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31 Dec 2009
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तुम्हारे बोल

तिलमिला जाता हूँ मैं हद कर देती हो क्या शर्तों पर जीवन जीने लगूँ या मान लूँ कि मेरा कोई अस्तित्व नहीं, बिन तुम्हारी सहमति के क्या चाहती हो तुम मैं कहता हूँ वो तुम मानती नहीं तुम कहती हो कि तुम जानती नहीं कोई तो रास्ता होगा..... सोचो न!!! बताओ न!!! मै
 
साधवी
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जिन्दगी और मौत

मौत!! आज कुछ इतने करीब से गुजरी जिन्दगी!! एक पल को ठिठकी सहमी, भरमाई, फिर हाथ थाम कर मेरा ले चली अपने साथ. एक नया साहस, एक नया अंदाज. अब तो सब कुछ देखा सब कुछ जाना पहचाना सा है. अब मुझे मौत से डर नहीं लगता!!
 
साधवी
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मेरा चिन्तन

मेरा चिन्तन मानस के अंतःपटल पर पर उठते चिन्तन मैं कौन हूँ? मैं कहाँ हूँ? मैं क्या हूँ? से परे सतही चिन्तन के पार एक अस्तित्व का प्रश्न क्या मैं हूँ?
 
साधवी
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मैं मुक्त हो गई

मन भटका था. तब मैं १७ साल की थी. घर पर माँ, पिता जी और एक छोटा भाई था. हम गाँव मे रहते थे. घर में यूँ तो कोई आभाव नहीं था मगर अथाह भी नहीं था. ग्रमीण परिवेश में शायद लड़कियाँ देर से बड़ी होती हैं. जो कुछ शहर की लड़कियाँ १०-१२ साल की उम्र में जान जाती है
 
साधवी
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चिर मौन!!

बेखौफ वैभवशाली किन्तु गंभीर और मौन... तन पर अरमानी का मँहगा सूट और उनसे उठती फ्रांसीसी परफ्यूम की उत्तेजक महक की अनकही आवाज!! सबने सुनी सबने गुनी सब साथ हो लिए.... घबरा हुआ वो आँख में आसूं लिए बदबूदार चिथड़ों में लिपटा भूख से परेशान दो रोटी के लिए ची
 
साधवी
Dec 29 2009 11:53 AM
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साँस की लूट

दो मुक्तक प्रस्तुत कर रही हूँ. -१- लिख रहे हैं जिन्दगी के रुप को रोज होती सांस की इस लूट को देखते ही देखते सब चुक गया ढो रहे हैं हड्डियों के ठूंठ को. -२- देखती हूँ रोज अपने राम को और उसमें ही बसे रहमान को बांटते हैं धरम के जो नाम पर क्या सजा दें आज उ
 
साधवी
Dec 29 2009 11:53 AM
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हाय, ये कैसी विडंबना है!

तू मेरा वर्तमान है.. मैं तुझसे मूँह चुराती हूँ.. तुझे देखने को भी मेरा मन नहीं करता! और फिर खोजने लगती हूँ तुझमें अपना भविष्य. सजाने लगती हूँ नये सपने! हाय, ये कैसी विडंबना है!
 
साधवी
Dec 29 2009 11:53 AM
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कौन है और क्या तलाशती है?

वो कुछ बोलती नहीं है. वो रोती नहीं है. वो हरदम एकटक बस सामने वाले की आँख में आँख डाले ताका करती है.. जाने क्या खोजती है सामने वाले की आँख में वो. उसकी तलाश का कोतुहल उसकी आँखों में दिखता है.. एक अजब उदासी, एक अजब परेशानी, एक अजब ज़ज्ब तूफान और एक अनजा
 
साधवी
Dec 29 2009 11:53 AM
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जनक कौन?

बढ़ती आबादी की सहानुभूतिराहित समवेदनाशून्य प्रवृतियाँ, विषम सामाजिक परिस्थियाँ और सामूहिक भृष्टाचार क्या यही अपराधों एवं दुष्कर्मों का जनक नहीं??
 
साधवी
Dec 29 2009 11:53 AM
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मोहल्ला और कविता

कुंठा से मन कडुवाया.. शब्दों ने आकार लिया.. ओह! शायद कविता रच गई.. अब कुछ गोड़ पसार लें.. तम्बाखू खंगार लें.. मोहल्ले के नुक्कड़ वाली पनवाड़ी की दुकान पर शाम को बतियायेंगे इस कविता को सुनायेंगे... मोहल्ले के तो हम मुन्नु हैं कौन बूझता है हमारा कवि वा
 
साधवी
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हाय!! मेरा भारत महान!

एक दूसरे को पीछे खींचते... एक दूसरे को नीचे दिखाते... दूसरों को दुखी देख खुशी मनाते लोग... नज़र से बचने चुपचाप खुशी मनाते लोग... अपने से ज्यादा दूसरों मे तल्लीन.. सामने वाले की सफलता पर गमगीन.. आपस में परेशान कुंठा में धरती को बनाते पीकदान... एक आँख ब
 
साधवी
Dec 29 2009 11:53 AM
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अभिव्यक्त करुँ या मौन धरुँ

अभिव्यक्त करुँ या मौन धरुँ कब कोई यहाँ पर सुनता है मेरे सब सुख दुख मेरे हैं कैसे माने हम तेरे हैं पर पीड़ा से विचलित होकर कब कोई यहाँ सर धुनता है कब कौन किसी का होता है क्यूँ जहर यहाँ पर बोता है. अपनी दुनिया में खुश हो लेंगे बस ख्वाब यहाँ वो बुनता है
 
साधवी
Dec 29 2009 11:53 AM
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खुदकुशी

जिन्दगी के खेल में शतरंज की बिसात पर यूँ भी किसी को मात किसी को शाह फिर क्या सोच कर की तुमने खुदकुशी.
 
साधवी
Dec 29 2009 11:53 AM
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डर

सुबह सुबह आँजुरी में अपने चमकती धूप लिए अँधेरी रात की गली के मुहाने पर आकर ठिठकी खड़ी है- शायद... मेरी आँखों की नमीं से वो भी डरी है.
 
साधवी
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हम किससे कहें?

शेर इंकलाबी वो पढ़ते रहे.. मंच पर से वो ही गरजते रहे... वो भी डरते रहे..और हम भी डरते रहे... यह व्यथा है..हमारी.. हम किससे कहें???.
 
साधवी
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आखिर क्यूँ??

आखिर क्यूँ?? आखिर क्यूँ यह अहसास है जब से उसने मुझे देखा वो यहीं कहीं मेरे आस पास है.... मैं जानती हूँ कि वो मेरा हो नहीं सकता.. उसकी अपनी एक दुनिया है जिसे वो खो नहीं सकता... मगर फिर भी न जाने क्यूँ... आखिर क्यूँ यह अहसास है जब से उसने मुझे देखा वो
 
साधवी
Dec 29 2009 11:53 AM
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मेरी पनीली आँखें…

कभी कुछ ख्वाब पलते थे मेरी इन पनीली आँखों में. डूब कर वो उतरता था… खो जाता था दूर… कहीं बहुत गहरे.. मैं डर जाती.. वो हंस देता मैं रो देती.. आँसूओं के संग संग मानो वो भी निकल आता मेरे आँसू पोंछता प्यार से गाल थपथपाता और कहता, ‘ऐ पगली’ एकाएक जाने कहाँ
 
साधवी
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एक रिक्तता

टूटा जो यह विश्वास का धागा.. फिर जुड़ेगा नहीं.. और एक रिक्तता सालती रहेगी जीवन भर.... तुम्हें भी और मुझे भी!!!
 
साधवी
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घी का दीपक..

इस दीपावली एक घी का दीपक छत की उस मुंडेर पर भी रखा.. जहाँ आकर तुम्हारी यादें मुझसे मिला करती थी.. मेरे जीवन को रोशन किया करती थी.. शायद दीपक की रोशनी उन यादों को भटकी राह दिखाये... एक उम्मीद बाकी है अभी!!
 
साधवी
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तू

चमन से आती हवाओं मेंतेरी छुअन काअहसास है...दूर रह कर भीतू कितनीपास है...
 
साधवी
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किसका विश्वास करुँ?

किसका विश्वास करुँ? तुम्हारा ? मगर तुम!! तुम तो मेरे अपने हो... अपनों पर अब कौन विश्वास करता है... अपनों से ही तो मानव डरता है.
 
साधवी
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तय करो किस ओर हो

तय करो किस ओर हो इस ओर हो, उस ओर हो. बातों को मनवाना हो तो तर्कों में कुछ जोर हो. या फिर कुछ ऐसा कर जाओ कि सदियों तक उसका शोर हो. तय करो किस ओर हो इस ओर हो, उस ओर हो.
 
साधवी
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चिट्ठाकार की टिप्पणी हड़ताल

दृश्य १: तहसील कार्यालय में रामाधार तिवारी और श्रीपद पटेल लिपिक पद को शोभायमान करते हैं. उनसे मिलने मैं जब भी किसी काम से तहसील कार्यालय गई, दोनों मुझे अधिकतर कार्यालय के बाहर ही, कभी पान की दुकान पर या कभी चाय की चुस्कियाँ लेते मिले. कम ही ऐसा होता
 
साधवी
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मेरी भाषा ही ऐसी नहीं है, क्या करे!

चाहे कितनी भी टिप्पणियाँ दिजिये मुझको. चाहे कैसी भी भाषा का प्रयोग किजिये. भले ही मुझे अपने समकक्ष मत आने दिजिये. नारी हूँ दमित कर दिजिये. ढकेल दिजिये पीछे. जो मन में आये सलाह दे डालिये. ’लो कमेंट’ और ले लो वाली मुद्रा में आ जाईये. चाहे तो ऐसा कह लिज
 
साधवी
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मैं जिनके लिए लिखती हूँ, वो मुझ पर अपना थोड़ा तो वक्त बर्बाद करें

यह क्यूँ लिख रही हूँ, मुझे खुद पता नहीं. शायद इसलिये कि मुझे कोई पढ़ नहीं रहा और न ही मेरा पास ऐसे दो लिंक हैं जो मैं दे सकूँ सनसनी मचाने के लिए. शायद परसाई जी ने एक बार कहा था कि मैं आम जन के लिए लिखता हूँ. मैं रिक्शेवालों के लिए लिखती हूँ. फिर तुम त
 
साधवी