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दिल से दिल की बात

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25 May 2010
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पैसा दीजिए, पानी देखिए

पेयजल समस्या पर होने वाली सेमिनारों-संगोष्ठियों में वक्ता बड़ी संजीदगी से कहते हैं कि यदि पानी का मोल नहीं समझा, इसे व्यर्थ बहाना नहीं छोड़ा ...तो आने वाले दिनों में पानी के लिए विश्वयुद्ध लड़े जाएंगे। भविष्य की बातें तो भविष्य पर ही छोड़ दें, फिलहाल
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आस्था अपार, भाषा बनी दीवार

विश्व क्षितिज पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भारत को जो पहचान दिलाई, उसके लिए प्रत्येक भारतवासी उनके प्रति कृतज्ञ है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित उनकी अमर कृति 'गीतांजलि ' अधिकतर बंगाली परिवारों में 'गीता' और 'रामचरितमानस' की तरह रखी जाती है। रेल मंत्री
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बंद पिंजरे में तोता ने दिया अंडा!

टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में आजकल टेलीविजन पर तरह-तरह की अविश्वसनीय खबरों का प्रसारण आम बात है। कई बार तो इन पर भरोसा करना बहुत ही मुश्किल होता है, लेकिन प्रिंट मीडिया में काफी हद तक ऐसी खबरों से परहेज किया जाता है। बुधवार १४ अप्रेल की रात इंटरनेट पर दैनिक
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भगवान से बड़ा हो गया भक्त का कद

चैत्र पूर्णिमा पर मंगलवार को हनुमानजी की जयंती मनाई गई। जहां-जहां बजरंगबली के भक्त हैं, वहां-वहां उन्होंने अपने आराध्य के जन्मदिन पर अपने-अपने तरीके से उल्लास मनाया। छोटी काशी जयपुर के मंदिरों में तो एक दिन पहले यानी सोमवार अद्र्धरात्रि से ही हनुमानजी का
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'ढंग` और 'ढोंग` के संगम से मिलती है सफलता

कल एक चिकित्सक मित्र से मिलने गया तो वहां उच्च सरकारी सेवा के अंतिम पायदान पर खड़े एक महानुभाव के भी दर्शन हुए। बातों ही बात में मीडिया की भूमिका या कहें कि उपादेयता पर चर्चा छिड़ी तो उक्त महानुभाव ने बड़े पते की बात की। आप भी गौर फरमाएं। उन महानुभाव का
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हींग की दाल, रुद्राक्ष की चटनी

इस पखवाड़े को यदि बजट पखवाड़ा कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से लेकर विभिन्न राज्यों के वित्त मंत्री और मुख्यमंत्री (जो वित्त मंत्रालय भी देखते हैं) अपने-अपने राज्यों के बजट पेश करने में जुटे हैं। अब इन बजट से
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अनवांटेड 36 महीने मनमोहनी सरकार के

तत्कालीन प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर की सरकार से कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद जब विश्वासमत पर लोकसभा में बहस हो रही थी, तो चन्द्रशेखर ने बड़े ही उदास स्वर में कहा था-गैर मुमकिन है कि हालात की गुत्थी सुलझे, अहले दानिश ने बड़ा सोच के उलझाया है। आज सहसा
Mar 06 2010 12:49 AM
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होली तो भौजी और साली के संग

जहां तक मैं समझ पाया हूं, पर्व-त्यौहार अप्राप्य को पाने का अवसर प्रदान करते हैं। इन विशेष अवसरों पर अपने इष्ट से अभीष्ट तथा सुख-समृद्धि का वरदान मांगते हैं। जहां तक होली की बात है, तो यह ऐसा पर्व है, जिसमें प्रकृति भी अपने विशेष रंग में रंगी नजर आती है।
Feb 28 2010 12:55 AM
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'करप्ट' हो गई खेती ?

भारतीय जनजीवन में अंग्रेजी और भ्रष्टाचार गड्डमड्ड हो गए हैं। अंग्रेजी के बिना कई स्थानों पर काम नहीं चलता तो भ्रष्टाचार के बिना हम काम चलाना चाहते ही नहीं। कई मामलों में ऐसा भी देखने में आया है कि महज सामाजिक रुतबे के लिए लोग अंग्रेजी अखबार मंगवाते हैं
Feb 26 2010 12:14 AM
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रेल बजट में राजनीति हावी

रेलवे स्टेशनों पर रेलवे का ध्येय वाक्य-संरक्षा, सुरक्षा, समय पालन-लिखा रहता है, लेकिन रेल मंत्री ममता बनर्जी के बजट में इस ध्येय वाक्य पर अमल करने की कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखी या कहें कि इस पर ध्यान देना भी उचित नहीं समझा गया। हालांकि ममता ने अपने बजट
Feb 25 2010 06:00 PM
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बारह बजे लेट नहीं, चार बजे भेंट नहीं

इस बार पटना से वापसी में अकेला ही था। हावड़ा-जम्मूतवी हिमगिरि एक्सप्रेस से लखनऊ तक आना था। सफर दिन का था और मैं अकेले ही था, सो सहयात्रियों से बातचीत शुरू हो गई। सहयात्रियों में पटना सचिवालय में कार्यरत दो बड़े अधिकारी थे। इनमें से एक अपनी बिटिया को बैंक
Feb 21 2010 12:54 AM
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बिहार - समय के साथ बदल रहा है स्वाद

बीतते हुए समय के साथ बिहार में बहुत कुछ बदलता जा रहा है। वंशवृद्धि के कारण हुए बंटवारे से खेत भले ही सिकुड़ती जा रही हो, उपज काफी बढ़ गई है। पिताजी ने बताया कि पहले जब लोगों के पास काफी खेत थे तो बहुत बड़ी आबादी मड़ुवा, जनेरा, सामा-कोदो खाने को विवश थी। जो
Feb 19 2010 01:11 AM
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बिहार - समृद्धि आई तो भागे अपराध

सूरज की किरणें जब अपना उजास फैलाती हैं, तो घटाटोप अंधकार का साम्राज्य भी खत्म हो जाता है। सरकारी कायदा जब सुधरता है तो बहुत सारी व्यवस्थाएं खुद-ब-खुद पटरी पर आ जाती हैं। पिछले डेढ़-दो दशक में जिस तरह अपहरण काण्ड कुटीर उद्योग की श्रेणी में आ गए थे और इनसे
Feb 18 2010 12:41 AM
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शिक्षा को मिल रही गति

मेरे जमाने में बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़ा करते थे और यह माता-पिता के लिए भी किसी तरह से कमतरी का द्योतक नहीं होता था। मेरी स्कूली शिक्षा पूरी होने तक ही नहीं, बल्कि कॉलेज शिक्षा तक यह हाल बना रहा। वर्ष 1990 के बाद सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर कुछ
Feb 16 2010 12:45 AM
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बिहार - गांवों की चमाचम सड़कें करती हैं स्वागत

करीब 18 माह के लंबे अरसे के बाद पिछले दिनों बिहार जाने का सुअवसर मिला। वैसे गत वर्ष मई में भी गया था, लेकिन समयाभाव में पटना से ही लौट आने के कारण यह लकीर छूकर आने भर की यात्रा रह गई थी। इस बार दर्जनों गांवों की यात्रा के क्रम में डेढ़-दो सौ किलोमीटर का
Feb 15 2010 12:14 AM
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...तो सीएम-पीएम क्यों न चुने जनता?

गुलाबीनगरी में गत 23 नवंबर को हुए शहरी निकाय के चुनाव में पहली बार जनता ने अपना महापौर चुनने के लिए मतदान किया। जी हां, पहले जनता पार्षदों को चुनती थी और फिर वे सब मिलकर महापौर चुनते थे। इस बार चुनाव में दो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस
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जीते-जी क्यों न पढ़ लें गरुड़ पुराण ?

महानगरीय जीवन की कुछ मान्यताएं बीतते हुए समय के साथ परंपरा में तब्दील हो जाती हैं। गुलाबी नगर में भी ऐसी ही एक परंपरा है। यहां किसी के परलोकगमन पर मृत्यु के तीसरे दिन तीये की बैठक होती है, जिसमें परिजन-पुरजन-मित्रजन-रिश्तेदार-साथ काम करने वाले सभी एक
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...और कैसा होता है प्रलय

शुक्रवार को फिल्में रिलीज होती हैं और फिल्मों के जानकार इसकी चीर-फाड़ करते हैं। आजकल जैसी फिल्में बन रही हैं, उनकी तारीफ तो विरले ही पढ़ने को मिलती है। शनिवार को भी बॉलीवुड की फिल्म -तुम मिले- और हॉलीवुड की फिल्म 2012 की समीक्षा पढ़ी। वैसे भी आजकल इन सम
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बच्चों के मरने का है इंतजार

गत वर्ष दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव के बाद अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी तो प्रदेशवासियों में स्वच्छ प्रशासन की उम्मीद जगी थी। गहलोत चूंकि गांधीवादी माने जाते हैं और उनके सादगी भरे आचार-व्यवहार से उनके ईमानदार होने में कोई संशय नह
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पहले सिरदर्द देते हैं और फिर हैड मसाजर...

जी हां, अभी कुछ दिनों पहले मैंने एक पोस्ट में भारतीय बाजार में चीन की घुसपैठ पर चिंता जताई थी। सच, अपने हाथ में ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन सोचने और कोसने से तो कोई रोक नहीं सकता। एक सप्ताह बाद दिवाली आने वाली है। कोई जमाना था जब घी के दीये जलते थे, फि
Oct 14 2009 07:37 PM
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चांदनी रात में कुछ गीत गुनगुनाइए...

गुलाबी नगर में 38 साल पहले साहित्य और संस्कृति से अंतर्मन से जुड़े कुछ लोगों ने तरुण समाज की स्थापना की थी। तभी से इस संगठन ने होली के अवसर पर महामूरख सम्मेलन और शरदोत्सव के रूप में गीत चांदनी का आयोजन शुरू किया। इन दोनों ही कवि सम्मेलनों की आज देश के
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गांधी का गुणगान, लालबहादुर लापता

कल यानी शुक्रवार दो अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती धूमधाम से मनाई गई। संयोग कहें या दुरयोग कि पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का जन्मदिवस भी इसी दिन था। कल के अखबारों में विभिन्न राज्य/केंद्र सरकारों और सरकारी संस्थाओं की ओर से भ
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बापू के बहाने

आज शाम साढ़े चार बजे टेलीविजन का स्विच ऑन किया तो दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर नई दिल्ली स्थित तीस जनवरी मार्ग से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जयंती पर आयोजित कार्यक्रम का सीधा प्रसारण चल रहा था। आज की ताजा खबरों से अवगत होने के लिए दूरदर्शन के न्यूज चैनल
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...ज्यों मूक को मिल गई वाणी

आज रात दो बजे यूं ही कुछ मित्रों के ब्लॉग पढ़ रहा था कि अनायास ही ब्लॉगवाणी डॉट कॉम खोलने के लिए माउस क्लिक कर दिया। आज तो सचमुच कमाल हो गया वरना ब्लॉगवाणी की विदाई का संदेश देखकर मन खिन्न हो उठता था। ऐसा लगता है जैसे बहुत कुछ ऐसा खो गया है जो दिल की
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नारी विवश नर सकल....

अद्धाांगिनी की एक और परिभाषा चार दिन पहले मैंने पत्नी के सहयोग से ही बड़ी मंजिलें पाने का जिक्र किया था। आज सुबह एक मित्र से बात की तो पत्नी को लेकर अपनी पीड़ा वे दबा नहीं सके। हालांकि उनकी पीड़ा वैसी नहीं थी, जैसी पत्नी पीड़ितों की होती है। आज तक अमूमन
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आस्था अपार, उल्लास अदृश्य

शक्ति की आराधना के पर्व शारदीय नवरात्र की पूरणाहुति महानवमी पर रविवार को हुई। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुरू हुए इस पर्व में श्रद्धालुओं ने अपनी श्रद्धा और सामरथ्र्य के अनुसार मां भगवती की आराधना की। संपूर्ण भारतवर्ष में मां भगवती की आराधना हुई। गुलाब
Sep 28 2009 12:44 AM
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पत्नी न चाहे तो...

अभी शçक्त की आराधना का पर्व नवरात्र चल रहा है। सच है, शçक्त के बिना व्यçक्तत्व की कल्पना बेमानी है। शçक्त - वैचारिक, शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक हर रूप में जरूरी है। इस शçक्त की पहली इकाई पत्नी है, जिसके मिलने के बाद ही व्यçक्त पूर्ण हो पाता है।
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देव तुम्हारे, मंत्र हमारे - यह कैसी घुसपैठ ?

आजकल मीडिया में चीन के घुसपैठ की खबरें रोज ही आ रही हैं। होना तो यह चाहिए कि हमारे देश की सीमाओं की ओर जो आंखें उठें, उन्हें बिना समय गंवाए फोड़ दिया जाए, लेकिन जब देश का शीर्ष नेतृत्व ही लचर व्यक्तित्व के हाथों में है तो कोई क्या करे। खैर, हमारे राजनेता
Sep 21 2009 01:05 AM
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...ये कहां आ गए हम

... तो आज अमिताभ बच्चन की फिल्म -सिलसिला-से अपनी बातचीत का सिलसिला शुरू करता हूं। सुबह बिहार के किशनगंज से एक डॉक्टर मित्र का फोन आया। वे बिहार में विधानसभा की 18 सीटों पर हुए उपचुनाव में सत्तारूढ़ जनता दल यू और भाजपा की करारी शिकस्त से दुखी थे। उपचुनाव
Sep 19 2009 01:23 AM
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सैशे में बिकता सुख

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और उनके तथाकथित अनुयायियों ने गांधी दर्शन को दरकिनार कर दिया। सत्तासीन नेताओं ने गांवों को उनके हाल पर छोड़ दिया। सुविधाओं के अभाव में गांव लाचार लोगों की शरणस्थली बनकर रह गए और न
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भुट्टे की भ्रूणहत्या

दसवीं पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए गांव छोड़कर शहर में आया तो मक्के का लावा (जिसे अब पॉप कॉर्न कहा जाने लगा है) ठेले पर बिकता देख अक्सर अचरज होता था कि यह भी कोई बिकने की चीज है। गांवों में तो इसे सबसे अधिक हेय समझा जाता था। हालात ऐसे थे कि मजदूर भी
Sep 05 2009 01:38 AM
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...पेट भरे से काम

बचपन में हम चार भाई-बहनों में जो भी खाने के समय आनाकानी नहीं करता, नाक-भौं नहीं सिकोड़ता, उसकी बड़ाई में मां अक्सर एक जुमले का इस्तेमाल करती थी-भोनू भाव न जाने, पेट भरे से काम। तब तो यह सुनने में अच्छा लगता था और अब इस आदत का दूरगामी परिणाम यह देखने को
Aug 19 2009 12:52 AM
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न क्यू का झंझट, न बाबू से झिकझिक

अभी पिछले दिनों बहुत ही जल्दबाजी में ट्रेन यात्रा का शिड्यूल बनाना पड़ा। ऐसे में महज एकाध दिन में जयपुर से पटना की ट्रेन में आरक्षण मिल पाना बहुत ही मुश्किल था। वैसे अमूमन जयपुर से पटना के लिए साप्ताहिक ट्रेनें ही चलती हैं और उनमें बिल्कुल ही जगह नहीं
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अपहरण का ग्रहण - कब छूटेगा दाग

बस और ट्रेन के सफर में करीब 38 घंटे बिताने के कारण काफी थकान हो गई थी, सो बिस्तर पर जाते ही गहरी नींद की आगोश में समा गया। सुबह करीब छह बजे नींद खुली तो सामने रखे हिंदुस्तान अखबार के मुख्य शीर्षक -बेटा तो नहीं, लाश मिली- ने विचलित कर दिया। समाचार के
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पटना बाई मिडनाइट बदल गई है तस्वीर

अभी पिछले शनिवार को सात-आठ घंटे के लिए पटना जाने का अवसर मिला। वैसे तो साल में एकाध बार जाना होता ही है। अमूमन जयपुर से जिस ट्रेन से जाता हूं, वह मध्य रात्रि बारह बजे बाद ही पटना पहुंचाती है। हर बार ऐसा ही होता था कि पटना के रहवासी सहयात्री भी वहां क
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ऑरिजिनल तो यही है

डेढ़-दो माह के लंबे अंतराल के बाद आज फिर आपलोगों से मुखातिब हूं। बात ही कुछ ऐसी हुई कि व्यस्तताओं के बावजूद इस अनुभव को शेयर करने से खुद को रोक नहीं पाया। पिछले कुछ दिनों से अपना एक छोटा सा मकान बनवा रहा हूं। इसी के सिलसिले में आज प्लबंर से लैट-बाथ की
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इंसान भूखे, देवताओं को आफरा

आज शीतलाष्टमी थी। शीतलाष्टमी से एक दिन पहले घरों में पुए-पुड़ियां और अन्य पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें अगले दिन शीतला माता को भोग लगाया जाता है। बाद में घरों में लोग वही कल वाला बासी भोजन ही शीतलाष्टमी को खाते हैं। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता की ऐसी
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सबके थे गिरधारीलाल

जीवन अनिश्चित है और मौत ध्रुवसत्य है, लेकिन इस तथ्य को हम सभी झुठलाते रहते हैं। इस कटु सत्य का अहसास तभी होता है जब कोई गुजर जाता है। राजनीति से मेरा कोई विशेष लगाव नहीं रहा है लेकिन गुलाबी नगर में अपने 14-15 वर्ष के प्रवास के दौरान यहां के सर्वप्रिय
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पेशे ने मुझे चुन लिया...

एक बौद्धिक अग्रज से पिछले दिनों लंबे अरसे बाद मिलना हुआ। कई सारे मसलों पर बातचीत हुई। इसी बीच उन्होंने फिल्म `वेलकम टू सज्जनपुर´ की तारीफ करते हुए इसे देखने की सलाह दी। कई सारी मजबूरियां होती हैं किसी फिल्म को सिनेमाहॉल में नहीं देख पाने की, सो रिलीज
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नौटंकी तो हम करते हैं

पिंकसिटी में सांस्कृतिक आयोजनों के हृदय स्थल जवाहर कला केंद्र के शिल्पग्राम में मंगलवार शाम नौटंकी देखने का सुयोग मिला। गांव छोड़े हुए करीब 25 साल हो गए, इस दरम्यान कभी नौटंकी देखने का मुहूर्त नहीं बना। वैसे भी महानगरों में ऐसे आयोजन विरले ही होते है