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17 Jun 2010
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हिन्दी ब्लागीर पर हिंसक हमला, पुलिस और विधायक गुंडो के साथ

एक इंजिनियर पाँच वर्ष पूर्व कंप्यूटर ले कर अपने गाँव जा बसा। इस लक्ष्य को ले कर कि वह अपने गाँव को बदलने से अपने अभियान को आरंभ करेगा। कंप्यूटर के उपयोग से पहली समस्या आरंभ हुई। गाँव में वैध बिजली कनेक्शन नाम के थे। नतीजा ये कि वोल्टता 230 के स्थान पर 50
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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'भगवान' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का अष्टम सर्ग

'भगवान' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का अष्टम सर्ग #fullpost{display:none;} अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के आठ सर्ग पढ़ चुके हैं। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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न जात पाँत, न कोर्ट कचहरी, न तलाक, एक बस नेह का नाता

'कहानी'एक बस नेह का नाता दिनेशराय द्विवेदी धोबी का छोरा, धोबी का काम पसंद नहीं आया। चला कमाने शहर में। बड़े शहर में काम ना मिला तो चला गया छोटे शहर में। वहाँ एक ईंट भट्टे पर काम करने लगा। तनखा नहीं थी, काम के हिसाब से पैसे मिलते थे। खूब काम करता खूब
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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विधि मंत्री मोइली देश और सु्प्रीमकोर्ट से माफी मांगे और अपने पद से त्यागपत्र दें

भोपाल गैस त्रासदी संबंधित अदालत के निर्णय और उस के बाद जिस तरह से परत-दर-परत तथ्यों का रहस्योद्घाटन हुआ है उस ने मौजूदा शासकवर्ग (भारतीय पूंजीपति-भूस्वामी-और साम्राज्यी पूंजीपति) को संकट में डाल दिया है। भारत में उन का सब से बड़ा पैरोकार राजनैतिक दल
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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साँप सालों पहले निकल गया, लकीर अब तक पीट रहे हैं

साँप तो निकल कर जा चुका है, और जिसे मौका लग रहा है वही लकीर पीट रहा है। जब मामले में अदालत का निर्णय आया तो न्यायपालिका को कोसा जा रहा था, साथ ही दंड संहिता की खामियाँ गिनाई जा रही थीं। निश्चित ही न्यायपालिका का इस में कोई दोष नहीं। उस का काम सरकार
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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श्रवण जी! अब क्या बचा है? भरोसा तो उठ चुका है

आज भास्कर में श्रवण गर्ग की विशेष टिप्पणी  "डर त्रासदी का नहीं भरोसा उठ जाने का है", मुखपृष्ठ पर प्रकाशित हुई है। आप इस टिप्पणी को उस के शीर्षक पर चटका लगा कर पूरा पढ़ सकते हैं। यहाँ उस का अंतिम चरण प्रस्तुत है--हकीकत तो यह है कि अपनी हिफाजत को लेकर
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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भोपाल के इंसाफ ने राज्य के चरित्र को फिर से उघाड़ दिया है

भोपाल गैस कांड से उद्भूत अपराधिक मामले में आठ आरोपियों को मात्र दो वर्ष की कैद और मात्र एक-एक लाख रुपया जुर्माने के दंड ने एक बार फिर उसी तरह भारतीय जनमानस को उद्वेलित कर दिया है जिस तरह भोपाल त्रासदी के बाद के कुछ दिनों में किया  था। इस घटना ने
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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आखिर किस से मापें? तेरा माप

आखिर किस  से मापेंतेरा मापसारे पैमाने देख लिएमाप करभोपाल दुखांतिकाके अपराधियों को दिया गया दंडआज वह भी देख लियासरकारी आँकड़ों मेंसिर्फ साढ़े तीन हजारबचाव करने वालों के मुताबिकपच्चीस हजार लोगों कीजान लील लेने वालेहजारों और कोसदा के लिये बीमारकर देने
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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'वीर भोग्या वसुन्धरा' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का अष्टम सर्ग

अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के सात सर्ग पढ़ चुके हैं। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग परिवर्तन के साथ ही
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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मनुष्य की मूलभूत जैवीय जरूरतें ही उस के विचारों को संचालित करती हैं।

विगत आलेख जनता तय करेगी कि कौन सा मार्ग उसे मंजिल तक पहुँचाएगा पर आई टिप्पणियों ने कुछ प्रश्न खड़े किए हैं, और मैं महसूस करता हूँ कि ये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन प्रश्नों पर बात किया जाना चाहिए।  लेकिन पहले बात उन टिप्पणियों की जो विभिन्न ब्लागों पर
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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जनता तय करेगी कि कौन सा मार्ग उसे मंजिल तक पहुँचाएगा

कल बंगाल में स्थानीय निकायों के चुनाव के नतीजे आए। भाकपा (मार्क्स.) के नेतृत्व वाले वाममोर्चे को करारी शिकस्त का मुहँ देखना पड़ा। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को अच्छी-खासी जीत मिली। आम तौर पर इस तरह के नतीजे देश के दूसरे भागों में आते
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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कामरेड! अब तो कर ही लो यक़ीन, कि तुम हार गए हो

कामरेड!अब तो कर ही लो यक़ीन कि तुम हार गए होअनेक बार चेताया था मैं ने तुम्हेंतब भी, जब मैं तुम्हारे साथ थाकदम से कदम मिला कर चलते हुएऔर तब भी जब साथ छूट गया थातुम्हारा और हमारायाद करो!क्या तय किया था तुमने?छियालीस बरस पहले जब यात्रा आरंभ की थी तुमने कि
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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'गुलाम तब जागे' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का सप्तम सर्ग

अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के छह सर्ग पढ़ चुके हैं। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग परिवर्तन के साथ ही
 
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मनुष्य के श्रम से विलगाव के जैविक और सामाजिक परिणाम

आज सुबह अदालत में जब हम चाय के लिए  जा रहे थे तो वरिष्ट वकील महेश गुप्ता जी ने पीछे से आवाज लगाई। मैं मुड़ा तो देखता हूँ कि पंचानन गुरू मौजूद हैं। वे मुझे याद कर रहे थे। वे कोटा की पहली पीढ़ी के वामपंथियों में से एक हैं। अपने जमाने में उन्हों ने इस
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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'पितृभाग' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का षष्टम सर्ग

अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के चार सर्ग पढ़ चुके हैं। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग परिवर्तन के साथ ही
 
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स्वर्ण बनाने का सूत्र

ये सज्जन अदालत परिसर में दुकान लगाते हैं, पकौड़ियाँ बनाने और बेचने में माहिर हैं। सज्जन हैं, सुबह से ही विजया के आनंद में मगन रहते हैं। दिन भर में पकौड़ियाँ और चाय बेच कर अपना गुजारा चलाते हैं। पिछले कुछ दिनों से इन की दुकान पर यह बैनर लगा दिखाई पड़ता
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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तात्कालिक मुनाफे की अर्थव्यवस्था के परिणाम

नंगे पहाड़आज तक जितनी भी उत्पादन-प्रणालियाँ रही हैं, उन सब का लक्ष्य केवल श्रम के सब से तात्कालिक एवं प्रत्यक्षतः उपयोगी परिणाम प्राप्त करना मात्र रहा है। इस के आगे के परिणामों की, जो बाद में आते हैं तथा क्रमिक पुनरावृत्ति एवं संचय द्वारा ही
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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देश के सब से गर्म शहर का एक दिन

पाठकों और मित्रों!आज न तो तीसरा खंबा पर कोई पोस्ट हुई और न ही अनवरत पर। आज गर्मी का यह आलम रहा कि दिन में जो काम होने थे उन में से अनेक छूट गए। सुबह साढ़े पाँच बजे उठा और बाहर निकल कर देखा तो तेज गर्म हवा चल रही थी। सुबह सुबह लू को चलते देख मैं स्तंभित
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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प्रकृति उस पर हर विजय का हम से प्रतिशोध लेती है

प्रकृति पर अपनी मानवीय विजयों के कारण हमें आत्मप्रशंसा में विभोर नहीं हो जाना चाहिए, क्यों कि वह हर ऐसी विजय का हम से प्रतिशोध लेती है। यह सही है कि प्रत्येक विजय से प्रथमतः वे ही परिणाम प्राप्त होते हैं जिन का हम ने भरोसा किया था, पर द्वितीयतः और
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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'पार्वती' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का पंचम सर्ग

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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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श्रम - मनुष्य तथा अन्य पशुओं के बीच अंतिम एवं सारभूत अंतर

भारतीय प्राचीन आवास (मोहेन्जोदड़ो)जिस तरह मनुष्य ने सभी भक्ष्य वस्तुओं को खाना सीखा, उसी तरह उस ने किसी भी जलवायु में रह लेना भी सीखा। वह समूची निवास योग्य दुनिया में फैल गया। वही एक मात्र पशु ऐसा था जिस में खुद-ब-खुद ऐसा करने की क्षमंता थी। अन्य
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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श्रीमद्भगवद्गीता के साथ मेरे अनुभव

डॉ. अरविंद मिश्र ने आज समूचे ब्लागजगत से पूछ डाला -आपने कभी गीता पढी है ? अब मैं इस प्रश्न का क्या उत्तर देता? हमारे यहाँ श्रीमद्भगवद्गीता की यह स्थिति है कि उस की कम से कम पाँच-दस प्रतियाँ हर वर्ष घर में अवश्य आ जाती हैं, और उन्हें फिर आगे भेंट कर दिया
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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उन्नीस मई का दिन, शादी के बाद की पहली रात

रात्रि एक बजे सरदार को फिर घोड़ी पर बिठाया गया। इस बार जलूस सीधे दुल्हिन के घर पहुँचा। तोरण मार अंदर पहुँचे तो कन्यादान हुआ और दुल्हा-दुल्हिन के बाएँ हाथ बीच में मेहंदी और कुछ अन्य चीजों की पिसी लुगदी रख सूत के लच्छे से बांध दिए गए। फिर बंधे बंधे ही मंडप
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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अठारह मई का वह दिन !!!

अठारह मई का वह दिन कैसे भूला जा सकता है? दो बरस पहले से जिसे देखने और मिलने की आस लगी थी वह इस दिन पूरी होने वाली थी। हुआ यूँ था ............ गर्मी की छुट्टियां थीं और मौसी की लड़की की शादी। सारा परिवार उस में आया था। सरदार, बाबूजी. माँ, बहनें और
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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'अग्नि देवता' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का चतुर्थ सर्ग

अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के तीन सर्ग पढ़ चुके हैं। इन कड़ियों को ऊपर दिए गए लिंक पर क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग परिवर्तन के साथ ही
 
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वानर से नर और लुटेरी अर्थव्यवस्था से पशुपालन तक

पेड़ों पर चढ़ने वाले एक वानर-दल से मानव-समाज के उदित होने से निश्चय ही लाखों वर्ष - जिन का पृथ्वी के इतिहास में मनुष्य-जीवन के एक क्षण से अधिक महत्व नहीं है, गुजर गए होंगे। परन्तु उस का उदय हो कर रहा। और यहाँ फिर वानर-दल एवं मानव-समाज मं हम क्या विशेष
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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शायर और गीतकार जावेद अख़्तर को मिली धमकी की निंदा और धमकी देने वाले के विरुद्ध त्वरित सख्त कार्रवाई की मांग करें।

भारत देश का शासन संविधान से चलता है और वह इस देश की सर्वोच्च विधि है। इस विधि के अंतर्गत सभी को अपने विचार अभिव्यक्त करने की आजादी है। किसी भी मुद्दे पर इस देश का कोई भी नागरिक स्वतंत्रता पूर्वक अपने विचार अभिव्यक्त कर सकता है। कुछ दिनों पहले देवबंद के
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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आलोचना, चाटुकारिता और निन्दा - अपराध और परिवीक्षा

हमारे पास माध्यम के रूप में सब से पहले काव्य कृतियाँ सामने आईं जो लिखित न होते हुए भी श्रुति से हमारे बीच थीं। इन कृतियों में सब कुछ था। जीवन था, जीवन का दर्शन था, जगत की व्युत्पत्ति की व्याख्या थी, सौन्दर्य था, अभिव्यक्ति थी और भी बहुत कुछ था। श्रुति के
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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"पौरुष और कला" - यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का तृतीय सर्ग

#fullpost{display:inline;} प्रथम सर्ग  ; धऱती माता' (पूर्वार्ध) प्रथम सर्ग "धऱती माता" (उत्तरार्ध)द्वितीय सर्ग "मनुष्य का विकास"अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के दो सर्ग पढ़ चुके हैं। इन कड़ियों को ऊपर
 
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थ्यों की पर्याप्तता और सत्यता

पाठकों और मित्रों !अनवरत की यह 500वीं प्रस्तुति है।  जब मैं ने अपना पहला ब्लाग 'तीसरा खंबा' आरंभ किया था तो मैं ने  सोचा भी न था कि मैं कोई दूसरा ब्लाग जल्दी ही आरंभ कर दूंगा। लेकिन यहाँ बातचीत का जो माहौल था,  उस ने मुझे प्रेरित किया कि
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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मनुष्य के वाक् और मस्तिष्क का विकास

परन्तु हाथ अपने आप में ही अस्तित्वमान न था। वह तो एक पूरी अति जटिल शरीर-व्यवस्था का एक अंग मात्र था। और जिस चीज से हाथ लाभान्वित हुआ, उस से वह पूरा शरीर भी लाभान्वित हुआ जिस की हाथ खिदमत करता था। यह दो प्रकार से हुआ।पहली बात यह कि शरीर उस नियम के परिणाम
 
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मनुष्य के हाथ श्रम की उपज हैं।

अर्थशास्त्रियों का दावा है कि श्रम समस्त संपदा का स्रोत है। वास्तव में वह स्रोत है, लेकिन प्रकृति के बाद। वही इसे वह सामग्री प्रदान करती है जिसे श्रम संपदा में परिवर्तित करता है। पर वह इस से भी कहीं बड़ी चीज है। वह समूचे मानव-अस्तित्व की प्रथम मौलिक शर्त
 
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"मनुष्य का विकास" - यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का द्वितीय सर्ग

प्रथम सर्ग  ; धऱती माता' (पूर्वार्ध) प्रथम सर्ग "धऱती माता" (उत्तरार्ध)अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के प्रथम सर्ग धरती माता का पूर्वार्ध और उत्तरार्ध पढ़ चुके हैं। इन दोनों कड़ियों को ऊपर दिए गए लिंक
 
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फ्रेडरिक ऐंगेल्स का कार्ल मार्क्स की समाधि पर दिया गया भाषण

14 मार्च को तीसरे पहर, पौने तीन बजे, संसार के सब से महान विचारक की चिंतन-क्रिया बंद हो गई। उन्हें मुश्किल से दो मिनट के लिए अकेला छोड़ा गया होगा, लेकिन जब हम लोग लौट कर आए, हमने देखा कि वह आरामकुर्सी पर शांति से सो गए हैं -परन्तु सदा के लिए। इस
 
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मात्रात्मक परिवर्तन हो रहे हैं तो गुणात्मक भी होंगे

बेटी नौकरी करने के साथ अपना सारा काम खुद करती है। आवास की सफाई, खाना बनाना, कपड़े धोना, उन पर इस्त्री करना आदि आदि जो भी घर के काम हैं। उसे सफाई के लिए एक हेंडी वैक्यूम क्लीनर चाहिए था। मुझे पता नहीं था कहाँ मिलेगा। हम दोनों कल शाम बाजार निकले। कुछ जगह
 
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मैं वकील, एक आधुनिक उजरती मजदूर, अर्थात सर्वहारा ही हूँ।

पिछले आलेख में मैं ने एक कोशिश की थी कि मैं आम मजदूर और सर्वहारा में जो तात्विक भेद है उसे सब के सामने रख सकूँ। एक बार मैं फिर दोहरा रहा हूँ कि सर्वहारा का तात्पर्य उस 'आधुनिक उजरती मजदूर से है जिस के पास उत्पादन के अपने साधन नहीं होते और जो जीवन यापन के
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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यह भ्रम भी एक दिन टूटेगा

कल एक मई, मजदूर दिवस था। हिन्दी ब्लाग जगत में बहुत आलेख इस विषय पर या मजदूरों से संबंधित विषयों पर पढ़ने को मिले। अखबारों और पत्रिकाओँ की यह रवायत बन गई है कि किसी खास दिवस पर उस से संबंधित आलेख लिखें जाएँ और प्रकाशित किए जाएँ।  टीवी चैनल भी उन का
 
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दादा जी! जरा अपने पोते पोतियों के दोस्त तो बनें!

श्री विष्णु बैरागी जी के ब्लाग एकोऽहम् पर कुछ दिन पहले एक पोस्ट थी  'वृद्धाश्रम: मकान या मानसिकता। मैं ने इस पर टिप्पणी की थी "काका साहब बेटे बहू और पोते पोती के दोस्त क्यों नहीं बन जाते हैं? क्यों दादा ही बने रहना चाहते हैं? मेरे पिता जी के काका जी
 
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ठंडा ठंडा मटके का पानी गर्मी में प्यास बुझाए, तडपते तन-मन को फिर से प्राण लौटाए

 अखबार में खबर है, कोटा के जानकीदेवी बजाज कन्या महाविद्यालय को एक वाटर कूलर भेंट किया गया। पढ़ते ही वाटर कूलर के पानी का स्वाद स्मरण हो आता है। पानी का सारा स्वाद गायब है। लगता है फ्रिज से बोतल निकाल कर दफत्तर की मेज पर रख दी गई है। बहुत ठंडी है
 
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एक राजनेता की मौत

महामहिम के देहांत का समाचार मिलने पर बहुत लोगों को शॉक (झटका) लगा था। वे अभी तीन माह पहले ही तो राज्य की राज्यपाल बनाए गए थे। उस समय किसी ने यह थोड़े ही सोचा था कि वे इतनी जल्दी विदा ले जाएँगे, और वे भी इस तरह पद पर बने रहते हुए। पर यह तो होता ही है, जो
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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