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Dreamer / स्वप्नदर्शी

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21 Mar 2010
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सपने में बातचीत -03

नफ़रत और प्यार जैसे सगे संबंधी, विलोम नहीं, बस है एक-दुसरे के पर्याय, मन की गहरी खाईयों के बीच झूलते हुये पुल है. चोट खाया, दुरदुराया प्यार नफ़रत की ओढनी में ही सर लुकाता फिरेगा अनेक बार, नफरत की टेक पर ही फिर खड़ा होगा, बरसायेगा कुछ पत्थर, करेगा कुछ
 
स्वप्नदर्शी
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Why Socialism? by Albert Einstein

This essay was originally published in the first issue of Monthly Review (May 1949). Is it advisable for one who is not an expert on economic and social issues to express views on the subject of socialism? I believe for a number of reasons that it is.
 
स्वप्नदर्शी
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सपने में बातचीत-02

मन के पैर नहीं होते बस जब-तब पंख उग आतें है, हरे-नीले-लाल, और उड़ जाता है अपरिमेय पहाड़ों को फांदता, समन्दर लांघता, समयकाल से बेपरवाह कंही भी. लाता है सपेरें सा पोटली बांधे सौगाते, कभी न देखी गयी, कभी न सुनी गयी, पकड़ में न आने वाले सुगंधियों सी, मचलती
 
स्वप्नदर्शी
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Chicken's split sex identity revealed

ये एक स्टोरी है जो अपने आप में सेक्स का निर्धारण जीव जंतुओं में कैसे होता है, के पुराने सारे मिथ तोड़ती है। दो लिंगो के बीच में बहुत ही पतली लाइन है, और वों सारे लोग जो सिर्फ कुछ हारमोंस की काम अधिक मात्रा और अपने पूर्वाग्रहों के चलते, इस पतली लाइन को
 
स्वप्नदर्शी
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तेहरान की छते (Roofrops of Tehran)

बहुत दिनों बाद जो कोई एक किताब एक झटके में ख़त्म की वों Mahbod Seraji की Rooftops of Tehraan है. किताब पढ़ते हुये मैं भी बहुत देर तक तेहरान की छतों पर बैठी रही। पूरी किताब कुछ १७-१८ साल के कुछ चार बच्चों उनके परिवार और १९७० के आसपास इरान के समय की है, जब
 
स्वप्नदर्शी
Mar 08 2010 09:15 AM
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अजनबी संसार की सड़क पर

मैं तुम्हारा नाम तक न पूछ सकीकभी मिलना न हुआ,न फिर मिलना होगा कभीदो दिन बाद शक्ल भूल जाऊँगी, आवाज बिसरा जायेगीफिर अगले महीने या साल भर बाद जो दिखे तुमतो शायद अनदेखे आगे सरक जाऊंगीफिर भी मन की गीली मिट्टी में हमेशा रहेगी तुम्हारी स्मृतिअलग-अलग शक्लो में
 
स्वप्नदर्शी
Mar 05 2010 05:34 AM
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सपने में बातचीत-01

अंतर्मन के किसी अँधेरे गहरे कुएं में कुश्ती लड़ते भ्रम और डर के बैचेन भूत होंगे, वहीं किसी कौने लुकी-छिपी हसरतें होंगी, सपने में भी पीठ किये बैठी. आधी उम्र के बीहड़ पार अँधेरे मुंह गडमड्ड परछाईयों सी तैरती रोज़-रोज़ पूछती है हसरतें " है पहचान कोई
 
स्वप्नदर्शी
Mar 01 2010 04:06 PM
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तुम्हारे सवालों की उम्र बढ़ती रहे

अपनी कल्पना में सहज रचे बसे तुमयूँ ही लेकर आते रहो रोज़ कई-कई सवालमेरे पास कुछ सीधे-सरल जब़ाब होंगेफिर कुछ टेढ़े-मेढे उलझे अनुमान भर भीऔर कभी मैं भी अवाक तुम्हारे साथउलझुंगी अबूझे सवालों से .............कभी अकुलाया बेमतलब, अनमना मन होगाघेरना मुझे तब भी
 
स्वप्नदर्शी
Feb 25 2010 01:25 AM
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निर्मल पांडे और नैनीताल

आज शाम होते-होते कई पुराने दिनों के मित्र परिचित कुछ थोड़ी देर के बाद निर्मल पर लौट आये.निर्मल को कुछ बार नैनीताल में देखा, कुछ थोड़ी बहुत बातचीत, कुछ ८९-९० के बीच उनके कुछ नाटक (नैनीताल युगमंच द्वारा आयोजित) को देखने का मौक़ा मिला होगा। कभी गाहे बगाहे इन
 
स्वप्नदर्शी
Feb 19 2010 03:42 PM
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बूझे-अबूझे जीवन संसार

एक अति उत्साहित छात्र मेरे छात्र दिनों के बाबत कुछ सवाल पूछने आता है, मैं उसे कुछ शहरों के कुछ स्कूल और विश्वविधालयों के नाम बताती हूँ, कुछ तस्वीरे दिखाती हूँ। फिर से अपनी स्टुडेंट लाईफ को याद करती हूँ, तो यही लगता है, कि जीवन का एक सान्द्र अनुभव था,
 
स्वप्नदर्शी
Feb 18 2010 04:28 AM
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औरत का घर

घर में नहीं, देश में नहींलड़की जन्म लेती है एक शरणार्थी शिविर मेंजिसमे में रहना है उसेजब तक नहीं मिलता उसे घर का पतालड़की घर में नही पलतीघर लड़की के स्वपन में पलता है ....घर के स्वपन में ढलीपरायेपन की हवा में पली,कुछ चाह में, कुछ अनचाहेकुछ हड़बड़ी में, कुछ
 
स्वप्नदर्शी
Feb 17 2010 10:07 AM
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प्रशांत महासागर से मुलाक़ात

कुछ तस्वीरे है, दुनिया के पश्चिमी छोर से................प्रशांत महासागर के तट से
 
स्वप्नदर्शी
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बिना अनुमति बिना सूचना के जनसत्ता में

एक मित्र ने ये लिन्क भेजा है। ब्लोगपर सीधे सीधे सभी सामग्री पर कॉपीराईट की घोषणा है, जिसे नज़र अंदाज़ किया गया है। मुझसे न सीधे अनुमति ली गयी गई, और न ही इसकी कोई सूचना जनसत्ता से है?क्या ब्लॉग का अपनी मेहनत और बौध्दिक संपदा पर कोई अधिकार नहीं है? एक
 
स्वप्नदर्शी
Feb 08 2010 03:57 PM
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प्रवासी नोट्स-०३

मन का कोई ठौर नहीं, अजनबी है मन. दिनचर्या से बेदखल मन, चोर की तरह नींद में सेंधमारी करता है. सपनीले उनींदेपन की मिठास में बौरायी मैं सुनती हूं, रात के सिरहाने गुनगुनाती कोई अनचीन्ही, भूली,बिसरी आवाज, जिसे नींद में ताना देती हूं. अंतर्मन के अँधेरे में
 
स्वप्नदर्शी
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बुरांश

करीने लगी कोई क्यारीया सहेजा हुआ बाग़ नहीं होगा ये दिलजब भी होगा बुरांश का घना दहकता जंगल ही होगाफिर घेरेगा ताप,मनो बोझ से फिर भारी होंगी पलकेमुश्किल होगा लेना सांसमैं कहूंगी नहीं सुहाता बुरांश मुझे,नहीं चाहिए पराग....भागती हूँ, बाहर-बाहर,एक छोर से दूसरी
 
स्वप्नदर्शी
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समय के क्षितिज पर प्रेम के कौतुक

बंद समाजों और बहुत हिदायतों में पली, नाक की सीध चलने वाली तीन लडकियां, अचानक से उतरना चाहती है कूदते-फांदते एक पहाड़ी ढलान, हैरतंगेज एक बूजूर्ग सहमता है, कुछ निगाहें कौतुक में जलती है, और मन का हिरन चौकड़ी भरता है............ लडकी का मन पंछी की तरह आकाश
 
स्वप्नदर्शी
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प्रवासी नोट्स-०२

सपनीले उनींदेपन की मिठास में बौरायी मैं सुनती हूं, रात के सिरहाने गुनगुनाती कोई अनचीन्ही, भूली,बिसराई आवाज, जिसे नींद में ताना देती हूं। अंतर्मन के अँधेरे में अचानक से कौंधती है कितनी प्यार भरी निगाहें, आवाजे, आहें, कुछ धंसी हुयी खामोशियाँ, लावा सा आठ
 
स्वप्नदर्शी
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जीवन में कब आता है यू-टर्न

जीवन में फिर कब हाथ आते हैं अनजाने फिसल गए कुछ पल,या बदहवासी में बीते दिन, महीने और सालउम्र मुठ्ठी भर रेत की तरह फिसलती हैऔर मन अधूरी यात्राओं, अनदेखे सपनों,मौन चीखों के ढ़ेर पर देर सबेर ढ़ेर होता चलता हैकि काश एक मौक़ा और मिलता तो कैसे सहेजते हमकुशलता से
 
स्वप्नदर्शी
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पांच साल के बच्चे और माँ की कहानी

एक पांच एक साल का बच्चा देखादेखी में पाल लेना चाहता हैएक हरे रंग का, एक बिन दांतों वाला कुत्ता, माँ सुकूं से हैबच्चा लाना चाहता है एक सांप, और माँ मछली पर राज़ी हैबच्चे को याद है साल भर पहले पाली गयी मछलियाँ,जिनमे से कुछ बेसमय मर गयी,बाकी छूट गयी एक पीछे
 
स्वप्नदर्शी
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एकनिष्ठा का सवाल, शरत और आज की स्त्री

एकनिष्ठा, अनन्यता पर स्त्री-पुरूष के सन्दर्भ मे राजकिशोर जी ने पिछले लेख मे शरतचंद्र के बहाने कुछ सवाल उठाये है, उन सवालों पर कुछ यथासंभव कच्चे-पके जबाब की तरह इस पोस्ट को देखा जाय।"स्त्री-पुरुष संबंध का शायद ही कोई आयाम हो जिस पर इस विचार-प्रधान, पर
 
स्वप्नदर्शी
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प्रवासी नोट्स-०१

अपने पहचाने परिचित दायरे से ही भाग खड़ा हुआ था मन, जाने कौन सी आस और किस तरह की प्यास धकेलती रही धरती के एक छोर से दुसरे तक। या फिर निपट निराशा थी, बंद हवाएं थी, या हूलज़लूल के मलबे से ढका आसमान था और कुछ खीझ भी कि हमारे होने न होने से कब कुछ होना था।
 
स्वप्नदर्शी
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किताब और जीवन

खोली थी एक किताब, किताब ने खोली एक समूची दुनिया,एक अनजाना भूगोल, चिंदी-चिंदी इतिहास, बोली, भाषा,समय और काल की अनंत क्षितिज पर रंग और रोशनी का रिश्ता.कभी धीमे, कभी बदहवास, कभी अचेत,मन की नदी में उफनते रहे भीतर ही भीतरकुछ अंजाने, अचीन्हे भाव, नदी के तट पर
 
स्वप्नदर्शी
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स्मृति के छल

अशंकित है बड़े, बूढ़े और समझदारहमेशा की तरह आनेवाले समय को लेकर,ढूंढते है सुकून बहुत पीछे छूटी दुनिया मेंजो अब कंही नहीं है, धुंधली पड़ गयी है स्मृति भी,छांटकर, पोंछकर सजा ली है मन ने स्मृति की दुनिया,कारीगरी से बचा लिया है सिर्फ अल्हड़ बरसों का रोमान,और
 
स्वप्नदर्शी
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स्मृति के छल

अशंकित है बड़े, बूढ़े और समझदारहमेशा की तरह आनेवाले समय को लेकर,ढूंढते है सुकून बहुत पीछे छूटी दुनिया मेंजो अब कंही नहीं है, धुंधली पड़ गयी है स्मृति भी,छांटकर, पोंछकर सजा ली है मन ने स्मृति की दुनिया,कारीगरी से बचा लिया है सिर्फ अल्हड़ बरसों का रोमान,और
 
स्वप्नदर्शी
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लेबर रूम

अभी-अभी माँ बनी है, और नीम बेहोशी में है स्त्री रफूगिरी में तल्लीन एक नर्स और एक डॉक्टर कहते है कि " दो तीन घंटे की स्मृति नही रहेगी " सर हिलाती स्त्री सोचती है इस तरह कैसे लकीर फेर दूँ ? सिफर कर दूँ तीन घन्टे? उसे याद रखनी है ये बेहूदी बातचीतलड़ना है
 
स्वप्नदर्शी
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दोस्तियाँ

कितनी आजीब बात है कि सोचे समझे जीवन में,बिन मौसम बरसात से टपक जाते है दोस्तऔर समझ चली जाती है पानी भरने,कोई पूछता है किस तरह की दोस्ती?कैसे दोस्त? कब मिले?और फिर बताया भी नहीं जा सकता कि कैसे बिन बताए,ऐसे अचानक आगए ये सारे जीवन के भीतररात को एक लडकी मिल
 
स्वप्नदर्शी
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नया साल मुबारक: कुछ और रास्ते मिले, कुछ और रास्ते खुले......

एक दिन अचानक मुहँ बिरायेगा आयना, चांदी के तार झलकेंगे कपास की खेती में बदलने से पहले, तुम फिर फ़िराक में रहोगे, अभी भी पकड़ में है वक़्त, कुछ और दिन के लिए मुब्तिला कर दोगे खुद की तलाश. वक़्त के बदलते घोड़े की घुड़सवारी नहीं करोगे, उसकी थापों की थाह लोगे, तब
 
स्वप्नदर्शी
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एक प्यार की मनुहार

प्यार करने वाला पुरुष स्त्री के ऊपर छतरी की तरह तन जाना चाहता है,बचा लेना चाहता है उसे बुरी नज़रों और नीयत से,तय करना चाहता है कि कब और कहाँ निकले,कब लौटे, भीड़-भाड़ भरी, बदहवास सड़क पर गाड़ी चलाये कि नहीं?अपनी तमाम सदिच्छाओं के बाद भी, कहाँ उसकी पकड़ म
 
स्वप्नदर्शी
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जीवन: क्या बनोगे तुम?

जिज्ञासावश नहीं आता सवाल कि बच्चे क्या बनोगे तुम? एक बेबस आदत की तरह आता है, एक सीमित कल्पना, और जीवन के अँधेरे बंद कमरों की ऊब से निकल कर आता है। आता है बिना पूछने वाले की जानकारी के, एक धूर्त मंशा का औज़ार बनकर जो लगातार मनुष्य को एक ख़ास तरह के उत्
 
स्वप्नदर्शी
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कुछ सिगरेटबाजों के लिए

इस बीच जीनोमिक रीसर्च की एक खासी उपलब्धी कैंसर को सिस्टम लेवल पर समझने की कसरत रही है। हमारे शरीर के बहुत से जींस जो सामान्यतः अपना काम करते है, आंतरिक और बाहरी वजहों से प्रभावित होकर, उस काम को ठीक से नहीं कर पाते, और यही एक वजह बनती है तमाम तरह के
 
स्वप्नदर्शी
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प्रेम के बिम्ब और निषिद्ध स्त्रियाँ

हेलोवीन की रात चुड़ैल बनकर घूमना चाहती हूँऔर कुछ देर विलुप्त होना चाहती हूँ, अन्धकार की दूनिया में बतियाना चाहती हूँ निषिद्द स्त्रीयों से, चखना चाहती हूँ वों अभिमंत्रित जलस्त्री के आदिम निषिद्ध, गुप्त ज्ञान का भागी होना चाहती हूँसेलम की चुड़ैलों मे स
 
स्वप्नदर्शी
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शब्दों को शोर की संज्ञा दे दूँ?

भाषा और भाव की संगत कुछ ऐसी कि जुगलबंदी की बहुत कम गुंजाईश बनती है, भाषा कारीगिरी एक लंबा उलझाव, सचेत दूनिया के सबक से पकी हुयी, और भाव कुछ अनगढ़, चिकनी मिट्टी के लोए। भाषा का शब्दकोष, वाक्य विन्यास और व्याकरण, और लगातार उधारी की मार में मरी भाषा, लं
 
स्वप्नदर्शी
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संगीत: भाषा और भाव की जुगलबंदी

भाषा और भाव की संगत कुछ ऐसी कि जुगलबंदी की बहुत कम गुंजाईश बनती है, भाषा कारीगिरी एक लंबा उलझाव, सचेत दूनिया के सबक से पकी हुयी, और भाव कुछ अनगढ़, चिकनी मिट्टी के लोए। भाषा का शब्दकोष, वाक्य विन्यास और व्याकरण, और लगातार एक भाषा से दुसरी के उधारी, सब
 
स्वप्नदर्शी
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संभावना

संभावना लुकी-छिपी रहती है प्रेम की तरह किसी अदृश्य कौने में,नही रहती वहाँ, जहाँ उसका इश्तेहार टंगता है,अबूझे ख़्यालों की बस्ती में बसती है, बे-उलटे पन्नो के ठीक बीचो-बीच अचानक मिल जाती है,संगीत की तरह लगातार एकांत संगत और रियाज़ मांगती है, नही फूटती का
 
स्वप्नदर्शी
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चिड़िया भर आसमान

चहकी हवा देती जैसे निमत्रण कि चलो एक छोर से दूसरे तक देख आए दुनिया, एक ज़रूरी शर्त है जीवन की इस छोर से उस तक और फ़िर उस छोर से इस तक उड़ना, मंजिल जैसी मंजिल भी नही कोई, लगातार गति है, सिर्फ़ यात्रा का रोमांच है, अनदेखे रास्तों की, अबूझी संभावनाओं की
 
स्वप्नदर्शी
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नही है देश जैसा कोई देश, शहर जैसा कोई शहर

कहीं दूर से एक भूली पुरानी धुन के संगीत में आह सुनाई देती है, घर लौट आओ......मै अकबक ढूंढती हूँ घर का पता, शहर का पता, देश का पता, बहुत टटोलने पर भी ठीक ठीक शिनाख्त नही कर पाती उस जगह की। यायावरी में एक शहर से दुसरे, दूसरे से तीसरे, और फ़िर लगभग चार द
 
स्वप्नदर्शी
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This Land is Your Land - Woody Guthrie

वूडी गुथरी के गाने और जीवन दोनों मुझे हमेशा से आकर्षित करते रहे। पिछले कुछ सालो में भूल गयी थी। पर कुछ इतफ़ाक से मेरे ५ साल के बेटे को गुथरी का एक गाना जो अमेरिका का एक तरह का लोकगीत है इतना भाया है, कि जब तक गाता है, और एक जगह स्टेज पर गा चुका है। उस
 
स्वप्नदर्शी
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Thanksgiving poem by 5 year old

Blueberry blueberry who are you?with raspberry you are going to be a topping toopie-pie who are you?you are frosting cake tooso you can be eatenTurkey turkey lets roast youso we could toast itand make it so scrumptious todayscrumptious food is very
 
स्वप्नदर्शी
Dec 01 2009 04:44 AM
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प्रेम पत्र

एक पत्र जो तुमने लिखा थाऔर मुझ तक पहुँचने से पहले चिंदी चिंदी कर दिया थाआज भी कैद है स्मृति में उड़ते वों सौ टुकड़ेतुम्हे अंदाज़ भी न थाफ़िर भी जोड़े थे मैंने वों सौ टुकड़ेक्यूंकि देखनी थी अपनी ही छवितुम्हारी हारी उम्मीदों का एक बिम्ब थामैं एक सिरे से गा
 
स्वप्नदर्शी
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जीवन

जीवन के वैविध्य के कुछ चित्र उकेरनाकुछ इस तरह हैजैसे एक अनाड़ी, दर्जीआड़ी, तिरछी,बेहिसाब लम्बी और बौनी परछाईयों के के माप से सिलता रहे कपड़ेया फ़िर एक अकेला चरवाहा किसीपहाड़ की मूंठ से अपनी ही प्रतिध्वनीकी गूंज मे बुनता रहे भ्रमऔर नकारता रहे जीवन का एक
 
स्वप्नदर्शी