही निट्ठल्ला.. यथानाम तथागुण ! कहीं दूर क्यॊ जाते हैं ? पिछली पोस्ट की प्रकाशन तिथि देख लीजिये... आज की डेट से डिफ़रेन्स जोड़ लीजिये, फिर मेरा योगदान घटा दीजिये.. यही है.. निट्ठल्लई ! इधर बड़ी साँसत रही, क्या लिखें.. क्या छोड़ें ? चलो असमंजस छोड़ो.. अ
 
डा० अमर कुमार
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डा. अनुराग के बचपन पर कराह उठा यह पचपन

जैसे जैसे डा. अनुराग की पिछली ज़बरदस्त पोस्ट को बाँचता जाता, दिल से.. हमारे वाले दिल से, कराह उठ रही थी, “हाय अमर तुम न हुये ।” ऎ भाई कोई यहीं खुन्नुस न निकाल लेना, कि “ अगर होते तो, क्या उखाड़ लेते ?” एकदम सच बात है, मैं क्या कर लेता.. ? मैं बचपन में
 
डा० अमर कुमार
Feb 11 2009 02:00 AM
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तुम पार नेट परमेश्वर तुम ही नेट पिता

ॐ जय गूगल हरे, स्वामी जय गूगल हरे फ़्रस्ट (एटेड ) जनों के संकट, त्रस्त जनों के संकट एक क्लिक में दूर करे ॐ जय गूगल हरे… जो ध्यावै सो पावै दूर होवै शंका, स्वामी दूर होवै शंका सब इन्फ़ो घर आवै, सब इन्फ़ो घर आवै कष्ट मिटै मन का ॐ जय गूगल हरे… नेट पिता तुम
 
डा० अमर कुमार
Jan 19 2009 01:58 AM
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चला बाघ मंत्री बनने !

सुबह सुबह पंडिताइन ने झकझोर मारा, " एई उट्ठो.. एई उठो न, देखो बाघ लखनऊ तक आगया  ! अरे, मैं तो अपना ही किस्सा लेकर बैठ गया, एक आवश्यक औपचारिकता तो पहले पूरी कर लूँ  ! आपसब ब्लागर भाई व भौजाईयों को  समस्त उत्तरायण पर्वों की हार्दिक
 
डा० अमर कुमार
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इतना विशाल देश.. क्या अकेले मेरे बस में ?

हरतरफ़ चर्चा है, कि देश मुसीबत में हैं, आतंकी इसे रौंद रहे हैं, घोटाले इसे लील रहे हैं ! सत्यम भी आख़िरकार असत्यम साबित हो रहा है ।  अब, भला आप ही बताइये, मैं अकेला क्या कर सकता हूँ ?  कल जोड़ने बैठा तो .. देश की आबादी निकली : 100 करोड़ जिसमें
 
डा० अमर कुमार
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अपनी उनके संग सुरक्षित ड्राइविंग … …

मोबाइल के उपयोग एवं ड्राइविंग के समय टेप से छेड़छाड़ ( डा. अनुराग ) के बाद आपकी उनकी चटर चटर ही एक्सीडेन्ट का एक और मुख्य कारण है ! अपुन के उल्हासनगर के कारग़ुज़ारों ने अनोखा सीट-बेल्ट इज़ाद किया है इसकी अग्रिम बुकिंग धड़ल्ले से चल रही है, संपर्क करें – अभ
 
डा० अमर कुमार
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भाई साहब, हैप्पी नियू ईयर टू यू !

पुरानी पोस्ट है, तो क्या हुआ…   3 जनवरी 2008 हैप्पी न्यू ईयर, सर. मैं पलटता हूँ, एक किंचित परिचित चेहरा मेरी तरफ़ मुखातिब मुस्कुराता हुआ दृष्टिगोचर होता है । इनको कहाँ देखा है , दिमाग में चल रहा होता है किंतु ज़ुबान से फिसल पड़ता है, " थैंक यू
 
डा० अमर कुमार
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वो अन्डरस्टैंडिंग थी और ये सियासत है !

स्थान: सीमा चौकी, इस बार उत्तर-पश्चिम क्षेत्र बात बात पर उबल पड़ने और भारत माँ की सौगंध लेने की आदत के चलते रामनिहारी जाटव अपने बटालियन में रामबवाली भारती पुकारे जाते थे ! हमारे चरित्रनायक रामबवाली जी अब लांसनायक भारती के नाम से पुकारे जाने लगे हैं ।
 
डा० अमर कुमार
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ये अन्डरस्टैंडिंग है और वो सियासत थी

स्थान : सीमा चौकसी चौकी, देश में कहीं भी.. खट्ट्क्क खट्ट्क्क खट्ट्क्क .. हवलदार रामबवाली भारती मेज़र फ़ेरन सिंह के सामने जा खड़े हुये, पंज़ों पर उचक कर एक सैल्यूट मारा, " शौह्हः , मेरा 10 दिन का लीव एप्लिकेशन रिकेमेन्ड एन्ड फ़ारवर्ड कर दीजिये ।"
 
डा० अमर कुमार
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चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !

यह विषय पड़ा तो बहुत दिनों से था... पर वही सनातन रोना, कुछ असलियत का और कुछ फ़ैशन में, बोले तो.. समय का टोटा, वह तो आपके पास भी होगा ! ब्लागिंग और लिखने का विषय ?  अरे, राम भजो... . जिस दिशा में  भी नज़र डालो, विषय  ललकार  रहे हैं !
 
डा० अमर कुमार
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सनद रहे कि यह नकल है..

अब ढूँढ़िये, इसका मूल लेखक ? यदि आप जागरूक पाठक हैं, तो पहचान ही जायेंगे.. इस पोस्ट के मूल लेखक को... नहीं पहचाना ?  कोई बात नहीं., फिर तो.. यह रचना मेरा हिन्दी के प्रसार में योगदान माना जाये और इस नक्काल के पोस्ट-मर्म को अनदेखा कर दें ओ पैणचो मं
 
डा० अमर कुमार
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घी के लड्डू, टेढ़े ही सही ...

आज की चिट्ठाचर्चा में मसिजीवी ने एक माकूल सवाल उठाया, जाने कहाँ गये वो ब्लाग..जो, " तुम तो छा गये गुरु !" जैसी टिप्पणियों से लदे रहते थे ! कुछेक तो मेरे पसंदीदा हुआ करते थे, जिन्हें मैं पढ़ तो लेता था, किन्तु  किसी हिन्दी टूल की जानकारी
 
डा० अमर कुमार
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अमर कुमार का ई-कचरा

आज शनिवार है या समझिये कि था... वैसे तो इतने दिनों गायब रहा ही, पर आज है मेरी साप्ताहिक छुट्टी, और यही दिन तो असल छुट्टी में शुमार है, सो अपने मेल इनबाक्स का थोड़ा बहुत ज़ायज़ा वगैरह लिया ही था, कि एक हितैषी का मेल देखा.. वैसे तो इनका लगाई-बुझाई करने जै
 
डा० अमर कुमार
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हे भगवान, तो यह सब तूने किया !

अपनी धरती पर ख़बरों का टोटा पड़ रहा, दिक्खै । पूरी दुनिया दुई दिन बाद सदर ए रियासत अमेरिका के इलेक्शन नतीज़ों को लेकर दुबली हुई जा रही है । शायद ठीकै हों सब के सब, अब ‘ कोउ नृप होंहिं.. ‘ वाला ज़माना तो रहा नहीं, सब जागरूक हो गये हैं । ठीक से जग नहीं पाय
 
डा० अमर कुमार
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अभी टैम नहीं है, शिव भाई !

अभी टैम नहीं है, शिव भाई ! अभी अभी मेलबाक्स खोला, देखा शिव भाई का मेल ! आनन्दम, भाई की नयी पोस्ट होगी, मेल से सब्सक्राइब कर रखा है । हौले से नज़ाकत से खोला, हाय रब्बा.. यहाँ तो शिवभाई बड़े उखड़े मूड में किन्तु तनिक लिहाज़ से कहाँ का गुबार यहाँ निकाल रहे
 
डा० अमर कुमार
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रानी रूठेगी… अपना सुहाग लेगी

बात तो भाई, एकदम्मै सही है. !  हाँ तो, शुरु किया जाय ? एक महीने का अंतराल होने को है.. और महीने में एक पोस्ट देने का वायदा भी है । मौका और मोहाल दोनों ही माक़ूल हैं  सो, इस नामाक़ूल की कलम चले ? पहले यह तो पूछो, कि गायब ही क्यों था ? गायब हों
 
डा० अमर कुमार