नोस्टेल्जिया भी विस्थापित होता है ....वो हमसे दो साल बड़ा था ..जब हम दसवी में थे वो ग्यारहवी में ....मेथ्स की .ट्रिगनोमेट्री अबूझ पहेली थी ..कुछ कुछ डरावनी भी ...उसने डर निकाला ..." बोर्ड के मेथ्स के एक्जाम में …....हौसला देने …सुबह वो अपनी साइकिल से
उम्र तकरीबन एक साल.. गोरा रंग ...घुंघराले लम्बे बाल ..एक हाथ में काले मोतियों से बना कड़ा ...बात करती आँखे ...जिनका स्केलेरा बिलकुल व्हाईट है...दुनियादारी से. .नॉन पोल्यूटिड ... अभी अपने छह साला भाई पर जमी है ....जो बेमन से बस्ते को पीठ पर टांग रहा
कहते है दोनों जुड़वाँ है ..अक्सर साथ चलती है .....मसरूफियत की आमद अगर है तो बेख्याली का आना भी तय है ...कहने वाले बेख्याली को "छोटी "कहती है .शायद इसलिए थोडा बागी मिजाज है .कभी कभी बेवजह ..बिना इत्तिला किये दरवाजे पर सुबह से दरवाजे पर आ बैठती है.....कुछ
स्टोर भी बड़ी अजीब शै है .... ....सजायाफ्ता मुजरिम सा अलहदा किसी कोने में खामोश खड़ा रहता है ..... भीतर कई अफ़साने छिपाये..... .हर सामान जैसे एक रिश्ते का नाम लिए बैठा है.....यूं भी जो चीज ढूँढने जाओ वो मिलती नहीं ... उधर कुछ गिरा है ..... बायो केमिस्ट्री
पैर के नीचे तकिये को ठीक करके मैने उचककर उस खिड़की से नीचे झाँकने की कोशिश की है .....एक पतंग कटकर गिरी है ....बड़ी वाली.गिलासटा ..दो मिनट हो गए है कोई लेने नहीं आया ....पिछले दस दिन से वही खिड़की मेरी बाहरी दुनिया है ... प्लास्टर के नीचे खुजली बहुत लगती
चिरकुट" दरअसल हमारे देश की एक नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है ...हम इसके अविष्कारक को रोज मन ही मन सैल्यूट ठोक देते है ..कितना आसान है न गला फाड़ कर चिल्लाकर कहना ..."अबे चिरकुट"....कोई बुरा मानने से पहले पडोसी से पूछेगा "चिरकुट माने "?
कल रात हम उंघियाये
कैसे रहते है लोग यहाँ "?....एक्सामिन टेबल पर लेटी सेक्स वोर्केर को एक्सामिन ...करते -करते ...मेरी कुलिग़ ने अंग्रेजी मे मुझसे कहा था ...."सेक्स वर्कर ".....सभ्य समाज की डिक्शनरी बदल रही है ..सूरत के रेड लाइट एरिया की उस बस्ती मे दो कमरों को फेरबदल करके
धूप पिछले दो दिनों से छुट्टी पे है ..परिंदे भी....सर्दियों का आफती धुंया नीचे उतर कर उंघती स्ट्रीट लाइटों को दिन की शिफ्टों में काम करा रहा है . ... ... हर आधे घंटे में अब भी कोई एस. एम् एस नए साल की बाबत इन-बॉक्स में दाखिल होता है ... मन करता है ..कोने
बॉम्बे एयरपोर्ट में घुसने के बाद आगे समय काटने की बाबत मै एक अख़बार उठाकर दाम पूछता हूं तो स्टाल वाला मुस्कराकर बतलाता है .कम्प्लीमेंटरी है .....शुरूआती एडिशन है ... .कोने पे एक महिला खड़ी है कुछ परेशान सी ..उम्र पचास के नजदीक .स्थूलकाय शरीर .ट्रोली
शुक्रवार .....रात नौ बजे ....
वे हमेशा की तरह किताबो में धंसे हुए है ...अपने चश्मे को ठीक करके मुझे देख मुस्कराते है ... वे पिता के उन मित्रो में से है जो मुझे बेहद पसंद हूँ...उसका एक कारण उनकी लाइब्रेरी का कलेक्शन भी है ..यूँ भी जब आप बचपन ओर
हमारे घर के ठीक सामने रहने वाले प्रोफेसर साहब कहा करते थे ...आज के ज़माने में पैसा उड़ रहा है .बस उसे पकड़ने की तरकीब आनी चाहिए .....हर आदमी ने अपनी अपनी तरकीब निकाल रखी है ..रोज नयी नयी निकल रही है ...जिंदगी इसी तरकीब में गुजर रही है... आपकी जिंदगी का कुल
सुबह की नींद ..में दो बार बजे अलार्म के बाद जब कोई आवाज देकर आपको उठाता है ओर आप तकिये से लिपट कर कहते है "बस पॉँच मिनट ओर " हाय वो पांच मिनट .....कितने जालिम होते है .....के उन पांच मिनटों के बाद निगोडी दुनिया में फिर एंट्री होनी ही है . एक
बारिश की
औसत आदमी के लिए यह सोच लेने से बड़ा ढाढस ओर कुछ नहीं है के सचाई की हमेशा जीत होती है -कर्टसी नैतिक शिक्षा ....यारो ने कहा है के लोभ भी एक कंटाजीयस बीमारी है ...जिसका डी एन ए हर साल म्युटेट करता है ..
इधर डिप्रेस होने के कई कारण. है ....सबसे बड़ा कौडा
फारुख हमारी सूमो का ड्राइवर है .जो जो पिछले चार दिनों से हमारे साथ . है.... अपनी सुबह की शुरुआत वो दूसरे ड्राइवरो की माफिक किसी भज़न या सूफी संगीत से से नहीं करता है .."कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है "से करता है ..आज .उसके साथ उसका बेटा भी है ...दस
इधर हमें साइंस से कुछ ज्यादा ही उम्मीदे लगने लगी है ...जब भी हम अपने एक पुराने दोस्त को फोन मिलाते है ...उधर से कुछ अजीब सी आवाजे सुनाई देती है ...कुछ खा रहे हो....हम संशकित होकर पूछते है ......
क्या ?
समोसा ...
अकेले ?
नहीं ब्रेड में दबाकर .....
हमे
आज उसका जन्मदिन है …इत्तेफाक से देहली में ही हूं...विश करने के लिए कॉल करता हूं तो मालूम चलता है वो …. घर में है …एक्सीडेंट हुआ है …
सब ठीक तो है …ना ….मै बेवकूफी भरा सवाल पूछता हूं ….
हाँ सब ठीक ही होगा …बिस्तर में जो हूं ….वो हंसती है ..एक आध फ्रेक
उन दिनों सपने बहुत छोटे होते थे यूं कहिये बलिश्त भर के ..ओर लगभग एक जैसे ..ट्विन्स .का भ्रम देते ...पर गुजरे वक़्त के साथ एक बात हमने जानी है की लड़कियों में कुछ हुनर शायद पैदाईशी होते है . मसलन वे किताबे कापियों पे साफ सुथरे कवर चढा कर रखती है ..उनपे
देर रात .....आसमान में उन पहाडियों के ऊपर....
वादियों के तारे .....
जब जमा होते है दिन भर की दास्तां बांटने को....
नीचे ........
एक खाली तम्बू की ओर इशारा करके कोई एक कहता है "लगता है मेरे वाले को आज गोली लगी है "! आर्मी के खुले ट्रक जब फौजियों से लदे