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07 Jun 2010
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मेरी नयी किताब - दाढ़ी में तिनका

प्रिय मित्र बहुत बरसों के बाद मेरी एक मूल किताब आ रही है – दाढ़ी में तिनका। इसमें आप बहुत कुछ पायेंगे- यार दोस्‍त, घुमक्‍कड़ी, शहरनामे, जीवन की खट्टी मीठी बातें, कुछ वरिष्‍ठ जनों से मुलाकात और मेरी नज़र में मैं खुद। मेधाबुक्‍स, एक्‍स 11, नवीन शाहदरा,
 
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60वां गणतंत्रता दिवस - दुष्‍यंत के दस सवाल

पिछले दिनों जयपुर के मेरे मित्र दुष्‍यंत ने अपने अखबार के आज के अंक के लिए मुझसे 10 सवाल पूछे। यही सवाल हम सब अपने आप से भी पूछ सकते हैं।आजादी के समय मेरा परिवार क्या था और मेरा बचपन कैसे गुजरा?मैं 1952 में पैदा हुआ। होश संभालने पर पाया कि हमारा परिवार
 
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कुछ अनछुए पल कमलेश्वर जी के साथ - प्रिया आनंद

ये रचना और साथ में चित्र मेरी टेलिफोन मित्र प्रिया आनंद ने हिमाचल प्रदेश से भेजे हैं. कमलेश्‍वर जी से जो भी मिला, उनका मुरीद हो गया. प्रिया मैडम ये दुर्लभ तस्‍वीरें मेरे ब्‍लाग के माध्‍यम से आप सब के साथ शे‍यर कर रही हैं. उनका स्‍वागत है. सूरज प्रकाश
 
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लंदन में मुलाकात नवाज़ शरीफ़ से . . .

कथा यूके के सम्‍मान समारोह में शिरकत करने के लिए जब मैं जुलाई 2007 में लंदन की यात्रा पर गया तो मेरी बहुत पुरानी मित्र पाकिस्‍तान की कथा लेखिका नीलम बशीर से एक बार फिर मुलाकात हो गयी. वे हमेशा की तरह अमेरिका से पाकिस्‍तान या शायद पाकिस्‍तान से अमेरिक
 
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बायें हाथ से काम करने वालों का दिन

आज अखबार ने बताया कि आज लैफ्ट हैंडर्स डे है. जब भी इस तरह के डे की बात पढ़ता हूं तो यही अफसोस होता है‍ कि बरस भर के बाकी दिन तो दूसरों के लिए लेकिन एक दिन आपका. अब चाहे मदर्स डे हो या फादर्स डे. साल में एक दिन आपका. भले ही अपने देश का करवा चौथ का व्र
 
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जयपुर में कहानी पाठ- कुछ नोट्स

पिछले दिनों जयपुर जाना हुआ. पहले तो मी‍टिंग की तारीख तय न हो पाने की वज़ह से जाना टलता रहा फिर बम धमाकों की वज़‍ह से जाना टला. मीटिंग तो अपनी जगह थी लेकिन मेरे ध्‍यान में जयपुर के वे सभी साहित्‍यकार और पत्रकार मित्र थे जो मेरे आने की खबर पा कर लगभग र
 
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मैंने पढ़ी किताबें - 2008 में

मैंने पढ़ी किताबें और देखीं फिल्में यहां मैं 2008 के दौरान पढ़ी गयी उन किताबों की फेहरिस्त दे रहा हूं जो मैंने खरीदीं या किसी न किसी बहाने मुझ तक पहुंचीं। कुछ किताबें पुस्तकालय से ले कर भी पढ़ी होंगी लेकिन उनके नाम अभी याद नहीं आ रहे। ऐसी किताबें भी
 
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अंग्रेजी फिल्में देखने के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी नहीं है मनोज रूपड़ा के लिए

बात शायद १९९९ के मुंबई फि़ल्म फेस्टिवल की है। तब तक उसका मुंबई से स्थायी रूप से मोहभंग नही हुआ था और वह अपनी रोजी रोटी मुंबई में ही कमा खा रहा था। उन दिनों मेरा ऑफिस मुंबई में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुआ करता था और फि़ल्म फेस्टिवल के सीज़न टिकट मेरे ऑ
 
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मेरा उपन्‍यास सुनो . . ..

कुछ दिन पहले मैंने आपको बताया था कि मेरे मित्र और विख्‍यात ब्‍लागर रवि रतनामी जी ने अपने सदाबाहर ब्‍लाग http://rachanakar.blogspot.com/ पर मेरे उपन्‍यास देस बिराना को ई बुक के रूप में डाला है। वे मेरे द्वारा अनूदित चार्ली चैप्‍लिन की आत्‍म कथा और चार
 
कथाकार
Dec 29 2009 11:49 AM
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आप बोलेंगे हिन्‍दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा

आप बोलेंगे हिन्‍दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा जी हां, अब बाजार में एक ऐसा औजार आ गया है कि आप बोलेंगे हिन्दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा. आपसे बोलने में गलती होगी तो उसे दोबारा बोलने पर ठीक भी कर देगा. इतना ही नहीं, आपके प्री रिकार्डेड संदेश, भा
 
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उदंती.कॉम का स्‍वागत

हमारी एक मित्र हैं रत्‍ना वर्मा। रायपुर में रहती हैं और बरसों तक वहां इतवारी पत्रिका संभालती रही हैं। इधर वे एक बहुत ही शानदार पत्रिका ले कर हाजिर हुई हैं। नाम है उदंती.com। आप निश्चित ही उदंती का मतलब भी पूछना चाहेंगे। मैंने भी पूछा था। उदंती दरअसल
 
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Dec 29 2009 11:49 AM
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इंदु शर्मा कथा सम्मान 2009 के लिए नामांकन

अक्तूबर 2008 इंदु शर्मा कथा सम्मान 2009 के लिए नामांकन प्रिय मित्र आप जानते ही हैं कि पिछले चौदह बरस के दौरान इंदु शर्मा कथा सम्मान ने अपनी चयन प्रव्रिᆬया, पारदर्शिता तथा समकालीन श्रेष्ठ साहित्य के प्रति अपनी आस्था और सम्मान भावना के कारण न केवल राष्
 
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कबाड़खाना.ब्‍लागस्‍पाट.कॉम पर किताबों की दुनिया पर मेरी पोस्‍ट

अच्‍छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होतीं - मेरी ये पोस्‍ट पढि़ये kabaadkhaana.blogspot.com पर. आपकी राय का इंत‍ज़ार रहेगा सूरज प्रकाश
 
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17वीं पुण्‍य तिथि पर शरद जोशी को याद करते हुए

बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा लेखक होना बेहतर है. आदमी के पास अगर दो विकल्‍प हों कि वह या तो बड़ा अफसर बन जाये और खूब मज़े करे या फिर छोटा मोटा लेखक बन कर अपने मन की बात कहने की आज़ादी अपने पास रखे तो भई, बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा सा लेखक ह
 
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नमक के बहाने

पुणे में वह मेरा आखिरी दिन था। लगभग पचास महीने वहां बिताने के बाद मैं मुंबई वा‍पिस जा रहा था। जो दो एक दावतनामे थे, वे निपट चुके थे। मैं वहां अपने आखिरी दिनों में होटलों में ही खाना खा रहा था। बेशक सामान बाद में ले जाता, मैं अगली सुबह वापिस जा रहा था
 
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प्रवासी साहित्‍य का अंधकार युग या स्‍वर्ण युग

इधर हंस के ताजा अंक में पत्रकार अजित राय का एक लेख प्रवासी साहित्‍य का अंधकार युग छपा है। ये लेख कई ब्‍लागों पर भी मौजूद है और पक्ष विपक्ष में कई टिप्पणियां बटोर रहा है। नुक्‍कड़ ब्‍लाग पर पर इसे http://nukkadh.blogspot.com/2009/09/blog-post_7078.htm
 
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धीरेन्द्र अस्थाना : मेरा सबसे पुराना साहित्यिक सहयात्री

धीरेन्द्र अस्थाना को मैं पिछले तीस इकतीस बरस (यह संस्मरण 2005 में लिखा गया था) से जानता हूं या कम से कम जानने का दावा तो कर ही सकता हूं। 1973 के आस पास वह मुजफ्फरनगर से नया नया देहरादून आया था और देहरादून के उस वक्त के बेहद सक्रिय साहित्यिक माहौल में
 
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बुकर प्राइज़ की जगह देखना चाहते हैं तेजेन्द्र कथा यूके सम्मान को

बुकर प्राइज़ की शुरुआत लगभग 40 बरस पहले हुई थी। एक बरस छोड़ कर दिया जाने वाला ये सम्मान अब तक सात भारतीय लेखकों की कृतियों पर भी दिया जा चुका है। सम्मान के लिए पात्र होने के लिए किताब के साथ स्तरीय होने के अलावा बस, एक ही शर्त जुड़ी होती है कि उसका
 
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Sep 23 2009 03:16 PM
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दिल्‍ली पूछे चार सवाल

जब भी दिल्ली जाता हूं, दिल्ली मुझसे हर बार वही चार सवाल पूछती है - कब आये- कहां ठहरे हैं- किस किस से मिले और - कब जायेंगे। बात शुरू से शुरू करता हूं। मैं दिल्ली में 78 से 81 तक लगातार रहा। तब बेशक लिखना शुरू नहीं हुआ था लेकिन मेरे ही शहर के वरिष्ठ कथाकार
 
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खब्‍बू दिवस

आज एक बार फिर आपसे खब्‍बू दिवस यानी लेफ्ट हैंडर्स डे पर बात कर रहा हूं। पिछले बरस इसी दिन आपसे खब्‍बुओं के बारे में ढेर सारी बातें शेयर की थीं। आज कुछ और बातें। पिछले दिनों कुछ ब्‍लागर्स मेरे घर आये थे तो खब्‍बुओं की दास्‍तान चली और सबने अपने अपने खब्‍बू
 
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लौटना मुंबई नगरी....

पुणे में लगभग चार बरस और दो महीने बिताने के बाद आज अपनी 29 बरस पुरानी कर्मस्थली मुंबई लौट रहा हूं। मुंबई आना जाना पहले भी होता रहा है। 1989 से 1995 तक मैं अहमदाबाद में रहा था और तब मैं वहां से बहुत अमीर हो कर लौटा था। जि़ंदगी के सही मायनों में अमीर।
 
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कितना अच्‍छा दिन

सुबह सुहानी है। मौसम मीठा मीठा सा तराना छेड़े हुए है। आज का दिन हमारे लिए खास है। बड़ा बेटा अपनी पहली नौकरी पर गया है। नागपुर से बीटेक और आइआइएम, लखनऊ से एमबीए करने के बाद। मेरे खराब स्‍वास्‍थ्‍य के बावजूद मेरी हिम्‍मत बढ़ाने के लिए उसने मुझे अपने पै
 
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कठपुतली का खेल

पिछले कुछ दिनों अस्पताल में रहना पड़ा तो पहले भी कई बार देखी फिल्म साउंड ऑफ म्यूजिक अपने लैपटॉप पर देख रहा था। फिल्म में एक दृश्य है जिसमें बच्चे घर पर ही अपने मेहमानों को कठपुतली का खेल दिखाते हैं। इस दृश्य को देख कर अपने बचपन के दिन याद आ गये जब हम
 
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बहुत निराश हुआ चालीस बरस बाद अपने स्‍कूल जा कर

बहुत बरसों से ये इच्‍छा थी कि अगली बार जब भी अपने शहर देहरादून जाऊं, उस गांधी स्‍कूल में जरूर जाऊं जहां से मैंने 1968 में हाईस्‍कूल पास किया था। बेशक 1974 में नौकरियों के चक्‍कर में हमेशा के लिए मैंने अपना शहर छोड़ दिया था और उसके बाद भी कुछ बरस तक व
 
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युवा पुत्र की अकाल मौत से उपजे शून्‍य में घुटता परिवार

बेंगलूर में रहने वाले मेरे मित्र के जवान बेटे की पिछले बरस नवम्‍बर में रात के वक्‍त एक सड़क दुर्घटना में मृत्‍यु हो गयी थी। बेचारा डेढ़ घंटे तक सड़क पर घायल पड़ा रहा। मां परेशान हाल मोबाइल से उससे बात करने की कोशिश कर रही थी। तभी वहां से गुज़र रहे कि
 
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न सारे जीनियस दाढ़ी रखते हैं और न सारे दाढ़ी वाले जीनियस होते हैं

पिछले दिनों जनवरी 2009 के नया ज्ञानोदय के संपादकीय में श्री कालिया जी ने दाढ़ी, मीडियाकर और जीनियस को ले कर कुछ रोचक और कुछ अरोचक टिप्पाणियां की थीं। खुद दाढ़ी वाला होने के नाते मेरा ये फर्ज बनता था कि दाढ़ी और दाढ़ीजारों के पक्ष में कुछ कहूं। उन तक
 
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कथाकार लवलीन नहीं रहीं

अभी थोड़ी देर पहले जयपुर से दुखद खबर मिली कि कथाकार लवलीन नहीं रहीं. वे मेरी बेहद प्रिय कथाकार और मित्र थीं. कई बार उनकी तकलीफों को देख कर मन व्याकुल हो जाया करता था लेकिन उनकी जिजीविषा देख कर यह आश्वासन भी रहता था कि ये लड़की अपनी जिंदगी खींच ले जाय
 
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