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Hindi short stories, poetry and blogs

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01 May 2010
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बर्फानी बाबा की दुर्लभ यात्रा

शिव शंकर , भोले-भन्डारी, कैलाशपति, विश्वनाथ ब्रम्हाण्ड के कण-कण में व्याप्त इस जगत को जागृत करने हेतु विभिन्न स्थानों पर भिन्न- भिन्न रूपों में पूजे जाते हैं|उन सब में सर्वोपरि कश्मीर में स्थित अमरनाथ धाम है |उत्त्त्तर भारत में कश्मीर की
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mera saath dena humsafar

बाद्लो के उस पार होकर बङी दूर एक रास्ता जाता है साथ मे मेरा हमसफर हो तो वह रास्ता प्यार देता है लाख ऊची पर्वते हो कितनी भी पथर्रीली राह हो कठिन चाहे कितनी भी हो जिन्द्गगी के दर्द से भरे दिन मलिन जटिल तूफान भी हो या खूब वारिस भी हो गिरता हुआ रास्ता क्ट
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चुभन(तीसरा भाग)

रजत हर वक्त शगुना से बात करने का यत्न करता, लेकिन वह कन्नी काटकर निकल जाती |आखिरकार वे दोनो जब कमरे में अकेले हुए तो रजत ने उसे अपनी ओर खींचकर पूछा,” शगु! कैसी हो ? पूछोगी नहीं कि मैं कैसा हूँ” शगुना ने झट उसकी बाहों को परे हटाते हुए
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दीदार-ए-यार

बहते चश्मों को तरसते मृग शावक सागर में समाने को बेताब दरिया जैसे पपीहे को स्वाति बूँद की प्यास ख़ादिम को दीदार-ए-यार की आस… कुंतल लट से लिपट खुश है दिल बँधकर जंजीर में दीवानगी हुई ऍसी तिशनगी बुझा रही हैं निगाहें उनकी दीदार-ए-यार ही अब ख़ुराक बन ग
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पुनर्जीवन(First Part)

दिन भर फुर्सत में बैठे रहने से विशा का मन नहीं लगता था |नौकर-चाकर ही सब काम कर दिया करते थे |उसने पेंट करके ग्रीटिंग-कार्ड़ बनाने की सोची |विशा का हाथ ड़्राईंग-पेन्टिंग में बहुत माहिर था |उसने बहुत ही प्यारे-प्यारे कार्ड़स बनाए |
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इन्द्रधनुषी चाह

विजय की कार जैसे ही कंवल की दुकान के सामने जाकर रुकी |कंवल ग्राहक को फ़टाफट सामान पकड़ाकर बाहर की ओर भागा |उसने विजय को कसकर सीने से लगा लिया |दोनों में बेहद प्यार था |रामनाथ को दुकान देखने को कहकर, दोनो दोस्त दुकान के ऊपर के घर में
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आँचल में बाँध सिसकी

अपने अल्फ़ाज़ों के नश्तर मेरे अन्तस में चुभोकर शराफ़त का मुखौटा ओढ़े तुम बन जाते महान सदा! नख से शिख तक काँप उठती आसमां सिर से ज़मीं पर आ गिरता तन में बहता लहू लावा बन जाता मूक रुदन से दब जाता लावा! झूठी चमक ओढ़ चेहरे पर खिलखिलाती मेरी सूनी बहार रुके-रुके
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हाहाकार

झोपड़िया की टूटी छत से टप-टप टपकता जल जीवन भिगोता, कँपकँपाता इमारतें बनानेवाला तन! फटे चिथड़ों में लिपटते रेशमी परिधान बनानेवाले पिचके पेट, अन्न को तरसते जग का पेट भरने वाले ! कूड़े के ढेर पर पलते कूड़ों का ढेर उठाने वाले घुटने पेट में गाड़,ठिठुरते नरम कं
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नोबेल प्रश्नचिन्ह के दायरे में!

अमरीकी राष्टृपति बराक ऑबामा को वर्ष २००९ का शान्ति का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा होने पर सारा विश्व असमंजस में है | शांति स्थापित करने का प्रयास करना एवं बेहतर भविष्य की उम्मीद जगाना (वो भी भाषणों में)…इससे वे शांतिदूत की पदवी कैसे पा गए
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भीतरी बारिश

सूखे तन पे बरसती भीतरी बारिश में भीग-भीग जाती हूँ मैं अन्तर्मन से ! गीली मेरी धोती चिपकी मुझ से क़ोफ़्त है कितनी उघड़ा है बदन ! भीतर चल रहे अंधड़ कँपकँपा जाते हैं दिखती हूँ जीवन जीती भीतर ही भीतर रिसती! चैन ले लूँ मैं भी आँधियाँ तो थमें निचोड़ लूँ गीली धो
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निर्झर

नूतन देहयष्टि का लिया प्रथम आलिंगन अनछुए बदन में मचली सिहरन ! तन-बदन के सहस्त्र छोर तक सका न जिन्हें कोई और चप्पा-चप्पा, हर इक पोर तुम्हारे स्पर्श से हुए विभोर ! सूर्य-किरण जहाँ न जा पाए उन अँधियारों में जा समाए हो तुमसे आत्मसात मचले अरमान ! बाँहों में
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पुनर्जीवन (second Part)

विशा फटी आँखों से रोहण को तक रही थी |किसी तरह अपने को सँभाल वह उसका हाथ झटक कर वहाँ से हट गई |आँखों में अटके सागर को उसने बेरोक बह जाने दिया |भरे-पूरे घर में तो उसे सिसकी लेने पर भी रोक थी ,अभी तक जो बात पर्दे में थी वह खुल सकती थी [..
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चुभन (दूसरा भाग)

रजत की साधारण नौकरी उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी | वे अपनी बेटी से बेहद प्यार करते थे, तभी उसकी खुशी के लिए उन्हें झुकना पड़ा | दो प्यार करने वालों को मिलाकर अब वे हार्दिक प्रसन्नता व आत्मिक शान्ति का अनुभव कर रहे थे | वे अपनी लाडली
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फैसला-दर-फैसला

तलाक की चर्चा होने पर ईषिता का मन काँप सा उठा, उसके पति पर चरित्रहीन होने का आरोप शत-प्रतिशत सत्य था |इसी से उसका तलाक लेने का फैसला पक्का था |वकील आया, उससे कुछ- कुछ पूछा—फिर कुछ पढ़कर सुनाया |उसके हस्ताक्षर करवाए और चला गया