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कबाड़खाना

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17 Jun 2010
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वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल, साहित्य, दर्शनशास्त्र और कामू के फटे जूते

फ़ुटबॉल का विश्व कप धीरे धीरे रंग पकड़ रहा है. इस बार ग्रुप सी का हिस्सा है अल्जीरिया की टीम. पहला मैच स्लोवेनिया से ०-१ से हार चुकी है. अभी उसने इंग्लैण्ड और अमेरिका से मैच खेलने बाक़ी हैं. अल्जीरिया मेरी फ़ेवरेट टीम तो नहीं रही है पर हर बार उसके
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जलसा - साल की एक बड़ी साहित्यिक घटना

जाने माने कवि श्री असद ज़ैदी ने हाल ही में अपनी एक एक पुरानी महत्वाकांक्षी योजना को ठोस सूरत देते हुए जलसा नाम के प्रकाशन का पहला अंक निकाला है. इसे वे साहित्य और विचार का अनियतकालीन आयोजन कहते हैं. अंग्रेज़ी के विख्यात प्रकाशन ग्रान्टा की तर्ज़ पर इसे
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खानसाहेब सुना रहे हैं राग मेघ

उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान की दिव्य आवाज़ में राग मेघ मल्हार:(साभार यूट्यूब)
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थोड़ा नमक था उनमें दुख का, सुख का थोड़ा महुआ

ग्वालियर में रहने वाले हमारे कबाड़ी मित्र अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी यह लम्बी कविता मुझे कुछ दिन पूर्व भेजी थी. एक बड़े फलक पर फैली यह कविता हमारी इस इक्कीसवीं सदी पर काफ़ी धारदार और ज़रूरी टिप्पणी है. कविता लम्बी है और ध्यान से पढ़े जाने की दरकार रखती
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सारे पेड़ भागते हैं मेरे पीछे नंगे पांव ...

आज सुबह आपने निज़ार क़ब्बानी की कुछ छोटी छोटी प्रेम कविताएं पढ़ीं. उसी क्रम को बढ़ाते हुए अब पेश हैं इसी कवि की प्रेम कविताओं की अगली किस्त. मैं उम्मीद करता हूं यह इन प्रेम कविताओं की आख़िरी किस्त नहीं होगी. भाषाजब आदमी प्यार करता हैकैसे इस्तेमाल कर सकता
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लालटेन से ज़्यादा ज़रूरी होती है रोशनी

अरबी मूल के कवि निज़ार क़ब्बानी की कविताओं से सिद्धेश्वर सिंह पहले ही आपका परिचय करवा चुके हैं. एक पत्रिका के प्रेम-कविता विशेषांक के लिए कविताएं चुनते और अनुवाद करते हुए मेरी निगाह इसी शायर की चन्द छोटी-छोटी प्रेम कविताओं पर पड़ी. तुरन्त अनुवाद करने का
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धूप में पेड़ भर छाँव प्यास में घूँट भर जल

'वे जो लकड़हारे नहीं हैं' सुरेश सेन निशान्त की कविताओं का संग्रह है जो अंतिका प्रकाशन से इसी साल २०१० में आया है. निशान्त की कविताओं की सहजता ने हिन्दी कविता के एक बड़े हिस्से को ओर अपनी ओर खींचा है.उनकी कविताओं की दुनिया में कोई 'दूसरा' संसार नहीं बल्कि
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रोहतांग : कुछ कबाड़, कुछ छवियाँ

पूरे सत्रह दिन की हाड़तोड़ यात्रा के बाद कल अपने बसेरे पर लौटा हूँ. २३ मई की सुबह घर से निकलना हुआ था और ९ जून की सुबह फिर से अपने द्वार पर. यह एक अध्ययन- यात्रा तो थी ही, विशुद्ध घुमक्कड़ी और आत्मीय पारिवारिक प्रसंग भी इससे जुड़ा हुआ था. इस बीच प्रकृति के
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वैष्णव जन

(कई दिनों से कबाड़खाना पर कोई माल नहीं आया … तो लीजिये पढ़िये अंशु मालवीय की एक कविता उसके संकलन दक्खिन टोला से) वैष्णव जन आखेट पर निकले हैं! उनके एक हाथ में मोबाइल है दूसरे में देशी कट्टा तीसरे में बम और चौथे में है दुश्‍मनों की लिस्‍ट. वैष्‍णव जन आखेट
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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याद पिया की आए

उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान (१९०२ –२५ अप्रैल १९६८) पटियाला घराने की शान थे. उनकी गायकी ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई बुलन्दियों तक पहुंचाया था. अपने गायन में खान साहेब ने अपनी जन्मभूमि कसूर - पटियाला घराने की मौसीक़ी में ध्रुपद अंग को तो आत्मसात किया
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मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते

कल आपने नरेश सक्सेना जी की एक कविता पढ़ी थी. नरेश जी के यहां विज्ञान की मूल धारणाएं अद्भुत काव्य-आयाम ग्रहण कर लेती हैं और साधारण से साधारण लगने वाली चीज़ें और प्रक्रियाएं एकबारगी किसी नए अर्थ के साथ हमारे सामने उद्घाटित होती हैं. आज इसी क्रम में पढ़िये
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आधा चांद मांगता है पूरी रात

नरेश सक्सेना जी की कविताएं आप यहां पहले भी पढ़ चुके हैं. 'समुद्र पर हो रही है बारिश' उनके संग्रह का नाम है. १६ जनवरी १९३९ को ग्वालियर में जन्मे नरेश जी साहित्य के अलावा फ़िल्मों के क्षेत्र में भी खासा कार्य कर चुके हैं. प्रतिष्ठित पहल सम्मान से नवाज़े जा
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अरविन्द गुप्ता को जानते हैं आप?

भारत में शिक्षा के प्रसार के तमाम सरकारी दावे हैं पर यह एक सच्चाई है कि लगातार बेहतर बनाए जाते पाठ्यक्रमों के बावजूद बच्चों को विज्ञान, गणित और भाषा में आमतौर पर खासी दिक्कतें पेश आती नज़र आती हैं और कस्बों, शहरों में ट्यूशन बाकायदा एक उद्योग के रूप में
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ग्रामोफोनीय रेकोर्ड के कबाड़खाने से कुछ रचनाएँ

बात बहुत पुरानी है, इतिहास में झांकियेगा तब पता चल ही जाएगा... समझिये ग्रामोफ़ोन भारत में आया ही था, उस ज़माने में कितनों के पास ग्रामोफ़ोन रहा होगा ? सन १९०० के आस पास की बात है, उस ज़माने में महिलाओं का घर से बाहर निकलाना कितना मुश्किल होता होगा, उस
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ग्रामोफोनीय रेकोर्ड के कबाड़खाने से कुछ रचनाएँ

बात बहुत पुरानी है, इतिहास में झांकियेगा तब पता चल ही जाएगा... समझिये ग्रामोफ़ोन भारत में आया ही था, उस ज़माने में कितनों के पास ग्रामोफ़ोन रहा होगा ? सन १९०० के आस पास की बात है, उस ज़माने में महिलाओं का घर से बाहर निकलाना कितना मुश्किल होता होगा, उस
May 22 2010 04:43 PM
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देहरादूनः कायापलट के पहाड़ों से घिरी घाटी

जर्मन रेडियो डॉयचे वेले में कुछ साल बिता चुकने के बाद लेखक-पत्रकार शिवप्रसाद जोशी वापस भारत में हैं. उनके शानदार गद्य की एकाधिक बानगियां हिन्दी की बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं में पहले भी देखी जा चुकी है. पहल में मारकेज़ पर लिखा उनका शानदार पीस अब भी मेरे
May 21 2010 05:45 PM
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अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही

चन्द्रकान्त देवताले जी को आप कबाड़ख़ाने पर पहले भी कई बार पढ़ चुके हैं. उनकी प्रमुख कृतियों में लकड़बग्घा हँस रहा है (१९७०), हड्डियों में छिपा ज्वर(१९७३), दीवारों पर ख़ून से (१९७५), रोशनी के मैदान की तरफ़ (१९८२), भूखण्ड तप रहा है (१९८२), आग हर चीज में
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तुरिया तुरिया जा फ़रीदा

उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब की आवाज़ में बाबा फ़रीद का एक सबद सुनिये
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लोनली प्लेनेट से कुछ शानदार छवियां

चाहे कहीं भी यात्रा कर रहा होऊं, लोनली प्लेनेट मेरी प्रिय रेफ़रेन्स गाइड रहती है. कोई पैंतीस साल पहले टोनी और मॉरीन व्हीलर द्वारा शुरू की गई यह गाइडबुक अब दुनिया भर के पर्यटकों के लिए किसी बाइबिल का सा काम करती है. वास्तविक यात्रियों द्वारा की गई
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ब्लॉग करो भई ब्लॉग करो

आज बस एक कार्टून
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एक अकर्मण्य दिवस का उजाला झरता जाता है धीरे - धीरे

वेरा पावलोवा छोटे कलेवर की बड़ी कविताओं के लिए जानी जाती हैं। उनके पन्द्रह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। संसार की बहुत सी भाषाओं में उनके कविता कर्म का अनुवाद हो चुका है जिनमें से स्टेवेन सेम्योर द्वारा किया गया अंग्रेजी अनुवाद 'इफ़ देयर इज समथिंग टु
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एक सिरफिरे बूढ़े का बयान

हरीशचन्द्र पाण्डे की कविताओं पर एक पोस्ट दो एक साल पहले कबाड़ख़ाने पर लगाई गई थी. 'एक बुरूँश कहीं खिलता है' और 'भूमिकाएं ख़त्म नहीं होतीं' उनके दो कविता संग्रहों के नाम हैं. प्रसिद्धि और साहित्य की उठापटक से दूर रहने वाले हरीशचन्द्र पाण्डे जी लगातार
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ब्लॉगिंग करने वाले मुर्गे से मिलिये

कनाडाई मूल के कार्टूनिस्ट डगलस सैवेज एक कॉमिक वैबसाइट चलाते हैं सैवेज चिकन्स यानी जंगली मुर्गियां. पीले कागज़ पर बनाए जाने वाले इन सिंगल पैनल कार्टूनों का ह्यूमर समकालीन और शानदार है. डगलस शनिवार और इतवार को छोड़ सप्ताह के हर रोज़ पिछले तीन से ज़्यादा
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यह आपकी ग़लत मांग है कवि से

वेणु गोपाल की एक कविता आपने कल पढ़ी थी. उसी क्रम में आज प्रस्तुत है उनकी एक और रचना:यहआपकी ग़लत मांग हैकवि सेकि वह ख़रीदकरशराब पिएज़िन्दगी के बारे मेंकुछ कहने से पहलेज़िन्दगी जिएवरना चुपचाप रहेहोंठ सिए(चित्र: पाब्लो पिकासो की १९१० की रचना द पोयट)आख़िर
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कि जंगल आज भी उतना ही ख़ूबसूरत है

वेणु गोपाल (२२ अक्तूबर १९४२ - १ सितम्बर २००८) के निधन के बाद हमने वीरेन डंगवाल का एक मार्मिक संस्मरण यहां लगाया था. वेणुगोपाल बड़े कवि थे - आदमी की पक्षधरता और सतत उम्मीद उनकी कविताओं की ख़ासियत हैं. उनकी एक कविता प्रस्तुत है: काले भेडि़ए के ख़िलाफ़
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जो न आई हंसी तो उसका नाम बॉम्बर वेल्स नहीं

बहुत समय नहीं हुआ जब क्रिकेट अपने महान खिलाड़ियों के अलावा कुछ ऐसे नामों के कारण भी बहुत लोकप्रिय था जो अपने जीते जी दूसरे कारणों से गाथाओं में बदल जाया करते थे। ऐसे ही एक खिलाड़ी थे ब्रायन डगलस वेल्स। इंग्लैंड की ग्लोस्टरशायर और नटिंघमशायर काउंटी की ओर
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अरे ओ सांभा

मैकमोहन को लोग उनके असली नाम से कम सांभा के नाम से ज़्यादा जाना करते हैं. और उनका असली नाम तो मैकमोहन भी नहीं था. मैकमोहन कल नहीं रहे. कैंसर से लड़ते हुए उन्होंने बम्बई के एक अस्पताल में अपने प्राण त्याग दिए. कुल इकहत्तर साल के मैकमोहन का फ़िल्मी कैरियर
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तुम मुझे क्षमा करो

हिन्दी और मैथिली में समान अधिकार के साथ लिख चुके राजकमल चौधरी (१९२९-१९६७) के गद्य को विशिष्ट पहचान हासिल है. आज पढ़िये मछली मरी हुई और देहगाथा जैसे उपन्यासों के लिए विख्यात इस बड़े कवि-उपन्यासकार-कथाकार की एक कविता:तुम मुझे क्षमा करो बहुत अंधी थीं मेरी
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भूल मत जाओ अपने मस्तिष्क में छिद्र बनाना

*** कविता के बारे में ( गद्य और पद्य में ) बहुत कुछ कहा गया है। काव्यशास्त्र की तमाम पोथियाँ 'कविता क्या है ?' के प्रश्नोत्तरों से भरी पड़ी हैं फिर भी कवि , आचार्य , पाठक और भावक के पास इस सिलसिले को लेकर सवाल कम नहीं हुए हैं ( और शायद होंगे भी नहीं )।
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प्रेम की सुन्दरता का निषेध करने वाले इसी तट आते हैं हाथ - पैर धोने

अख़बार , टीवी , इंटरनेट से गुजरते हुए पिछले कुछ दिनों से वीरेन जी की यह छोटी - सी कविता बार - बार याद रही है.....याद क्या आ रही है परेशान -सी किए हुए है...आइए देखते - पढ़ते हैं....विद्वेष / वीरेन डंगवालयह बूचड़खाने की नाली हैइसी से होकर आते हैं नदी के जल
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कौन-सी दिशि में अँधेरा अधिक गहरा है !

चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर,इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं ।*****ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाबफिरता है चाँदनी में कोई सच डरा—डरा।आज अपने सहकर्मियों के बीच फुरसत के चंद पलों में यूँ ही बातचीत के दौरान जब दुष्यन्त कुमार( १९३३- १९७५ ) के ( ऊपर
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हिमालय में प्लूटोनियम - सी आई ए का एक और अपराध -2

(पिछली किस्त से जारी)दर असल सी आई ए के पस्त पड़ जाने का मुख्य कारण कुछ और थी - आर टी जी के भीतर धरे प्लूटोनियम की नैसर्गिक ऊष्मा के कारण आर टी जी सीधे सीधे बर्फ़ को गलाता हुआ किसी ग्लेशियर के बीचोबीच पहुंच चुका था.इस पूरे किस्से के दो पहलू हैं. अच्छा तो
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हिमालय में प्लूटोनियम - सी आई ए का एक और अपराध

इधर दिल्ली में हुए कोबाल्ट रेडियेशन की बहुत चर्चा है और यह खासी चिन्ता का विषय भी है. लेकिन आज से करीब चालीस साल पहले अमरीका ने हिमालय की पवित्र चोटियों पर ऐसा पाप किया था जिसके परिणाम क्या हुए या क्या हो रहे हैं या क्या होंगे, कोई नहीं जानता. पीटर ली के
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दूर से अपना घर देखना चाहिये

वरिष्ठ कवि विनोद कुमार शुक्ल की यह विख्यात कविता मुझे अभी अभी सुन्दर ठाकुर ने फ़ोन पर सुनाई. मुझे लगा कि इसे यहां आप के साथ बांटा जाना चाहिये.दूर से अपना घर देखना चाहिएविनोद कुमार शुक्लदूर से अपना घर देखना चाहिएमजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना
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दिल लगा कर तुम ज़माने भर के धोखे खाओगे

अहमद हुसैन मुहम्मद हुसैन की आवाज़ में आज पेश है एक और ग़ज़ल. ग़ज़ल लिखी है दिनेश ठाकुर ने:
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गुलबदन, गुलपैराहन, ग़ुंचादहन याद आ गया

नज़ीर बनारसी साहब की इस शानदार ग़ज़ल को स्वर दिया है अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन ने
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बनी रहती हैं लय की जड़ें

सुबह आपको पॉल साइमन के अल्बम ग्रेसलैण्ड से शीर्षक गीत सुनवाया था. अब उसी अल्बम से मेरा एक और प्रिय गीत अन्डर अफ़्रीकन स्काई-Joseph's face was black as night The pale yellow moon shone in his eyes His path was marked By the stars in the southern
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ग्रेसलैण्ड

अमेरिकी मूल के गायक पॉल साइमन ने अपने कैरियर की शुरूआत १९६० के दशक के मध्य अपने साथी आर्ट गार्फ़न्कल के साथ की थी और साइमन एन्ड गार्फ़न्कल नाम से अपने अल्बम निकाले. अधिकांश गीत ख़ुद पॉल लिखा करते थे. दोनों ने मिलकर कई सुपरहिट गीत रचे. मिसेज़ रॉबिन्सन और
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द स्टोरी ऑफ़ स्टफ़

यह पोस्ट दीपा पाठक ने अपने ब्लॉगपर लगाई थी. द स्टोरी ऑफ़ स्टफ़ नाम की फ़क़त इक्कीस मिनट की एक डॉक्यूमेन्ट्री पर लिखी यह पोस्ट दुनिया पर मंडरा रहे एक आसन्न संकट को रेखांकित करती है. मेरा मानना है कि हर किसी जागरूक व्यक्ति ने इस फ़िल्म को देखना चाहिये और जहां
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ओ जन्नत के बिछावनहार

यह पीली टैक्सी नाम का एक गाना है जिसे बॉब डिलान समेत तमाम कलाकारों ने अलग-अलग काल में गाया है। इसमें समकालीन भारतीय विकास का अक्स झिलमिलाता है इसलिए यहां आपकी नजर पेश किया जा रहा है। उनने बिछाई जन्नत और एक पार्किंग की आबादएक गुलाबी होटल, एक बुटिक- झूमते