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12 Jun 2010
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खामोशी और शब्द

न जाने बेजान स्मृतियों में इतनीताकत कहां से आ गई कि वेयकायक उठ कर वर्तमान में अपनीजडें तलाशने लगी थी ।शायद यह वक्त हीअपने आप को पूरा होते हुएदेखने का थामैंने अपने दोनों हाथ उठायेमेरी दुआ तुरंत कबुल हो गई समय खामोशी के साथ थाइससे पहले की शब्द अपनामनचाहा
 
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hava pani

शुरुआत या अंतएक ऊंची उठती आज़ान के आस-पासही उगे थे कुछ अहसासकुछ जन्म ले रहा था कहींयह शुरुआत थी या किसी चीज का अंतवह सपनें की तरह आया ओरहकीकत की तरह लौट गया उसके आने से उस दिन काइतिहास कुछ बदल सकता थादूसरा अच्छा या बुरा पन्नामेरी जिंदगी में जुड सकता थापर
 
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कला की उपासिका-ऐलिज़ाबेथ ब्रूनर

बचपन से युवावस्था की ओर दिनों में जब ढूंढ-ढूंढ कर देश दुनिया की कला, सिनेमा, लेखन, अध्यातम की चीज़े पढने का शौक हुआ करता था, लगभग उन्हीं दिनों ऐलिज़ाबेथ ब्रूनर के बारे में पडने को मिला। विदेशियों का भारत प्रेम मुझे हमेशा अभिभूत करता रहा है। उस वक्त वे
 
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एक जीवन यह भी

ताउम्र जीवन की आपाधापी में संघर्ष चलता रहता है। एक बडा हिस्सा समाज में स्वयं को स्थापित करने में गुजर जाता है । जब जीवन का उतरार्थ ठीक सामने दिखाई पडता है तब सब कुछ हाथ से फिसलता प्रतीत होता है । यह ठीक है जीवन में कुछ प्रतिबध्तायें होती हैं जिनको निभाना
 
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चिडियों का गीत

हिंदी साहित्य में जिस तरह सुमित्रा नंदन पंत अपनी कविता में पराकार्तिक छटा बिखेरते है उसी तरह का रंग यह चीनी कविता अपने में समाहित किये हुये है। विश्व कविता का एक मोती है चीनी कविता। छन चिंग-रुंगमई के महीनेकया कहती है चिडिया पहाडों मेफसले और पौधेफसले ओर
 
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सलामत भाई

जानवरों की जमात में सबसे शरारती प्राणी को नचाना जानते हो तुम कितना हुनर है तुम्हारे हाथों में सलामत भाई तुम्हारे कहने पर बंदर टोपी पहन लेता है आँखे छपकाता है कलाबातियाँ खाता है झट से आकर तुम्हारी गोद में बैठ जाता है एक जानवर से तुमहारा रिश्ता अजीब सी
 
vipin-choudhary
Dec 29 2009 11:51 AM
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लोकतंत्र की इस लडाई में

अगर हमें आजादी चाहिये तो इसके लिये हमें अपना पूरा जीवन जोखिम में डालना पडेगा। यह बात सू कि से बेहतर कौन जानता होगा जो म्यानमार में लोकतंत्र की माँग के एवज में पिछले तेरह सालों से रँगून में अपने घर में नजरबंद हैं। यह है बडी माँग के बडे लोकतंत्र की माँ
 
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स्त्री शक्ति को नमन

एक कविता शर्मीला इरोम के लिये (रोश्नी की लकीर) हर शब्द भारी है यहाँ कहाँ हैं मोरपँखी सपनों की उडान कहाँ प्रसँग हैं इंदधनुषी रंगों की मुस्कान कहाँ है तिलिस्मी यौवन का उन्माद पल प्रतिपल की पीडा लेखा जोखा है केवल यहाँ इस सफेद चादर पर चारों दीवारों के बी
 
vipin-choudhary
Dec 29 2009 11:51 AM
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आने वाले कल में

विज्ञानं के क्षेत्र में कई तरह के प्रयोग होते रहे हैं। अमेरिकन विज्ञानिक समुदाय के अनुसार मानव इतिहास की सबसे बडी खोज खनिजो के लिये बनाई गयी पिरियोडिक टेबल है। दुसरी बडी खोज लोहे की खोज है, तीसरी रेडियो की खोज तथा चौथी ग्लास की खोज तथा पाँचवी खोज सतह
 
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जीवन के भीतर स्त्री

हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा २३ अकटूबर में आयोजित महिला विमर्श पर चंदीगढ में आयोजित विशिष्ट अतिथि के रूप में आलोचक निमला जैन ने कहा समाज में महिलाओं की भिन्न भिन्न समस्याऐं हैं। समाजसेविका निमल दत्त ने कहा महिलाओं की दशा अभी भी शोचनीय है। केवल कुछ म
 
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Dec 29 2009 11:51 AM
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चिकित्सा और नोबेल

सन १९०१ से शुरू हुये नोबेल पुरुस्कार हर साल शांति, साहित्य, भौतिकी, रसायनशास्त्र, चिकित्सा के लिये मिलता है। भारत में अब तक गुरदेव रविन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य, चन्द्रशेखर रमन को भौतिकी के लिये, डा हरगोविन्द खुराना को चिकित्सा के लिये, मदर टेरेसा को
 
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Dec 29 2009 11:51 AM
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पत्थर होती दुनिया

जीवन की इस आपा धापी में कई परम्परागत मुल्य कम होते जा रहै हैं। मानवीय संवेदनाऐ मानों खत्म ही हो गई हैं। सभी लोग बस पैसों की तरफ दौड रहें है। जो मुल्य कभी हमारे लिये बेहद मुल्यवान थे अब वो ही हमें बोछ लगने लगे हैं। पर जब हम हर तरफ से हम मुसीबत में घिर
 
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Dec 29 2009 11:51 AM
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गुरु मंञ

हम सभी एक उद्देश्य लेकर इस धरती पर आते हैं। हमारे पास जीने का जितना भी समान है हमें उसी से ही काम चलाना पडता है। इंसानों से लेकर प्रकर्ति के पास अपने जीवन यापन का सभी साजों सामान मौजुद है। सभी जीवित चीजें अपनी निर्धारित गति से ही चलते हैं। आज से ही न
 
vipin-choudhary
Dec 29 2009 11:51 AM
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बाढ की विभीषिका

बिहार में इन दिनों जबरदस्त बाढ का प्रकोप जारी है। हर रोज बाढ की विभीषिका की तस्वीरें अखबार में देखने को मिलती है। सवाल यह उठता है, हर साल आने वाली इस बाढ की रोकथाम की व्यवस्था के लिये सरकार के पास कोई कारगर उपाय नहीं है। सभी प्राकृतिक आपदाओं की मार ग
 
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Dec 29 2009 11:51 AM
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प्रार्थना का वक्त

इस भागदौड से भरे माहौल में जीवन की रफतार बहुत तेज होती जा रही है। सभी स्थापित मूल्य बदलते जा रहे हैं। पैसा कमाने और अंधाधुंध आगे बढने की होड में हम आगे और आगे बढते जा रहे हैं अपने मूल्यों की तिलांजली दे कर। सादा जीवन और उच्च विचार की अवधारणा खतम होती
 
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Dec 29 2009 11:51 AM
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आज का यह दिन

यूँ तो हर दिन कि शुरूआत सूरज के उगने से ही होती है और हर दिन का अवसान सूर्य के अस्त होने से होता है। हर दिन की अलग कहानी होती है, कोई दिन अपनी शुरूआत में ही भारी दिखाई देता हैं, तो कोई दिन खुशनुमा तबियत लिये पैदा होता है। इनहीं दिनों के तयशुदा घंटों
 
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Dec 29 2009 11:51 AM
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बहुत पहले से

बहुत पहले से ही कुछ चीजों का होना तय होता है। हर चीजों को घटना एक निश्चित पक्रिया है, हम रोक नहीं पाते उसे तो कोई अपनी किस्मत को कोसता है तो कोई मातम मनाने लगता है। हमारे पास तब केवल एक ही रास्ता है जिंदगी को उसी तरह बहने दो जिस तरह वह बह रही है। उसम
 
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Dec 29 2009 11:51 AM
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खुद को दोहराते हम

जीवन का कैनवास बहुत लम्बा चौडा है। हम ढेर सारी चीजें समेट कर चलते हैं जिनमें से कई चीजें पीछे बहुत पीछे छुट जाती हैं तब हम ठहर कर सोचते है कि हमारे लाख चाहने पर भी ऐसा क्या हुआ की वह वस्तु हमें नहीं मिली। तब हार कर हम ढुढतें हैं कोई मंत्र जो जीवन में
 
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आओ चुनाव-चुनाव खेलें

चुनाव-चुनाव खेलेगे हमारे नेता लोग फिर चुनाव जितने के बाद जनता से लुका छिपी खेलेंगे। चुनाव को लेकर यह मज़ाक आम हो चला है और इससे भी बढी बात यह यह है कि हमें इस मज़ाक पर कोई शर्म भी नहीं है। लोकतंत्र में चुनावों को उत्सव की संज्ञा दी जाती है, चुनावों की
 
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Oct 14 2009 07:48 PM
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मराठी कवि विंदा करंदीकर की कविता

हिंदी के अलावा मराठी, मलयालम, तेलगु कविता से गुजरते हुये विंदा करंदीकर मराठी के कवि जिनहें ३९ वाँ भारतीय ज्ञानपीठ का पुरुस्कार प्राप्त हुआ की बेहद खूबसूरत कविता से रुबरु हुई कविता का शीर्षक हैमैनें तुम्हें देखा नहीं मैंने तुम्हें देखा नही और शायद देख
 
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मोहनदास अंतसचेतना पर प्रहार करती फिल्म

जहाँ हमारी हिंदी फिल्मों में बेहतरीन विषयों की पटकथा की कमी का रोना रोया जाता हो, वहीं एक हैरतअगेज़ विषय पर फिल्म बनाने का बीडा उठानें का काम किया है, मज़हर कामरान, उदय प्रकाश और आभा सौनकिया की टीम ने। हमारे हिंदी फिल्मों के अब तक के इतिहास में किसी
 
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Sep 11 2009 02:07 PM
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मँहगाई

आज के इस वक्त में हमेंहमें कपडा, रोटी और मकान से ज्यादाऔर भी कुछ चाहियेपर मँहगाई के उतार चढाव के इस दौर मेंकुछ ज्यादा मिलने की उम्मीद हमें नहीं हैहैरान परेशान होने के दिन अब लद गये हैहमने मान लिया है रुपया हमारा बाप हैऔर हमनें उसकी गुलामी स्वीकार कर ली
 
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Aug 30 2009 09:39 AM
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तुगलक की विरासत और हमारी-----

वर्तमान को इतिहास से जोडने में हमारी प्राचीन धरोहरे एक सेतु का काम करती हैं। आज जब हम अपनें वर्तमान के एश्वर्य पर गर्व करते है वही इतिहास की विशालता हमारे उस गर्व को धुमिल कर देती है।दिल्ली में जहाँ लाल किला, इंडिया गेट, कुतुब मीनार जैसी विख्यात ऐतिहासिक
 
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Jul 26 2009 12:59 PM
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मृगतृष्णा

मृगतृष्णा और इंसान में उतना ही अंतर है जितना अंतर प्रेम और प्यास में जीवन और आस में है आशाओं के छोटे-बडे टापुओं को लाँघते हुये हम वहीं पहुँच पाते हैं केवल, जहाँ दूर तक फैला हुआ पानी है और लगातार लम्बी होती घनी परछाईयाँ हैं तमाम उम परछाईयों के पीछें भ
 
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हम केवल हमीं से हैं

हर इंसान अपना एक आत्मसम्मान ले कर पैदा होता है। उसकी चेतना में सबसे पहले खुद का सम्मान करना मौजूद रहता है तभी तो जब हम एक छोटे से बच्चें को भी कई लोगों के सामनें डाँट देते हैं तो वो भी बुरा मान जाते हैं। हर इंसान के लिये सहज ही अधिकार उपलब्ध हैं केवल
 
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बेहतर पसंद

एक आहवाहन के साथ एक आवाज आई मैं उस वक्त भी उसके साथ थी यह बेहतर पंसद का मामला था जो दोनों तरफ से एक साथ उठना था पर न जाने क्यों कुछ बुरें धब्बें पडनें ही थे जो अपना काम कर ही गये और मैं असहज हो गई जब एक साथ कई हकीकतों ने एक साथ सिर उठाया तो बडी हकीकत
 
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जिन्दगीं

एक सपना दूसरे सपनें से टकराता है तो चमक पैदा करता है एक रिश्ता दूसरें के निकट आता है फिर नाकाम हो लौटता हैं एक मुस्कुराहट जो कहीं गुम हो टूटता तारा बन जाती है एक उम्मीद जो आखिर में खुद को राख के ढेर में पाती है जिंदगीं कहीं इन्हीं अदभुत रिश्तों का ना
 
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कम्युनिटी रेडियो---- समाज सेवा का नया स्वरुप

बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब रेडियो केवल संगीत और खबरें सुनने का सस्ता और सरल माध्यम था। रेडियो की लोकप्रियता के उस दौर में रेडियो सिलोन और अमीन सयानी एक दुसरे के पर्याय बन गये थे। आज से कई साल पहले यह बात असंभव लग सकती थी पर आज के दौर में रेडियो भी
 
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women empowerment

community radio
 
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Feb 01 2009 09:58 AM
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चलो नये साल में प्रवेश करें

हमें हर वक्त कुछ नया चाहियें तो नया साल क्या बुरा है हम सब ही नये साल की ओर लपकेंगें और निचोड लेंगें उसका नयापन भी भर देंगें उसमें वो ही उदासी, पीडा और वो तमाम खामियाँ जो हमनें बीते बरस कमाई थी हम पूरी तरह से तैयार बैठे हैं पुराने साल को इतिहास के सू
 
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