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डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद.

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16 Jun 2010
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गुजरात के बोलो तो साहब जलते हुए मंज़र देखे हैं ?

ग़ज़लजंगल के दरिन्दे तो देखे, बस्ती के पयंबर देखे हैं ?गुजरात के बोलो तो साहब जलते हुए मंज़र देखे हैं ?गाते हो समन्दर की गाथा, लहरों की अदा पे रीझे हो,हे महामहिम बोलो तो सही, आँखों के समन्दर देखे हैं.रो-रो के सिसकर मांगे थे जो जान को अपनी मुश्किलमें
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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फिर शहर में नाचेंगे ख़ंज़र,फिर शहर में बरसेंगे शोले.

ग़ज़लपत्थर तो उछाले हो मुझ पे, सोचो तो तुम्हारा भी सर है.घर मेरा जलाने से पहले, सोचो तो तुम्हारा भी घर है.फिर शहर में नाचेंगे खंज़र, फिर शहर में बरसेंगे शोले,आने को है मौसम ख़ास कोई, हर शख्श कांपता थर-थर हैक़ातिल भी वही मुंसिफ़ भी वही,इंसाफ़ हमारा क्या
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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हमने माना कि रिश्ते पुराने हुए,कुछ हमारे भी बारे में सोचा करो.

ग़ज़लहमने माना कि रिश्ते पुराने हुए, कुछ हमारे भी बारे में सोचा करो.वास्ता तुम भले ना रखो हमसे अब, यूँ सरेआम हमको न रुस्वा करो.ऐब लाखों हैं हममें कहा आपने, कुछ हुनर पर हमारे भी बोला करो.कोस लो कोस लो हम को जी भर के तुम, कनखियों से मगर यूँ न देखा करो.हाल
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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बादल ये मुहब्बत के कहीँ और बरसते हैं.

ग़ज़लबादल ये मुहब्बत के कहीं और बरसते हैं.इक बूँद की खातिर हम वरसों से तरसते हैं.फ़ुरसत नहीं मिलती, मिलने की तुम्हें हमसे,क्या दिल में तुम्हारे है, हम खूब समझते हैं.कदमों की तेरे आहट, फिर हमको सुनाई दे,राहों में जो तन्हा हम, सड़कों पे भटकते हैं.मैं लाख
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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कोई ई-मेल,कोई फोन, कोई ख़त भी नहीं.

ग़ज़लनींद रातों की मेरी रोज़ उड़ाने वाले.खो गये जाने कहाँ दिल को लुभाने वाले.कोई ई-मेल, कोई फोन, कोई ख़त भी नहीं,याद आते हैं बहुत हमको भुलाने वाले.दिल भी वो ले गये चुपके से चुरा कर इक दिन,मेरे बचपन में खिलौनों को चुराने वाले.जान लेवा ये तपिश, उस पे
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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जीवननी समी सांजे मारे ज़ख़्मोनी यादी जोवीती.

गुजराती ग़ज़लખુશ્બૂમાં ખીલેલા ફૂલ હતાં, ઉર્મિમાં ડૂબેલા જામ હતા.શું આંસુનો ભૂતકાળ હતો-શું આંસુનાં પણ નામ હતા.હુઁ ચાંદની રાતે નીકળ્યોતો, ને મારી સફર ચર્ચાઈ ગયી,કંઈ મંઝિલ પણ મશહૂર હતી, કંઈ રસ્તા પણ બદનામ હતા.જીવનની સમી સાંજે મારે જખ્મોની યાદી જોવીતી,બહુ
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
May 01 2010 04:54 PM
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साथ में सिर्फ अपने हैं ग़म दोस्तो.

ग़ज़ल धूप में जल रहे हैं कदम दोस्तो.साथ में सिर्फ हैं अपने ग़म दोस्तों.याद फिर उसकी आयी हमें देर तक,आँख फिर होगयी अपनी नम दोस्तो.मोम के वे नहीं जो पिघल जायेंगे,अपने पत्थर के हैं इक सनम दोस्तो.साथ में आज कल वो कहाँ हैं मेरे,साथ खाई थी जिसने कसम
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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मेरी पगड़ी को जो उछालेंगे.

ग़ज़लतुमको हम सब को बेंच डालेंगे.मसखरे देश क्या सँभालेंगे.ख़ैर अपनी मनायें वे सर की,मेरी पगड़ी को जो उछालेंगे.उनकी फितरत तो सब ही जाने हैं,आस्तीनों में साँप पालेंगे.लोग भी दोगलें कहां कम हैं,इन हकीमों से ही दवा लेंगे.देशद्रोही जो हाथ आये तो ,हम भी फिर
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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क्या हमारा है हाल मत पूछो.

ग़ज़लक्या हमारा है हाल मत पूछो.हमसे ऐसे सवाल मत पूछो.हमने थोड़ी जो ज़बां खोली तो,फिर मचेगी बवाल मत पूछो.आज इसके तो साथ कल उसके,है सियासत छिनाल मत पूछो.चंद टुकड़ों में,चंद टुकड़ों में,मुल्क बेचें दलाल मत पूछो.कीमतें आसमां को छूती हैं,हमसे उनका कमाल मत
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
Feb 17 2010 06:09 PM
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सर हमारा तो अभी बाकी है.

हाथ काटे हैं ज़बां काटी है.सर हमारा तो अभी बाकी है. एक चिड़िया की तो हिम्मत देखो तोप पर बैठी गुनगनाती है लोग दातों में उँगलियाँ दाबें,
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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स्वर्णिम गुजरात दृष्टि एवं अभियान.

स्वर्णिम गुजरात दृष्टि एवं अभियान.गुजरात राज्य के प्रसिद्ध प्रशिक्षण केन्द्र स्पीपा अहमदाबाद में अपने प्रिंसीपल प्रशिक्षण में ता.18-01-10 से 22-01-10 के दरम्यान अपने पावरपोइन्ट प्रस्तुति में राज्य में हुए पिछले दस सालों भारी परिवतर्तनों को ध्यान में रखकर
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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अपने होटों से क्या छू दिया आपने !

ग़ज़लजिस्म में अपने वो गर्मियाँ ना रहीं.उनके चेहरे पे भी सुर्ख़ियाँ ना रहीं.पीछे-पीछे कभी जिनके भागा किये,बाग में वो हसीं तितलियाँ ना रहीं.रफ़्ता रफ़्ता क़रीब आ गये आपके,बीच में अपने अब दूरियाँ ना रहीं.अपने होटों से क्या छू दिया आपने,ज़िन्दगी में कोई
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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अश्क बहते नहीं उम्र भर,ग़म न कर अय मेरे हमसफ़र.

ग़ज़लतुम तपिश दिल की बढ़ने तो दो, बर्फ पिघलेगी ही एक दिन.तोड़कर सारी जंज़ीरें वो, घर से निकलेगी ही एक दिन.शौक़ जलने का परवाने को, होगया आजकल इस कदर,लाख कोशिश करे कोई भी, शम्आ मचलेगी ही एक दिन.अश्क बहते नहीं उम्र भर, ग़म न कर अय मेरे हमसफ़र.बात बिगड़ी है
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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जब से आयें हैं वो ज़िन्दगी में.

ग़ज़ल जब से आयें हैं, वो ज़िन्दगी में. दिल ये लगता नहीं अब किसी में. मौत पानी की लिक्खी थी मेरी, मैं तो डूबा हूँ गहरी नदी में. दिल मचलता है यूँ ही नहीं ये, बात कुछ तो है उस अजनबी में. हमसे प्यासों से कोई ये पूछे, उम्र कैसे कटी तिश्नगी में. अय अँधरो त
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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इक बार तुम्हें देखा जिसने सब होश गवां बैठे अपने.

ग़ज़ल होटों का तबस्सुम समझे हैं, आँखों की ज़बा भी जाने हैं. लाखों में तुम्हें अय जाने-ग़ज़ल, हम दूर से ही पहिचाने हैं. इक बार तुम्हें देखा जिसने, सब होश गवां बैठे अपने, मस्ज़िद से नमाज़ी भी ग़ुम हैं, सूने-सूने बुतखाने हैं. चूमें हैं तुम्हारे गालों को
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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अपने को कहाते हैं देखो तो वो फ़ुरसतिया.

ग़ज़ल जिस दिन वो मुहब्बत से घर अपने बुलायेंगे. जूठे ही सही उनके हम बेर भी खायेंगे. अपने को कहाते हैं, देखो तो वो फ़ुरसतिया, ज़ख़्मों को हमारे हम फ़ुर्सत से दिखायेंगे. शीरी थी ज़बा अपनी, ये तल्ख़ हुई कैसे ? रूदादे सफ़र अपना, हम उनको सुनायेंगे. बिछुड़े
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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छोड़िए छोड़िए सारे शिकवे गिले.

ग़ज़ल अपनी नज़रों से यूँ ना गिरा दीजिए. दूसरी जी में आये सज़ा दीजिए. छोड़िए छोड़िए सारे शिकवे-गिले, हो सके तो ज़रा मुस्करा दीजिए. पास हैं आज तो आप उखड़े हुए, दूर जायें तो फिर ना सदा दीजिए. थम न जायें कहीं आशिकी में कदम, थोड़ा थोड़ा सही हौसला दीजिए. म
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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तस्वीर हमारी वो चुपके चुपके से निहारा करते हैं.

ग़ज़ल राहों में अगर जो मिल जायें झट से वो किनारा करते हैं. तस्वीर हमारी वो चुपके चुपके से निहारा करते हैं. ये बात नहीं वो समझेंगे, ये बात कहां वो मानेंगे, हम ख़्वाब में उठ उठ के अक्सर उनको ही पुकारा करते हैं. ठंडी ठंडी रातों की चुभन उस पे ये ग़जब की
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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बेहतर है मुझे लौटा देना ख़त मेरे जलाने से पहले.

ग़ज़ल दिल से भी मिटाओ तो जाने, ये नक़्श मिटाने से पहले. बेहतर है मुझे लौटा देना, ख़त मेरे जलाने से पहले . तबियत भी है उखड़ी, उखड़ी मुखड़ा भी है फीका-फीका, सरकार मेरे क्यों गुमसुम हैं अहवाल सुनाने से पहले. घर वीरां करके कहते हैं, घर अपना बसा लेना तुम
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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ट्रेन छूटे हुए इक ज़माना हुआ.

ग़ज़ल दिल को टूटे हुए इक ज़माना हुआ. भाग फूटे हुए इक ज़माना हुआ. प्लेटफार्म पे हम ताकते रह गये, ट्रेन छूटे हुए इक ज़माना हुआ. वो न आये मनाने हमें आज तक, हमको रूठे हुए इक ज़माना हुआ. फिर मिलेंगे दुबारा किसी मोड़ पर, वादे हुए झूटे हुए इक ज़माना हुआ. इस
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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आओ मिस काल करके ही देखें उसे.

ग़ज़ल वो न आया दुबारा शहर दोस्तो. लग गई उसको किसकी नज़र दोस्तो. आओ मिस काल कर के ही देखें उसे, हो रही उसकी कैसे गुज़र दोस्तो. उसको पिंज़ड़े में रहना गवारा न था, कट गये उसमें ही उसके पर दोस्तो. धूप में रह के जो छांव देता रहा, मिल के काटा सभी ने शज़र द
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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सरकारी अध्यापकों का दुख दूर करते मुख्यमंत्री नरेन्द्रमोदीजी.

सरकारी अध्यापकों के दुख दूर करते मुख्यमंत्री नरेन्द्रमोदीजी । कृपया फोटो पर क्लिक कर स्पष्ट लिखा देखें. राज्य के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्रमोदीजी ने ता.13-11-09 के रोज सरकारी कोलेजों में वर्षो से रिक्त प्रिंसीपल के पदों पर 25 सरकारी अध्यापकों को प्रमो
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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स्वर्णिम रथ का शहेरा में आगमन

स्वाइन फ्लू का नाट्यमंचन सावधान साहेबान। मंचस्थ महानुभावो में संसदीय सचिव गाँधीनगर श्री जयद्रथसिंहजी परमार उनके दायें शहेरा विधान सभा के लोकप्रिय एम.एल.ए.श्री जेठाभाई भरवाड तथा बायें पंचमहाल जिले के डी.एस.पी.साहब विद्यार्थियों की नाट्य प्रस्तुति निहारते
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
Oct 07 2009 02:36 PM
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चूजों की हिफाज़त का जिम्मा सांपों को अगर दोगे लोगे.

ग़ज़ल चूजों की हिफाज़त का ज़िम्मा सांपों को अगर दोगे लोगो. सामान तबाही का अपने तुम खुद ही कर लोगे लोगो. उड़ते हैं हवाओं में वे तो हालात ज़मी के क्या जाने ? सरहद से उठेगी जब आँधी पत्तों से बिखर लोगे लोगो. करते हो किनारों पे मस्ती मौज़ो का इल्म नहीं तु
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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घर छोड़ के ना जाओ सैंयां हम लोग पड़ें तोहरे पैंयां.

ग़ज़ल अय ब्लागे-चमन देखो तो सही ये कैसे ज़माने आये हैं. ये कल के लेंड़ हगे हमको ब्लागिंग समझाने आये हैं. चड्डी को उतारे फिरते थे अपने जो मुहल्ले के छोरे, आया जो बुढ़ापा अब अपना आँखें वो दिखाने आये हैं. सब मिल के करें ऐसी-तैसी वे सहन करें बोलो कब तक ?
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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चूजों की हिफाज़त का ज़िम्मा सांपों को अगर दोगे लोगो.

ग़ज़ल चूजों की हिफाज़त का ज़िम्मा सांपों को अगर दोगे लोगो. सामान तबाही का अपने तुम खुद ही कर लोगे लोगे. उड़ते हैं हवाओं में वे तो हालात ज़मी के क्या जाने ? सरहद से उठेगी जब आँधी पत्तों से बिखर लोगे लोगे. करते हो किनारों पे मस्ती मौज़ो का इल्म नहीं तु
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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हम तो रिसर्च कर रहे हैं आटा दाल पे.

ग़ज़लवो तो उलझ के रह गये गोरी की चाल पे.हम तो रिसर्च कर रहे हैं आटा दाल पे.सूखे पड़े थे कोई उन्हें पूछता न था,बारिश हुई तो आ गये नाले उछाल पे.अँधों को रोशनी से कोई वास्ता नहीं,पाबन्दी वो लगा रहे जलती मशाल पे.मँहगी हुई है ज़िन्दगी सस्ती है मौत क्यों
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
Sep 14 2009 05:47 PM
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मोदीजी आँखें खोलिए,राज्य के शिक्षकों के दुख देखिए.

मोदीजी आँखें खोलिए, राज्य के शिक्षकों के दुख देखिए.ता. 5 सितम्बर गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री श्रीनरेन्द्रमोदीजी ओनलाइन डी.टी.एच. के माध्यम से राज्य के तमाम शिक्षकों, छात्र-छात्राओं को संबोधन करने वाले हैं. शिक्षकों का सम्मान भी किया जायेगा. छात्र
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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सौ दिन के करिश्मे का कुछ होश करो साहब ?

ग़ज़लये कैसा उजाला है, ये कैसी दिवाली है.सब्जी भी हुई गायब, खाली मेरी थाली है.हमने तो कटोरी में डुबकी को लगा देखा,है दाल बहुत मँहगी और जेब भी खाली है.सौ-दिन के करिश्मे का कुछ होश करो साहब,सूरत तो बहुत भोली, पर चाल निराली है.लोगों की लुगाई ने, घर ऐसे
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
Sep 03 2009 07:25 PM
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जिन्ना जिनको हैं प्यारे बहुत वे लोग यहाँ क्या करते हैं ?

ग़ज़लसरदार हमें प्यारे हैं बहुत, जो उनको हाथ लगायेंगे.गुजरात के बेटे गुस्ताख़ी उनकी कैसे सह पायेंगे.ज़िन्ना जिनको हैं प्यारे बहुत, वे लोग यहाँ क्या करते हैं ?खायेंगे कहीं का और ढोंगी, फिर गीत कहीं के गायेंगे.दामाद की मानिंद छोड कभी, आये थे पार दरिन्दों
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
Aug 25 2009 06:49 PM
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डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद.

मोदीजी शिक्षा जगत के भृष्टाचारियों से हमें बचाओ.गुजरात राज्य के शिक्षा विभाग में व्याप्त भृष्टाचार की उस समय पोल खुल गयी जब राज्य के शिक्षा इन्सपेक्टर एच.आर.पोला अंग्रेजी माध्यम की स्कूल में दो छात्राओं को एडमीशन दिलाने में रिश्वत लेते धर लिये गये. सारा
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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मेरे हाथों से अब तक महक ना गई उनकी ज़ुल्फ़ों को छेड़े ज़माने हुए.

ग़ज़ल मेरे हाथों से अब तक, महक ना गई, उनकी ज़ुल्फ़ों को छेड़े ज़माने हुए. मेरी सांसों का जादू है अब तक ज़वां, हमने माना कि रिश्ते पुराने हुए. ये कसक,ये तड़प, ये जलन, ये धुआँ, उस मुहब्बत की बख़्शी ये सौगात है, साज़ो-आवाज़ ये, शेरो-शायरी, उनसे मिलने के
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद.

ग़ज़ल मेरी जानेमन, मेरी जानेजां, मेरी चश्मेनम, मेरी दिलरुबा. तेरे इश्क में, तेरी चाह में, दिल हो गया, मेरा बावरा. मेरे पात सारे हैं झर गये, मैं तो ठूंठ में हूँ बदल गया, तू समन्दरों पे बरस गयी, तेरी राह मैं रहा ताकता. मेरी आँख ये है भर आयी क्यों, मेरे
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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लाला और लालाइन साथ में नहाये हैं.

ग़ज़ल लोग अपना संडे भी इस तरह मनाये हैं. लाला और लालाइन साथ में नहाये हैं. अपनी सविता भाभी भी, क्या ग़ज़ब की भाभी हैं, प्रेम का सिलेबस वो मुफ़्त में पढ़ाये हैं. उनकी वे पड़ोसिन भी, कितनी दरिया दिल देखो, इमरजंसी में अक्सर काम, काम उनके आये हैं. प्यार
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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तेरी आर्ज़ू,तेरी जुस्तजू,तेरी बेरुखी, तेरी बेदिली.

ग़जल तेरी आर्ज़ू, तेरी जुस्तजू, तेरी बेरुखी, तेरी बेदिली. मेरी बेकसी, मेरी मुफ़लिसी, मेरी दिल लगी, मेरी तशनगी. तूने पा लिया, मैंने खो दिया, तू तो बस गयी, मैं उजड़ गया, मेरे सीने में, उठे हूक सी, तुझे क्या पता, है ये मनचली. तुझे ये गिला, कि भुला दिया,
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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घर मेरे उसने जो आना चाहा.

ग़ज़ल घर मेरे उसने जो आना चाहा. रास्ता सबने भुलाना चाहा. और भी सर पे चढ़ गये अपने, हमने उनको जो मनाना चाहा. कान पर हाथ रख लिए उसने, हमने दुखड़ा जो सुनाना चाहा. तोड़ने का रहा जुनूं उसको, हमने रिश्ता तो निभाना चाहा. राज़ सब पर अयां ना हो जाये, हमने ज़ख
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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दिल का ये ज़ख्म है गहरा नहीं भरनेवाला.

ग़जल दिल का ये ज़ख्म है गहरा नहीं भरने वाला. तेरा शैदाई ये ज़ल्दी नहीं मरने वाला. अपनी सीरत भी वो देखे तो समझ जायेगा, आइना देख के हर रोज सँवरनेवाला. पास आये तो वो मौज़ो की रवानी समझे, दूर ही दूर से दरिया से गुज़रनेवाला. जान लेवा ये तपिश और तमन्ना उसक
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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मोदीजी सरकारी कोलेजों को बचाओ.

मोदीजी सरकारी कोलेजों को बचाओ . गुजरात राज्य की तमाम सरकारी कोलेजें रेग्युलर प्रिंसीपल के अभाव में दम तोड़ रही हैं. राज्य की 150 साल पुरानी सरकारी आर्टस सांयस कोलेज अहमदाबाद में दिल्ली से आयी नेक टीम के लिखित सुझाव के बावज़ूद अभी तक रेग्युलर प्रिंसीप
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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वो करें जो गोबर तो वाह- वाह करते हैं.

ग़ज़ल ब्लाग की सियासत में, खूब ये झमेले हैं. लोग रोज़ आ, आ, के, अपनी अपनी पेले हैं. वो करें जो गोबर तो, वाह-वाह करते हैं. हम करें जो उँगली तो, मुश्किलों से झेले हैं. भैंसियों के वे हुस्न पर, देखो जान छिड़के हैं, पूँछ के सभी आशिक, सब के सब मचेले हैं.
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.
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हम किताबें ही नहीं, दिल भी पढ़ा करते हैं.

ग़ज़ल हम किताबें ही नहीं, दिल भी पढ़ा करते हैं. दस्तख़त वक्त के सीने पे जड़ा करते हैं. आँखें बरसे हैं तो थोड़ा ये सुकूँ मिलता है, दिल के सीमेन्ट को इस तरह कड़ा करते हैं. सीढ़ियाँ फ्लेट की चढ़ने में उखड़ती सांसें, लिफ्ट से लोग तो हँस-हँस के चढ़ा करते
 
डॉ.सुभाष भदौरिया.