कर्मनाशा's Image

कर्मनाशा

http://karmnasha.blogspot.com/
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
16 Jun 2010
कुल प्रविष्टियां
93
पाठक भेजे
5748
पसंद
340
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
61.81
पसंद करें
2
नापसंद करें

उजला होता जा रहा है अधिक उज्जवल

वह कथा साहित्य की गंभीर अध्येता हैं। वह अंग्रेजी साहित्य की अध्यापक हैं। वह चित्रकार हैं। वह सामाजिक सरोकारों से सक्रिय जुड़ा़व रखने वाली कार्यकर्ता हैं। वह अनुवादक हैं। वह संपादक हैं। वह अमेरिका के आयोवा विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय लेखन कार्यक्रम और
पसंद करें
3
नापसंद करें

रोहतांग : अपने - अपने हिस्से का हिमालय

यात्रा की थकान व खुमारी के उतरने के बाद स्मृतियों के उतराने और उन्हें उलीचने -समेटने - सहेजने के क्रम में मोबाइल और कैमरे से ली गईं तस्वीरों को एडिट करने की जुगत के बीच आज दोपहर के आलस्य में कुछ लिखा गया है। पता नही ये कवितायें हैं या कवितानुमा ट्रेवेलाग
टैग: कविता
पसंद करें
2
नापसंद करें

यात्रा और उसके बाद

'कर्मनाशा' पर लगभग महीने भर बाद वापसी हो रही है. कल सत्रह दिनों की यात्रा के बाद विराम पाया और खूब जी भरकर सोया. २३ मई की सुबह घर से निकलना हुआ था और ९ जून को वापसी हुई.इस बीच लिखत - पढ़त के साथ खूब घुमक्कड़ी भी हुई. जहाँ एक ओर धूप और घाम के साथ लू के
टैग: मौसम
पसंद करें
0
नापसंद करें
पसंद करें
2
नापसंद करें

मातृत्व : तनी हुई रस्सी पर

***  सुन रहा हूँ। आज सुबह से ही अखबार ,इंटरनेट और टीवी पर देख रहा हूँ कि आज 'मदर्स डे' है। इतने - इतने 'डे' हो गए हैं कि हिसाब रखना कठिन हो गया है और असल बात तो यह भी है कि हिसाब तो तभी रखा जाय जब जरूरत हो। दिन में कई बार सोचा कि चलो अपन भी 'मदर्स
पसंद करें
0
नापसंद करें

गुनगुनी बारिशें

If you are the forest of the cloudsI am the axe that parts it- Octavio Paz....... जिन चीजों में मन रमता है उनमें कविता का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है. दुनिया जहान की कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कितना - कितना कहा जा चुका है और कितना - कितना बाकी है फिर भी
पसंद करें
3
नापसंद करें

हल्का नहीं हुआ है गुलमुहर का लाल परचम

तुम्हारा नाम( दो कवितायें )०१-किसी फूल का नाम लिया और भीतर तक भर गई सुवासकिसी जगह का नाम लियाऔर आ गई घर की यादचुपके से तुम्हारा नाम लियाऔर भूल गया अपना नाम।०२-असमर्थ - अवश हो चले हैं शब्दकोशशिथिल हो गया है व्याकरणसहमे - सहमे हैं स्वर और व्यंजनबार - बार
टैग: कविता
पसंद करें
2
नापसंद करें

टप - टप चुएला पसिनवा बलम ..

आज गर्मी से तनिक राहत हैसुना है पहाड़ों पर बारिश हुई है और उसका असर तलहटी में दीख रहा है आज पसीने से देह चिपचिप नहीं हो रही है और खुद को भला - सा लग रहा है लेकिन ऐसा कभी - कभी होता है ऐसा कभी - कभार होना ही भला है, अगर रोज ही जिन्दगी की धूप में किसी का /
पसंद करें
4
नापसंद करें

प्रेम की पाठ्यपुस्तकें नहीं होतीं

सीरिया के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवियों में गिने जाने वाले महान अरबी कवि निज़ार कब्बानी (1923-1998) की कुछ कविताओं के अनुवाद आप पहले भी पढ़ चुके हैं । आज प्रस्तुत है उनकी दो छोटी कवितायें : (अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)०१- विलग करो वसन विलग करो वसन निज देह
पसंद करें
3
नापसंद करें

नहीं निगाह में मंजिल

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यह ग़ज़ल मुझे बहुत प्रिय है।आबिदा परवीन के स्वर में इसे सुनना तो एक अलग ही किस्म का अनुभव होता है। कैसा अनुभव ? अब क्या बताया जाय ! ऐसा किया जाय कि इसे पढ़ा और सुना जाय ..बस्स... नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही। नहीं विसाल मयस्सर
पसंद करें
3
नापसंद करें

तुम्हारे पाँव

इधर कुछ समय से कई तरह की व्यस्तताओं और यात्राओं के चलते लिखना - पढ़ना लगभग छूटा - सा हुआ है। देह थक जाती है तो दिमाग भी विश्रांति की दरकार करने लगता है और लगता है 'दिल ढूँढता है फिर वही फुरसत के रात दिन' जैसे वाक्यांश कहीं खो से गए हैं लेकिन नींद का उत्सव
पसंद करें
3
नापसंद करें

कितना कठिन और लम्बा है 'प्रेम' जैसे एक छोटे से शब्द का उच्चारण

कई दिन हुए कुछ लिखना हो न सका। नियमित लिखा जाय यह जरूरी तो नहीं। और सिर्फ लिखने के लिए लिखना....! आज अभी कुछ देर पहले ही कुछ यूँ - सा बन गया। अगर यह कविता है तो आज आपके साथा साझा करते हैं चार कवितायें। इनके वास्ते शीर्षक भी कुछ सूझ नहीं रहा है। फिर वही
टैग: कविता
पसंद करें
3
नापसंद करें

एक स्त्री की कर्मकथा

विश्व कविता के पाठकों और प्रेमियों के लिए आज एक और महत्वपूर्ण कविता का अनुवाद। स्त्री स्वाधीनता आन्दोलन के सौ बरस पूरे होने के उपलक्ष्य में भारत और पूरी दुनिया में स्त्री के संघर्ष और सृजन को रेखांकित करने के उद्देश्य से तमाम तरह के कार्यक्रमों का
पसंद करें
2
नापसंद करें

चलो अब घर चलें दिन ढल रहा है

* * *'कर्मनाशा' पर इधर कुछ समय से अपनी और अनूदित कविताओं की आमद अपेक्षाकृत अधिक रही है और यह भी कि अपनी कई तरह की व्यस्तताओं और यात्राओं के कारण बहुत कम पोस्ट्स लिख पाया हूँ। वैसे भी ब्लागिंग के वास्ते इतना ( ही / भी ) समय निकल पा रहा है यह कोई कम अच्छी
पसंद करें
0
नापसंद करें

सर्वनाम /दून्या मिख़ाइल की कविता

विश्व कविता के पाठकों / प्रेमियों के लिए दून्या मिखा़इल कोई नया नाम नहीं है। १९६५ में जन्मी अरबी की इस युवा कवि को दुनिया भर में प्रतिरोध की कविता के एक महत्वपूर्ण स्त्री स्वर के लिए जाना जाता है। आज प्रस्तुत है उनकी एक छोटी किन्तु बेहद चर्चित कविता का
पसंद करें
1
नापसंद करें

कविता की रोटी की पाकविधि / रेसिपी

* इस ठिकाने पर अक्सर विश्व कविता के अनुवाद को प्रस्तुत किया जाता रहा है। इसी क्रम में आज प्रस्तुत है जापान के मशहूर कवि , अनुवादक और अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर नाओशी कोरियामा की एक बहुपठित और बहुचर्चित कविता जिसका शीर्षक है ' कविता की रोटी'। यह उनसठ पंक्तियों
पसंद करें
0
नापसंद करें

हिन्दी , भूमंडलीकरण ,अनुवाद , कविता ,ब्लागिंग और उर्फ़ मेरठ विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय सेमीनार की याद

पिछले माह की १२ - १४ तारीख को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा 'भूमंडलीकरण और हिन्दी' विषयपर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमीनार सफलता पूर्वक संपन्न हो गया जिसकी विस्तृत रपटें समाचार पत्रों , पत्रिकाओं , वेबसाइट्स और ब्लाग्स पर
टैग: आसपास
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक पक्षी के साथ सुबह

* आज की सुबह एक पक्षी के साथ हुई। अपनी बैठक का परदा जब धीरे से सरकाया तो खिड़की के बाहर गमले का निरीक्षण करते हुए एक पाखी को पाया।* रूप - रंग का क्या करूं बखान ! कमरे के भीतर से ही मोबाइल से खींची गईं दो तस्वीरें हाजिर हैं श्रीमान !*मन में आया है अभी कुछ
टैग: कविता
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक लड़की / पालतू बिल्ली : एज़रा पाउंड की दो कवितायें

तारीख : ११ मार्च / रात ( या प्रभात ! / ? ) १२: २८ ए० एम०आज याद आया कि फरवरी २०१० में कई - कई कुछ छोटी कुछ लम्बी यात्राओं की वजह से लिखना - पढ़ना बस यूँ ही - सा रहा है। मार्च का एक सप्ताह भी कुछ ऐसा ही... यह भी याद आया कि बहुत दिनों से किसी कविता का अनुवाद
पसंद करें
0
नापसंद करें

वह अब भी पत्थर तोड़ रही है

आज पुरानी डायरी से अपनी एक पुरानी कविता ...वह अब भीइलाहाबाद के पथ परपत्थर तोड़ रही है।और अब भीढेर सारे निराला उस पर कविता लिख रहे हैं।अब भीनहीं उगा है कोई छायादार वृक्षजिसके तलेउसका बैठना किया जा सके स्वीकार।उसके हाथ का गुरु हथौड़ाअब भी प्रहार किए जा रहा
टैग: कविता
Mar 08 2010 07:15 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

दिन : वे दिन , ये दिन ( बरास्ता निर्मल वर्मा के शीर्षक)

आज सुबह - सुबह निर्मल जी की याद आ गई - निर्मल वर्मा (३ अप्रैल १९२९- २५ अक्तूबर २००५) की। यह शायद इसलिए हुआ हो कि बहुत दिनों से उन पर लिखना टल रहा है। लिखना, मतलब लिखना । अपने पेशे की माँग और पुर्ति के बीच संतुलन साधने की कवायद में बहुत कुछ लिखा है उनके
टैग: कविता
Mar 04 2010 02:39 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

होली : हम - तुम

पाँच छोटी शीर्षकहीन कवितायें*गुझिया मेंयह जो भर गई है मिठासइसका उत्स है तुम्हारे ही आसपास। * * आज से शुरु हो गया है मेरा अवकाश आज से बढ़ गया है तुम्हारा काम आज बहुत देर तक पढ़ता रहा नज़ीर और निज़ार। याद आता रहा ताज याद आती रही रेतीले बगूलों की कतार। तुम्हीं
टैग: कविता
Feb 26 2010 09:14 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

जोगीड़ा सारा रारा ...

लीं साहेब 'सुरु' हो गयल फ़गुआ ...गाईं , बजाईं चाहे खाली सुनीं आ राग ताल पर माथा धूनीं ॥फगुआ त ह..यह होली गीत या फगुआ भोजपुरी इलाके में कई रूपों में ( कुछ शब्दों के हेरफेर के साथ ) मिलता है लेकिन इसमें उल्लास और मस्ती सब जगह एक जैसी ही पाई जाती है। आज
Feb 21 2010 08:59 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

'न हो कोई पहचान' और एक पहेली

आज कुछ नहीं , बस्स , बाबा बुल्ले शाह की एक पंक्ति और इस अकिंचन द्वारा किया गया उसका अनुवाद : चल वे बुल्लेया ! चल ओत्थे चल्लिए , जित्थे सारे आन्ने ! ना कोई साड्डी जात पिछाने , ते ना कोई सानू मान्ने ! *******चलो बुल्ला ! चलो वहाँ चलें जहाँ है अन्धों का
Feb 16 2010 07:46 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

राह बस एक

खोजते - खोजतेबीच की राहसब कुछ हुआ तबाह।बनी रहे टेकराह बस एक।
टैग: कविता
पसंद करें
1
नापसंद करें

वसन्त का कोई शीर्षक नहीं

सुन रहा हूँ कि वसन्त आ गया है! आज कुछ यूँ ही लिख दिया है कविता की तरह..इस यकीन के साथ कि यदि निज व निकट के जीवन प्रसंगों में कहीं नहीं दिखता है वसन्त तो कविता में , और सिर्फ कविता में वह तो है मात्र एक स्वप्न ..एक क्षतिपूर्ति..शीत से सिहरे दिनों में
टैग: कविता
पसंद करें
0
नापसंद करें

बाहर लगातार बढ़ रहा है सूर्य का ताप

कल दिन भर घर से बाहर रहा। दोपहर में आनेवाला अखबार भी नहीं देख सका। अगर शाम को एक सहकर्मी का एस।एम.एस. न आता तो ध्यान भी न आता कि आज ( २४ जनवरी को ) 'नेशनल गर्ल चाइल्ड डे' है। इसके बाद बिटिया ने अखबार सामने धर दिया कि बाँचो। देखा तो अखबार के कुल तीन पृष्ठ
टैग: कविता
पसंद करें
0
नापसंद करें

वसंतागम और 'सब्जी है उपहार प्रकृति का'

शिशिर का हुआ नहीं अन्तकह रही है तिथि कि आ गया वसन्त !अभी कुछ देर पहले एक कार्यक्रम से लौटा हूँ। सरस्वती पूजा , वसन्त पंचमी और निराला जयन्ती को लेकर कस्बे में एक आयोजन था जिसमें बहुत कुछ सुनने को मिला। आज सुबह का अख़बार भी ' सखि वसन्त आया' की पंक्ति लेकर
टैग: कविता
पसंद करें
3
नापसंद करें

विबग्योर बिखराए प्रेम का यह प्रिज्म

छंदबद्ध, लयबद्ध व तुकान्त कविताओं के लिए मेरे मन में बहुत आदर का भाव है किन्तु जबरदस्ती की तुकमिलावन और त्वरित तुकबन्दी को पढ़ने - गढ़ने के लिए मेरे पास न तो समय है और न जगह। आज यूँ ही फरमाइश पर कुछ लिख रहा था और जब उसका पहला ड्राफ़्ट घर में सुनाया तो हाय -
टैग: कविता
पसंद करें
0
नापसंद करें

पृथ्वी की उर्वरा को निचोड़कर

आजकल सर्दी सब पर भारी है। बीच - बीच में घना कोहरा भी घिर आता है। आज तो पूरे दिन कोहरा बूँद - बूँद कर बरसता रहा। फिर भी सब कुछ अपनी चाल चल रहा है। अभी कुछ देर पहले ही कुछ लिखा है उसी का एक कवितानुमा हिस्सा साझा करते हैं सबके साथ :सुन्दर - असुन्दरजो सहा
टैग: कविता
पसंद करें
0
नापसंद करें

अब मैं अनुपस्थित इच्छाओं की एक चमकीली राख हूँ

आधुनिक पोलिश कविता के बड़े नामों -विस्वावा शिम्बोर्स्का और हालीना पोस्वियातोव्सका की कवितायें आप इसी जगह पढ़ चुके हैं। ये वे नाम हैं जिनके कारण पोलैंड के साहित्य के जरिए एक दुनिया से परिचित होते हैं और अपनी दुनिया को एक नई निगाह से देखने के लिए कोशिश की एक
पसंद करें
2
नापसंद करें

हैप्पी - हैप्पी के हर्षातिरेक में उभ-चुभ कर रहा है सारा संसार

आज नए साल का पहला दिन है। सभी को नया साल मुबारक! हैप्पी न्यू ईयर ! नए वर्ष की मंगलकामनायें !परसों एक नया कैलेण्डर खरीदकर लाया था और कल एक नई कविता लिखी गई जो शाम को जाते हुए साल की विदाई और नए साल की अगवानी में आयोजित में आयोजित एक कवि गोष्ठी में सुनाई
टैग: कविता
पसंद करें
3
नापसंद करें

बिछोह से खुलते हैं मोह के नए मानी

पतझर पील़ा पड़ गया पत्ता झरने को है वृक्ष से समय - समुद्र में विलीन होने को विकल है एक बूँद। बीते वक्त पर खीझना भी है रीझना भी ऐसे ही चलना है जीवन को सोचें क्या किया ? करना है क्या ? पढ़ना है पुराने हर्फ निकालना है नये अर्थ नई इबारतों से भरना है नए साल
पसंद करें
6
नापसंद करें

एक स्त्री की लेखनी का स्पर्श चीजों के मायने बदल देता है

आज बड़ा दिन है। अब तो कुछ ही देर में 'है' के स्थान पर 'था' कहना पड़ेगा। आज क्या किया? सुबह थोड़ी देर से सुबह हुई। हर काम में थोड़ी - थोड़ी देरी हुई जैसे कि आज शाम भी थोड़ी देर से हुई लेकिन इस अलसाई सुबह में नाश्ते के बाद हुआ यह कि छत पर लेटे - लेटे याद किय
पसंद करें
2
नापसंद करें

वान गॉग इसे उठाकर रोप देता है अपने कैनवस पर

हालीना पोस्वियातोव्सका की बहुत सी कविताओं के अनुवाद आप पहले भी पढ़ चुके हैं। आज एक खास कविता, इसमें पोलैंड की इस महान कवयित्री का जीवन और निजी अनुभव संसार तो है ही महान चित्रकार विन्सेन्ट वान गॉग का एक चित्र * भी अपनी पूरी भव्यता व दिव्यता के साथ चमक
पसंद करें
4
नापसंद करें

भँवरे की एक गूँज हिलाकर रख देती थी समूचा भुवन

त्रैमासिक पत्रिका 'बया' ( संपादक : गौरीनाथ) के जुलाई - सितम्बर २००९ के अंक में अपनी चार कवितायें प्रकाशित हुई हैं। हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया के बहुत से पाठकों तक हो सकता है कि 'बया' की पहुँच न हो किन्तु यह एक अच्छी और पठनीय पत्रिका है जो अंतिका
पसंद करें
4
नापसंद करें

बाज़ार , जाम , कविता.. और ब्लाग कविता जैसी कोई चीज है क्या ?

अपने गाँव से कस्बे तक पहुँच कर बाज़ार को पार करना और कार्यस्थल तक पहुँचना व वहाँ से वापसी ट्रैफिक जाम की वजह से दिनोंदिन एक दुखदायी काम होता जा रहा है। आज से कुछ साल पहले तक इस जगह ऐसा नहीं होता था। लोगबाग कहते हैं अपना कस्बा अब शहर होता जा रहा है , द
पसंद करें
3
नापसंद करें

हमारी लालसाओं की धधकती भठ्ठी की आँच से पिघल रही है जिसकी धवल देह

रामगढ़ ( जिला : नैनीताल ) उत्तराखंड महादेवी वर्मा सृजन पीठ में आयोजित 'हिन्दी कहानी और कविता पर अंतरंग बातचीत' के दो दिवसीय आयोजन ( ३० एवं ३१ अक्टूबर २००९ ) के दो दिनों के दौरान तीन कवितायें लिखी थीं जिनमें से दो को तो इसी जगह प्रस्तुत कर चुका हूँ। आज
पसंद करें
0
नापसंद करें

फिर - फिर यह कविताई !

चलो अब सो जाओ रे भाई !असरा - पसरा है सन्नाटा देखो रात अधियाई।चिड़िया - चरगुन सोय रहे हैं सोयें कुकुर -बिलाई।पर तुम जाग - जागकर भैया करते कौन कमाई ?उजले कागज को काला कर लिखते कौन लिखाई ?जिसको तुम कविता कहते हो वह तो तुकम - तुकाई।जग है , स्याना मारे , ताना
टैग: कविता
पसंद करें
5
नापसंद करें

जैसे कि किसी लम्बे वाक्य से गिर पड़ता है एक शब्द

कल दिलीप चित्रे नहीं रहे। साहित्य और सिनेमा तथा चित्रकला की दुनिया में उन्हें बहुत आदर के साथ याद किया जाता है। अब यह कहते हुए कितना अजीब-सा लग रहा है कि वे हमारे बीच नहीं हैं। हमारे साथ अगर कुछ है तो उनका विपुल सृजन और बेशुमार यादें। शायद ऐसे ही मौक