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बाल किशन का ब्लॉग

http://bal-kishan.blogspot.com/
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14 Apr 2010
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आयेंगे और रह जायेंगे

दिन की रोशनी की आवाज़ कानों में उड़ेलते चेहरे पर फैले पसीने की सनसनाहट का शोर मचाते आते होंगे किसी पर्वत की गहराई से निकलकर किसी आसमान की तराई से न जाने कौन सी गरम हवा वाली शहनाई सेतकरीरों की झंझट का कोई स्टीली-शीट ओढ़े हुए फटे हुए कुर्ते का दाहिना हाथ
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पत्थर पर भी नहीं.

किसी अन्धियरिया रात का सपना होगापसीने से नहाए अकबकाये से मुंह पर खिंचती जायेगी आश्वासन की रेखा कि;कंधे पर रखा हिमालय उतरेगा कभी कटोरी भर आटा चेहरे पर पोत करदिखाएँगे, लाजवायेंगे सब को कि;देखो खली पेट अब भर गया हैभूख का अजगर पाँव के रास्ते उतर गया हैकिसी
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ब्लॉगर का धाँसू हो बसंत

लगता है हिंदी ब्लागिंग जयराम 'आरोही' जी को भा गई है. इसीलिए तो उन्होंने इसी विषय पर एक और कविता लिख डाली. मैंने तो सुझाव दिया कि परमानेंट ब्लागिंग में ही आ जाइए. मेरी बात सुनकर बोले; "पहले पूरी तरह से स्योर हो जाएँ कि कोई मुकदमा नहीं दायर करेगा तब ही
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धन्य-धन्य कंसल्टिंग वाले ब्लॉगविधाता

प्रस्तुत है जयराम 'आरोही' की कविता जो उन्होंने कल ही ब्लागिंग जैसे नए विषय पर लिखी है. आप कविता बांचिये.लिखने का न लूर था, ब्लागिंग होइ गई बंद कहाँ से लाता आईडिया, लगवाता पैबंद लगवाता पैबंद थाम के रखता इसकोसमझ में आया यही यहाँ से जल्दी खिसको मगर आईडिया
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कुछ तो कोरा रहे .....

लिख लेते कविता अगर हाथ में हरी, लाल, पीली पन्नी रहती लेकिन मिला भी तो सफ़ेद कागज़ कैसे चलाऊँ उसपर कलम? काली सियाही उसे भद्दा कर देगी सफ़ेद कागज़ की यही समस्या है लालच तो देता है लेकिन डरता भी है वैसे तो कहता है कुछ लिख दो लेकिन डरता है इस बात से कि; चली
Dec 29 2009 11:45 AM
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उनकी आँख पत्थर की है

शाम से आँख में नमी सी हैओस की बूँदें आँख में बैठ गयी होंगी नहीं-नहीं ये आँख की नमी है क्या कह रहे हो? अभी आँखें नम होती हैं! किसकी? अच्छा, उनकी? फिर ठीक है उनकी आँख पत्थर की है शायद इसीलिए नम हो जाते होगी .............................................
Dec 29 2009 11:45 AM
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आदमी, तरक्की और जिंदगी.

कविता नहीं आपको सच्ची घटना सुनाता हूँ. किस्सा नहीं आपको ये हकीकत बताता हूँ. कल सरे-बाज़ार जिंदगी से मुलाकात हुई थी. बेचारी....... पूरी तरह से लुटी-टूटी हुई थी. शरीर पर लिए घूम रही गहरे घाव थी, तेज़ धूप - पसीने से तरबतर-- ढूंढ़ती फ़िर रही वो एक छाँव थी.
Dec 29 2009 11:45 AM
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तुम ऐसा लिखना जो सबकी समझ में आए

तुम ऐसा लिखना जो सबकी समझ में आए. -लेकिन मैं लिख नहीं सकता. -तुम बोल तो सकते हो न? -मैं बोलने की कोशिश की थी. लेकिन आवाज़ पेट से निकली. -मुन्नू कह रहा था कि सबकुछ पापी पेट की वजह से है. -पापी तो आंतें होती हैं. पेट तो बिल्कुल सीधा होता है. -वो देखो तु
Dec 29 2009 11:45 AM
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पेश है लाइव मुशायरे.

एक तो बालकिशन ने सबको शायर बना दिया और सब है की उसी के पीछे पड़े है. बहुत नाइंसाफी हो रही है ये. बालकिशन ने क्या कहा और क्या नही कहा वो बाद की बात है पर मुशायरों की बाढ़ आ गई है ब्लाग जगत मे. खैर आप सब को क्या आप तो इन मुशायरे का आनंद उठाइए. ये मुशायर
Dec 29 2009 11:45 AM
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चिरकुटई पर प्रीमियम

प्रस्तुत है जयराम 'आरोही' की बिलकुल नई कविता चिरकुटई पर प्रीमियम. आप कविता पढिये. .......................................................... चिरकुट ऐक्ट्रेस चिरकुट ऐक्टर चिरकुट ऐक्ट्रेस की माँ चिरकुट म्यूजिक डायरेक्टर चिरकुट कांसेप्ट चिरकुट इफेक्ट चि
Oct 14 2009 07:41 PM
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श्री जयराम 'आरोही' की एक कविता "दुःख-सागर"

प्रस्तुत है श्री जयराम 'आरोही' की एक कविता "दुःख-सागर". आप कविता बांचिये.कैसे बारिश लताडती हैसिकुड़े हुए पीले पत्तों को कागज़ की नावों को सड़े हुए गत्तों कोझारखंडी झुरमुटों का लतियाया जानासंवार पायेगा जंगलों को? खिसियाई बिल्ली रोक पाएगी चूहों के दंगलों
Sep 16 2009 04:22 PM
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ओसोलन मोशावा के काव्य संग्रह 'मिराज एंड वाटर' से एक कविता

समय का इतना अभाव है कि ब्लॉग लिखने तक की फुर्सत नहीं है. काम से फुर्सत निकालता भी हूँ तो बीमार होने के लिए. बीच-बीच में मन खिन्न हो जाता है. मित्रों का ब्लॉग न पढता तो शायद बीमारी बनी रहती. काम करने की फुर्सत नहीं देती. ब्लॉग के अलावा साथी हैं, कुछ क
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आशा थी कि अब गड्डी बिकेगी.....

सरकार ने लिक्विडिटी को बढ़ावा देते हुए व्याज दरों में गिरावट की. आशा थी कि अब गड्डी बिकेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बिकी तो लेकिन गड्डी नही बल्कि.....
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स्साले सारी मोमबत्तियां खरीद ले गए..........

लोडशेडिंग हो गई. दूकान पर कैंडल नहीं मिली. स्साले सारी मोमबत्तियां खरीद ले गए. कह रहे थे आतंकवाद से जंग लडेंगे. आतंकवाद से जंग! माय फुट.
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आख़िर एक इंसान हूँ मैं

इथियोपिया के विख्यात कवि ओसोलन मोसावा की कविता . रेत की नदी में चलते-चलते दुखने लगे हैं पाँव दूर है गाँव कहाँ से लायें ऐसी नज़र जो दिखाए एक पेड़ बिना पत्तों वाला ही सही कहाँ से लायें ऐसे कान जो सुनाएं एक गीत बिना भाव वाला ही सही कहाँ से लायें एक जुबान
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हिंडोला

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पुनीत पावन पर्व की पवित्र परम्परा का पालन करते हुए आपके समक्ष मेरे द्वारा सजाया गया हिंडोला (झांकी) प्रस्तुत कर रहा हूँ. प्रथम पूज्य श्री गणेश की जय जय बजरंगी जय हनुमान बम-बम भोले. जय शिव शंकर सबका मालिक एक है यशोदा का नन्द ल
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छुटके से ब्लागर रे....... तेरा दरद ना जाने कोय

ब्लोगर मीट ख़तम होने के बाद पता चलता है कि ब्लोगर मीट हो गयी। मेरी यह बात हाल ही में कोलकाता हुई मीट के सन्दर्भ में है. प्रत्यक्षा जी के साथ मुलाकात करने के बाद शिव ने फ़ोन करके बताया कि इस तरह की ब्लोगर मीट हुई है. उलाहना देने के अलावा और क्या कर सक
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प्रेमचंद के फटे जूते

आज परसाई जी की पुण्य तिथि है. उनको श्रद्धांजलि देते हुए उनके द्वरा लिखा ये व्यंग्य प्रस्तुत कर रहा हूँ. आप इसे पढ़े. परसाई जी और उनकी रचनाओं के बारे में और अधिक जानने के लिए आप यंहा , यंहा और यंहा जरुर पढ़े. प्रेमचंद के फटे जूते ============= प्रेमचंद
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समीर भाई क्या ये आपके बचपन की तस्वीर है ?

इस पोस्ट को लिखने की प्रेरणा ख़बरदार! नक़ल ना कहें यंहा से मिली है। मुझे मिला है ताज - साल के सर्वश्रेष्ठ ब्लागेर का, बधाई दीजिये। आज माफ़ कर दीजिये कमेन्ट नहीं कर पाऊंगा बहुत काम है। बोलो बोलो टिपण्णी करोगे या नहीं? आज किस बिषय पर लिखूँ बड़ी चिंता क
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मुझे मत जलाओ!

दो बड़ी दर्दनाक और दुखद घटनाएँ घटी थी इस देश में एक नीलम हत्या काण्ड. नीलम एक घर की बहु थी और उसे उसके ससुराल वालों ने दहेज़ की लिए जला कर मारदिया था. दूसरी रूप कँवर हत्या काण्ड. शायद इसी से कुछ मिलती जुलती. नतीजा सिर्फ़ एक ही - स्त्री को जला दिया गया
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खोज

पूरा जुलाई कविता करते हुए ही बीत गया. आपलोगों ने जिस प्यार और अपनेपन से हौसलाफजाई की उसकेलिए जितने भी धन्यवाद दूँ कम है. इसी प्यार और अपनेपन के कारण ही एक और कविता पेश कर रहा हूँ. आशा ही नहीं पूर्ण विश्वाश है कि इस कविता को भी आपसबका वो ही प्यार मिले
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बालकिशन की डायरी भाग-१ सन १९८८

आज यूँही एक काफ़ी पुरानी डायरी पढ़ते हुए इन दो कविताओं पर नज़र टिक गई और फ़िर कई बार पढ़ डाला. अहसास ये हुआ कि ये कवितायें आज भी कितनी प्रासंगिक है. आप भी पढ़ें. १ ये क्या हो रहा है अपने वतन में हिंसा का बाज़ार गर्म है जाने किसका भय छाया है जन में सच पर
Jul 30 2008 12:48 PM
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या फिर यहाँ केवल तुम्हारा शरीर रहता है?

वे बता रहे थे कि तुम्हें नौकरी नहीं मिली इसलिए तुम आतंकवादी बन गए लेकिन एक बात मेरी भी सुनो उन्हें भी तो नौकरी नहीं मिली थी जिन्हें तुमने मार डाला तुम नहीं देख सके? कि उन्हें भी नौकरी नहीं मिली थी इसीलिए तो वे फल का ठेला लगाये खड़े थे पचास रूपये कमाते
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एक आहट रोज आए

आहट की आवाज़ सुनी जैसे कह कह रहा हो मैं आ गया हूँ आ गया हूँ तुम्हें डराने तुम्हें एहसास दिलाने कि तुम अकेले नहीं हो अकेले नहीं हो तुम मैं भी तो हूँ बस, आया था यही बताने हाँ, आहट ही तो है एक आहट सुख की और एक आहट दुःख की एक उसके उसके आने की और एक उसके ज
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लगता है जैसे उम्र बढ़ती जा रही है

कल सबेरे एक कविता लिख दी थी मैंने तुम्हारी लिपस्टिक से उसे लिखकर दीवार पर चिपका दिया था धूल से सनी दीवार ने कागज़ को गन्दा कर दिया लेकिन मुझे चिंता उस कागज़ की नहीं मुझे चिंता थी उन शब्दों की जो मैंने तुम्हारी लिपस्टिक से लिक्खे थे मुझे चिंता थी लिपस्ट
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अंतरात्मा की आवाज़

मैंने कहा "एक रोटी और नहीं खा सकूंगा" वे बोलीं "अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनो और खा लो" मैंने कहा "खाना तो पेट की आवाज़ पर निर्भर है" वे बोलीं "लेकिन वहां तो सब अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर खा रहे हैं मैंने कहा "उनकी अंतरात्मा पेट में बसती होगी वे बोलीं "का
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अनामिका जी की कविता - चुटपुटिया बटन

मेरा भाई मुझे समझाकर कहता था - "जानती है पूनम -तारे हैं चुटपुटिया बटनरात के अंगरखे में टंके हुए!"मेरी तरफ़ 'प्रेस' बटन को चुटपुटिया बटन कहा जाता था,क्योंकि 'चुट' से केवल एक बार 'पुट' बजकरएक-दूसरे में समां जाते थे वे.वे तभी तक होते थे काम केजब तक उनका
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पुकारो मैराडोना को....

बहुत दिनों से महान अंतर्राष्ट्रीय कवियों की एक भी कविता पोस्ट नहीं की. आज इच्छा हुई कि एक कविता किसी महान कवि की पेश करूं. मेरी कवितायें पढ़कर आप सब ने जिस साहस और धैर्य का परिचय दिया है, उसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ.ये कविता क्यूबा के महान कवि उज
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रोज पूछता है मेरा बच्चा ये सवाल मुझको

फ़िर वही किस्से मंदिरों-मस्जिद के हवाओं में हैलगता है ये पुराना सा साल मुझकोखामोश जबां के ही सर बचते हैं यंहा सर कटने से पहलेना जाने क्यूं ना आया ये ख्याल मुझकोआज फ़िर खली हाथ चले आए आज फ़िर मेरा खिलौना नही लायेरोज पूछता है मेरा बच्चा ये सवाल मुझको.ना ड
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जावेद अख्तर साहब की कलम से - १

कौन सा शे'र सुनाऊं मैं तुम्हे, सोचता हूँनया मुब्हम है बहुत और पुराना मुश्किल (उलझा हुआ)================================== ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गयाकुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए==================================हमको उठना तो मुह
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तुमको क्या मालुम.

दुश्मन तो खुले-आम करते है दुश्मनी की बातेंदोस्त मगर कब क्या कर गुजरे तुमको क्या मालूम.अगर पोंछने वाला कोई हो साथी तोआंसुओं का मज़ा क्या है तुमको क्या मालूम.अरे नादान सूरज चाँद सितारों की बातें करता हैआसमान मे कब बादल छा जाय तुमको क्या मालूम.गैरों पे क