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09 Jun 2010
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पागल प्रेमी

देखो आकाश मेंघना अँधेरा छाया है ।लगता है कोई प्रेमीबादल बन आया है ।इसके मन भावन रूप परधरती मोहित हो जाएगी ।प्रेम की प्यासी अपना आँचल फैलाएगी ।और अमृत की वर्षा मेंआकंठ डूब जाएगी ।ऑंखों में रंग और ओठों पे मधुर गीतआया है ।लगता है कोई प्रेमीबादल बन आया है ।
 
शोभा
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फिर आया फागुन….

फिर आया फागुन….फिर आया फागुनरंगों की बहारतुम भी आजाओये दिल की पुकारटेसू के फूलों नेधरती सजाईअबीर, गुलाल नेचाहत जगाईकोयल की कुहूडसे बार- बारतुम भी आ जाओ…….खिलती नहीं दिल मेंभावों की कलियाँसूनी पड़ी मेरेजीवन की गलियाँतुम बिन ना मौसम मेंआए बहारतुम भी आजाओ…..
 
शोभा
Feb 26 2010 06:41 PM
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प्रेम की ऋतु फिर से आई

प्रेम की ऋतु फिर से आईफिर नयन उन्माद छायाफिर जगी है प्यास कोईफिर से कोई याद आयाफिर खिलीं कलियाँ चमन मेंरूप रस मदमा रहीं----प्रेम की मदिरा की गागरविश्व में ढलका रहीफिर पवन का दूत लेकरप्रेम का पैगाम आया-----टूटी है फिर से समाधिआज इक महादेव कीकाम के तीरों
 
शोभा
Feb 12 2010 06:52 PM
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कमलासना माँ!

माँ!तुम कब तक यूँ हीकमलासना बनीवीणा- वादन करती रहोगी? कभी-कभी अपनेभक्तों की ओरभी तो निहारो देखो--आज तुम्हारे भक्तसर्वाधिक उपेक्षितदीन-हीन जी रहे हैं भोगों के पुजारीमहिमा-मंडित हैंसाहित्य संगीतकला के पुजारीरोटी-रोज़ी कोभटक रहे हैं क्या अपराध है इनका-? बस
 
शोभा
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आवाज़: सुनो कहानी: अकेली - मन्नू भंडारी की कहानी

आवाज़: सुनो कहानी: अकेली - मन्नू भंडारी की कहाणी हिन्दयुग्म अपने पाठकों को प्रसिद्ध कहानियाँ भी सुनवाता है. इसी श्रंखला में सुनिए मन्नू भंडारी की एक कहानी अकेली और बताईये की आपको यह कहानी कैसी लगी .
 
शोभा
Dec 29 2009 11:41 AM
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anubhav

बीत रहा है जीवन पल-पल काल चक्र है घूम रहा आता है जीवन में कोई कोई पीछे छूट रहा सूखी पुष्पों की माला जो विगत वर्ष का हार बनी नए वर्ष के स्वागत में फिर मुसकाती है कली-कली फिर आँखों में नूतन सपने जीवन सुखी बनाने के भूल विगत की असफलताएँ भावी सफल बनाने के
 
शोभा
Dec 29 2009 11:41 AM
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हिन्द-युग्म: 28 दिसम्बर 2008 को हिन्द-युग्म मनाएगा वार्षिकोत्सव (मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव)

हिन्द-युग्म: 28 दिसम्बर 2008 को हिन्द-युग्म मनाएगा वार्षिकोत्सव (मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव)
 
शोभा
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आज दिल में

आज दिल में एक हूक सी उठ रही है। आँखों में अंगारे हैं। समझ नहीं आता किसको दोष दूँ? आतंकवादियों को, नेताओं को या देश की भोली जनता को ? या फिर अपनी शासन प्रणाली पर आँसू बहाऊँ ? जहाँ चोर, बेईमान खुले आम जनता को लूटते हैं और जनता कुछ नहीं कर पाती ? आखिर क
 
शोभा
Dec 29 2009 11:41 AM
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चाचा नेहरू

जवाहर लाल नेहरू का अर्थ है- प्रत्यक्ष ऋतुराज,चिर जीवन और आनन्द का पुतला। उन्होने एक शानदार जीवन जिया । सामान्य जीवन नहीं अपितु एक सार्थक जीवन। वे विश्व मानस थे। उन्होने अपनी दुनिया में होरहे शोषण और अन्याय को खत्म करने के लिए अपनी शक्तियों का सद् उपय
 
शोभा
Dec 29 2009 11:41 AM
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दीपावली

दीपावली नाम है प्रकाश का रौशनी का खुशी का उल्लास का दीपावली पर्व है उमंग का प्यार का दीपावली नाम है उपहार का दीवाली पर हम खुशियाँ मनाते हैं दीप जलाते नाचते गाते हैं पर प्रतीकों को भूल जाते हैं ? दीप जला कर अन्धकार भगाते हैं किन्तु दिलों में - नफरत की
 
शोभा
Dec 29 2009 11:41 AM
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त्योहारों का मौसम

लो आगया फिर से त्योहारों का मौसम उनके लूटने का हमारे लुट जाने का मौसम बाजारों में रौशनी चकाचौंध करने लगी है अकिंचनो की पीड़ा फिर बढ़ने लगी है धनी का उत्साह और निर्धन की आह सभी ढ़ूँढ़ रहे हैं खुशियों की राह व्यापारी की आँखों में हज़ारों सपने हैं ग्राहक
 
शोभा
Dec 29 2009 11:41 AM
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जवाहर लाल नेहरू का अर्थ है- प्रत्यक्ष ऋतुराज

जवाहर लाल नेहरू का अर्थ है- प्रत्यक्ष ऋतुराज,चिर जीवन और आनन्द का पुतला। उन्होने एक शानदार जीवन जिया । सामान्य जीवन नहीं अपितु एक सार्थक जीवन। वे विश्व मानस थे। उन्होने अपनी दुनिया में होरहे शोषण और अन्याय को खत्म करने के लिए अपनी शक्तियों का सद् उपय
 
शोभा
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जो चढ़ गए पुण्य-वेदी पर........

प्रिय पाठकों !यह सप्ताह भारत के इतिहास का एक विशिष्ट सप्ताह है। १०० वर्ष पहले इसी सप्ताह इस धरती पर दो महान विभूतियों ने जन्म लिया था। एक क्रान्तिदूत , शहीदे आज़म भगत सिंह और दूसरे राष्ट कवि रामधारी सिंह दिनकर। दोनो ने अपने-अपने दृष्टिकोण से देश को दिशा
 
शोभा
Sep 27 2009 10:00 AM
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हिन्दी से मुलाकात

कल रात स्वप्न मेंमेरी मुलाकात हिन्दीसे हो गई ।डरी,सहमी कातरहिन्दी को देखकरमैं हैरान सी हो गई ।मैंने पूछा -तुम्हारी यह दशा क्यों ?तुम तो राष्ट्र भाषा हो ।देश का स्वाभिमान हो ।हिन्द की पहचान हो ।यह सुनते ही--हिन्दी ने कातर नज़रों सेमेरी ओर देखा ।उसकी दृष्टि
 
शोभा
Sep 14 2009 09:31 AM
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स्वाधीनता दिवस

स्वाधीनता दिवसजश्न,उत्सवदेशभक्ति गीत और भाषणऔर देशभक्ति नदारदशहीदों को श्रद्धांजलिध्वजारोहणइतिहास का गौरव गानबड़े-बड़े वादेबधाइयों का आदान-प्रदानऔर कर्तव्यों की इतिकुछ ही देर बाददेश को लूटने की योजनाएँएकता पर प्रहारवोट की राजनीतिऔर कुटिल अट्टाहसऔर
 
शोभा
Aug 14 2009 09:49 PM
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माँ

माँ" एक प्यारा सा शब्द एक मीठा सा रिश्ता प्रेम उदधि त्याग की मूरत बलिदान रूप ईश्वरीय शक्ति आँचल में समेटे ममता का सागर दो प्यारी सी आँखें ममता से लबालब राहों में बिछी देखती हैं सपने दो कोमल सी बाँहें सदा संरक्षण को आतुर एक सच्चा सम्बल एक शक्ति और एक
 
शोभा
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अंदाज़ अपना-अपना

प्यार की प्यास तो दोनो को थी एक अतृप्त हो भटकता रहा एक ने अपनी मंज़िल पा ली रिश्तों के मरूस्थल दोनो की राहों में थे एक सूखी रेत से टकराता रहा एक ने स्नेह की गागर छलका ली। मर्यादाओं के काँटे दोनो के जीवन में थे एक बबूल बन चुभता रहा एक ने फूलों से डाल स
 
शोभा
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मेरा परिचय

मैं तुम पर आश्रित नहीं स्वयं सिद्धा हूँ तुम्हारे स्नेह को पाकर ना जाने क्यों कमजोर हो जाती हूँ स्वयं को बहुत असहाय पाती हूँ शायद इसलिए तुम्हारे हर स्पर्ष में प्रेम की अनुभूति होती है उस प्रेम को पाकर मैं मालामाल हो जाती हूँ और अपनी उस दौलत पर फूली नह
 
शोभा
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होली के रंग

होली के रंग और तुम्हारी याद दोनो साथ-साथ आ गए…. खिले हुए फूल और… बरसते हुए रंग कसक सी…. जगा गए आती है जब भी टेसू की गन्ध दिल की कली मुरझा सी जाती है रंगों में डूब जाने की चाहत…. बलवती हो जाती है चेतना बावली होकर पुकार लगाती है और शून्य में टकराकर पगल
 
शोभा
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केवल सबला हो

नारी तुम.... केवल सबला हो निमर्म प्रकृति के फन्दों में झूलती कोई अर्गला हो । नारी तुम... केवल सबला हो । विष देकर अमृत बरसाती हाँ ढ़ाँप रही कैसी थाती । विषदन्त पुरूष की निष्ठुरता करूणा के टुकड़े कर जाती विस्मृति में खो जाती ऐसे जैसे भूला सा पगला हो ना
 
शोभा
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मेरी आँखों में

बरस गए हैं मेरी आँखों में हज़ारों सपने महकने लगे हैं टेसू और मन बावला हुआ जाता है सपनों की कलियाँ दिल की हर डाल पर फूट रही है और ये उपवन नन्दन हुआ जाता है समझ नहीं पा रही हूँ ये तुम हो या मौसम जो बरसा है मुझपर फागुन बनकर
 
शोभा
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फिर आया फागुन

फिर आया फागुन…. फिर आया फागुन रंगों की बहार तुम भी आजाओ ये दिल की पुकार टेसू के फूलों ने धरती सजाई अबीर, गुलाल ने चाहत जगाई कोयल की कुहू डसे बार- बार तुम भी आ जाओ… …. खिलती नहीं दिल में भावों की कलियाँ सूनी पड़ी मेरे जीवन की गलियाँ तुम बिन ना मौसम मे
 
शोभा
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फिर नयन उन्माद छाया

प्रेम की ऋतु फिर से आई फिर नयन उन्माद छाया फिर जगी है प्यास कोई फिर से कोई याद आयाफिर खिलीं कलियाँ चमन में रूप रस मदमा रहीं---- प्रेम की मदिरा की गागर विश्व में ढलका रही फिर पवन का दूत लेकर प्रेम का पैगाम आया----- टूटी है फिर से समाधि आज इक महादेव की
 
शोभा
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कौन हो तुम…

कौन हो तुम… बता दो…… मैं जानना चाहती हूँआकर्षण की डोरी क्यों फेंक रहे हो? मैं इसमें बँधती जा रही हूँ बहुत कुलबुला रही हूँ सम्मोहन का जाल क्यों बुन रहे हो? ये मुझे कसता जा रहा है मैं इसमें कसमसा रही हूँप्रेम की मदिरा क्यों बहा रहे हो ये मुझे मदहोश कर
 
शोभा
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anubhav

माँ! तुम कब तक यूँ ही कमलासना बनी वीणा- वादन करती रहोगी? कभी-कभी अपने भक्तों की ओर भी तो निहारो देखो-- आज तुम्हारे भक्त सर्वाधिक उपेक्षित दीन-हीन जी रहे हैं भोगों के पुजारी महिमा-मंडित हैं साहित्य संगीत कला के पुजारी रोटी-रोज़ी को भटक रहे हैं क्या अपर
 
शोभा
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लोकतंत्र

मैं लोकतंत्र हूँ-- भारत का संविधान मेरा ही अनुगमन करता है क्योंकि-- मैं जनता के लिए जनता के द्वारा और जनता का तंत्र हूँ फिर भी-- जन सामान्य यहाँ कुचला जाता है तोहमत मुझपर लगती है मैं जन-जन को अधिकार देता हूँ राष्ट्र निर्माण का अधिकार अपना प्रतिनिधि च
 
शोभा
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२३ जनवरी का दिन...

२३ जनवरी का दिन एक अविस्मरणीय तिथि बन आता है और एक गौरवशाली इतिहास को सम्मुख ले आता है एक विलक्षण व्यक्तित्व अचानक आँखों में प्रकट होजाता है और भारत की तरूणाई को जीवन मूल्य सिखा जाता है। एक अद्भुत और तेजस्वी बालक इतिहास के पन्नों से निकल आता है और टू
 
शोभा
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बच्चन जी की पुन्य तिथि पर

प्रिय पाठकों कल हालावादी कवि हरिवंश राय बच्चन जी की पुन्य तिथि है। उनकी लिखी कुछ पंक्तियाँ मुझे बहुत प्रिय हैं। आप भी इनका रसास्वादन कीजिए- भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला कवि साकी बनकर आया है, भरकर कविता का प्याला। कभी न कणभर खाली होगा लाख
 
शोभा
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शर्मिन्दा हुई हिन्दी

हिन्दी की सेवा करने वाले और उसी की कृपा से विख्यात यशस्वी साहित्यकार को देखने और उनको सुनने को मैं बहुत उत्सुक थी। यह सुअवसर मुझे कल २८ दिसम्बर को हिन्द-युग्म के वार्षिक उत्सव में मिल गया। मैं बहुत उत्साहित थी। मेरा उत्साह कुछ ही देर में क्षीण हो गया
 
शोभा
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घिन आने लगी है 'घोड़ामण्डी' से

लगते थे ... .बहुत अच्छे तुम बातें तुम्हारी ..... सीधे दिल के अंदर नसों में खून ... ..उबलने लगता था कुछ भी करने को आतुर चिलचिलाती धूप में पसीने से लथपथ .. आते थे जब भी .. भटकते हुए मांग कर किसी से 'लिफ्ट' अथवा पैदल ... तुम्हारा भूखा प्यासा पदयात्रा से
 
शोभा