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मेरी छोटी सी दुनिया

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17 Jun 2010
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ब्लाह..ब्लाह..ब्लाह..

"मैं बहुत कम बोलती हूं ना, सो कभी-कभी बहुत दिक्कत हो जाती है.." पिछले दस मिनट से लगातार बोलते रहने के बाद एक लम्बा पॉज देते हुये वो बोली..कुछ दिनों से लग रहा है कि हिंदीभाषी अब धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं मेरी कंपनी में, आज से तीन साल से तुलना करने पर
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एक शहर, मसरूफियत और जिंदगी

अब उसका यहाँ चेन्नई से जाना लगभग तय हो चुका है.. एक तरह का काउंटडाउन चल रहा है.. कल तक जब उसका जाना तय नहीं था तब वह हर दूसरे-तीसरे दिन चेन्नई को कोसती हुई मिलती थी.. और किसी तरह यहाँ से भागने कि इच्छा जताती रहती थी.. दफ्तर में वर्क प्रेसर भी सामान्य से
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जानवरों से अधिक मासूम प्रेम अब हमें मयस्सर कहाँ

वो कई सालों तक हमारे साथ रहा.. हम बच्चों के जिद पर ही उसे घर में लाया गया था.. पटना सिटी के किसी पंछियों के दूकान से पापाजी खरीद कर लाये थे.. उससे पहले भी हमने कई बार कोशिश कि थी तोता पालने कि, मगर हर बार कोई ना कोई जुगत लगाकर सभी रफूचक्कर हो जाते
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क्योंकि जिंदगी से बढ़कर कोई कहानी नहीं होती

इस कहानी का कोई पात्र काल्पनिक नहीं है.. या फिर ये भी कह सकते हैं कि यह कोई कहानी नहीं है.. यह असल जिंदगी कि कड़वी सच्चाई है.. वैसे भी मेरा मानना रहा है कि असल जिंदगी से बढ़कर कोई कहानी नहीं होती है.. यह मेरी एक मित्र कि कहानी है जिससे अचानक कई सालों बाद
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हिंदी ब्लॉगिन्ग को लेकर मेरी समझ

मैं पहले ब्लौगिंग की प्रकृति को समझना जरूरी समझता हूँ फिर हिंदी ब्लॉगिंग की बात करूंगा.. ब्लॉग लिखने वाले सभी व्यक्ति जानते होंगे कि ब्लॉग शब्द "वेब लॉग" को जोड़कर बनाया गया है, और इसमें आप जो चाहे वह लिख सकते हैं.. मैंने सर्वप्रथम किसी ब्लॉग को पढ़ना
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एक गंजेरी की सूक्तियां

एक-गँजेरी डरता है तूफ़ान सेतबजब बची हो सिर्फ एक तीलीऔर चलती होदिलों में आंधियांदो-धुवें में बनती है शक्लें भीबिगड़ती हैं शक्लें भीयह कोई जेट प्लेन का धुवाँ नहींजो सीधी लकीर पे चलेतीन-सिगरेट पीने वाले को गालियाँसिर्फ वही देजिसने नहीं पीया हैप्रदुषण का
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दोस्ती को रीडिफाइन करने का समय

छुटपन में घर के बड़े कभी भी किसी से अधिक दोस्ती बढ़ाने के लिए नहीं कहते थे.. बिहार में उस समय जैसे हालत थे उसमे उनका यह एतराज जायज भी था.. समय बदला, हम बच्चो ने भी अपने आसमान तलाशने शुरू किये, फिर कई दोस्त भी बने.. कुछ समय के साथ चले तो कुछ चले गए.. अब
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माँ से जुडी कुछ बातें पार्ट 1

मैंने मम्मी से बचपन में कभी राजा-रानी या शेर-खरगोश कि कहानी नहीं सुनी.. या शायद कोई भी कहानी नहीं सुनी है.. जब से होश संभाला, मैंने उन्हें डट कर मेहनत करते पाया.. पूरे घर को एक किये रहती थी.. और उस एक करने के चक्कर में हम बच्चे उनसे डरे सहमे रहते थे..
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ओ देश से आने वाले बता - "पैगाम-ए-मुहब्बत"

ओ देश से आने वाले बताकिस हाल में है यार-ए-वतनवो बाग-ए-वतन, फ़िरदौस-ए-वतनक्या अब भी वहां के बागों मेंमस्तानी हवाऐं आती हैंक्या अब भी वहां के पर्वत परघनघोर घटाऐं छाती हैंक्या अब भी वहां की बरखाऐंऐसे ही दिलों को भाती हैंओ देश से आने वाले बता----अख्तर
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मैं कई बार मर चुका हूंगा - पाब्लो नेरूदा

सारी रात मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह कीकुछ गिनते हुए,गायें नहींपौंड नहींफ़्रांक नहीं, डालर नहीं...न, वैसा कुछ भी नहींसारी रात मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह कीकुछ गिनते हुए,कारें नहींबिल्लियाँ नहींमुहब्बतें नहीं...न!रौशनी में मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह कीकुछ गिनते
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समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आईसमाजवाद उनके धीरे-धीरे आईहाथी से आईघोड़ा से आईअँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...नोटवा से आईबोटवा से आईबिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...गाँधी से आईआँधी से आईटुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...काँगरेस से आईजनता से आईझंडा से बदली हो आई,
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दो बजिया बैराग्य पार्ट फोर

मैंने कभी भी पापाजी को गुस्से में चीखते-चिल्लाते नहीं देखा है.. वह भी एक आम इंसान हैं, और किसी और कि तरह गुस्साते भी हैं.. मगर घर में उनके गुस्से को ऊँची आवाज कभी नहीं मिली.. उनका चुप रह जाना ही अपने आप में सब कह जाता था.. जब तक इतनी समझ नहीं आयी थी कि
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ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

कल मैंने एक दफ़े फिर से यह सिनेमा देखी, और इस पुरानी पोस्ट को फिर से ठेल दिया। पहली बार जब मैंने यह लिखा था तब शायद ही कोई मेरे ब्लॉग को पढता था, शायद अबकी कोई पढ़ ले। :)कल मैंने फिर से प्यासा देखी, ये एक ऐसी फ़िल्म है जिसे मैं जितनी बार देखता हूं उतनी
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दो बजिया वैराग्य पार्ट थ्री

कल दीदी का फोन आया, तक़रीबन रात साढ़े दस बजे के आस पास.. अक्सर जब भी फोन करती है तो उसका समय दस से ग्यारह के बीच ही होता है.. बहुत खुश होकर फोन कि थी और सिर्फ एक सूचना देकर एक मिनट से भी कम समय में फोन रख दी.. बोली कि मैंने आखिर अपना इमेल बना ही लिया है
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इंडिया सर ये चीज धुरंधर

किसी ने सच ही कहा है, कि अंग्रेजी में अक्सर अपशब्द डाल्यूट हो जाया करते हैं.. अपनी तीव्रता नहीं बनाये रख पाते हैं.. कुछ ऐसा ही फौलोवर शब्द के साथ भी है.. शब्दकोश.कॉम पर फौलोवर शब्द के तरह-तरह के मतलब दे रखे हैं.. मसलन - अनुगामी, अनुयायी, शिष्य,
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मां रेवा तोरा पानी निर्मल, खलखल बहतो जायो रे!!

अभी कुछ दिनों पहले रविश जी ने फेसबुक पर "इंडियन ओशन" के एक गीत "मां रेवा" का जिक्र करते हुये कहा था "मां रेवा...तेरा पानी निर्मल..कल कल बहतो जाए...इंडियन ओशन का जब यह गाना सुनता हूं तो मां रेवा हलक के भीतर उतरने लगती है। नर्मदा के दीदार की तमाम ख्वाहिशें
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दो बजिया वैराग्य पार्ट टू

घर से कई किताबें लाया हूँ जिनमे अधिकतर फणीश्वरनाथ रेणु जी कि हैं.. उनकी कहानियों का एक संकलन आज ही पढ़ कर खत्म किया हूँ, 'अच्छे आदमी'.. पूरी किताब खत्म करने के बाद फुरसत में बैठा चेन्नई सेन्ट्रल रेलवे स्टेशन पर अपने मित्र के ट्रेन के आने का इंतजार कर रहा
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अब मुझे कोई इन्तजार कहाँ

मेरे कितने जिद करने पर तुमने मुझे चूमने के लिए अपने होंठो को आगे कर दिया था.. आँखे भी बाद थी तुम्हारी.. तुम्हारी वह मासूमियत देख कर तुम्हारे होंठो को चूम भी नहीं पाया था मैं.. बस देखता रह गया था वह समर्पण.. कुछ देर बाद आँखें खोलने पर तुमने मुझे
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क्या हम खुद को गलत मानने कि हद तक मैच्योर हैं?

११ मार्च को आखिरी दफ़े कुछ लिखा था यहाँ.. १५ दिन से ऊपर गुजर गए हैं यहाँ कुछ भी लिखे हुए.. मैं कभी भी इस मुगालते में नहीं रहा कि लोग मुझे पढ़ने को बेचैन हैं और मुझे अपने पाठकों के लिए कुछ लिखना चाहिए.. मुझे पता है कि लोगों कि यादाश्त बहुत कमजोर होती है
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बाथ टब कि कहानी

"पछान्त मामू, आपके पास टब है?" उसके अजीब सवालों में एक और सवाल शामिल था अभी.. मुझे समझ में नहीं आया कि अचानक से साईकिल चलाते हुए वह टब या यूं कहें कि बाथ टब पर कैसे आ गई.. मैंने भी उसके बालमन को दिलासा देते हुये "हां" कह दिया.."कितना बड़ा है आपका वाला
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शाईनिंग इंडिया और कैटल क्लास

मैं अबकी जब घर आ रहा था तब चार साल के बाद स्लीपर में यात्रा किया.. मैं रास्ते भर खूब इंज्वाय किया.. तरह तरह के लोग आते थे और अपने तरह से अपना बिजनेस कर रहे थे.. कोई पान-मसाला बेच रहा था तो कोई नट बन कर पैसे कमा रहा था.. कभी कोई लैंगिक विकलांग आकर जबरी
Mar 05 2010 11:11 PM
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ऐसा खुदा जिसने आवारागर्दी और यायावरी सिखाया

अब वह बात पुरानी हो चुकी है.. लोग उसे भगवान कहते कहते शायद भगवान मान भी लिए हों क्रिकेट का.. छुटपन में सपने देखते थे कि सचिन वन डे में दोहरा शतक जमाये.. बड़े होने के साथ वह दीवानगी कम होती गई.. आज जब उसने लगा ही दिया तब याद आया, कि इसी तवारीख़ का इन्तजार
Feb 25 2010 12:34 AM
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मेरा सामान

एक दफ़ा जब याद है तुमको,जब बिन बत्ती सायकिल का चालान हुआ था..हमने कैसे, भूखे-प्यासे, बेचारों सी एक्टिंग की थी..हवलदार ने उल्टा एक अठन्नी देकर भेज दिया था..एक चव्वनी मेरी थी,वो भिजवा दो..सावन के कुछ भींगे-भींगे दिल रक्खे हैं,और मेरी एक ख़त में लिपटी रात
Feb 23 2010 11:48 PM
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दिमाग का एक और फितूर

मन में ठान लिया था कि अब नहीं सोचूंगा, बहुत सोच लिये और सोच-सोच कर दुखी भी हो लिये.. अब खुश रहना चाहता हूं.. वैसे भी जीवन ने यही पाठ पढ़ाया है कि जिसके लिये हम सोचते हैं और दुखी होते हैं उसके लिये हमारे प्रति उन सोच, प्यार, आदर, सम्मान का कोई मोल नहीं
Feb 22 2010 10:14 PM
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समय बड़ा बलवान हो भैया!!

जैसे-जैसे समय भागता जा रहा है, ठीक वैसे-वैसे ही मायूसी भी बढ़ती जा रही है.. लगता है जैसे दोनों समानुपाती हैं.. डर लगता है, कहीं मायूसी डुदासी का और उदासी अवसाद का सबब ना बन जाये.. मुझे इस मायूसी के कारणों का भी ज्ञान है, मगर वे कुछ वैसी ही बातें हैं जिसे
Feb 15 2010 06:46 PM
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दिल में बैठा एक डर

सुबह अमूमन देर से उठता हूं, दफ़्तर का समय भी कुछ उसी समय होता है.. मगर आज जल्दी नींद खुल गई.. सुबह के दैनिक क्रिया से निवृत होकर अपना मेल बाक्स चेक कर ही रहा था कि उधर से मेरे मित्र का फोन आया.. बेहद हड़बड़ी में था.. हेलो बोले बिना बोला "जल्दी से मेरे लिये
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कुछ बाते जो मुझे हद्द दर्जे तक परेशान करती हैं.. हमेशा..

अमूमन मेरी कोशिश रहती है कि हद तक किसी से झूठ ना बोलूँ.. मगर एक आम इंसान कि तरह सच को मैं भी छुपाता हूँ.. खासतौर से जब पूरी तरह से मेरी बात हो तब झूठ बोलने कि अपेक्षा मैं कुछ ना कहना ही पसंद करता हूँ.. वैसे भी मेरे साथ ऐसे किस्से कम ही आते हैं जब मुझे
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कुछ चित्रों कि रंगीनियत से बुना गया पोस्ट

इस पोस्ट में डाले गए सभी चित्र मुझे बेहद खास पसंद हैं, और मेरे ही द्वारा लिए गए भी हैं.. लगभग सभी चित्र हाल-फिलहाल में लिए गए हैं, और इनमे मैंने किसी भी प्रकार कि छेड़छाड़ किसी साफ्टवेयर के द्वारा नहीं की है.. यह अपने पूर्ण प्राकृतिक अवस्था में है..यहाँ
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अ फ्राईडे (अ वेडनेसडे कि तर्ज पर एक साफ्टवेयर कंपनी में)

प्रोजेक्ट मैनेजर राठौर - कौन हो तुम..??? क्या पहचान है तुम्हारी ?फोन से - कौन हूं मैं!! मैं वो हूं जो आज कमिटमेंट करने से डरता है, मैं वो हूं जो आज घर जाने से डरता है, ये सोच कर की कहीं घर वाले पहचानने से इंकार ना कर दें...मैं वो हूं जो, आज जॉब चेंज करता
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क्यों चली आती हो

क्यों चली आती हो ख्वाबों मेंक्यों भूल जाती होतुमने ही खत्म किया थाअपने उन सारे अधिकारों कोमुझ पर सेअब इन ख्वाबों पर भीतुम्हारा कोई अधिकार नहींक्यों चली आती हो ख्यालो मेंकभी नींद चुराने, कभी चैन चुरानेतुमने ही तो मुझेअपने ख्यालों से निकाल फेंका थाअब मैं
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समय चाहे जो भी लिखे, हम तो तठस्थ ही रहेंगे

आजकल जो हिंदी ब्लौग का माहौल बना हुआ है उसमें मेरे हिसाब से यही बात सही बैठती है.. तठस्थ ही रहें और अपनी ढफली बजाते रहने में ही भलाई है.. दो लोगों की अगर आपस में ठनी हुई है तो उसमें अपनी टांग ना घुसाने में ही मुझे भलाई दिखती है..मैं यह सब बातें इसलिये
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ख्यालातों के अजीब से कतरन

रात बहुत हो चुकी है, अब सो जाना चाहिये.. कहकर हम दोनों ने ही चादर को सर तक ढ़क लिया.. वैसे भी चेन्नई से बैंगलोर जाने वाले को ही समझ में आता है कि सर्दी क्या होती है, और अगर किसी तमिलियन को सर्दी के मौसम में दिल्ली भेज दो तो जिंदा या मुर्दा, मगर अकड़ा हुआ
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हर तरफ बस तू ही तू

बहुत पहले कुछ गद्य के साथ इस पद्य को पोस्ट किया था.. आज फिर से इस पद्य को पोस्ट किये जा रहा हूं.. पूरी पोस्ट को पढ़ने के लिये उस पुराने पोस्ट पर जायें.. आपको कुछ निहायत लज़ीज कमेंटों को भी पढ़ने का लुत्फ आयेगा वहां.. मेरी प्रीत भी तू,मेरी गीत भी तू,मेरी
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दिल तो बच्चा है जी

सिनेमा देखते हुये वह सीन आया जब रैंचो के दोनों दोस्त यह सोच कर उदास थे कि चलो हम दोनों नीचे से ही सही, मगर पास तो हुये.. मगर अपना यार रैंचो फेल हो गया.. थोड़ी देर बाद पता चलता है कि रैंचो तो टॉप किया है और दोनों का चेहरा और लटक जाता है और पीछे से आवाज आती
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खुशियों का जरिया : ई-मेल या स्नेल-मेल

अभी थोड़ी देर हुये जब बीबीसी के हिंदी ब्लौग पर सलमा जैदी जी को पढ़ा, जिन्होंने नये साल में मिले ग्रीटिंग कार्ड को लेकर अपनी खुशी जाहिर की है.. और यह संयोग ही है कि आज ही मेरी प्यारी बहन और उतनी ही प्यारी मित्र स्नेहा का नये साल का ग्रीटिंग कार्ड के साथ
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पता नहीं, प्रोसेसर स्लो है या हार्ड डिस्क फुल?

आज सुबह ऑफिस जाने की हड़बड़ी में था तभी देखा कि पापा जी का फोन आ रहा है.. और इससे पहले भी तीन बार उनका फोन आ चुका था जिसका मुझे पता नहीं चल सका.. उन्होंने बताया कि मेरे लिये किसी सईद का फोन आया था और उन्होंने मेरा नंबर उसे दे दिया है..मैं तब से ही सोच
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अब भी उसे जब याद करता हूं, तो बहुत सिद्दत से याद करता हूं

समय के साथ बहुत कुछ बदला है.. मैं भी बदला हूं, मेरी सोच के साथ-साथ परिस्थितियां भी बदली है.. कई रिश्तों के मायने बदले हैं.. पहले जिन बातों के बदलने पर तकलीफ़ होती थी, अब उन्ही चीजों को देखने का नजरिया भी बदला है और उन्हें उसी रूप में स्वीकार कर आगे बढ़
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DDLJ के जादू का बाकी है असर

कुछ महिने पहले "दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे" के 14 साल पूरा होने के अवसर पर मैंने अपनी याद अजय जी के ब्लौग चव्वनी छाप पर आप लोगों से बांटा था.. आज उसे ही अपने ब्लौग पर भी बांचे जा रहा हूं.. डीडीएलजे ऋंखला के बाकी लेख पढ़ने के लिये इस लिंक पर जायें.
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एक कविता कोडिंग पर

कोई अपने ही घर में चोरी करता है क्या? नहीं ना? मगर मैंने किया है.. ज्ञान जी के शब्दों में यह रीठेल है.. यह कविता मेरे एक बेहद पुराने पोस्ट पर डा.अमर जी ने कमेंट किया था जिसे यहां ठेले जा रहा हूं.. आजकल ब्लौगिंग करने की फुरसत भी नहीं है और कुछ लिखने क
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बैंगलोर में मार-कुटाई की बातें

दो लोग मेरी जिंदगी में ऐसे भी हैं जिन्हें देखते ही धमाधम मारने का बहुत मन करने लगता है.. पता नहीं क्यों.. एक को तो अबकी पीट आया हूं और दूसरे को धमका आया हूं कि जल्द ही आऊंगा, मार खाने को तैयार रहना.. यह मत सोचना कि लड़की समझ कर छोड़ दूंगा.. :) ये दोन
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