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इंडियानामा...

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08 Mar 2010
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माया ममता मोह जाल...

आपके सामने भी कई बार ये समस्या आई होगी कि किसी की भावनाएँ आपको कुछ करने ना करने के लिए उसका रही होंगी तो कभी रोक रही होंगी। या कोई इन बंधनों में बांधना चाहता होगा। मैं केवल और केवल माँ के साथ निस्वार्थ रुप से ममता के बंधन में जरुर हूँ। माँ भी मेरे साथ
 
Rajiv Ranjan Singh
Mar 07 2010 10:36 AM
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हकीकत ऐसा भी.....

हकीकत है कि कोई अपना कहने का आज भरे समाज में खोजने पर ही मिलता है। हर कोई यही कहता है कि संभव तभी है जब आप अपने पास हर किसी को देखे खोजे और समझे कि कोई तो है जो आप के पीछे दीवार की तरह अडिग है और जीवन भर रहेगा। लेकिन ना तो ये कभी होगा और ना ही ये समाज
 
Rajiv Ranjan Singh
Mar 07 2010 10:33 AM
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द्वार खोलो नया साल आया है....

नए साल की ढेरों बधाइयाँ, आप सबों को हमारी तरफ से साल 2010 बेहद तरक्की के साथ आनंन्द बिखेरे.. नया बरस के हर पल हर क्षण आप सबों का अभिमान बने, रोज सरोज मास मधु पाखि संवत् सर अभिमान बने...।एक नए संकल्प के साथ कि नए साल में आप इंडियानामा के जरिये ढेर सारी
 
Rajiv Ranjan Singh
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क्या खोया क्या पाया....१,

ये मैं लिख रहा हूँ लेकिन बहुत दिनों के बाद कारण मेरे निजी थे। ऐसा भी नहीं था कि मैं लिख नहीं सकता था बस केवल और केवल आलस ही था, जिसके कारण लिख नहीं पाया था, इसके लिए थोडी आपसे आज़ादी चाहता हूँ। शुरुआत मैं करता हूँ साल 2008 के अंतिम महीनों में हुए घटन
 
Rajiv Ranjan Singh
Dec 29 2009 11:48 AM
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विदा साल २००८....,

मित्रों काफी लम्बे अरसे के बाद आप लोगों से एक बार फिर मुखातिब हूँ, समय नहीं दे पाने के कारण आप से माफी माँगता हूँ। पिछले दिनों काफी कुछ घटा जिसपर लिखने का मन तड़प उठा लेकिन लिख नहीं सका ये मेरी गलती है,क्षमा करेंगे। साल 2008 अब अपने अंतिम संध्या के क
 
Rajiv Ranjan Singh
Dec 29 2009 11:48 AM
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अब तो बस करो.....

साल 2007 से लेकर अब 2008 का सितम्बर माह आ गया है लेकिन, आपसी लडाई है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। लोग हैं कि एक दूसरे को मरने मारने से पीछे नहीं हट रहें हैं। हर बार केवल एक ही मुद्दा कि महाराष्ट्र में हो तो केवल और केवल मराठी ही बोलनी होगी। क्या
 
Rajiv Ranjan Singh
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हर बार कि तरह एक बार फिर बेबस......,

साल दर साल लोग भले ही प्रगति करते जाए लेकिन हर बार कि तरह प्रकृति के आगे वेबस हो ही जाते हैं। बचपन से सुनते आ रहें हैं कि मधेस इलाके की शोक है कोसी। कुवांरी नदी कही जानेवाली कोसी के रौद्र रुप को देखकर भय लगना स्वाभाविक लग रहा है। हरबार की भांति अब स्
 
Rajiv Ranjan Singh
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आज लिखने का मन करता है.......

कुछ दिनों पहले मैंने सोच ही लिया था कि अब फिर कभी इंडियानामा में कुछ भी नहीं लिखूँगा। लेकिन आस पास इतना कुछ घट चुका कि अब अगर मैं रुकता हूँ तो अपने इंडियानामा के नाम को सार्थक नहीं कर पा रहा हूँ। गुजरात से लेकर के कश्मीर तक जल रहा है। गुजरात में सैकड
 
Rajiv Ranjan Singh
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दुखवा का से कहूँ......

अपनी इस परिस्थिती से कैसे रुबरु होउ कुछ समझ में नहीं आ रहा है। हर बार अपने जीवन का होना बडा ही निरर्थक लगता है। पिछले दिनों से यही धारणा मुझे अपने घेरे में ले लिया है। इस अवसाद से निकलने का कोई रास्ता नहीं निकल रहा है। लग रहा है कि सब कुछ छूट गया बेह
 
Rajiv Ranjan Singh
Dec 29 2009 11:48 AM
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चलो सजाओ दुकान आ गया राजनीति का मौसम

बाजार में हल्ला मचा कि गई अब कांग्रेस सरकार, वाम पंथियो ने अपना समर्थन वापस ले लिया। लगी सड़क पर सरकारी गाडियाँ तेज गति से दौडने, कोई नेता अपना गठजोड़ बैठा रहा है तो कोई अपनी फिराक में है कि इसबार तो समर्थन करने पर कुछ पारितोषिक के रुप में मंत्री पद
 
Rajiv Ranjan Singh
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मैं कब हम होगा…. ?

एक सवाल मेरे जेहन में बराबर कौंधता रहता है कि मैं कभी हम में बदलेगा या नहीं। अपनी अपनी परिस्थितियाँ हैं कि किस तरह से एक दूसरे के करीब लोग लाते हैं। अगर अपनी बात करूँ तो कभी भी मैं में नहीं जीता क्योकि यह एक ऐसी परिस्थिती है जो अगर हावी हो गया तो अहम
 
Rajiv Ranjan Singh
Dec 29 2009 11:48 AM
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मँहगाई की मार गरीब की हार

हाल फिलहाल की आर्थिक उथल पुथल ने आम जनता की परिस्थितियों को ऐसी जटिल कर दी है कि लगता ही नहीं कि वो कभी भरपेट खाना भी खाते थे। शहर में निकलो तो हर तरफ एक ही चर्चा कि मँहगाई ने कमर तोड़ कर रख दी है। लोग खाने के लिए तरस रहे हैं, अब अच्छे पकवान तो केवल
 
Rajiv Ranjan Singh
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भारतीयता भूलते भारतीय...

हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारे इंडियानामा में इस विषय पर भी लिखना पड़ सकता है कि भारत में ही भारतीयता से कोसो दूर जा चुके हैं धरती के लाल। लाख कोशिशों के बाद ना तो वो दर्जा मिल रहा है ना ही वो आधार जो कि एक सम्मान का जगह भी दिला सके। हाता
 
Rajiv Ranjan Singh
Dec 29 2009 11:48 AM
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क्या कोई पितृ घातक भी हो सकता है.......?

ऐसा हम आये दिन ही सुनते हैं, ये कोई नई बात नहीं है। लेकिन सवाल उठता है उस बेटे के बारे में जो अपना जीवन ही परिवार और माता पिता के लिए छोड दिया वो कभी अपने आदरणीय पिता का घातक हो सकता है क्या ? इसका जवाब हमें नहीं मिला। लेकिन अगर गंभीरता से इसपर विचार
 
Rajiv Ranjan Singh
Dec 29 2009 11:48 AM
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जो देखा नहीं वो भी अपना लगे….

क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि जब किसी दूरदराज़ में बैठे व्यक्ति से बात करते हैं, तो लगता है कि उससे पहले भी मिल चुके हैं या यूँ कहें कि वर्षों से उसे जानते हैं। मेरे साथ तो यह हमेशा ही होता है। मैं शहर दर शहर तो शुरुआती दौर से ही भटकता से रहा हूँ। इसी
 
Rajiv Ranjan Singh
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तेल का खेल.... कहीं कंगाल तो कहीं मालामाल...!

आपने कभी सोचा होगा कि तेल इतना असर डाल सकता है, हमारे रोज रोज के खर्चे पर। लेकिन ये हुआ, और अब तो हालात ये है कि तेल ने अपना असर न केवल एक क्षेत्र पर दिखाया है, बल्कि हर ओर बखूबी अपनी महत्ता को दिखा गया। हम और आप समझते हैं कि मँहगाई ने हमारी और आपके
 
Rajiv Ranjan Singh
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सरकार के हुक्कमरान

अभी एक दर्दनाक हत्याकांड की बातों को लोग भूल भी नहीं पाये थे, कि नोयडा निठारी हत्याकांड के बाद फिर दहल उठा, आरूषी के हत्या से। हुक्कमरान सकते में हैं कि इस घोर पाप का सूत्रधार कौन है। हरबार लोग इस शर्मनाक अपराध के लिए कभी सरकार के निठ्ठल्लेपन को ,तो
 
Rajiv Ranjan Singh
Dec 29 2009 11:48 AM
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यही है पथ....

हर कदम एक परीक्षा यही नियती है भले ही हमारी हो या आपकी, लेकिन सच्चाई यही है। ये परीक्षा आपने खुद के जीवन में कई बार दुहराई होगी। लेकिन आखिर में तन्हा ही दिखा होगा सारा आकाश। कभी तो खुद का जीवन ही पूरा का पूरा एक परीक्षा का मंच कहें या यो कहें, कदम कद
 
Rajiv Ranjan Singh
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और कितना बाँटोगे....

के बँटवारे का दर्द हम आज भी झेल रहे हैं। ज़मीनों के बँटवारे हो गए जिसने दिलों पर लकीर खींच दी। एक बार फिर इन दिलों को बाँटने का सिलसिला शुरु हो गया। कोई कहता है भाषा के आधार पर बाँट दो तो कोई कहता कि नहीं, क्षेत्रफल और दूरियाँ ज्यादा है इस लिए एक और
 
Rajiv Ranjan Singh
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धीरे धीर सब गए...

आप से वादा किया था कि मैं जरुर आपके पास फिर आउँगा। तो लिजिए एक बार फिर आपके सामने मुखातिब हूँ। आपकी और हमारी बात अधूरी रह गयी थी। जी हाँ मैं भूला हुआ नहीं हूँ, आपसे वायदा किया था कि मैं आपको दूसरी कडी सुनाने को। जनाब अब ज्यादा समय नहीं लूँगा हाजिर है
 
Rajiv Ranjan Singh
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मैं कौन....

मैं आप से मुखातिब होता हूँ तो लगता है कि घर आ गया हूँ। सच भी है मेरे पिता जी कि दो बातें आज मुझे कुछ सोंचने पर मजबूर करती हैं। परिवार तो गाँव की मिट्टी से जूडा ही था लिहाजा घर सें सगुण और निर्गुण बंदिशों की भरमार हुआ करती थी दो हैं आप को बताता हूँ। प
 
Rajiv Ranjan Singh
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एक उलझाव....

एक उलझाव है, वो ये कि शहर आखिर बदल क्यों रहें हैं। हर शहर के साथ लोगों का मिज़ाज बदल रहा है। लोग एक दूसरे से नफ़रत करने लगे हैं। कोई सुनने को तैयार नहीं है दूसरे कि बात। शायद मैने नहीं सोचा था कि लोग ऐसे भी होंगे। पिछले दिनों कई वाकयों से रु-ब-रू होन
 
Rajiv Ranjan Singh
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दिल का अज़ीज किसे कहते हैं....

आज मुझे लिखने का मन बहुत कर रहा है लेकिन शब्द और विचार आपस में जूझ रहें हैं कि क्या लिखू। एक तो मैं हर बार लिखता ही रहता हूँ कि आपस का प्यार कितना अज़ीज होता है। कोई समझे तो उसके मायने बेहद गंभर हैं। लेकिन आज मुझे ना ही अपने बारे में लिखना है ना ही क
 
Rajiv Ranjan Singh
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याद जिसे भूल ना सकूँ......

मैने तो कभी सोचा ही नहीं था कि मेरे साथ भी कभी ऐसा कुछ होगा कि इतनी बेताबी होगी किसी के याद में लेकिन हकीकत है। माँ की याद तो उस जाडे के दिनों में चुल्हे के पास बैठ कर खाना खाने से लेकर के उस हर कठिन परिस्थिती में याद आती है जब लगता है कि जीवन अब समा
 
Rajiv Ranjan Singh
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क्या शराब पीना इतना जरुरी है.....

इतने अर्से के बाद आप लोगों से मुखातिब होना और सीधा यही सवाल उछाल देना अपने आप में कुछ अजीब सा लगता है। लेकिन ये मेरी मजबूरी कहें या यो कहें कि जब मैं किसी उधेड़बुन में होता हूँ तो आप सबों से चर्चा करने बैठ जाता हूँ। इससे मैं अपने आप को आप के करीब मान
 
Rajiv Ranjan Singh
Dec 15 2009 06:02 PM
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दर्द बाँटने से कम होता है लेकिन किससे.....

एक दर्द है जिसे मुझे बाँटने का मन करता है लेकिन समझ में नहीं आता है कि किसके साथ बाटू। ले देकर के आप को ही बोर करने का साहस करता हूँ। आप आगे बढने से पहले जरूर पूछेगें कि आखिर है क्या जिससे ऐसी दर्द उपज गयी। तो भाई इस दर्द का रिश्ता दिल दिमाग दोनों से
 
Rajiv Ranjan Singh
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साल भर बाद फिर वही यादें .....

साल भर बाद अचानक से काम करते करते एक फोन आया तो वो सारी यादें ताजी हो गयी। मैं इतने दिनों से इंडियानामा से दूर रहने के बाद एक बार फिर जुडने की कोशिश कर रहा हूँ। आप से दूर रहकर सब कुछ बेमानी लग रहा है। इस लिए वहीं बातें एक बार फिर आप के साथ बाँट कर रह
 
Rajiv Ranjan Singh
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क्या खोया क्या पाया ....२

बन्दूक दिखी तो एकबार लगा कि कोई कमांडो होगा मैं भी टकटकी लगाने लगा, लेकिन अचानक मेरी तरफ आती गोली का अहसास हुआ, लगा कि अब हो गया खबरनवीसी का जय-जय श्री राम । गनीमत था कि गोली दूर से निकल कर पीछे की दीवार में जा लगी लेकिन दीवार के पीछे खडे महाराष्ट्र
 
Rajiv Ranjan Singh