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किस से कहें ?

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08 Jun 2010
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तूने ये क्या सितम किया : 'शकील' बदायूनी - तलत महमूद

मैं 'शकील' दिल का हूँ तर्जुमाँ कि मुहब्बतों का हूँ राज़दांमुझे फ़ख्र है मेरी शायरी मेरी ज़िंदगी से जुदा नहींबकौल साहिर लुधियानवी :'जिगर' और 'फ़िराक़' के बाद आने वाली पीढ़ी में 'शकील' बदायूनी एकमात्र शायर हैं जिन्हों ने अपनी कला के लिए ग़ज़ल का क्षेत्र चुना
 
अमिताभ मीत
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"उल्फ़त की सज़ा दो ..." : पहचानें ये आवाज़

छुट्टी का दिन हो और कुछ करने को न हो .... गर्मी के मारे कहीं बाहर जाना भी मुमकिन न हो ..... तो घर बैठे गाने सुनने से अच्छा काम क्या हो सकता है भला ?सुबह से बैठा एक किताब पढ़ रहा था ...... इतनी हेवी ड्यूटी थी कि कुछ देर में बंद कर दी और इस बेमिसाल आवाज़ में
 
अमिताभ मीत
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बशीर बद्र : आम आदमी का ख़ास शायर

बशीर बद्र को आम आदमी का शायर कहा जाए कि ख़ास ? या फिर आम-ओ-ख़ास का ख़ास शायर?ज़िंदगी की आम बातों को बेहद ख़ूबसूरती से अपनी ग़ज़लों में कह जाना बशीर बद्र साहब की ख़ासियत है. इनके तखय्युल की परवाज़ देखिये इनके कुछ शेरों में ...दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये
 
अमिताभ मीत
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अभी तो मैं जवान हूँ ... : हफ़ीज़ जालंधरी - मल्लिका पुखराज

अबू अल असर हफ़ीज़ जालंधरी का जन्म १४ जनवरी, १९०० को जालंधर, पंजाब में हुआ.उन की प्राम्भिक शिक्षा एक मदरसे में हुई. और हालांकि बाद में उन्हों ने एक स्थानीय स्कूल में दाख़िला लिया लेकिन सातवीं तक की पढाई के बाद पढाई छोड़ दी.आज़ादी के बाद हफ़ीज़ जालंधरी पाकिस्तान
 
अमिताभ मीत
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किस तरह फैला हुआ है कारोबार-ए-इंतज़ार : हसरत मोहानी

किसी ने एक शेर याद दिलाया पिछले दिनों ...."उन के ख़त की आरज़ू है उन के आमद का ख़यालकिस तरह फैला हुआ है कारोबार-ए-इंतज़ार"बेहतरीन शेर है और बेहतरीन ग़ज़ल हसरत मोहानी की .....मौलाना हसरत मोहानी का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले में १८७५ में हुआ. असल नाम था
 
अमिताभ मीत
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Nostalgia Prevails : फ़िल्म "दुलारी" - २

कुछ महीने पहले फ़िल्म दुलारी के दो गाने पोस्ट किये थे ... यहाँआज पेश हैं उस फ़िल्म के तीन और गीत .... हालांकि इस फ़िल्म के सभी गीत बेहद चले थे. इस फ़िल्म में लता के कई गाने थे जो किसी अगली पोस्ट पर .... यहाँ सुनिए दो गीत शमशाद बेग़म की आवाज़ में ..ये
 
अमिताभ मीत
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काश तुम्हें पता होता !

तारोंभरा साफ़ आसमान ... गोपनीय रातेंजब हो जाती हैं पहुंच से परे और अनिश्चित सपनों,इच्छाओं,और अपनी ही चेतना से प्रदूषितभारहीन तैरता हूं मैंअनमना, अटपटा... कमज़ोरबसथाम कर एक हाथऔर बैठना निःशब्दकाफ़ी होताकाश तुम्हें पता होता !
 
अमिताभ मीत
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मुहम्मद ज़हूर हाशमी

मुहम्मद ज़हूर हाशमी ..... ये नाम कुछ सुना हुआ सा नहीं लगता है न ?बहरहाल, मुहम्मद ज़हूर हाशमी हिन्दुस्तान के सब से उम्दा संगीतकारों में से एक हैं ......१८ फ़रवरी, १९२७ को जलंधर के क़रीब जन्म हुआ इस बेहतरीन संगीतकार का. सिर्फ़ दस साल की उम्र में घर से भाग
 
अमिताभ मीत
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At the Library

कभी कभी किसी दूसरे (के) नज़रिए से देखने की आदत है चीज़ों को ..... और कभी कभी कुछ बातें जो सहज भाव से आती हैं .... वो बिलकुल ही खिचडी भाषा में होती हैं. ऐसा ही एक ख़याल ..... जैसे आया वैसे ही पेश है ..... और फिर उस ख़याल को हिंदी में लिखने की कोशिश .... साथी
 
अमिताभ मीत
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एक नज़्म : वसीम बरेलवी

वसीम बरेलवी हमारे दौर के उन शायरों में हैं जिन्हों ने अपनी भाषा की सरलता और चिंतन को, ज़िन्दगी के आम सरोकारों से ग़ज़ल पैदा कर एक संतुलन के साथ अवाम और अदब को जोड़ा है. वसीम बरेलवी की गज़लें बहुत मक़बूल हैं ... आज पेश है उन की एक नज़्म ....ग़ौरतलब है कि किस
 
अमिताभ मीत
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"मकान" - कैफ़ी आजमी : एक नज़्म उन्हीं की आवाज़ में

मशहूर लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह ने कैफ़ी आजमी को "आज की उर्दू शायरी का बादशाह" करार दिया था ........कैफ़ी आज़मी आज की उर्दू शायरी के बादशाह हैं कि नहीं ये बात रहने दीजिये ...... लेकिन उनकी शायरी की अज़मत से इनकार नईं किया जा सकता. जहां उन्हों ने उर्दू
 
अमिताभ मीत
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एक सितारवादक की आवाज़ : शुजात खान

इतवार का दिन हो, दफ़्तर से छुट्टी .... बाहर गर्मी हो और निकलने का मन न करे .. तो वक़्त कुछ यूं गुज़ारा कितना अच्छा लगता है !!शुजात हुसैन खान का जन्म १४ अगस्त, १९६० को कलकत्ता में हुआ. पिता मशहूर सितार वादक उस्ताद विलायत खान. शुजात खान का सम्बन्ध सितार के
 
अमिताभ मीत
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एक सवाल ..... ख़ुद से

मुझे अक्सर लोगों से शिक़ायत रहती हैउसे ऐसा करना चाहिए थानहीं कियामेरी बेटी मेरा कहा नहीं मानतीहर तीसरे दिन मुझ से कहती हैकि फ़लां काम नहीं करेगीऔर दूसरे ही दिन फिर वही काम करती हैमैं ने लाख बार कहा है उसेकि ये रिपोर्ट मुझे १ तारीख़ को चाहिएलेकिन वो कभी ५
 
अमिताभ मीत
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"शहीद - स्तवन" : राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर"

राष्ट्रकवि 'दिनकर' के प्रति मेरा न जाने कैसा लगाव है ....कवितायें पढने में ही दिन गुजारता हूँ .... नौकरी के इलावा.ज़्यादातर उर्दू शायरी, 'मीर' और 'ग़ालिब' में तो डूबा रहता हूँ , इसके इलावा अन्य शायर भी ......... लेकिन हर कुछ दिनों पर 'दिनकर' को पढना जैसे
 
अमिताभ मीत
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"घबरा के जो हम सर को ........ " : पहचानें ये आवाज़

कल दफ्तर से घर आते वक़्त ड्राइव करते करते ये ग़ज़ल सुन रहा था ...कोई दो चार लाइनें दिमाग में आईं ..बस यूं ही सी हैं ........ लेकिन यहाँ दर्ज कर रहा हूँ ......क़स्रत-ए-ग़म से चूर चूर रहाआप से इस क़दर मैं दूर रहागो मिलीं सारी ने'मतें मुझ कोआप के हिज्र में
 
अमिताभ मीत
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इक सपना मैं ने देखा है

२३ मार्च ! ज़िन्दगी का एक अहम दिन .... आज के दिन ज़िन्दगी का रुख बदल गया ....इक सपना मैं ने देखा है क्या अजब निराला सपना है है सपना, लेकिन अपना है ना दश्त न कोई सहरा है इस पर न किसी का पहरा है ता हद्द-ए-नज़र बस तू ही तू ता हद्द-ए-नज़र कलियाँ ख़ुशबू लब पर
 
अमिताभ मीत
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ग़ालिब : तीन शेर ..... एक ग़ज़ल

बचपन ही से कविताओं के शौक़ रहा .... हर तरह की कवितायें .... हिंदी भी अंग्रेज़ी भी ...... जितने कवियों / शायरों की रचनाएं पढ़ सका .. पढता रहा .... ये शौक़ कभी कम नहीं हुआ ... बल्कि वक़्त के साथ बढ़ता ही रहा ....फिर न जाने कब, कैसे कभी कभी कुछ कुछ लिखने भी लगा
 
अमिताभ मीत
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दहर को इक हसीं गुलज़ार बना रक्खा है

कभी कहीं कुछ लिखा था ......... कहाँ लिखा था याद नहीं ........ वो काग़ज़ का टुकड़ा कहाँ गया पता नहीं .... दो बंद याद हैं .... उसे यहाँ क़ैद कर लूँ इस से पहले कि दिमाग़ से भी निकल जाए जो कुछ अब तक याद है ....इक अदद ख्वाब, एक आरज़ू का हासिल है जो मुझे
 
अमिताभ मीत
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जन्मदिन अक्कू का : बेटियाँ कितनी जल्दी बड़ी हो जाती हैं !

बेटियाँ कितनी जल्दी बड़ी (और समझदार भी) हो जाती हैं. जैसे अभी कल ही की बात हो, जब मैं ने अक्कू के लिए ये पोस्ट किया था .......... "दिल हो गया शैंटी फ्लैट या रब्बा ....." मेरे दिमाग़ से बात निकल गई थी लेकिन उसे अब तक याद है. जब मैं अपनी स्टडी में कंप्यूटर
 
अमिताभ मीत
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आये न बालम वादा कर के : 'शकील'

मैं 'शकील' दिल का हूँ तर्जुमा कि मुहब्बतों का हूँ राज़दांमुझे फख्र है मेरी शायरी मेरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं शकील बदायूनीं को आम तौर पे फ़िल्मों के गीतकार के रूप में जाना जाता है. बतौर एक फ़िल्मी गीतकार तो शकील ने सफलता की बुलंदियों को छुआ ही, उस से जुदा
 
अमिताभ मीत
Mar 04 2010 06:17 AM
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जोगीरा सारा रा रा : "होरी ..... इन भोजपुरी"

होली के अंदाज़ निराले हैं ........ हालांकि मैं ने इस बार नहीं खेली लेकिन कॉम्पलेक्स में खेली गई होली धूमधाम से ..... पिछली पोस्ट में होली के तीन गीत सुनवाए थे ............ आज कॉम्पलेक्स की होली की कुछ तस्वीरों के साथ सुनिए होली के तीन और गीत कुछ अलग ही
 
अमिताभ मीत
Mar 01 2010 05:34 PM
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जोगीरा सा रा रा रा ...... होली है !!!

फिर आई होली ........ होली पहले अपनी अक्कू के साथ ..... फिर बाक़ी दुनियाँ के साथ ...आप सभी दोस्तों को होली की शुभकामनाएं ...पहले सुनिए "जोगीरा सारा रा रा ...... होली खेलत नंदलाल बिरज में ............"फिर ये सदाबहार गीत ....... "होली आई रे कन्हाई रंग बरसे
 
अमिताभ मीत
Feb 28 2010 12:44 PM
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सुहानी रात ढल चुकी ...... रफ़ी साहब : कुछ नायाब तस्वीरें

दोस्तों रफ़ी साहब के बारे में क्या कह सकता है कोई .......... एक कमाल के फनकार ही नहीं वो इंसान भी गज़ब के थे .........आज देखिये उनके घर की कुछ नायाब तस्वीरें .....औए सुनिए एक सदाबहार गीत .......... नौशाद ने कभी कहा था कि मैं ने बहुत से गाने बनाए .......
 
अमिताभ मीत
Feb 28 2010 12:43 PM
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"मरना भी मुहब्बत में किसी काम न आया" : क़व्वालियाँ - ८

करीब ६ महीने पहले क़व्वालियों की एक श्रृंखला शुरू की थी. ७ क़व्वालियाँ पोस्ट की थी .... फिर और और पोस्ट्स की वजह से वो श्रृंखला रुक गई थी ..... आज उसी श्रृंखला में पेश है ये क़व्वाली .............."मरना भी मुहब्बत में किसी काम न आया...."फ़िल्म : आज़ाद
 
अमिताभ मीत
Feb 24 2010 09:29 PM
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१५ अगस्त : वसीम बरेलवी

पिछले दिनों तबीयत काफ़ी नासाज़ थी और मैं अस्पताल में था ... क़रीब १५ दिन.उसी दौरान न जाने कब की पढ़ी वसीम बरेलवी साहब की एक नज़्म याद आयी. मैं ने जब ये नज़्म पढ़ी थी तो मुझे बेहद अच्छी लगी थी ये नज़्म. घर आ के इसे पढने की कोशिश की है. सुनें न सुनें, इस नज़्म को
 
अमिताभ मीत
Feb 20 2010 08:16 PM
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कभी मुझे एक शख्स मिला था

यही शाख़ तुम जिस के नीचे किसी के लिए चश्म-ए-नम हो यहाँ अब से कुछ साल पहले मुझे एक शख्स मिला था जिसे मैं ने आग़ोश में ले के पूछा था - मेरी जान !!क्यों खड़ी रो रही हो ?मुझे अपनी बोसीदा आंचल में फूल के गहने दिखा कर उस ने कहा था - मेरा साथी उधर - उस ने उंगली
 
अमिताभ मीत
Feb 16 2010 06:47 AM
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राह में बिछी हैं पलकें आओ ..........

चार दिन हुए हैं फ़क़त यूं लगे है उम्र बीती आओ सखी मिल भी जाओ ज़िन्दगी तुम बिन है रीतीसब कुछ तो है ..... तुम चार दिन को नहीं तो गोया कुछ भी नहीं .......... आ जाओ ........ आ जाओ राह में बिछी हैं पलकें आओ .............ये आवाज़, ये अंदाज़ ........... सुनिए
 
अमिताभ मीत
Feb 14 2010 08:37 AM
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हर एक बात प कहते हो तुम कि तू क्या है : ग़ालिब "कुंदन लाल सहगल"

ग़ालिब की ये ग़ज़ल कई लोगों ने गाई है. आज कुंदन लाल सहगल का अंदाज़ देखिये .... कि सुनिए ....??हर एक बात प कहते हो तुम कि तू क्या है तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ्तगू क्या है न शोले में ये करिश्मः न बर्क़ में ये अदा कोई बताओ, कि वह शोख-ए-तुन्द खू क्या है यह
 
अमिताभ मीत
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सच ? या झूठ ?? और एक खूबसूरत गीत

झूठ से ख़ुशी मिलना नामुमकिन है झूठ से कभी किसी को कुछ हासिल नहीं हुआ ख़ुशी सच्चाई और प्यार से मिलती है सच्चाई और प्यार - यही ख़ुशी दे सकते हैं बहुत ज़्यादा प्यार - यही ज़िन्दगी का मक़सद होना चाहिए और प्यार से ख़ूबसूरत कोई चीज़ नहीं होती दुनियाँ में सच्चाई
 
अमिताभ मीत
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Nostalgia Prevails - फिल्म : दुलारी (१९४९)

दुलारी (१९४९)दोस्तों पुराने फिल्मों के गीतों से मेरा न जाने क्या लगाव है. पिछले ३० - ३५ सालों में न जाने कितने गीत सुने .... ग़ज़लों का दौर आया ... सब सुनता रहा ... शायद यही किया है किताबें पढने के इलावा इस ज़िन्दगी में. नौकरी अपनी जगह.... रोटी का सवाल
 
अमिताभ मीत
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क़त'आत : अहमद नदीम क़ासिमी

दो दिनों से घर पे हूँ .... दफ़्तर से निजात कभी कभी अच्छा लगता है !! एक पुरानी डायरी के कुछ सफ़हे पलट कर देख रहा था....मुख्तलिफ शायरों के कुछ क़त'आत मिले जो न जाने कब से दर्ज हैं यहाँ ........क़त'आत मुझे ख़ास तौर पे पसंद आते हैं. क़त'अ उर्दू या फ़ारसी नज़्म
 
अमिताभ मीत
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उदास रात बहुत बेक़रार करती है

उदास रात बहुत बेक़रार करती है एक वादा-ए-वफ़ा जिस पे है मौक़ूफ़ हयात लुत्फ़ ये देखिये क्या क्या निहां है उल्फ़त में मुद्द'आ मुझ से नहीं गो कि है शरीक़-ए-हयात सिवा अब और हो क्या कम नसीबियों का करम दुआ इक सहर की थी पाई है बस रात ही रात मौकूफ = मुल्तवी,
 
अमिताभ मीत
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तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी .... "तलत"

बस तीन शेर "मीर" के ...... और एक पसंद का गीत "तलत" की आवाज़ में ...... "हम ने भी नज़्र की है कि फिरिए चमन के गिर्द यारब ! चमन के छूटने तक बाल-ओ-पर रहें !!" "वजह-ए-बेगानगी नहीं मालूम तुम जहां के हो, वां के हम भी हैं" "रहा था देख उधर 'मीर' चलते अजब इक ना
 
अमिताभ मीत
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"अवधूत : कबीर" : कुमार गन्धर्व

नहीं ..... कुछ कहना नहीं है. अल सुबह से ये सुन रहा था ..... बार बार सुना ....... कई बार सुना !! जी में आया कि इसे पोस्ट ही कर दूँ .......... सुन कर देखें ...... शायद अच्छा लगे !! जब बात "कबीर" की हो और अंदाज़ कुमार गन्धर्व का ......तो मुझ जैसे अदना इं
 
अमिताभ मीत
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मुझ निर्धन के धन बस तुम हो ! : "नीरज"

धनियों के तो धन हैं लाखों ..... आज बीस-एक दिनों के बाद वहाँ से लौट के आया हूँ, जहां खुदा न करे किसी को जाना पड़े ......... और अगर जाने की नौबत आ ही जाए तो वापस तो कभी न आना पड़े........... मन में न जाने कितनी ही बातें हैं.......... मगर हमेशा की तरह खुद
 
अमिताभ मीत
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दो दिन के लिए मेहमान यहाँ .....

आज अजीब सा दिन है ..... एक बहुत बड़े अज़ाब से छूट गया हूँ .. या शायद एक जाविदाँ ग़म की गिरिफ़्त में आ गया हूँ ......... ऐसे हर मौक़े पे मुझे बस दो लोग याद आते हैं ......... मीर तकी 'मीर' और असदुल्लाह खाँ 'गालिब' ... असदुल्लाह खाँ 'गालिब' ... ....के दो त
 
अमिताभ मीत
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इधर उधर बिखर गया !!

न जाने कौन शख्स था जो अधजगी सी आँखों में धनक के तमाम रंगों के सौ ख्वाब उधार दे गया जो मेरे दोनों हाथों को एक बार थाम कर उम्र भर को बंदी बना गया ये उस के हाथों का लम्स ये धनक के रंग क्या थे ? मेरे वुजूद में क्योंकर आये ?? कैसा फ़ुसूँ था कि तारी हुआ और
 
अमिताभ मीत
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एक वो भी दिवाली थी .....

सभी दोस्तों को दीपावली की शुभकामनाएं. ख़ुशी का पर्व है ..... किसी जाननेवाले का जन्मदिन भी है ...... लेकिन आज के दिन भी ये गात पोस्ट कर रहा हूँ ........... ज़रूर कोई मजबूरी होगी. बहरहाल, आप तो ये गीत सुनिए, फ़िल्म : नज़राना (१९६१) गायक : मुकेश संगीत : रव
 
अमिताभ मीत
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अहमद "फ़राज़"

यूनुस भाई की एक पोस्ट जब पढ़ी थी तब ये ग़ज़ल याद आयी थी .... पढने की कोशिश की है ..... सुनना अच्छा लगे न लगे ....... ये ग़ज़ल ज़रूर पसंद आएगी ..... क्यों तबीयत कहीं ठहरती नहीं दोस्ती तो उदास करती नहीं हम हमेशा के सैर-ए-चश्म सही तुझ को देखें तो आँख भरती
 
अमिताभ मीत
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किस से कहें ?

तू कि इक गम था अब तलक मुझ को तू ने खुद ही बुझा दिया मुझ को तेरी हर बात मुबारक हो तुझे कहा कि इश्क ! और मिटा दिया मुझ को !! तेरी दुनिया ... जिन दोस्तों के लिए जीती है चलो मुबारक वो दो दोस्त आज से तुझ को वो जो हर बात पे तुझ को कहें कि मेरे "अज़ीज़" चलो अ
 
अमिताभ मीत
Oct 14 2009 07:33 PM