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सहज साहित्य(SAHAJ SAHITYA)

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05 Jun 2010
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खड़े जहाँ पर ठूँठ

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ खड़े जहाँ पर ठूँठ कभी यहाँ पेड़ हुआ करते थे।सूखी तपतीइस घाटी में कभी झरने झरते थे । छाया के बैरी थे लाखों लम्पट ठेकेदार , मिली-भगत सब लील गई थी नदियाँ पानीदार । अब है सूखी झील कभी यहाँ- पनडुब्बा तिरते थे । बदल गए हैं मौसम सारे
 
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Jun 05 2010 06:12 PM
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मेरी माँ

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ चिड़ियों के जगने से पहले जग जाती थी मेरी माँ । ढिबरी के नीम उजाले में पढ़ने मुझे बिठाती माँ । उसकी चक्की चलती रहती कोई गीत न गाती माँ । गाय दूहना, दही बिलोना सब कुछ करती जाती माँ । सही वक़्त पर बना नाश्ता जीभर मुझे खिलाती माँ
 
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वक़्त नहीं

प्रस्तुति- पंकज चतुर्वेदी हर खुशी है लोगों के दामन में, पर एक हँसी के लिए वक़्त नहीं. दिन रात दौड़ती दुनिया में, ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं माँ की लोरी का एहसास तो है, पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं सारे रिश्तों को तो हम मार चुके, अब उन्हें दफ़नाने
 
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सहज साहित्य(SAHAJ SAHITYA)

ॐपिचकारी की धार, रंगों की बौछार अपनों का प्यार, यही है होली को त्यौहार होली का पर्व आप के लिए शुभ हो !वीर- सविता मुखी होली की शुभकामनाएं रंग रंगीली आई होली,खुशियाँ ढेरों लाई होली।राजा रंक सभी घर होली,पकवानों सी मीठी होली।बैर भाव मिटाए होली,सबको गले लगाए
 
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Mar 01 2010 08:42 AM
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तीन वर्ष पूरे

प्रिय हिमांशु भाई,होली की शुभकामनाओं के साथ लेखनी का होली -विशेषांक भेज रही हूँ, उम्मीद है पसंद आएगा।यहाँ इंगलैंड में भले ही अभी पातहीन वृक्षों पर कोपलें न फूटी हों, परन्तु चिड़ियों ने घोसले बनाने शुरु कर दिए हैं। सृजन और संरक्षण की इस एक और नई नवेली ऋतु
 
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नववर्ष!

कमला निखुर्पा लाए आपके जीवन में, उन्नति उत्कर्ष । हर हाथ को थमा कर कलम, जगाएँ सुप्त अनुभूतियाँ । बिखरे हर चेहरे पर खुशियाँ । उँगली पकड़कर दिखाएँ क्षितिज पर चमकता बाद्लों से निकलता हिमांशु । - कमला निखुर्पाजीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है ।
 
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शुभकामना !

मन से उर -कम्पन से लिखूँ शुभकामना । उँगली तुम जीवन में स्नेह की थामना । उगते रहें सूरज नित द्वार तुम्हारे । तुम नहीं हारना जग चाहे ये हारे । करना न पड़े कभी दु:खों का सामना । -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है ।
 
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शिक्षकों के लिए ई-मंच - टीचर्स आफ इंडिया

शिक्षकों के लिए ई-मंच - टीचर्स आफ इंडिया यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शिक्षक हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था के हृदय हैं। शिक्षा को अगर बेहतर बनाना है तो शिक्षण विधियों के साथ-साथ शिक्षकों को भी इस हेतु पेशेवर रूप से सक्षम तथा बौद्धिक रूप से सम्‍पन्‍न बना
 
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Dec 29 2009 11:40 AM
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मैं उजाला हूँ

मैं उजाला हूँ -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' मैं उजाला हूँ ,उजाला ही रहूँगा । अँधेरी गलियों में ज्योति-सा बहूँगा । चाँद मुझे गह लेंगे कुछ पल के लिए , पर मैं रोशनी की कहानी कहूँगा ॥ XXXXXX पल जो भी मिले हैं मुझे उपहार में । उनको लुटा दूँगा मैं सि
 
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Dec 29 2009 11:40 AM
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ਮੁਖੌਟੇ

। ਇੱਥੋਂ ਤਕ ਕਿ ਦੋਹਾਂ ਨੇ ਇਕ ਦੂਜੇ ਦੀ ਸ਼ਕਲ ਤਕ ਨਾ ਵੇਖਣ ਦੀ ਸਹੁੰ ਖਾਈ ਹੋਈ ਸੀ। ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰਾਂ, ਮਿੱਤਰਾਂ ਤੇ ਜਾਣਕਾਰਾਂ ਦੀਆਂ   ਉਹਨਾਂ ਵਿਚ ਮੇਲਜੋਲ ਕਰਾਉਣ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ਾਂ ਅਸਫਲ ਰਹੀਆਂ। ਵੱਡਾ ਭਰਾ ਗੰਭੀਰ ਬੀਮਾਰੀ ਕਾਰਨ ਹਸਪਤਾਲ ਵਿਚ ਭਰਤੀ ਰਿਹਾ। ਤਦ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਸਮਝਾਉਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਛ
 
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जीवन की कर्मभूमि

जीवन की कर्मभूमि रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु ' जीवन की इस कर्मभूमि में , ठीक नहीं है बैठे रहना । बहुत ज़रूरी है जीवन में सबकी सुनना ,अपनी कहना । सुख जो पाए, हम मुस्काए, आँसू आए ,उनको सहना । रुककर पानी सड़ जाता है, नदी सरीखे निशदिन बहना [21जून,2009 ] जीव
 
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Dec 29 2009 11:40 AM
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महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ

जीवन - मूल्य संरक्षक न्यूज़ मासिक सम्पादक - डॉ एन के शर्मा सम्पादन सहयोग - नरेन्द्र कुमार एक अंक –दस रुपये, वार्षिक -100रुपये सम्पादकीय कार्यालय ए-5 बी/7 एस एफ़ एस फ़्लैट्स पश्चिम विहार, नई दिल्ली -63 -इस पत्रिका के अप्रैल अंक में ‘दिल्ली की लौ : बहन सत
 
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Dec 29 2009 11:40 AM
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अमलतास के झूमर:

।रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ धरती तपती लोहे जैसी गरम थपेड़े लू भी मारे। अमलतास तुम किसके बल पर खिल -खिल करते बॉंह पसारे। पीले फूलों के गजरे तुम भरी दुपहरी में लटकाए। चुप हैं राहें सन्नाटा है फिर भी तुम हो आस लगाए। जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज म
 
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Dec 29 2009 11:40 AM
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मणिमाला-3

मणिमाला- 3 रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु ' 1-पूजा        पूजा आडम्बर नहीं मन को   शुद्ध करने की प्रक्रिया है   जो अपने आपको शुद्ध प्रमाणित करने   की आवश्यकता समझते हैं , वे तरह – तरह के आडम्बरों में पड़ते हैं
 
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Dec 29 2009 11:40 AM
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1-चक्रव्यूह

मँझले को देखो न , कितना कमज़ोर हो गया है। ’’ सुबह पत्नी ने कहा। ‘‘ देख तो मैं भी रहा हूँ। पर करूँ भी तो क्या ? कलकत्ता में रहे हैं। वहाँ गरम कपड़ों की ज्यादा ज़रूरत नहीं पड़ी। अधिक न भी हों तो तीनों बच्चों के लिए एक – एक फुल स्वेटर ज़रूरी है। मैं चप्
 
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2-चक्र

मोना को सुबह ही सुबह खेलते देखकर महेश ने पत्नी को कनखियों से इशारा किया –'' देखो , मोना की रात भी कितना समझाया था कि सोने का वक्त हो गया है। खेल बंद करके होमवर्क पूरा कर लो। अब फिर सुबह ही सुबह...... '' वह क्रौंध से होंठ चबाता हुआ दूसरे कमरे में चला
 
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3-जहरीली हवा

रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु ' आँख खुली। किशोर हड़बड़ाकर उठ बैठा। गला सूख रहा था। पानी पीकर थोड़ी राहत मिली। हाशिम गहरी नींद सोया हुआ था। उसे भयंकर सपने पर हैरत हुई। सपने उसे कभी – कभार ही आते हैं पर इस तरह का सपना तो कभी नहीं आता। पूरा शहर पागलपन की आ
 
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4-दूसरा सरोवर

रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु ' एक गाँव था। उसी के पास में था स्वच्छ जल का एक सरोवर। गाँववाले उसी सरोवर का पानी पीते थे। किसी को कोई कष्ट नहीं था। सब खुशहाल थे। एक बार उजले-उजले कपड़े पहनकर एक आदमी गाँव में आया। उसने सब लोगों को मुखिया की चौपाल में इकट्
 
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5-मुखौटा

मुखौटा रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु '     नेताजी को चुनाव लड़ना था। जनता पर उनका अच्छा प्रभाव न था। इसके लिए वे मुखौटा बेचने वाले की दूकान में गए। दूकानदार ने भालू , शेर , भेडिए , साधू – संन्यासी के मुखौटे उसके चेहरे पर लगाकर देखे। कोई भ
 
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मुक्तक

मुक्तक बघनखे पहनए हुए, पुरोहित अपने गाँव के । शूल अब गड़ने लगे हैं अधिक अपने पाँव में । दूर तक है रेत और गर्म हवा के थपेड़े यहाँ पहुँच झुलसे सभी साने ठण्डी छाँव के । -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है । सम्पूर्ण वि
 
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‘Tusi Hamare Bhai Ho’

जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है । सम्पूर्ण विश्व सुखी हो , यही सच्चे मानव का प्रयास होना चाहिए। रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
 
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मैं उजाला हूँ

रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु ' मैं उजाला हूँ , उजाला ही रहूँगा । अँधेरी गलियों में ज्योति-सा बहूँगा । चाँद मुझे गह लेंगे कुछ पल के लिए , पर मैं रोशनी की कहानी कहूँगा ॥ पल जो भी मिले हैं मुझे उपहार में । उनको लुटा दूँगा मैं सिर्फ़ प्यार में । नफ़रत की फ
 
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मधुर कुलश्रेष्ठ की दो कविताएँ

मजदूर शहर के व्यस्ततम चौराहे पर लगी है हाट मजदूरों की लोग आलू, प्याज की तरह हाथों की मछलियाँ देख-देखकर छाँट रहे हैं मजबूत मजदूर ताकि मजदूर के पसीने की बूँदों से चमक उठे उनके सपनो का महल. 2- अपना अपना दर्द झोपड़ी को दर्द है कि वह कभी अपना सिर उठाकर सी
 
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Oct 25 2009 11:00 PM
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शत-शत दीप जलाएँ

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' अँधियारे के सीने पर हम शत-शत दीप जलाएँ ; दिल में दर्द बहुत है माना, फिर भी कुछ तो गाएँ । दुख की नदी बहुत है लम्बी बहुत ही छोटी नैया , छप-छप करती तिरती जाती पार पहुँचती भैया ! दूर किनारा ,गहरी धारा देख नहीं घबराएँ । आँसू और
 
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शुभकामना !

पल पल सुनहरे फूल खिले , कभी न हो कांटों का सामना !  जिंदगी आपकी खुशियों से भरी रहे , दीपावली पर हमारी यही शुभकामना !! संगीता पुरी जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है । सम्पूर्ण विश्व सुखी हो , यही सच्चे मानव का प्रयास होना चाहिए। रामेश्
 
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बच्चों के मन में सेंध लगानी होगी

31 अगस्त ,2009,प्रगति मैदान का प्रगति ऑडिटोरियम, अवसर दिल्ली पुस्तक मेला । नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया ने विचार गोष्ठी-'बच्चों के लिए पुस्तकों का लेखन ,चित्रांकन ,विपणन : वर्त्तमान चुनौतियाँ' का आयोजन किया । गोष्ठी की अध्यक्षता देवेन्द्र मेवाड़ी ने की
 
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Oct 07 2009 05:28 PM
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विजया दशमी मंगलमय हो !

विजया दशमी मंगलमय हो ! विजया दशमी मंगलमय हो ! जीवन सबका सदा अभय हो ! दूर      अभावों    की   बस्ती से, हो प्यार ,तन-मन निरामय हो ! -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है । सम्पूर्ण
 
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Sep 28 2009 10:34 AM
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हिन्दी

कमला निखुर्पा हिन्दी! ना बनना तुम केवल माथे की बिन्दी, जब चाहा सजाया माथे पर, जब चाहा उतारा फेंक दिया। हिन्दी! तुम बनना हाथों की कलम, और जनना ऐसे मानस पुत्रों को, जो कबीर बन फ़टकारे, जाति धर्म की दीवारें तोड़ हमें उबारे। जो सूर बन कान्हा की नटखट केलियाँ
 
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Sep 16 2009 10:53 AM
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संस्कार है हिन्दी ।

सूर-मीरा के पदों की झंकार है हिन्दी । देश का स्वाभिमान है,संस्कार है हिन्दी । यह दिवस सप्ताह मास की अवधि है बहुत कम बरसों नहीं ,सदियों का व्यवहार है हिन्दी। -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है । सम्पूर्ण विश्व सुखी हो
 
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Sep 15 2009 10:05 PM
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जागरूक भारत

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' धर्मान्धता संक्रामक रोग है , मतान्धता विष है , जातिवाद पागलपन है , क्षेत्रीयतावाद राष्ट्र की जड़ों को खोखला करने वाला घुन है और भ्रष्टाचार इन सबका बाप है । स्वयं को श्रेष्ठ न होते हुए भी श्रेष्ट होने की भावना इन मरणान्तक
 
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Aug 15 2009 08:26 AM
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महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ-1

महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ शब्दशिल्पियों के आसपास सम्पादक : राजुरकर राज वार्षिक: 60 रुपये सम्पर्क: एच-3,उद्धवदास मेहता परिसर नेहरू नगर भोपाल -462003 चलित वार्ता : 09425007710 ई-मेल-shabdshilpi@yahoo.com यह पत्रिका पूर्णतया साहित्यिक समाचारों के लिए समर्प
 
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Fw: Home Remedies (Useful)

जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है । सम्पूर्ण विश्व सुखी हो , यही सच्चे मानव का प्रयास होना चाहिए। रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
 
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पत्रिका:अप्रतिम वार्षिकी

अप्रतिम वार्षिकी [जनवरी 2009] सम्पादक : वीरेन्द्र कुमार सिंह आवरण एवम सज्जा : नीता सिंह सम्पर्क:पो बा न 3, पो ओ गोमती नगर ,लखनऊ-226010 पृष्ठ ; 150 ,मूल्य ; तीस रुपये साहित्य का अखाड़ा खूँदने वाले लोगों से हटकर साफ़-सुथरी पत्रिका निकालना एक चुनौती भरा क
 
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असभ्यनगरt

समीक्षा असभ्य नगर असभ्य नगर श्री रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु ' की बासठ लघुकथाओं का संकलन है। लघुकथा को लेकर हिमांशु जी के पास भावनात्मक आवेग के साथ मूल्यपरक जीवनदृष्टि भी है। इन लघुकथाओं को पढते हुए हम हृदय की उन धडकनों के साक्षी बन जाते हैं जिन्हें ह
 
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जूते और वोट

रामेश्वर काम्बोज ' हिमांशु ' जूते जूते में गुन बहुत से, सदा राखियो संग । गुण्डे नेता हों जहाँ , वहाँ दिखाए रंग ॥   वहाँ दिखाए रंग,झपट   दुष्टों को मारे । यह घमण्ड का भूत , सिर से तुरन्त उतारे ॥   इसका जोड़ न तोड़ सभी कुछ इसके बूते । परमा
 
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Heaven and Hell

जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है । सम्पूर्ण विश्व सुखी हो , यही सच्चे मानव का प्रयास होना चाहिए। रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
 
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मुस्कान तुम्हारी

आगे बढ़ो तुम पार अँधेरे के । दो क़दम दूर हैं द्वार सवेरे के॥] मुस्कान तुम्हारी पीछे तो केवल छाया है यही तुम्हारा सरमाया है । तुम अपनों को ढूँढ़ रहे हो कोई साथ नहीं आया है । देखी है मुस्कान तुम्हारी सब कुछ आँसू से पाया है । जिसको तुमने गीत कहा था चुपके र
 
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हमारे संस्कार ( एक घरेलू महिला की डायरी)

हमारे संस्कार ( एक घरेलू महिला की डायरी) सविता यशपाल (1) माता पिता के विचार (2) अच्छे विचार (3) मन को वश में करना सीखें (4) चेहेरे पर हँसी – खुशी रखें (5) अपने विचारों को सशक्त बनाएँ (6) हमेशा तनाव – मुक्त रहिए (7) माता – पिता को भूलना नही चाहिए 1 -म
 
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ਪੰਜਾਬੀ ਬਾਈਵਾਲ ਸ਼ਿਆਮ ਸੁਂਦਰ ਅਗਰਵਾਲ

जीवन एक कला है । साहित्य उसी का सहज मार्ग है । सम्पूर्ण विश्व सुखी हो , यही सच्चे मानव का प्रयास होना चाहिए। रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
 
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खून के रिश्ते ।

खून ही पीते रहे ये खून के रिश्ते । सदा ही रीते रहे ये खून के रिश्ते ॥   जोंक भी जीती सदा सबको पता कैसे । इसी तरह जीते रहे ये खून के रिश्ते ॥   घाव जो खाए भला कब ठीक वे होते । शूल से सीते रहे ये खून के रिश्ते ॥   वे समझते हैं हमें रोना
 
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