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08 Mar 2010
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क्या पूरे भारत को मिल गया रोटी, कपड़ा और मकान?

हमारे यहाँ जनता और उसकी समस्याओं को देखने का चश्मा काफी अलग-अलग नंबर का होता है, इतना ही नहीं इसे देखने वाले भी अलग-अलग वेराईटी के होते हैं तभी हमारा देश विविधता में एकता के लिए दुनिया भर में मशहूर है. आज समाचार पत्र में देश की तकनीकी क्रांति के एक बड़े
 
Sundip Kumar Singh
Feb 16 2010 01:36 AM
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लो पाकिस्तान ने दिखा दी अपनी जात, कर लो अब "अमन की आशा"

इधर अख़बार और टीवी में लगातार एक विज्ञापन दिखाई दे रहा है...अमन की आशा... जो भारत और पाकिस्तान के बीच अमन की आशा जगाने के लिए कुछ अति-उत्साही मीडिया संगठनों के द्वारा चलाया जा रहा है. हमारे देश की संस्कृति में एक खास सीख हमेशा दी जाती है कि सामने वाला
 
Sundip Kumar Singh
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लो नहा लिया गंगा में, कर आये उसे मैला...

लगा ली आज लाखों-करोड़ों नेगंगा में डुबकी,धो लिया सबने अपना पापऔर भुला दियाकल तक की सारी दुशवारियों को भी!बनारस से लेकर हरिद्वार तकऔर इलाहाबाद से लेकर गंगासागर तककई दिनों से लोगकर रहे थे इसी नहान के लिए मश्श्क्कत!लो हम सफल हुएअपने इस होली डीप(पवित्र स्नान)
 
Sundip Kumar Singh
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क्या दोषी नेताओं का भी पद नहीं छिनना चाहिए...?

हरियाणा के पूर्व पुलिस कप्तान इन दिनों मीडिया की सुर्ख़ियों में हैं. छेड़छाड़ के आरोप में उन्हें महज ६ माह की सजा मिलने के बाद अचानक देश की जनता जाग पड़ी है...मीडिया जाग पड़ा है और इन सबके बाद अचानक सरकार भी जाग गई है. सब कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे
 
Sundip Kumar Singh
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स्वागतम २०१०...!

नयी उम्मीदों और नए अरमानों के साथ नए साल का स्वागत है...नया साल आप सब की जिंदगी में खुशियों का रंग भरता रहे...यही हमारी कामना है
 
Sundip Kumar Singh
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अंधेर नगरी-चौपट राजा!

बात-बात में मीडिया को कोसने वाली जनता आज कहाँ है. जो काम उसे करना चाहिए था वह मीडिया कर रहा है. मीडिया ने साबित किया है कि जो गलत है उसे रोकने में वह एक सशक्त माध्यम बन सकता है, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि इस काम में आखिरकार सबकुछ जनता के ऊपर ही टिकी
 
Sundip Kumar Singh
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सच भाई... जमाना कितना बदल गया न...

जमाना कितना बदल गया। पहले शादी-ब्याह के मौके पर लड़के-लड़की ऐसे सकुचाये-सकुचाये घूमते थे जैसे जबरदस्ती उनकी शादी हो रही हो और उनके पास बचने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए शरमा-शरमा कर काम चला रहे हों. हर बात शरमा-शरमा कर ऐसे बोलना ताकि कोई ये ना समझ ले कि
 
Sundip Kumar Singh
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मुद्दे हम बनाते हैं...

महंगाई के इस दौर में जार-जार होकर जनता बस इतना ही कह पाती है- हमारी कोई नहीं सुनता किसी को नहीं हमारी फिकर... लेकिन क्या हम अपनी बदहाली के खुद जिम्मेदार नहीं... आज़ादी के ६ दशकों बाद भी नहीं है हम अपनी पेट भरने को आश्वस्त और ना ही है हमें रोजगार पाने
 
Sundip Kumar Singh
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बिहार में राजनीति के जरिये विकास की बयार!

अगर सीधे शब्दों में कहें कि आधा बिहार राजनीतिक हो गया है तो कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। हाल ही में अपने गाँव गया था। पिछले २० सालों से वहां के बदलाव को मैं देख रहा हूँ लेकिन इस बार जो देखा वाकई गौर करने लायक है. बदलाव की ये बयार पिछले ४-५ सालों में
 
Sundip Kumar Singh
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खगड़िया नरसंहार के सन्देश!

बिहार के खगड़िया जिले में नरसंहार हो गया...बाहर वालों के लिए ये एक नक्सली हमला भर है जैसा रोजाना छत्तीसगढ़, झारखण्ड और दक्षिण बिहार के कई इलाकों में होते रहता है। उनके लिए ये बस एक खबर भर है लेकिन जो लोग बिहार को समझते हैं. जिन्होंने बिहार को करीब से द
 
Sundip Kumar Singh
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अब तमीज़ सीखेंगे दिल्ली वाले!

सुना है सरकार अब दिल्ली वालों को तमीज सिखाएगी। अगले साल बहुत सारे मेहमान आने वाले हैं इसलिए दिल्ली सरकार ने फैसला किया है कि उनके आने से पहले सबको सड़क पर चलना, कायदे-कानून से लेकर थूक फेंकना तक सिखाना है। इसके लिए जो भी सजा देना हो दिया जायेगा. केवल
 
Sundip Kumar Singh
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मिलावट का ये जमाना...आम आदमी और टीवी!

लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है॥टीवी वालों को भी। सो उन्हें जो मन में आ रहा है दिखा रहे हैं ...हमें भी अधिकार है अपनी बात कहने का इसलिए कह रहा हूँ. यहाँ बस स्वस्थ लोकतान्त्रिक परम्परा काम कर रही है और कुछ नहीं. यूँ कहें तो हम टीवी की बुराई
 
Sundip Kumar Singh
Sep 23 2009 10:50 PM
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इकोनामी क्लास और भेड़-बकरी बनी जनता...?

इलीट क्लास से आने वाले हमारे एक मंत्री जी ने जब से विमान के इकोनोमी क्लास को भेड़-बकरी क्लास की संज्ञा दी है तब से हर जगह लोगों ने हाय-तौबा मचा रखी है। लोगों ने ऐसी प्रतिक्रिया दी है जैसे उन्होंने कोई ऐतिहासिक गलती कर दिया है, और पहली बार उन्हें
 
Sundip Kumar Singh
Sep 18 2009 07:30 AM
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...अपने-अपने भगवान!

चलो हम भी गढ़ लेंअपने भगवान और अपना अलग धर्महम भी ढूंढ़ लें...खुद में कोई खूबी और गढ़ लेंअपनी अलग दुनिया!लेकिन इसके लिए चाहिएकरोड़ों रूपये, ढेर सारा संगमरमरऔर कई कोस धरतीऔर ऊपर से जनता का धनखर्च करने का माद्दा भी...चलो इसके लिए खड़ा करेंकोई सामाजिक
 
Sundip Kumar Singh
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कलयुग जाने वाला है, सतयुग आने वाला है...

कल दिवार पर लगी एक पोस्टर देखी। उसपर यही लिखा हुआ था. प्रचार था किसी बाबा का. जो सतयुग आने का सपना दिखा रहे थे. जैसे सबकुछ बदलने वाला ही हो, बस. अब राम राज्य आने ही वाला हो. ऐसे न जाने कितने सपने बेचने वाले बाबा लोग रोजाना टीवी पर दिखते रहते हैं. जिन
 
Sundip Kumar Singh
Aug 29 2009 06:51 AM
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लो मन गया फिर आज़ादी का जश्न!

लो मना लिया मैंने भी अपनी आज़ादी का जश्नहाथों में तिरंगा थामेझूमते-गाते और नारे लगातेबच्चों, बूढों और नौजवानों कोटीवी चैनलों पर देखकर,राष्ट्रभक्ति के गानों को सुनकरकर लिया मैंने भी अपना मन हल्काऔर निभा ली मैंने भी अपनी जिम्मेदारीदेश और देशभक्ति की!इस आजाद
 
Sundip Kumar Singh
Aug 15 2009 11:42 PM
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बोल तेरे पास प्लास्टिक के और कितने थैले हैं...?

खबर में तो पढ़ा था लेकिन प्रत्यक्ष में कल पहली मर्तबा दर्शन हुआ। मिठाई की दुकान पर जब मिठाई वाले ने हाथ में मिठाई का डब्बा पकडा दिया तो ख्याल आया की थैली लाना तो अपनी आदत में शुमार ही नहीं है और अब तो दिल्ली में सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबन्ध
 
Sundip Kumar Singh
Aug 04 2009 11:15 PM
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कौन सोचेगा देश के आम आदमी के बारे में?

आज दोपहर में टीवी न्यूज़ चैनलों पर हमारे सांसद छाये हुए थे। टीवी पर चल रहे एक कार्यक्रम सच का सामना को लेकर वे अपना विरोध जता रहे थे। उनके अनुसार इस कार्यक्रम में निहायत ही निजी सवाल पूछे जाते हैं और यह देश के सांस्कृतिक माहौल के लिए ठीक नहीं है। इतना ही
 
Sundip Kumar Singh
Jul 23 2009 10:56 PM
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कल्लन काका, उनकी बकरी और गाँव में उनकी मूर्तियाँ!

गाँव में चौपाल सजी थी। बीच में सरपंच कल्लन काका पलथी मारे बैठे थे। अगल-बगल में मंगरू चाचा, खेदन, मंगल, श्याम समेत गाँव के सभी बड़े-बुजुर्ग और महिलाएं और बच्चे अपनी-अपनी जगह पकड़े हुए थे। कल्लन काका ने जब से सुना था कि राज्य की मुख्यमंत्री साहिबा पूरे
 
Sundip Kumar Singh
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प्यासा देश और पानी में डूबते उसके लोगों की कहानी..!

हमारा देश कितना बड़ा है और आबादी तो इतनी बड़ी कि मत पूछिए। एक अरब से ज्यादा तो हम सरकारी आंकडे के अनुसार ही हैं। अनाज भी हम अपने खाने के लायक उगा ही लेते हैं. रह गयी बात पानी की तो वो भी हमारे देश में कम नहीं है. अब देखिये न मुंबई नगरिया को... पूरा श
 
Sundip Kumar Singh
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बजट पर हम क्या बोलें, आप ने देख ही लिया!

देश में बजट पहली बार नहीं आया है पिछले ६ दशकों से हम हर साल बजट का इन्तेज़ार करते हैं. हर बार हमारे विकास के नाम पर करोडों-करोड़ की राशि की घोषणा और उसका खर्चा दिखा दिया जाता है और हमारी बदहाली दूर करने का कोई लक्ष्य तय कर दिया जाता है. हम टीवी पर और
 
Sundip Kumar Singh
Jul 07 2009 06:13 PM
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बेकार की बात... बजट से काहे का एक्सपेक्टेशन भाई!

जब से बजट का समय नजदीक आया है इन मीडिया वालों ने नाक में दम कर रखा है। हर अख़बार में, हर समाचार चैनल पर एक ही राग अलापे हुए हैं॥बजट से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं एसएमएस कर बताएं। अरे अब क्या-क्या बताएं और अगर बता ही दिया तो का हो जाएगा। वैसे भी मर रहे ह
 
Sundip Kumar Singh
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बेकार की बात कर रहे हो, बजट से काहे का एक्सपेक्टेशन भाई!

जब से बजट का समय नजदीक आया है इन मीडिया वालों ने नाक में दम कर रखा है। हर अख़बार में, हर समाचार चैनल पर एक ही राग अलापे हुए हैं..बजट से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं एसएमएस कर बताएं। अरे अब क्या-क्या बताएं और अगर बता ही दिया तो का हो जाएगा। वैसे भी मर रहे
 
Sundip Kumar Singh
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लो कर लो प्यार...अब कोई नहीं रोकेगा आपको!

लो भैया अब कौन रोक सकता है आपको प्यार करने से. अब तो अदालत ने भी कह दिया है कि वयस्क आदमी अगर आदमी से आम सहमती से प्यार करे तो उसे सजा नहीं दिया जा सकता. भाई तो अब परेशान काहे होते हैं और अब आपको शहर-शहर घूम कर परेड करने की जरुरत भी नहीं है. अब तो भा
 
Sundip Kumar Singh
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आपका टीवी केवल बुद्धू बक्सा भर नहीं है!

अगर आप ये सोचते है कि आपके घर के ड्राइंग रूम में लगा टीवी सेट बस मन बहलाने का एक जरिया भर है और ये कोई ऐसा मैटर नहीं है जिसपर हम गंभीरता से सोचे और बहस करें तो फिर आप गलत सोचते हैं। वो जमाना गया जब टीवी को बुद्धू बक्सा समझ हम इसकी गंभीरता से पल्ला झा
 
Sundip Kumar Singh
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ऐसे तो नहीं मिटेगी गरीबी...हाँ जब तक बिके बेच लो!

ये कोई नयी बात थोड़े ही है, गरीबी तो हमेशा ही बिकती है। राजनीति और फिल्म वाले इसे सबसे सही तरीके से बेचते हैं। एक जमाने में इंदिरा जी ने जमकर गरीबी बेची थी। उन्होंने बस इतना ही कहा था -गरीबी हटाओ और लोगों ने तुरंत विपक्ष को हटा दिया और इंदिरा जी को ज
 
Sundip Kumar Singh
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लो भई, फिर आ गया स्वयंवर का जमाना!

किसी महान आदमी ने कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है। हिंदुस्तान की सरजमीं पर इतिहास एक बार फिर पूरा एक चक्कर लगाकर वहीँ पहुँचने वाला है जहाँ से उसने प्राचीन काल में अपनी यात्रा शुरू की थी. हम बात कर रहे हैं स्वयंवर प्रथा की जिसे आर्यों ने शुरू किया
 
Sundip Kumar Singh
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लो देख लो नटवरलालजी की अगली पीढी को!

अब आप ये मत पूछिये कि ये नटवरलालजी कौन थे। नटवरलालजी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. नटवरलालजी की गिनती हमारे देश के प्रमुख ठगों में होती है। बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गाँव में जन्में नटवरलालजी ने अपने करिश्माई दिमाग की बदौलत से वर्षों तक बिहार,
 
Sundip Kumar Singh
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मिशन काहिरा और ओबामा का नज़रिया...!

लीजिये इस्राइल ने अमेरिका के अश्वेत राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा द्वारा फलिस्तीन-इस्राइल विवाद के हल के लिए तैयार किये गए रोड मैप का जवाब दे दिया। इस्राइल ने दुनिया के सामने एकतरफा ऐलान कर दिया कि फलिस्तीन राष्ट्र का गठन स्वीकार किया जा सकता है बशर्ते
 
Sundip Kumar Singh
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मीडिया और चाँद-फिजा के तराने..!

मीडिया की बांछे खिल गई है खासकर टीवी चैनल वालों की... पता है क्यूँ... चाँद मोहम्मद फिर सामने आ गए हैं। फिर उन्हें फिजा से किये गए प्यार के वादे याद आ गए हैं और आँखों में आंसू और होंठों पे प्यार का तराना लेकर फिर से वे फिजा के दरबार में हाजिरी लगाने प
 
Sundip Kumar Singh
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सिस्टम की चील-पों और चाय वाला छोटू...

पूरी दुनिया ने शुक्रवार को बाल मजदूर निषेध दिवस मनाया। मीडिया में दिन-भर नूरा-कुश्ती चलती रही. देश भर से बाल-दिवस मनाने के लिए सज-धज कर घर से निकले समाजसेवी लोग और इस मौके पर जगह-जगह आयोजित समारोहों में भाषण देने वाले नेताजी लोग खूब दिखे. इनके फूटेज
 
Sundip Kumar Singh
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नक्सलबाड़ी से आगे...ब्रांड नक्सलवाद!

नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सलवादी आन्दोलन अब बंगाल तक ही सीमित न होकर एक देशव्यापी समस्या बन चुका है। नक्सलवाद को एक वाद के तौर पर और किसानों और गरीबों की लड़ाई के तौर पर पेश करने वालों के लिए इस सप्ताह में इस विषय से जुडी चंद ख़बरों के शीर्षक यहाँ पेश
 
Sundip Kumar Singh
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वाकई बहुत संजीदा हो गए हैं हम!

हमारे यहाँ कोई न कोई दिवस मनाने का चलन बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है। अभी-अभी दुनिया ने विश्व पर्यावरण दिवस मनाया है. इस दिन अपने एक मित्र की पर्यावरण के प्रति चिंता देखकर लगा कि दुनिया वाकई बहुत ही संजीदा हो गयी है. सुबह ऑफिस में अपने एक मित्र को लाइ
 
Sundip Kumar Singh
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अब माउस-माउस में विधमान है ईश्वर...

इन्टरनेट पर खबरों की ख़ाक छानते एक खबर हाथ लगी- सैकडों किलोमीटर दूर स्थित भगवान के दर्शन अब इन्टरनेट पर सुलभ। इसके लिए बस पैसा पे करिए और हो जायेगी आपके नाम की पूजा. मतलब दाम चुकाईये और भगवान की कृपा के हक़दार बनिए. इसके लिए अब तीर्थयात्रा के तमाम कष्
 
Sundip Kumar Singh
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राजनीति की बहती गंगा और पत्रकार हीथर ब्रुक!

कौन है ये हीथर ब्रुक! एक ब्रिटिश पत्रकार! मैंने आज पहली बार ये नाम सुना। अब आप पूछियेगा कि क्या किया है इस पत्रकार ने जो मैं इसके बारे में इतना ज्यादा बात कर रहा हुं...तो इसका जवाब है कि आज के जमाने में जब राजनीति और पत्रकारिता को लोग एक ही थैली के च
 
Sundip Kumar Singh
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इन तीस हज़ार लोगों का पेट क्या प्रभाकरण भरेगा!

श्रीलंका में लड़ाई ख़त्म हो गई है। लिट्टे का मुखिया मारा गया. श्रीलंका की सरकार ने राहत की सांस ली. दशकों से जारी खूनी लड़ाई का अंत हो गया. पूरी दुनिया ने श्रीलंका में सैनिकों का फ्लैगमार्च देखा, मौत बरसाती बंदूकों की गड़गडाहट और तोपों से बरसते शोले टी
 
Sundip Kumar Singh
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चलो अब पार्टी को धो-पोछ कर चमका लें...

चुनाव ख़त्म हो गया। जनता ने दगा दे दिया और किस्मत ने भी साथ नहीं दिया। हमें क्या मालूम था इस तरह से बिसरा देगी जनता हमारे काम को. क्या-क्या नहीं किया इस कृतघ्न जनता के लिए. जिस जनता के हाथों में एक अदद ग्लास तक नहीं थी उसे कमंडल वगैरह बटवाए... मस्जिद
 
Sundip Kumar Singh
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ई का हो गवा रे...नेताजी का सब खेले गड़बड़ा गवा...

हाँ तो हम बात कर रहे थे अपने नेताजी की। रात में अलार्म लगाकर सोये थे कि सुबह चुनाव परिणाम आने वाला है और रामफल पंडित की बात सच निकली तो उनकी किस्मत का दरवाजा आज खुलने वाला है. सुबह हुई, अलार्म बजी और नेताजी जल्दी-जल्दी तैयार हो मतगणना केंद्र की ओर चल
 
Sundip Kumar Singh
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अब बस वोटर युग का अवसान होने ही वाला है!

भारतीय लोकतंत्र का मैं भी एक वोटर हूँ। अब यानी कि १५ मई की आधी रात को मुझे लगाम अपने हाथ से छूटती हुई दिख रही है. वैसे तो १३ मई से ही हम जैसे वोटर रुपी जीव खुद को असहाय महसूस करने लगे थे. लेकिन अब जाकर लगाम अपने हाथ से पूरी तरह बाहर जाती हुई दिख रही
 
Sundip Kumar Singh
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'स्लमडॉग' अजहरुद्दीन और मिलिनेअर फ्रीडा पिंटो!

हाल ही में एक फिल्म आई थी 'स्लमडॉग मिलिनेअर'। एक चाय वाले के करोड़पति बनने की अविश्वश्नीय लेकिन दर्दभरी दास्ताँ। फिल्म में देशी-विदेशी क्रियेटिव महारथियों का जमावाडा था. फ्रेंच डायरेक्टर, भारतीय संगीत निर्देशक और फ्रेंच डीजे के तडके के बीच गरीबी की ऐ
 
Sundip Kumar Singh