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Gender Jihad जेण्डर जिहाद

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08 Mar 2010
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एक लड़की की शादी

नासिरूद्दीन जहन में एक बात हमेशा कौंधती है, क्‍या लड़की की जिंदगी का सारा सफर शादी पर ही खत्‍म होता है। मैं अक्‍सर सोचता हूँ कि दसवीं, बारहवीं में जो लड़कियाँ हर इम्‍तेहान में लड़कों से बाजी मारती रहती हैं, कुछ दिनों बाद ऊँची तालीम, नौकरी और जिंदगी के
Mar 04 2010 10:03 PM
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महिला आंदोलन की जरूरत है मर्दों की भागीदारी

आंदोलन को ही आगे बढ़ाएगी मर्दों की साझेदारी नासिरूद्दीन ढाका। बराबरी के लिए और हिंसा के खिलाफ आवाज तो महिला संगठन और आंदोलन उठाते रहे हैं। अब मर्दों की साझेदारी की बात हो रही है… तो क्या महिला आंदोलन इसके लिए तैयार है? सवाल उठ रहे हैं कि कहीं आ
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बिन मारे बैरी मरै, या सुख कहाँ समाय

लोगों के नजरिये में है बेटियों के न होने का ‘उत्सव’ जितना सुख खेत में खड़ी ईख के बिकने से होता है, वैसा ही सुख जनमते बेटी के मरने से और अगर शादी से पहले बेटी मर गयी तो क्या कहने? यह अपनी तन से पैदा हुई ‘तनया’ के बारे में बुंदे
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‘सुंदर-सुशील-संस्कारी’ बहू!

तीन) अकड़ते हो घमंड में चूर। नहीं थकते शेखी बघारते अपने को ‘मर्द’ कहते हो पर बड़े बेशर्म हो भई। भैंस/स्कूटर/ कलर टीवी या फिर चंद पैसे… नहीं मिले तो हिचकते नहीं मारने से संगनी को! चार) भैंस चाहिए स्कूटर और कलर टीवी भी फ्रिज है तो माइ
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… पोती नहीं होगी आपको ?

पाँच) जी हाँ बेटा है आपका पगड़ी आपकी सलामत बेटा पैदा करने की पूरी कीमत वसूलेंगे आप माँगेंगे दहेज और कहेंगे ‘बेटी है आपकी जो है उसी का है’ कम लाई तो ताना देंगे मारेंगे.. सच है कि बेटा ही है आपका बेटी का बोझ न खौफ। पर क्या गारण्टी इसकी पोती नहीं होगी आ
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सहती है क्यों औरत?

छह) तुम पूछते हो सहती है क्यों औरत? जवाब क्यों नहीं देती? … ‘‘पिता-पति-पुत्र ही हैं स्त्री के रक्षक बाप-शौहर-बेटा है निगहबान इसका खानदान का नाम चलाता है बेटा बोझ की खान है बेटियाँ मर्द कमाता है, खिलाता है, पैसा लाता है लाठी है बुढ़ापे की इसीलिए
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बेटी पढ़ेगी तो…

एक) बेटी पढ़े्गी तो समझेगी दुनिया।  बनेगी खुद मुख्‍तार फिर खुद लिखेगी अपनी तकदीर और तय करेगी अपना सफर ………………………. दो) पढ़े्गी नहीं तो समझेगी कैसे हुए क्‍यों हालात बदतर? पढ़ेगी नहीं
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कुछ मर्दों के साथ भी हिंसा होती है लेकिन …

इसकी तुलना महिला के खिलाफ होने वाली हिंसा से कतई नहीं की जा सकती नासिरूद्दीन ढाका। हिंसा वही करता है जिसके पास सत्ता की ताकत होती है। कई बार यह ताकत कुछ औरतों के पास भी होती है। फिर वे भी पितृसत्तात्मक मूल्यों का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन महिलाओं के स
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मन पर वार करती है हिंसा

बच्चे-बच्चियों की खातिर हिंसा से करें तौबा नासिरूद्दीन ढाका। घर में होने वाली हिंसा महिलाओं-बच्चे और बच्चियों पर जबरदस्त असर डाल रही है। उनकी शख्सीयत को प्रभावित कर रही हैं। वे कैसे इन्सान बनेंगे, इस बात की बुनियाद भी इससे तय हो रही है। कई रिसर्च इस
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सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी में है हिंसा की जड़ें

पिछले दिनों बांग्‍लादेश की राजधानी ढाका में जेण्‍डर समानता और हिंसा रोकने में मर्दों की भागीदारी पर दक्षिण एशियाई देशों का एक संवाद आयोजित किया गया था। यह संवाद संयुक्‍त राष्‍ट्र संगठन के विभिन्‍न एजेंसियों ने मिलकर किया
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मर्दानगी ही सीखनी है तो महात्‍मा गांधी से क्‍यों नहीं सीखते

महिला हिंसा खत्म करने को मर्दो का साथ जरूरी नासिरूद्दीन ढाका। ‘‘महिलाओं ने हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई। नीतियाँ और कानून बनाने के लिए जद्दोजहद किया। … लेकिन अब महिला आंदोलन को मर्दो के साथ की सख्त जरूरत है। बिना मर्दो को भागीदार बनाए ह
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चूरन के साथ बछड़े वाली गाय का दूध पीयें, बेटा होगा!

नासिरूददीन हैदर खाँ यह चूरन दूर देश तक मशहूर है। मशहूर हो भी क्यों न? पुत्र लिंग पैदा करने का जो दावा है। कोई विज्ञापन नहीं। कोई तामझाम और लुभाने वाली पैकिंग नहीं। बस पुड़िया में बाँध कर मिलेगी। एक चुटकी का कमाल! बुंदेलखंड ही क्यों हमारे समाज में पुत
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बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा

भ्रूण का लिंग परीक्षण करने वाले अल्ट्रासाउंड सेंटरों की चाँदी किसी काम की नहीं पीपीएनडीटी सलाहकार समिति नासिरूद्दीन हैदर खाँ बेटा बताया बेटी हो गई… लायक नहीं हैं फिर भी अल्ट्रासाउंड मशीन चला रहे हैं … सरकारी डॉक्टर हैं पर लिंग जाँच कर कान
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लड़की मरै घड़ी भर का दु:ख, जिये तो जनम भर का

बुंदेलखंड की धरती पर धड़ल्ले से हो रही भ्रूण की लिंग जाँच नासिरूद्दीन हैदर खाँ बांदा/चित्रकूट। खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी- बुंदेलों के मुँह से स्त्री वीरता की हमने यही कहानी सुनी थी। लेकिन अब बुंदेलखंड में यह धुन ज्यादा सुनाई दे रही
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अनचाही मुसलमान बेटियाँ: जमीनी हकीकत

कई लोगों को लगता है कि इस तरह की टिप्पिणियाँ या रपट खामख्वाह के मुद्दे उछालने का काम करती हैं। फिर वो इसकी तहकीकात में ढेर सारे ऐसे सवाल करते हैं, जिनका वर्तमान रपट से कम ताल्लुक होता है। मुसलमानों में लिंग चयन और लिंग चयनित गर्भपात की क्या हालत है,
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अनचाही मुसलमान बेटियाँ: जमीनी हकीकत

कई लोगों को लगता है कि इस तरह की टिप्पिणियाँ या रपट खामख्वाह के मुद्दे उछालने का काम करती हैं। फिर वो इसकी तहकीकात में ढेर सारे ऐसे सवाल करते हैं, जिनका वर्तमान रपट से कम ताल्लुक होता है। मुसलमानों में लिंग चयन और लिंग चयनित गर्भपात की क्या हालत है,
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… और जब उन गायब बेटियों से पूछा जाएगा (Declining sex ratio among the Muslims-1)

और जब उन गायब बेटियों से पूछा जाएगा नासिरूद्दीन हैदर खाँ ‘..और (इनका हाल यह है कि) जब इनमें से किसी को लड़की पैदा होने की खुशखबरी दी जाती है तो उसका चेहरा स्याह पड़ जाता है और वह तकलीफ में घुटने लगता है। जो खुशखबरी उसे दी गयी वह उसके लिए ऐसी बुराई की
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घायल पंखों की ऊँची उड़ान

नवीन जोशी शायद आपने फ्लेविया एग्निस का नाम सुना हो या उन्हें जानते भी हों। वे मुंबई में रहती हैं और महिलाओं के हक के लिए देश भर में लड़ने वाली वकील और सक्रिय कार्यकर्ता हैं। ‘घरेलू हिंसा’ पर उन्होंने काफी काम किया है- एक तरह से दिशा देने वाला शोध। ‘म
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हिंसा के खिलाफ एक औरत का संघर्ष और जीत

मशहूर वकील और महिला अधिकार कार्यकर्ता फ्लेविया एग्निस की आत्‍मकथा का हिन्‍दी अनुवाद है परवाज़। अंग्रेजी से हिन्‍दी में इसे ढालने की कोशिश मेरी है। पहले ‘का‍दम्बिनी’ और फिर ‘हिन्‍दुस्‍तान’ मे
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चुनाव और महिलाओं की उम्‍मीदें

चुनावी राजनीति में एक जुमला चलता है-वोट बैंक। इस लिहाज से अगर देखा जए तो महिलाओं से बड़ा वोट बैंक कोई और हो नहीं सकता। लेकिन अपने यहाँ की सियासत उन्हें वोट बैंक नहीं मानती। बात यहीं पर खत्म नहीं हो जती। दरअसल बात यहीं से शुरू होती है। सियासत और सियास
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लड़कियों की शाम

इनकी कैसी साँझ? इनकी ज़िंदगी में तो हर वक्त है साँझ का धुँधलका साँझ का क्यों रहे इन्हें इंतज़ार क्या करें इस वेला में, यही सवाल लेकर आती है हर शाम काश इस साँझ में ये भी करें ता-थया उछलें-कूदें, मचाएँ धमाल पर कहाँ हैं ये शाम कोई इनके दिल से पूछे ये तो