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01 Jun 2010
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साहित्य एक घर

साहित्य एक घर : विस्थापित लेखकआपका यह लेखक पिछले एक सप्ताह से जर्मनी में हैं. आज दोपहर १.४५ पर मेरी रेलगाड़ी फ्रैन्क्फुर्ट के लिए रवाना हो जायेगी. आज ही शाम यहाँ की सुप्रसिद्ध साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था `लिट- प्रोम' द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय
 
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वह एक मशाल-सा कोई : जन्मदिन ३० मई पर विशेष

तीन दिन पहले 'भास्कर' दैनिक में काम करने वाले अपने पुराने मित्र और पत्रकार विमल झा के कहने पर मैंने बहुत जल्दी में हिंदी के सुविख्यात आलोचक-चिंतक डा. रामबिलास शर्मा के जन्म दिन (३० मई) के अवसर पर यह एक टिप्पणी लिखी थी, जो संपादित होकर शनिवार, २२ मई के
 
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एक और बाघ

अभी अभी युवा कवि फ़रीद खान की यह कविता 'एक और बाघ' पढी़। बहुत देर तक और अभी तक यह कविता ज्यों की त्यों अपने पूरे अस्तित्व के साथ मेरे मस्तिष्क में है। पिछले साल मार्च में आगरा में हुए SAARC देशों के लेखक सम्मेलन में एक अमेरिका में रह रहे भारतीय अंग्रेज़ी
 
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असमाप्त कविता का एक और नया शुरुआती ड्राफ़्ट

(यह कविता इसी तरह लिखी जा रही है, अलग-अलग समय और मूड्स में। यह किसी सूची में शामिल होने के लिए नहीं, अपने समय की चिंता का हिस्सा बनने के लिए लिखी जा रही है। जीवन की अनिश्चितताओं और बिखरावों के बीच। यह किसी भाषा विशेष की अभिव्यक्ति या उसकी कला-परंपरा का
 
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मई दिवस इस बार : मोसांटो कपास बीजों की नयी फसल के दौर में

आज मई दिवस है। मज़दूर दिवस। सुबह से कई फोन और एस.एम.एस. आ रहे हैं। कुछ पुराने साथी-दोस्त हैं, जिनका हर साल लगभग एक जैसा संदेश होता है ''हम मेहनतकश इस दुनिया से, जब अपना हिस्सा मांगेगे, इक गांव नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे!''या ''जिस खेत से
 
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असमाप्त कविता के नये शुरुआती ड्राफ़्ट्स

(तीन)लुटियन के टीले से कभी नहीं दिखती अरुंधतिवहां अक्सर दिखता है पृथ्वी के निकट आता हुआअमंगलकारी रक्ताभ मंगलया अंतरिक्ष में अपनी कक्षा से भटका कोई गिरता हुआ टोही खुफि़या उपग्रहरोहतक या मथुरा से देखो तो सूर्योदय के ठीक पहलेराजधानी के ऊपर हर रोज़ उगता है
 
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एक असमाप्त कविता शृंखला के आरंभिक ड्राफ़्ट

अरुंधति(एक)जेठ की रात मेंछप्पर के टूटे खपड़ैलों से दिखता था आकाश अपनी खाट पर डेढ़ साल से सोई मां की मुरझाई सफेद-जर्द उंगली उठी थीएक सबसे धुंधले, टिमटिमाते, मद्धिम लाल तारे की ओर ‘वह देखो अरुंधति !’मां की श्वासनली में कैंसर था और वह मर गई थी इसके बादउसकी
 
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वर्जीनिया पुस्तक मेले में 'पीली छतरी वाली लड़की' और 'हरिया हरक्युलिस की हैरानी'

 (मैं पिछले कुछ दिनों से लगातार एक कविता 'अरुंधति' पर काम कर रहा था। आज लगभग पूरी हुई है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि वह अब अपने अंतिम पाठ की शक्ल ले चुकी है। छोटी-सी है। कल या परसों पोस्ट करूंगा। कठिन दिन हैं, हमेशा की तरह ही। तब तक आप यह
 
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एक दिन : के.सच्चिदानन्दन की कविता

यह कविता कल सुबह लगभग ९.४० पर हमारे समय के समूचे भारतीय कविता के परिदृश्य के शिखर कवि और अपनी मौलिक कल्पनाशीलता के कारण सबसे अलग पहचाने जाने वाले  के. सच्चिदानंदन ने 'फेस बुक' पर पेस्ट किया था. इस अनुवाद को भी आप 'तुरंता अनुवाद' या 'आशु-अनुवाद'
 
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आवेग : मूल-पाठ

'आवेग'दिनकर कुमारआवेग ने किसी को बनाया प्रेमीकिसी को क्रांतिकारी,किसी को हत्यारा,किसी को शिकारी.आवेग में ही चुनी गयी गलत राहलिए गए ग़लत फ़ैसलेबुने गए सपनेरचा गया संशय का अरण्य.यह आवेग गर्भ से ही संग रहा हैगर्भ से बाहर के जगत में भीइसी के सम्मोहन
 
Uday Prakash
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वसन्त पंचमी

''दिये हैं मैने जगत को फूल-फल,किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल;पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल-ठाट जीवन का वहीजो ढह गया है अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा।बह रही है हृदय पर केवल अमा;मै अलक्षित हूँ; यही कवि कह गया है।
 
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एक युग का अंत

ज्योति पत्र पर लिखे समर का अंत हो गया है.....ज्योति बसु : ८ जुलाई १९१४-१७ जनवरी २०१०
 
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कला कैलेण्डर की चीज़ नहीं है

आज १३ जनवरी से हमारी भाषा के सबसे संवेदनशील और क्लासिकी ऊंचाइयों को अपनी साधारण-सादा कविताओं की उँगलियों से कई बार छू चुके अप्रतिम कवि शमशेर बहादुर सिंह के सौवें जन्म-वर्ष की शुरूआत हो रही हैं। उन पर अब उत्सवों और आयोजनों का सिलसिला साल भर तक चलेगा। साल
 
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यह भी मेरा महान देश है....!

सात अक्तूबर को जब फ्रैंकफुर्ट हवाई अड्डे से फ्रेइबुर्ग जाने के लिए बाहर आया तो चारों ओर से रंगों ने घेर लिया । ये अपरिचित से लगते सम्मोहक रंग थे । यहाँ मैं रंगों के किसी मेले या महानगर में पहुँच गया था । यह हेमंत का मौसम था । पेड़ों से पत्ते जब आने वा
 
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ओह! यह अचानक आघात....

वैशाली, अपने घर आए हुए आज एक पखवाड़ा बीत गया। इन पंद्रह दिनों में हर दिन लगातार उदास और चिंतित करता गया। अपने आसपास और दूर दराज़ से आने वाली हर ख़बर बेचैनी और डर से भर देती है। कभी एम्नी सेज़ेयर की लम्बी कविता पढ़ी थी -'रिटर्न टु माई नेटिवलैन्ड'। हम अप
 
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फ्राइबर्ग की कुछ छवियां

फ्राइबर्ग एक छोटा सा शहर है। यह शिक्षा, पर्यावरण अध्ययन और शोध और वैकल्पिक जीवन-समाज की खोज के लिए जाना जाता है। आबादी मुश्किल से ढाई लाख की है लेकिन पार्कों और बाजारों में चहल-पहल बनी रहती है। जहां मैं हूं, वहां से पांच मिनट पैदल चलने पर पहाड़ शुरू
 
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UDAY PRAKASH

आप सबसे आज मैं दो महीने के लिए विदा ले रहा हूं। दिसंबर के पहले सप्ताह में फिर से मिलेंगे। हां, बीच में कहीं ऐसा अवसर मिला कि नेट मेरे पास है, तो हो सकता है कि आप कोई पोस्ट फिर पायें। अब से दो घंटे बाद मैं अपने वैशाली के घर से निकल जाऊंगा और कल सुबह त
 
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एक आतंकी का पति और बुद्ध की मुस्कान (दो)

सत्ताओं ने एक ऐसा समय रचा है हमारे इर्द-गिर्द कि सारे दुस्वप्न और आशंकाएं एक-एक कर सच होने लगती हैं। उस रोज़ जब पोखरण में परमाणु के धमाके हुए उसके बाद के पंद्रह दिन पाकिस्तान में उथल-पुथल के थे। अगर सियासत के खिलाड़ी सरहद के इस पार अपनी हिंसा की ताकत क
 
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एक खुशी छोटी-सी और....

कल ही मुझे 'पीली छतरी वाली लड़की' के जर्मन अनुवाद की किताब का कवर इमेज मिला। आप भी देखें। मुझे और मेरे दोस्तों को बहुत पसंद आया। जैसा मैंने वायदा किया है, इसके अनुवादकों से मैं ज़ल्द आपका परिचय कराऊंगा।साथ में हिंदी और अंग्रेज़ी वाली किताबों के आवरण के
 
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एक आतंकी का पति - और बुद्ध की मुस्कान (एक)

अब से ११ साल पहले, मई या जून के महीने की लू से तपती, गर्म और झुलसती कोई तारीख थी। सुबह ६ बजे हम दिल्ली के रोहिणी इलाके के अपने फ्लैट से निकले थे। आलू, पूड़ी, अचार बना कर रख लिया गया था। एक फ्लास्क में फ्रिज़ का ठंडा पानी। रात भर फ्रीज़र में रखने के बाद सुबह
 
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Aug 29 2009 08:50 AM
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अरेबा परेबा

मैंने पिछली पोस्ट में वादा किया था कि अपने प्रिय लेखक अमितावा कुमार की प्रसिद्ध किताब 'Husband of a Fanatic' के बारे में आपको बताऊंगा, लेकिन यह सारा समय कई-कई तरह की अस्त-व्यस्तताओं में गुज़रा। ज़ल्द ही उस किताब के बारे में पोस्ट लगाऊंगा क्योंकि हिंसाओं और
 
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शहीद दिवस : येहुदा अमिखाई की कविता

(पिछले कुछ दिनों से सांप्रदायिक-जातिवादी और अंधराष्ट्रवादी हिंसाओं की जीत और कामयाबियों का जश्न जिस तरह से मीडिया, अखबार और राजनीति में मनाया गया, वह भयावह था। इस उपमहाद्वीप की सारी अशक्त आबादी या गैर-राजनीतिक नागरिकता इस समय ऐतिहासिक असुरक्षा और वध्यता
 
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एक और 'पुरस्कार'....सबसे बड़ा ....

अभी से कुछ ही समय पहले, २७ जुलाई को गुना (म.प्र.) में मेरे नये कविता संग्रह 'एक भाषा हुआ करती है', जिसके प्रकाशित होने की सूचना आप तक पहले ही पहुंचा चुका हूं, का लोकार्पण हमारे समय के एक ऐसे व्यक्तित्व ने किया, जिनकी ओर मेरे जैसे तमाम लेखकों, व्यक्तियों,
 
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लेकिन यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं था

यह लेकिन किसी फिल्म का दृश्य नहीं था इसमें एक मुस्कुराता हुआ सज्जन-सा खलनायक था जिसने पैगंबर की हत्या की थी और एक दूसरा था जो दिखाई दिया था पैगंबर को बचाते हुए और करुणा के पक्ष में बहुत ठोस और अकाट्य तर्क देते हुए इसके बाद जो फिल्म नहीं थी उसका एक बह
 
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यंत्रणा और आत्मद्वंद्व के अंधेरे दिन

मैंने और मेरे परिवार ने, एक बार नहीं कई कई बार लांछन, दंड, अपयश, अभाव और दुखों की ऐसी ही यंत्रणा झेली है। इस बार भी हमने पांच दिनों से न ठीक से खाया है, न सो सके हैं। मैंने बार-बार दुहराया है कि मैं कोई महान व्यक्ति नहीं हूं। कोई क्रांतिकारी, मठाधीश
 
Uday Prakash
Jul 17 2009 10:55 AM
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फ़ाशीवाद की सुरंग में मृत भाई से मुलाकात

स्मृतिशेष : कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह मेरे भाई थे। मेरी तीसरी फुआ के बेटे। मेरे पिता उनके मामा थे। मां के पक्ष से उनकी और पिता के पक्ष से मेरी शिराओं में बहने-दौड़ने वाला रक्त एक ही था। निकट और सगे संबंधों को प्रगट करने के लि
 
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शोक के निजी पलों का क्रूर तमाशा

आजकल कीर्तियां भी इस आधार पर बनती हैं कि किसने किस पर प्राणघातक यानी छविभंजक हमला किया। कुछ आलोचक तो ऐसे मिल जाएंगे जिन्होंने सिवाय इसके कुछ और आलोचना में किया ही नहीं है। इसका भी महत्व कम होता जा रहा है कि आपकी दृष्टि क्या है। विचारधारा के समापन का
 
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रात में हारमोनियम

यहां वर्षों से हाशिए में डाल दिए गये अपने कविता संग्रह 'रात में हारमोनियम' के बिल्कुल अंतिम पन्ने पर छपी कविता प्रस्तुत कर रहा हूं। उम्मीद है आप पसंद करेंगे। ॥ ताना बाना ॥ हम हैं ताना, हम हैं बाना । हमीं चदरिया, हमीं जुलाहा, हमीं गजी, हम थाना ॥ नाद ह
 
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'रात में हारमोनियम' से एक ज़रूरी और प्रासंगिक कविता

कई साल पहले 'रात में हारमोनियम' शीर्षक से मेरी कविताओं का संग्रह वाणी प्रकाशन से आया था। जैसा कि तय था- हिंदी कविता, विचारधाराओं और संस्थानों में सक्रिय प्रच्छन्न जातिवादी फ़ाशीवाद के चलते इसे भरसक हाशिए पर रखा गया। भाषा, संस्कृति और कलाओं के इलाके मे
 
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कुशीनगर से लौटकर

कुशीनगर और गोरखपुर से एक सप्ताह की यात्रा से आज ही लौटा हूं। यह एक अविस्मरणीय यात्रा थी। वह स्थान, जहां बुद्ध की विशाल प्रतिमा आज भी अपने निर्वाण की अंतिम मुद्रा में सोई हुई है। मैं यहां अपने नये उपन्यास 'चीना बाबा' के मुख्य पात्र चीना बाबा की खोज मे
 
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उनका उनके पास

जैसा तय था और उस दिन कुछ युवाओं की मांग थी कि २० जून को त्रिवेणी कलाकेंद्र में पढ़ी गयी कविताओं को यहां पोस्ट करूं तो उसी की आपूर्ति में दो कविताएं यहां एक के बाद एक प्रस्तुत हैं। वैसे ये कविताएं 'संवेद' (संपादक : किशन कालजयी, राजीव रंजन गिरि, अंक सित
 
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एक-बचन फैसला

चार रोज़ पीछे आपके इस लेखक को कृष्ण बलदेव बैद सम्मान मिला। प्रख्यात कवि-आलोचक और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ज्यूरी के अकेले निर्णायक थे। उन्होंने कहा-' इस सम्मान की निर्णय प्रकृया 'एक-बचन' है, जब कि 'पूर्वग्रह' के अलावा जिस पत्रिका का संस्थापन-संपादन
 
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हमने 'भारत के गोर्की' का घर देखा .....

मैंने मुंशी प्रेमचंद को नहीं देखा। जब मेरा जन्म हुआ, उसके सोलह साल पहले उनकी मृत्यु हो चुकी थी। जब मैं कुछ लिखने-पढ़ने और समझने लायक हुआ, तब से मैंने उनकी कहानियां पढ़नी शुरू कीं| उनकी कहानियां और उपन्यास पढ़ते हुए कई-कई बार उनसे मिलने का मन होता था।
 
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एक स्याह और शोकाकुल तारीख : हबीब तनवीर का जाना

१९८२ : जब हबीब साहब बेरसराय में पड़ोसी थे. २००८ : भोपाल में जब उन्होंने 'वनमाली सम्मान' दिया हम में से हज़ारों लोग आज उदास होंगे. हबीब साहब का जाना एक जलती हुई रौशन कंदील का अचानक बुझ जाना है. उन्हें अभी कई बरस और रहना चाहिए था. हमारे बीच. उनका जाना सि
 
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कविता की किताब अब मेज़ पर

आखिर परसों 'एक भाषा हुआ करती है' की पांच लेखकीय प्रतियां (Author's complimentary copies) कूरियर सर्विस से मिल गयीं। 'सुनो कारीगर', अबूतर कबूतर' और ' रात में हारमोनियम' के बाद यह मेरा चौथा कविता संग्रह है। पहला कविता संग्रह 'सुनो कारीगर' पहली बार १९८०
 
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सभ्यताओं की नींव कौन रखता है?

अभी कुछ ही रोज़ पहले एक दोस्त ने यह क्लिप भेजा था। तब तक वह एक बड़े व्यावसायिक अखबार में एक अच्छे ओहदे पर था। लेकिन वह अपने आपको कभी प्रबंधन का हिस्सा नहीं मानता था। उसके सरोकार दूसरे थे और वह कहता था कि मैं मालिक को अपना हुनर और अपनी मेहनत बेचता हूं,
 
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उस घर को मैंने देखा...फिर उंगलियों से उसकी उदासी को छुआ

मेरी एक बहुत पहले लिखी गयी कहानी का शीर्षक है 'खंडित स्त्रियां, नेहरू जी और अस्ताचल'। आज २७ मई है और यह कहानी २७ मई १९६४ की स्मृति में लिखी गयी थी। तब जब मैं १२ साल का था। उस कहानी को अगर आप पढे़ तो इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पं. जवाहरलाल नेहरू
 
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अम्ररावती की विदेश यात्रा : मेरा दागिस्तान -५

यह पोस्ट ४ दिन पहले लिखी गयी थी. आज लगा पा रहा हूं.) आज बुद्ध पूर्णिमा है. आज से अच्छा और कौन सा दिन हो सकता है, जब मैं अमरावती के उन चार दिनों की अमिट स्मृतियों की अंतिम कडी़ प्रस्तुत करूं. बुद्ध ने कहा था-'जीवन स्वयं में एक यंत्रणा है.' .....'मुक्त
 
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हम क्या करें?

प्रतिलिपि के प्रतिभाशाली संपादक और संवेदनशील समकालीन कवि गिरिराज किराड़ू ने यह खबर अभी भेजी है। क्या अभी भी जानना-समझना बाकी है कि पूंजी, बाज़ार, तकनीक, राजनीति और मनुष्य-विरोधी हिकमत से गढे़-बनाए गये इस तथाकथित लोकतांत्रिक यथार्थ में असली सृजनात्मक प्
 
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एक कविता जो अभी लिखी गयी

।। दुख।। अंधेरे में जब कोई और नहीं होता था सबसे अधिक उजाला उनके इर्दगिर्द ही होता सबसे साफ़ दिखाई देते थे वही कोहरे या धुएं के पार धुंधले मैले आकाश में जैसे दिखते हैं सितारे कोई कोई उनमें से सबसे तेज़ चमकता है सबसे अलग अपने ही रंग में जलता कोई नक्षत्र
 
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