बेदखल की डायरी's Image

बेदखल की डायरी

http://bedakhalidiary.blogspot.com/
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
03 Apr 2010
कुल प्रविष्टियां
39
पाठक भेजे
3638
पसंद
159
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
93.28
पसंद करें
5
नापसंद करें

अजनबी भाषा का वह शहर और तीन लड़कियां

हॉस्‍टल के कमरे में वो तीन लड़कियां साथ रहती थीं। सदफ, शिएन और अपराजिता। सदफ हमेशा चहकती, मटकती सारी दुनिया से बेपरवाह अपनी रंगीन खुशियों में खोयी रहती थी। ज्‍यादातर समय दोस्‍तों के साथ घूमती-फिरती और रात होने से पहले ही कमरे में नमूदार होती। लौटकर भी
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
8
नापसंद करें

जीवन की छोटी मामूली बातें

ये प्‍यार जताना, पकड़ना किसी का हाथ, कहना I love you, ये क्‍यों इतना जरूरी है? जो न कहो तो कुछ फर्क पड़ता है क्‍या? जो मैं ये न कहूं किसी से या कि कोई मुझसे तो क्‍या बिगड़ता है? कितनी मामूली बातें? जीवन की ये बहुत छोटी, मामूली बातें, इनसे सचमुच कुछ बदलता
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
9
नापसंद करें

प्‍यार की भाषा कहां खो गई है

अभी कुछ दिन पहले हिंदी के कवि चंद्रकांत देवताले जी के किसी परिचित से मेरी मुलाकात हुई। उसने बताया कि देवताले जी से उसने मेरे बारे में काफी कुछ सुन रखा है और बातचीत के दौरान ही उसने एकदम से पूछ लिया, ‘जब वो वेबदुनिया में आपसे मिलने आए थे तो आपने उन्‍हें
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
11
नापसंद करें

We all shit, we all pee but we never talk about it - 2

बंबई में फिल्‍म रिपोर्टिंग करते हुए जब तक मैं खुद इस दिक्‍कत से नहीं गुजरी थी, मेरे जेहन में ये सवाल तक नहीं आया था। पब्लिक टॉयलेट यूज करने की कभी नौबत नहीं आई, इसलिए उस बारे में सोचा भी नहीं। लेकिन अब अपनी दोस्‍त लेडी डॉक्‍टर्स से लेकर अनजान लेडी
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
8
नापसंद करें

We all shit, we all pee but we never talk about it

अगर मैं ठीक-ठीक याद कर पा रही हूं तो ये पिछली गर्मियों की किसी तपती दोपहरी वाले दिन घटी घटना है। मैं घर में अकेली थी कुछ-कुछ फुरसतिया मूड में कभी इधर, कभी उधर बैठकर टाइम पास करती। तभी दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजे पर दो महिलाएं खड़ी थीं। मेरे दरवाजा खोलते
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
8
नापसंद करें

We do not belong to your world

मैंने नहीं देखी है आज तक कोई बोहेमियन औरत, लेकिन हमेशा से सोचती रही हूं कि काश कि जीवन ऐसा हो कि कल को अपनी आत्‍मकथा लिखूं तो उसका नाम रख सकूं – एक बोहेमियन औरत की डायरी। लेकिन चूंकि मैं जिस देश और जिस समाज में पैदा हुई, वहां ऐसे बेजा ख्‍यालों तक की आमद
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
3
नापसंद करें

आवाज का घर

Normal 0 MicrosoftInternetExplorer4 /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt;
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
0
नापसंद करें

देखी है कोई बोहेमियन औरत ?

हम कौन हैं? हम क्‍यों हैं? क्‍या है हमारे होने का मतलब? हम क्‍यों होना चाहते हैं? क्‍यों होना चाहिए हमें? जो न हों तो किसका क्‍या बिगड़ता है? क्‍या आता है, क्‍या चला जाता है? हमारा ये होना हमारे लिए है या कि किसके लिए? इस सृष्टि के एक कण से बनी मैं, मेरे
 
मनीषा पांडे
Feb 25 2010 12:09 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

सिनेमाई झरोखों से जिंदगी की झलक

अजय जी के पुरजोर इसरार पर मैंने महीनों टालने के बाद मेरी जिंदगी में सिनेमा के अनुभवों से जुड़ा ये एक पीस लिखा था, जिसे उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग चवन्‍नी चैप पर लगाया है। किताबों पर लिखते हुए उसी रौ में मैंने सिनेमा पर भी कलम घसीट डाली। क्‍या है, कैसी है, पढ़ने
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक बेचैन पत्‍नी का आत्‍म विलाप

जब से सुहासिनी आई है, आभा बेचैन रसोई से कमरे और कमरे से रसोई में फिरकी सी डोल रही है। रसोई में होती है तो भी कान लगाए रहती है कि आशु इसे गुपचुप क्‍या पढ़ा रहा है। कहीं मेरे बारे में तो बात नहीं कर रहे हैं। सब्‍जी काटते, दाल छौंकते, चावल बीनते उसके कान इधर
 
मनीषा पांडे
Feb 21 2010 01:13 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मेरी जिंदगी में किताबें - 3

ज्‍यादातर दोस्‍तों ने किताबें खरीदना छोड़ दिया है और किताबों के बारे में बात करना भी। गलती उनकी भी नहीं है। जीवन ही ऐसा है। तंख्‍वाह के अंकों में जीरो बढ़ाते जाने और कॅरियर में एक आला मुकाम हासिल करने के लिए लोग मुंह अंधेरे दफ्तरों के लिए निकलते हैं और रात
 
मनीषा पांडे
Feb 20 2010 02:09 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मेरी जिंदगी में किताबें - 2

कितनी आसानी से किसी को सबकुछ देकर उसका सबकुछ छीना जा सकता है और वो उफ तक नहीं करेगा, उल्‍टे इस छीन जाने के बदले आपका एहसानमंद होगा। इलाहाबाद के वो साथी आज भी दिल्‍ली के पुस्‍तक मेलों में परिवार के साथ घूमते हुए मिल जाते हैं और आज जब किताबें न खरीद पाने
 
मनीषा पांडे
Feb 18 2010 08:55 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

अपने दीवाने को तू चूम सके

उसने अपनी बेटी के लिए एक कविता लिखी थी। उसने कामना की थी कि उसकी बेटी हरसिंगार सी खिले और हर ओर छा जाए। बेले सी उसकी खुशबू संसार की वादियों में बिखर जाए। वह पहाड़ी बर्फ सी निर्मल हो। उसकी चमक के आगे शर्मसार हों सितारे। वह अलकनंदा सी बहे और राह की हर
 
मनीषा पांडे
Feb 17 2010 05:32 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मेरी जिंदगी में किताबें

कुछ दिन हुए किताबों के महामेले से लौटी हूं। पुस्‍तक मेले में जाना मेरे लिए किसी उत्‍सव की तरह होता है, हालांकि जानती हूं कि वहां से मनों निराशा और टनों उदासी के साथ वापस लौटूंगी। हिंदी किताबों का संसार हजार-हजार फांस बनकर आंखों में चुभता रहता है। छुटपन
 
मनीषा पांडे
Feb 13 2010 03:14 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

डिब्‍बाबंद मुल्‍क, बड़ी होती लड़की और मातृत्‍व की उलझी छवियां -1

करीब ढाई साल गुजरे उस बात को, जब मेरी एक कजिन, जो हमारे ठेठ सामंती, ब्राम्‍हण परिवार में साफ दिल वाली एक लड़की थी, ने एक बेटी को जन्‍म दिया। मैं मुंबई गई थी, तब बिल्‍कुल अकेली थी। ननिहाल, तीन मौसियों और बुआ के घरों वाले उस शहर में कोई अपना नहीं था। ए
 
मनीषा पांडे
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है

हिंदी में बहसें कैसे होती हैं। जाना होता है, भदोही, पहुंच जाते हैं भटिंडा। किसी ने एक बहस शुरू की और हिंदी में कोई बात कही। तो कोई और, जिसे टूटी-फूटी फ्रेंच आती हो, (ठीक से हिंदी भी नहीं आती) बीच में कूदकर फ्रेंच में उसका जवाब देने लगता है। फिर कोई औ
 
मनीषा पांडे
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

‘पतनशीलता’ क्‍या कोई मूल्‍य है

प्रत्‍यक्षा जी, पतनशीलता क्‍या कोई मूल्‍य है। पतन मूल्‍य कैसे हो सकता है। अच्‍छे और बुरे की, सत्‍य और असत्‍य की, उदात्‍त और पतित की सारी परिभाषाएं हर देश, काल और विचारधारा में कमोबेश समान होंगी। जो बात वस्‍तुत: पतित है, स्‍त्री मुक्ति के विमर्श में व
 
मनीषा पांडे
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

तुम्‍हारा होना

ये कविता एक कहानी का हिस्‍सा थी। कहानी अधूरी रह गई और कविता भी। इस कविता को पूरा नहीं करना चाहती। ये ऐसे ही अच्‍छी है, अपने अधूरेपन में..... आज यह कविता..... तुम्‍हारा होना तुम्‍हारा होना मेरी जिंदगी में ऐसे है, जैसे झील के पानी पर ढेरों कमल खिले हों
 
मनीषा पांडे
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

डिब्‍बाबंद मुल्‍क, बड़ी होती लड़की और मातृत्‍व की उलझी छवियां -2

साल की उम्र में जब मैने पहली बार सिमोन द बोवुआर को पढ़ा और मातृत्‍व संबंधी उनके विचारों से दो-चार हुई, तो मेरी सोच में एक भयानक बवाल मचा। उम्र के उस पड़ाव पर पैदा हो रहे सहज बोध, सहज इच्‍छाओं और पढ़े हुए विचारों में ऐसी कुश्‍ती, धकमपेल मचती कि लगता द
 
मनीषा पांडे
Dec 29 2009 11:47 AM
पसंद करें
5
नापसंद करें
पसंद करें
10
नापसंद करें

आ बैल मुझे मार

लिखने के नाम पर आखिरी पोस्‍ट मैंने 3 तारीख को लिखी थी। उसके बाद घर और ऑफिस के बीच दौड़ लगाती थोड़ी मोहलत का इंतजार कर रही थी कि कब मौका मिले और मैं इलाहाबाद की रंग-रौशनी पर थोड़ी और नजरें घुमाऊं। लेकिन मोहलत कहां है। इतने दिन हुए, दोस्‍तों ने टोकना भ
 
मनीषा पांडे
Nov 09 2009 11:20 PM
पसंद करें
4
नापसंद करें

कितना कुछ होना बचा रह जाता है

इससे पहले कि मुझे घर और दफ्तर की मारामारी के बीच कुछ कलमघसीटी की फुरसत मिले, ये कविता गौर फरमाएं। जीवन में कितना कुछ होना बचा रह जाता है अभी तो कहना था कितना कुछ कितना तो सुनना था एक नदी थी जिसके उस पार जाना था पहाड़ी पर फिसलना था एक बार सुदूर जंगल क
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
7
नापसंद करें

कितना जानता है एक शहर हमें और हम शहर को – 2

जिदंगी और अनुभवों की दुनिया में एक लंबा अरसा गुजार लेने के बाद अपने उस शहर को देखना, जिसने आपका बुनियादी संस्‍कार और मानस गढ़ा हो, जिसने दिमाग और हिम्‍मत के शुरुआती तेवर से लेकर बिजबिजाती हुई भावुकता तक से नवाजा हो, उस शहर को हम किस निगाह से देखेंगे
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
8
नापसंद करें

कितना जानता है एक शहर हमें और हम शहर को

इस बार कुछ चार बरस बाद मेरा इलाहाबाद जाना हुआ। इलाहाबाद – वह शहर जहां मैं पैदा हुई, जहां मैंने जिंदगी के बीस बरस गुजारे। वह शहर, जहां से मेरे सुख-दुख की, हंसी और विषाद की, निजी और सामाजिक करुणा और अपमान की और पहले प्‍यार की सादगी और बेचारगियों की ढेर
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
6
नापसंद करें

सचमुच प्‍यार को दिल में छिपा लेना आसान नहीं है

प्रमोद और स् वप् नदर्शी ‍‍ जी की बात को आगे बढ़ाते हुए मेरी पिछली पोस्‍ट छिपा लो यूं दिल में प्‍यार मेरा पर प्रमोद और स्‍वप्‍नदर्शी जी ने जो कहा, उस बात को समझते और पूरा-पूरा स्‍वीकार करते हुए मैं अपनी बात को थोड़ा आगे बढ़ा रही हूं। यह उनकी और मेरी ब
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
9
नापसंद करें

छिपा लो यूं दिल में प्‍यार मेरा

क्‍या हम जीवन में कुछ भी सहज और स्‍वाभाविक होते हैं? सबकुछ ओढ़ा-बिछाया सा न हो। बिलकुल सहज, जैसे बारिश की बूंदें, जैसे फूलों का खिलना, जैसे उत्‍तरी से दक्षिणी ध्रुव तक हर दौर और हर सभ्‍यता में एक खास उम्र में आकर हर लड़की और लड़के के मन में प्रेम का
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
11
नापसंद करें

स्‍वेटर बुनने वाले प्रोफेसर

ये जो किस्‍सा मैं सुनाने जा रही हूं, इसकी भूमिका सिर्फ इतनी ही है कि ये मेरी एक दोस्‍त अपरा ने कुछ दिनों पहले मुझे सुनाया था। दोस्‍त पुरानी है, इलाहाबाद के दिनों की और आजकल कनाडा में एक यूनिवर्सिटी से साइकोलॉजी में रिसर्च कर रही है। इससे ज्‍यादा पहचा
 
मनीषा पांडे
Oct 19 2009 11:53 PM
पसंद करें
14
नापसंद करें

प्‍यार की मनाहियां और कुछ चोर दरवाजे

कल विनीत के ब्‍लॉग पर एक पोस्‍ट और दियाबरनी से प् यार हो जाता ‍और मेरे बचपन की कुछ तसवीरें अचानक याद हो आईं, जो कहीं अवचेतन में पड़ी होंगी और जिदंगी पर अपना असर छोड़ गई होंगी पर अब जो दिन-रात हथौड़े सी दिमाग में दनदनाती नहीं रहती। कुल मिलाकर इलाहाबाद
 
मनीषा पांडे
Oct 18 2009 09:28 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

खून, नदी और उस पार

उन तमाम लड़कियों के लिए जिनके सपनों में इतने अनंत रंग थे जितने धरती पर समाना मुश्किल है, लेकिन जिनके सपनों पर इतने ताले जड़े थे, जो संसार की सारी अमानवीयताओं से भारी थे। तुम जो भटकती थी बदहवास अपने ही भीतर दीवारों से टकराकर बार-बार लहूलुहान होती अपने
 
मनीषा पांडे
Oct 14 2009 07:47 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

जीवन तो यूं भी चलता रहता है

जानती हूं एक दिन तुम यूं नहीं होगे मेरी जद में एक दिन तुम पांव उठा अपनी राह लोगे जीवन तब भी वैसा ही होगा जैसा तब हुआ करता था जब तुम छूते नहीं थे मुझे वैसे ही उगेगा सूरज बारिश की बूंदें भिगोएंगी तुम्‍हारे बाल पेड़ों के झुरमुट में अचानक खिल उठेगा कोई ब
 
मनीषा पांडे
Oct 14 2009 07:47 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ब्‍लॉगिंग के साइड इफेक्‍ट

प्‍लेटफॉर्म पर बहती नदी....... (मुझे साफ करने की कोई जरूरत नहीं है। रात भर में बिल्‍ली ही साफ कर जायेगी।) कोयला होने से पहले ही पड़ गई मेरी नजर हे भगवान ! अब इसे साफ कौन करेगा ........ खुल गई पोल !
 
मनीषा पांडे
Oct 14 2009 07:47 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

अकेला कमरा

एक उदास, थका सा कमरा कमरे की मेज पर किताबों का ढ़ेर मार्खेज पर सवार अमर्त्‍य सेन का न्‍याय का विचार रस्किन बॉन्‍ड का अकेला कमरा कुंदेरा का मजाक, काफ्का के पत्र मोटरसाइकिल पर चिली के बियाबानों में भटकते चे ग्‍वेरा की डायरी अपने देश में अपना देश खोज रह
 
मनीषा पांडे
Oct 14 2009 07:47 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक दिन

पठानकोट से जाती है जो गाड़ी कन्‍याकुमारी को सोचा था एक दिन उस पर बैठूंगी इस छोर से उस छोर तक कन्‍याकुमारी से सियालदाह सियालदाह से जामनगर जामनगर से मुंबई मुंबई से केरल वहां से फिर कोई और गाड़ी जो धरती के किसी भी कोने पर लेकर जाती हो टॉय टेन पर कालका स
 
मनीषा पांडे
Oct 14 2009 07:47 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक आत्‍मस्‍वीकारोक्ति के बहाने कुछ सवाल – 3

इस सिगरेट पुराण से अब मैं बोर हो गई हूं। मनीषा प्रगतिशील छापाखाना से सिगरेट पुराण का यह आखिरी संस्‍करण प्रकाशित हो रहा है। इसके बाद प्रगतिशील छापाखाना अन्‍य महत्‍वपूर्ण विषयों पर जोर देगा।) कुल मिलाकर 19 महीने मेरी जिंदगी में इस बला का साया रहा। अब स
 
मनीषा पांडे
Oct 14 2009 07:47 PM
पसंद करें
5
नापसंद करें

उम्‍मीद

ढ़ाई साल पहले उदासी और उम्‍मीद के जाने कैसे नमकीन मौसम में ये कविता लिखी गई थी। कल सफाई करते हुए पुरानी किताबों के बीच कागज के एक टुकड़े पर लिखी मिली। उम्‍मीद कभी भी आती है जब सबसे नाउम्‍मीद होते हैं दिन अनगिनत अधसोई उनींदी रातों और उन रातों में जलती
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
10
नापसंद करें

सुख कहां है ?

सुख कहां है ? किसमें है सुख ? जब मां ने अपनी मां और उनकी मां ने उनकी मां से विरासत में मिली बेडि़यों से लड़की के हाथ-पैर कसकर बांध रखे थे, अपने कमरे की खिड़की से दूर आसमान में उड़ते परिंदे को निहारती लड़की सोचती थी, परिंदा हो जाने में है सुख। जब अपनी
 
मनीषा पांडे
Oct 04 2009 04:21 PM
पसंद करें
8
नापसंद करें

एक आत्‍मस्‍वीकारोक्ति के बहाने कुछ सवाल–2

अब जब ये आदत नहीं रही तो इस पर किसी सार्वजनिक मंच से बात करना बहुत नहीं तो थोड़ा आसान जरूर हो गया है। ये बिलकुल वैसा ही है जैसे चोरी छोड़ देने के बाद कोई दार्शनिक लहजे में यह स्‍वीकारे कि कभी वो चोर हुआ करता था। जिस आदत को मैं दुनिया से छिपाती फिरी क
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
13
नापसंद करें

एक आत्‍मस्‍वीकारोक्ति के बहाने कुछ सवाल

ये मेरी डायरी का बहुत अंतरंग पन्‍ना है। इतना अंतरंग कि कई बार मैं खुद भी उससे नजरें मिलाने से बचती रही हूं। कुछ बहुत अंतरंग और हमविचार मित्रों को छोड़कर मुझे दुनिया के सामने यह स्‍वीकारने में भयानक संकोच था। संकोच इसलिए नहीं था कि मैं मुझ जैसी हूं, ब
 
मनीषा पांडे
पसंद करें
1
नापसंद करें

छुट्टी का एक दिन और बर्गमैन से मुलाकात

आज का दिन बस ऐसे ही गुजर गया। बहुत कुछ करने की योजनाएं बनाते और कुछ भी न करते हुए। लिव टू टेल द टेल, सीन्‍स फ्रॉम ए मैरिज, सोशलिज्‍म इस ग्रेट और कसप के डीडी और बेबी के साथ। सबके दरवाजे खटखटाए, लेकिन किसी के ठिकाने पर मन रमा नहीं। इधर-उधर टहलती रही। स
 
मनीषा पांडेय