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कतेक रास बात

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02 Apr 2010
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स्टेशन पर’क हरियर दुबि आ लाल गुलमोहर

लेखक-आदि यायावर (१)रेखा केँ नइँ जानि किएक मोन भऽ गेलनि जे स्टेशन पर जा केँ कनि काल’क लेल बैसल जाए. किछुए दिन’क गप्प अछि फेर तेँ ओ एहि स्टेशन केँ छोड़ि के चलि जेतीह, आ तकर बाद फेर सँ एतय एबाक कोनो प्रयोजन नहिँ. पछिला तीन साल ओ कोन तरहेँ काटने छलीह से वैह
 
आदि यायावर
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छोट लोक - सुभाष चंद्र

छोट लोक धरती पर जन्मैत छैथदूबि जकाँ बढ़ैत छथिपयर सँ दबाओल जाइत छैथआ कोनो चर्च के मारल जाइत छैथ !पैघ लोक आकाश मे जन्मैत छैथआकाशे मे रहैत छैथजमीन की होइछओ नहि जनैत छैथ !बाचल, मध्यमजे नहि कर्ता आ नहि पाचकदूनू अधिकार सँ तिरोहितओ उगैत छैथ,बढ़ैत छैथ लत्ती जकाँ
 
करण समस्तीपुरी
टैग: कविता
Mar 09 2010 06:19 PM
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नव पोथी : भोथर पेन्सिल सँ लिखल

-- करण समस्तीपुरी "बारह गोट कथाक सँग्रह, जे आधुनिक मैथिलक जीवन सँघर्ष केँ प्रदर्षित करैत अछि. प्रत्येक कथा शहरक भागम-भाग सँ निकलैत अछि आ गामक कोनो कोनटी मे जा केँ खत्म होइत अछि। वा नहिँ तऽ गाम’क कोनो घर’क ड्योढ़ी सँ निकलि आधूनिक भारत’क कोनो मेट्रोपोलिटन
 
करण समस्तीपुरी
Feb 01 2010 04:31 PM
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बदलत कोना? -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'

लोक मरैत रहत सदैव, आतंकवादीक गोली सँ।जनता ठकाइत रहत सदैव, क्रूर राजनेताक बोली सँ।गरीब तंग रहत सदैव, पेटक किलकिलाइत भूख सँ।कवि- श्री रूपेश कुमार झा 'त्योंथ', सम्पर्क- +91-9239415921स्त्री दबायल रहत सदैव, पुरुखक चमचमाइत बूट सँ।सवर्ण डेराइत रहत सदैव, डोमक
 
सम्पादक: कतेक रास बात
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बुद्धि नहिए- संतोष कुमार मिश्र

- श्री संतोष कुमार मिश्रएक बेर यादब लोभ लालच मेकरबौलक बजेट निकासाअपन जेबी नीक सँ भरलकतोरलक मैथिलक आशाकहै हम मैथिल छी। कवि- श्री संतोष कुमार मिश्र। जनकपुर (नेपाल) निवासी श्री संतोष कुमार मिश्र जी काठमाण्डू (नेपाल) मे एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे अधिकारी
 
सम्पादक: कतेक रास बात
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ई चिठ्ठी हुनकर नाम

प्रिय संजू!आइ नञि जानि किएक, अहाँ के चिठ्ठी लिखबाक मोन भऽ रहल अछि। ओना तऽ एहि सँ पहिनेहो कतोक चिठ्ठी लिखने छलहु, मुदा ई चिठ्ठी आन सब चिठ्ठी सँ भिन्न अछि। एहि चिठ्ठी के जखन अहां पढ़ैत रहब, तावेत धरि हम दूर ... बहुत दूर, क्षितिजक ओहि पार जा चुकल रहब। एही
 
सम्पादक: कतेक रास बात
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अनचिन्हार सन अपन (कथा)- सुभाष चन्द्र

आई संजूक दुरागमन छैक। आईसऽ करीब एक बरिसक पूर्वक गप्प अछि। पोड़का साल बैसाख मे ओकर वियाह भेल रहैक। वियाह मे कतै खुशी रहै, संजूक मोन खुशी सऽ आह्लादित रहैक। विवाह सँ पहिनहि ओ अपन मन-मंदिर मे कतेक सुन्नर वरक कल्पना कयने छल? वियाहक नाम सुनितै ओकर मन रोमांचित
 
सम्पादक: कतेक रास बात
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गरिमा आओर पलास

कथा, भाग-१: लेखक एवम मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी) गरिमा एखन ऑफिस सँ अएले छलीह. चाह’क केतली गैस पर चढा क' वर्षा मे भीजल केश के सुखाबए लागलीह. फेर चाह आ रेडियो ल'क' बालकनी मे आबि गेली. आल इंडिया रेडियो पर 'बरखा बहार आयी रस की फुहार आयी ' बाजि रहल छ
 
सम्पादक: कतेक रास बात
Dec 29 2009 11:41 AM
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कतेक रास बात !!

बहुत दिन स हम अहि ब्लॉगक एक गोट निश्क्रिय सदस्य बन गेल छलहू | कारण एक ता समयक अभाव छल, दोसर किछू नव लिखबाक इच्छा हर बेर कलम थमा जाई छल| आई बहुत दिनक बाद कीछ समय भेटल ता अपने सभक समक्ष एक गोट प्रेम गीत प्रस्तुत कॅ रहल छी| " इज़ोरिया राति में चंद्रमाक
Dec 29 2009 11:41 AM
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उठू मैथिल भेलै भोर- विनित ठाकुर

जय जय मैथिल जय मिथिला हर–हर गङ्गे जय कमला कवि- श्री विनित ठाकुर जन्म- 01 मार्च, 1976 ई. शिक्षा: बी. एड. प्रकाशित कृति: बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज सम्प्रति: शिक्षक (प्रगति आदर्श ई. स्कूल, लगनखेल, ललितपूर, नेपाल) स्थायी पता: मिथिलेश्वर मौवाही–६, धनुषा, ने
 
सम्पादक: कतेक रास बात
Dec 29 2009 11:41 AM
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जिनगी कोना भेंटत ?

दुख:क ठोर पर हंसी कोना भेंटत ? जेकरा भाग्ये में अछि दुःख, ओकरा ख़ुशी कोना भेंटत ?? जे नहि बेचलक अप्पन आत्मा कें, ओकरा नौकरी कोना भेंटत ?? गामो कए रहल अछि शहरक देकसी, आब कतहु सादगी कोना भेंटत ? चान पर बढि रहल अछि प्रदुषण, भला कहू ! चांदनी कोना भेंटत ?
 
सम्पादक: कतेक रास बात
Dec 29 2009 11:41 AM
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गोली-बन्दूक थोडे बुझैत छैक

करण समस्तीपुरी "छौंरी पतरकी गे........ गोरिया खेतबा के आरी.... काहे मारे गजब पिहकारी.... !!" गोर दक-दक भरल-पुरल शरीर, माथ पर जटा, हाथ मे डिबिया लेने आ तोतर आवाज मे इएह गीत के तान छोडैत घर से बथान पर जाएत जटा झा के प्रति पता नहि कोना हमरा मोन मे लगाव
 
सम्पादक: कतेक रास बात
Dec 29 2009 11:41 AM
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रस्ता

श्री सतीश चन्द्र झा आदमी विचार सँ पैघ होइत छै वैभव आ अभिमान सँ नहि जनैत छी विचारक फुनगी पर लेखक- श्री सतीश चन्द्र झा , म.न. 119, क्रॉस रोड, संत नगर बुराड़ी, दिल्ली- 110084 सम्पर्क- 9810231588 आदमीक प्रवृति टाँगल रहैत अछि आ ओकर प्रारब्ध कर्मक गति तकैत
 
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मध्य वर्गक सपना

श्री सतीश चन्द्र झा भीजि क’ आयल छलहुँ हम आँखि मे किछु स्वप्न धेने। मोन के पौती मे भरि क’ स्नेह के संदेश रखने। किछु कहब हम बात अप्पन किछु अहाँ सँ आइ पूछब। फेर हम निष्प्राण भ’ क’ बाँहि मे विश्राम खोजब। कवि- श्री सतीश चन्द्र झा , व्याख्याता, दर्शन शास्त
 
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नांगट जमाय

श्रीमती कामिनी कामायनी हकासल पियासल लाल काकी दौडल अयलहि। भट-भट आँखि सँ नोर खसैत, "यै बहिन... कनि चलथुन्ह है... ओझा मौहक नहि करैत छथिन्ह", नूआक खूट सँ आँखि पोछैत बजलीह। त' बहिन आने की पुरैनिया वाली काकी तुरते पएर मे चप्पल पहिर संग धेलिह। काजक आंगन...
 
सम्पादक: कतेक रास बात
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शरद ऋतु- अमित अभिनन्दन

अमित अभिनन्दन शरद ऋतु अछि आयल सुन्दर गाछक शाख रंग बिरंगक फूल खिलल अछि पोखरिक काते कात खूब लाल अछि फूल बैजयंती पीयर अछि कनेल बेला जूही चंपा सभ सं राह आच्छादित भेल कवि- अमित अभिनन्दन , झंझारपुर प्रखण्डक बलियारि ग्रामक निवासी 24 वर्षीय अमितजी पेशा सँ चि
 
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अबोध सपना- श्री सतीश चन्द्र झा

श्री सतीश चन्द्र झा जीवन केर विस्तृत नील पटल बादल बनि किछु हमहूँ लिखितौं। उगितै जौं चान अमावसक अपने अँगना हमहूँ नचितौं । छल उमर अबोधक कतेक नीक , संघर्ष कतहु, नहि कतहु द्वेष सागर सन सौंसे पथ विशाल जा सकी जतय, नहि कतहु शेष। कवि- श्री सतीश चन्द्र झा , व
 
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ब्रह्माक चिंता

रूपेश कुमार झा 'त्योंथ' ब्रह्माक चिंता ब्रह्मा कयलनि अनुपम श्रृष्टि, श्रम सं ओ रचलनि इंसान। बुद्धि संग द' बल-विवेक, फुंकलनि ओहि मे ओ स्वर्णिम जान। तइयो हुनका नहि भेटलनि तृप्ति, द' देलनि मनुज कें असीमित ज्ञान। भेजलनि जखन धरती पर ओकरा, छल ने जीव कोनो ओ
 
आदि यायावर
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फुरसत- सुभाष चन्द्र

मकरा जाल बुनैत अछि फुरसत मे ओ करैत अछि निढाल फुरसत मे कथी लेल पूछैत छथि वो हमरा सँ एहन-ओहन सवाल फुरसत मे कवि- सुभाष चन्द्र. सम्पादक, " कतेक रास बात " लोक नीक जकां देख लिअ हमरा अपना कें घर सँ निकालि फुरसत मे लूटि लिअए हमर परछाईं हमरा नहि त रहि जायत कच
 
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बुढ़’क अर्थशास्त्र (खट्टर काका)

लेखक: खट्टर काका भातिज लोकनि; हमरा बुझल अछि जे हमर फोटो देखि अहाँ लोकनि अपन आँखि भौँह सरियाबे लागल होयब. अधिकाँश लोकनि’क मुँह सँ बिनु प्रयासे के मुस्की छुटि रहल होयत. मुदा हम अपने लोकनिक मुस्की’क कारण जानए चाहैत छी. आई धरि कहियो एहेन भेल अछि जे हम अह
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दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाडी़

दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी कवि- श्री हरिश्चन्द्र झा दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी, पारे कोना उतरतै चिन्तें शरीर कारी । धारा विलोकि विह्वल सुत वृन्द मातृ नोरक वलिदान केरि वेदी, चढ़िगेल पुत्र कोरक। प्रलयोक ज्वाल सहि कए दए गेल रत्न भा
 
आदि यायावर
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गरिमा आ पलास (भाग-४)

कथा, भाग-4: लेखक:- आदि यायावर, मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी) एखन धरि पढ़लौंह, "बचपन से तरुनाई धरि संग चलनिहार गरिमा आ पलासक सतत प्रेम, तमाम वर्चस्व आ विषमताक कात करैत जीवन पथ मे दुन्नु लोकनिक संग आनि देल्कैन्ह! फेर अहम् आ स्वाभिमानक द्वंद, दाम्पत्
 
आदि यायावर
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घिढारी के मंत्र

आदरणीय पाठक गण,किछु सामयिक व्यस्तता आ किछु तकनिकी अव्यवास्थाक कारणहम अहाँ लोकनिक "गरिमा आ पलास" कें अगिला भाग ससमय नहि उपलब्ध करएबा हेतुक्षमा-प्रार्थी छी. हम शीघ्रे कथाक अगिला भाग सँ अपने लोकनिक रु-बा-रु करएबाक वचनके साथ विजय दशमी पर अपने लोकनिक मनोरंजन
 
सम्पादक: कतेक रास बात
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गरिमा आओर पलास

कथा, भाग-3: लेखक:- सुभाष चन्द्र, मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)एखन धरि पढ़लौंह, "बचपन से तरुनाई धरि संग चलनिहार गरिमा आ पलासक सतत प्रेम, तमाम वर्चस्व आ विषमताक कात करैत जीवन पथ मे दुन्नु लोकनिक संग आनि देल्कैन्ह! फेर अहम् आ स्वाभिमानक द्वंद, दाम्पत्य
 
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गरिमा आओर पलास

कथा, भाग-2: लेखक:- राजीव रंजन लाल, मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)करण समस्तीपुरी द्वारा लिखल पहिल भाग मे पढ़लौंह, "बचपन से तरुनाई धरि संग चलनिहार गरिमा आ पलासक सतत प्रेम, तमाम वर्चस्व आ विषमताक कात करैत जीवन पथ मे दुन्नु लोकनिक संग आनि देल्कैन्ह. मुदा
 
सम्पादक: कतेक रास बात
टैग: maithili
Sep 11 2009 10:56 PM
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एना कते दिन (कथा) - सतीश चन्द्र झा

- श्री सतीश चन्द्र झास्वच्छ आ निर्मल आँखिमे जेना नोर झिलमिलाए लगैत छैक अथवा ओसक बुन्न फूल पर चमकऽ लगैत छै, तहिना ओकर ठोरो पर मुस्की नुका नञि सकैत छलैक। कखनहु कोनो बात हो कोनो प्रसंग हो ओकर मुस्की सुहागिनक लाल-लाल सिन्दुर सँभरल सोउँथ जकाँ हरदम चमकैत रहैत
 
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खस्सी आ चिकबा (लघुकथा) - सुभाष चंद्र

एकटा छागर छल, जकरा शुरूए सँ चिकबा पोसि रहल छल। खूब नीक जेकां रहैत छल छागर। चिकबा खूब ध्यान दैत छलै ओहि छागर पर। चिंतित रहैत छल छागरक प्रति। छागर कतओ इम्हर-ओम्हर नहि चलि जाय , कतओ रस्ता नहि बिसारि जाय, कतओ भुलता नहि जाय। हरियर-हरियर घास, कटहरक हरियर पात,
 
सम्पादक: कतेक रास बात
Jul 24 2009 07:38 PM
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एहि शहर मे- सुभाष चन्द्र

एहि शहर मे इजोरिया राति मे एकसरि बैसला पर मोन पड़ैत अछि अपन गाम आन गामक चभच्चा पोखरि प्राय: हमर नेनपनक कोनो संगी एहि इजोरिया मे नाओ पर घूमैत होयत कवि- श्री सुभाष चन्द्र , युवा पत्रकार सुभाष जी पत्रकारिताक संग हिन्दी आ मैथिली दुहू साहित्य मे सक्रिय छथ
 
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गिलू और उसका दोस्त

एक जंगल के किनारे वाले हिस्स्से में एकरहती थी। उस गिलहरी का नाम चिंटू था। चिंटू एक दिन गूमते हुए जंगल में दूर तक निकल गयी वहाँ उसे एक चितीका बच्चा टिनटिन मिला। दोनों ने एक दूसरे का हाल पूछा और एक दूसरे के साथे खेलने लगी खेलते हुआचीते के बच्चे से टिनट
 
विजय ठाकुर
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नव बरखक बहाने- कुन्दन कुमार मल्लिक

इ की भेल, अनचोँकहि मे नीन टूटल बाहर पट्टखाक शोर छल करैत लोक अनघोल छल तखन बुझना मे आयल इ त’ स्वागत करैत नव बरखक बोल छल केओ नव वसन मे चमकैत केओ मदिरा सँ बहकै त’ केओ सुन्दरी संग नाचैत ओहि मोहल्ला मे एकटा घर एहनो छल जतहि ने कोनो शोर छल नहि कोनो अनघोल छ्ल
 
कुन्दन कुमार मल्लिक
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दू गोट मलयालम कविता

हम लिखि रहल छी बाट पर खसल मोरक ओस पर हम लिखि रहल छी, तोहर नाम मूल कवि- श्री के. सच्चिदानन्दन, मैथिली अनुवाद- श्री सुभाष चन्द्र जेना, पहिनहुँ कोनो कवि लिखने छल नाम- स्वतंत्रता केँ हरेक वस्तु पर। तोहर नाम लिखय लागी त' मिटेनाय कठिन भ' जेतय धरती आ आकाश प
 
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बाढि पर एक कवि- डॉ. गंगेश गुंजन

दु:खे टा चारु कात छै आ जी रहल- ए लोक ताकैत आसरा कोनो दुःख पी रहल- ए लोक ! घर-द्वारि दहि गेलैक सब बच्चा टा छै बांचल रेलवेक कात, बाट-घाट जी रहल- ए लोक ! सांझो भरिक खोराक ने छैक अगिला फसलि धरि जीबा लए ई लाचार कोना जी रहल- ए लोक ! कवि- डॉ. गंगेश गुंजन, 7
 
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दर्पण- श्री सतीश चन्द्र झा

अछि दर्पण टांगल देबाल पर देखि लेब किछु क्षणिक ठहरि क'। करब कर्म जे अपन दिन भरि आयत मुख पर भाव उतरि क' । बनतै नहि प्रतिबिम्ब झूठ के उचित कर्म सँ छिटकत आभा। कवि- श्री सतीश चन्द्र झा , व्याख्याता, दर्शन शास्त्र, मिथिला जनता इंटर कॉलेज, मधुबनी अनुचित करब
 
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दुविधा- श्री संतोष कुमार मिश्र

असगर मे बैसिक' अपनापर बिचारै छलहुँ अप्पन भावना के हेराक' अनुभव के डुबाक' हम बड सोचलहुँ कवि- श्री संतोष कुमार मिश्र । जनकपुर (नेपाल) निवासी श्री संतोष कुमार मिश्र जी काठमाण्डू (नेपाल) मे एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे अधिकारी छथि। मैथिली साहित्य सँ विशेष
 
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कोशीक ताण्डव- प्रो. (डॉ.) अशोक सिंह तोमर

यौ भाय! कहाँ छै न्याय हमरा लेल? कहाँ छै देवी आ देवता? निबर आ दुबर केँ देखनिहार ओकर दुःख आ व्यथा सुननिहार कियो नहि अछि। पचास बरखक बाद कोशीमाय अपन पुरना मार्ग सँ उठैत-बजरैत जल प्रलयक महाताण्डव सँ गामक-गाम विलीन कs देलकैत। कियो नहि बचि सकलैक जे कियो बचल
 
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विस्थापित

कवियत्री- सुश्री कामिनी कमायनी बड्ड दिन भेलए देस कोस सँ दूर, मोन जेना भसिआएल बूढ़ सन हेराए गेलए, किओ ककरो कल्लोल कए कि गाम मोन पड़ल, मुदा कोन गाम ठाम की, कतेको गाम आ शहरि मे भटकैत दिन, एक दिन उदास पुछैत चित सँ, जन सँ कि वित्त सँ, पूर्ण भेल रिक्त की लज्
 
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मिथिला दर्शन

कवि- शिवेश झा "शिव" हकासल छी पियासल छी मिथिला दर्शन के आशल छी! मदारी छी भिखारी छी मिथिला दर्शन लेल पागल छी!! कवि- शिवेश झा "शिव" . मधुबनी जिलाक राघोपुर बलाट गामक निवासी श्री भोला झाक सुपुत्र 21 वर्षीय शिवेश जी दिल्ली सँ मल्टीमीडीयाक अध्ययनक संग मैथिल
 
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भरि माथ सिन्दूर

पाठक लोकनि कृपया एहि कहानी’क कोनो नीक शीर्षक बताओल जाए. एखुनका शीर्षक "चीप" लागि रहल अछि. गार्गी आई समय सँ पहिने उठि गेल छलीह, मुदा भोर’क दैनिक काज एखनो धरि खतम नहि भेल छलन्हि. राति सँ एक्के सोच मे बाझल छलीह. चारि दिन सँ प्रभाकर केँ ओ बस मे देखि रहल
 
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नहि सोभैय’ रँगदारी,

कवि- दयाकान्त मिश्र अहाँ विदेहक छी सन्तान, राखू याज्ञवल्यक शान, नहि बिसरु मन्डन अयाची, वचस्पति विद्यापति केर नाम, गौरव गाथा सँ पूर्ण धरा पर, नहि करु एकरा सँग गद्दारी, नहि सोभैय्य रँगदारी । हमर ज्ञान सँस्कृतिक चर्चा, हई छल जग मे सदिखन, छल शिक्षा’क केन
 
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एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा

कवि-बबुआजी झा "अज्ञात" एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा जतय जाँइ¸ जे करँइ¸ अपन छौ सबल पाँखि उन्मुक्त गगन छौ सुमधुर भाषा¸ प्रकॄति अहिंसक अपन प्रदेश¸ अपन सभ जन छौ मुदा कतहु रहि अर्जित जातिक मान सुरक्षित रखिहेँ सूगा¸ एतबा धरि तॊं करिहेँ सूगा उत्तम पद अधिकाधिक अ
 
सम्पादक: कतेक रास बात