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मुझे कुछ कहना है

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14 Jun 2010
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सारा देश भोपाल के साथ, हम किसका मुंह तक रहे हैं?

कल्पेश याग्निकमुट्ठी भर मठाधीश, पांच लाख निर्दोषों को छल रहे हैं। पूरे 26 बरस से। तब ये बेगुनाह निर्ममता से बर्बाद कर दिए गए। अब निर्लज्जता से प्रताड़ित किए जा रहे हैं। कानून के नाम पर। किंतु अन्याय की सीमा होती है। न्याय करने वाले हर व्यवस्था में होते
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क्यों छीन रहे हैं हम इनसे बचपन

ब्लॉग पर खबरों के बारे में लिखना मुझे कम पसंद है लेकिन पिछले दिनों एक ऐसा वाकया हुआ जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया। पिछले दिनों भास्कर में एक खबर थी कि राइट टु एजुकेशन लागू होने के बावजूद जयपुर के एक प्रतिष्ठित एमपीएस ( माहेश्वरी पब्लिक स्कूल) ने फर्स्ट के
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मैं कुछ लिखना चाह रही हूं पर क्या

बहुत सारे दोस्तों के मेल और फोन है तेरे ब्लाग पर रोज आते हैं और रोज निराश कर देती है। ये वैसा ही है जब आप बहुत न चाहते हुए भी मुस्कुराते हैं। कोई परिचित या ऐसा जिसे आप चाह कर भी उस समय अपने खराब मूड के बावजूद एक स्माइल तो दे ही देते हैं। लेकिन आपकी
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आखिर ये कैसे लोग हैं जिन्हें हमने सत्ता में बिठाया है

दो दिन से लगातार राजस्थान विधानसभा में चल रहा ड्रामा शुक्रवार को चरम पर पहुंच गया, जब विधायकों और मार्शलों में हाथापाई हो गई। चार विधायक घायल हैं जिनमें एक पूर्व मंत्री भी हैं। विपक्ष में बैठी भाजपा के सचेतक के निलंबन पर ये सारा ड्रामा गुरुवार से ही
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आग क्यों नहीं धधकती इन सीनों में?

कल्पेश याग्निकजलजले कहकर नहीं आते। लेकिन, पुणे में तो जलजला पूरी घोषणा के साथ आया। तीन राज्य सरकारों के पास कागज थे। दो केंद्रीय खुफिया एजेंसियों के पास खबर थी। पुलिस तो वैसे भी चाहे तो सब पता लगा लेती है। लेकिन, कानून के इन रखवालों का नकारापन कई जानें
Feb 15 2010 01:56 PM
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आंटी ! प्लीज मुझसे बात कीजिए।

आंटी प्लीज मुझसे बात कीजिए। मेरा मन कह रहा था कि आंटी में झकझोर कर कहूं। रजाई में से थका सा चेहरा निकलकर आंटी ने हमारे साथ गए कारीगर को कहा, इन लोगों को घर में दिखा दे, जो देखना चाहते हैं। दरअसल हम अपने घर के लिए डिजायन देखने ठेकेदार के आदमी के साथ एक
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थ्री इडियट्स से उलझते फाइव पाइंटर

पिछले साल जब मैं चेतन भगत से मिली थी, उनके किताब पढ़ने के बाद वे एक यंग राइटर लगते थे, जिसका आब्जर्वेशन का नजरिया बिलकुल अलग है। उनसे मिलने के बाद मुझे लगा कि वो इंसान भी उतने ही अच्छे हैं. एक साधारण भारतीय की तरह सोचते हैं और एक अच्छे इंसान की तरह लिखते
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आल्मोस्ट सिंगल

ये उस किताब का नाम है जो इन दिनों मैं पढ़ रही हूं, चेतन भगत की सारी किताबें खत्म करने के बाद इस बार कुछ नया ट्राय किया जाए के मूड में यह किताब उठा लाई। हजबैंड के साथ सीसीडी में उनके किसी मित्र से मिलने गई थी, तो मैंने सोचा दोनों दोस्त सालों बाद मिले
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‘उत्तर’ वे हैं, किन्तु प्रश्न हमसे पूछ रहे हैं

कल्पेश याग्निक यह बड़ा छलावा है। जलवायु बिगाड़ने वाले मुट्ठी भर हैं। उनके शिकार असंख्य। हमारे देश को ही लें। हमें सबूतों सहित छठे क्रम का बुरा बना दिया गया है। यानी पांच ही देश हिंदुस्तान से ज्यादा खराब हैं। और दुनिया का वातावरण खराब कर रहे हैं। यही
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स्पेयरिंग फ्यू मोमेंट्स फा‍र चेतन भगत

यूं तो पढ़ने को बहुत ज्यादा टाइम इन दिनों नहीं मिलता , फिर भी चेतन भगत की दो किताबें थीं जो मैं काफी समय से पढ़ना चाह रही थी तो इस बार दिल्ली जाना हुआ तो मैंने सोचा क्यों न रास्ते में दोनों किताबें पढ ली जाएं। तो पहले छूटी हुई किताब वन नाइट एट काल से
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ओल्ड हैबिट्स डाय हार्ड

अकसर जिन दिनों में ब्लाग पर काफी विजिट कर रही होती हूं, उन दिनों सोचती हूं अब रेगुलर लिखूंगी लेकिन फिर वही होता है व्यस्तताएं आती हैं और ब्लाग पर लिखना बहुत कम हो जाता है. सिर्फ लिखना ही नहीं दूसरे ब्लाग पढना तो और भी कम हो जाता है। मेरे फेवरेट ब्लाग
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नाकारा नेता और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी

जयपुर की आग ने जहां इतनी बड़ी कंपनी के सुरक्शा दावों की पोल खोल कर रख दी है साथ ही हमारे नाकारा नेताओं और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी की सच्चाई भी सबके सामने ला दी है। आखिर कैसे लाखों लीटर तेल घनी आबादी एरिया में रखने की इजाजत दे दी । अगर यह जगह आयल डिपो को
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अपनी आंखों से देखा विनाश का वह दृश्य

जयपुर में लगी भयानक आग की चर्चा तो आज मीडिया सहित हर जगह हो रही है, पर मैं उन चंद लोगों में से थी जिन्होंने उस हादसे को अपनी आंखों से देखा। सच कहूं तो जिन्दगी में ही पहली बार कोई हादसा एकदम सामने यूं घटते देखा। कल किसी काम से मैं शाम को मां के यहां ज
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पिंक प्रिंसेस इन हर पिंक वर्ल्ड

पर इसके लिए बाजार जिम्मेदार है मेरी छह साल की भतीजी आरूषि। उसे दुनिया में हर चीज पिंक चाहिए। पिंक ड्रेस, पिंक हेयर बैंड पिंक शूज एंड आन एंड आन। वो जब तीन साल की थी तब भी वो जानती थी कि उसे अपनी स्कर्ट के साथ आज पिंक टाप पहनना है और कल मजेंटा फ्राक। आ
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मन नाद दे

नवनीत गुर्जर स्टेट एडिटर दैनिक भास्कर राजस्थान म न भी ब्रह्र। नाद भी ब्रह्म। जो मन से नाद को मिलाए वही मन्ना डे। दरअसल, हवा की तरह संगीत का भी कोई सिरा नहीं होता। शिखर कहीं भी हो सकता है। शुरुआत में भी। आखिर में भी और बीच में भी। मन्ना डे को कुछ इस त
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शब्द

बहुत दिनों पहले देर रात एक विदेशी फिल्म के लिरिक्स सुने थे, फिर सो नहीं सकी। घंटों बाद जो याद रहा, उसे अपने लफ्जों से रफू करके कागज पर उतार दिया, जिन्हें अब ब्लाग पर पोस्ट कर रही हूं शब्द, जिन्हें कहना था शब्द जो जुबां पर आते-आते हमेशा ठहर गए शबद, जि
Oct 14 2009 07:38 PM
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शांति के साथ क्रूरता

कल्पेश याग्निक नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर विश्व शांति के लिए 1994 में जब प्रमुख लड़ाकू फिलीस्तीनी नेता यासेर अराफात को नोबेल मिला था तो मखौल उड़ा था कि ‘क्या इस बार पुरस्कार के लिए हत्यारा होना शर्त थी?’ अब जबकि बराक ओबामा को यह सम्मान दिया गया है तो
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गुर्जर आंदोलन it haunts me

मेरी बस एक झटके से सिकंदरा तिराहे पर रूकती है। लोगों कीआवाजाही वैसे ही है जैसे बाकी कस्बों और शहरों में है। फर्क है तो इतना इस तिराहे पर एक बोर्ड है जहां लिखा है - इस स्थान पर कई वीर गुर्जरों ने अपने प्राण न्यौछावर किए। हमारी बस का कंडक्टर किसी परफेक्ट
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नो सीएम आफ्टर एट पीएम

राजस्थान विधानसभा में ऐसा भी होता है ?गर मैं तुम्हारी पत्नी के बारे में कहूं ?ो सीएम आफ्टर एट पीएम ?े जुमला पूरे राजस्थान ने पिछले पांच साल तक बहुत बार सुना,अलग-अलग लोगों के मुंह से सुना और हर बार इसके अर्थ अलग ढंग से लगते रहे। कभी नाराजगी भरे लहजे म
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जयपुर बम धमाकों का एक साल

मई को जयपुर बम धमाकों को पूरा एक साल हो गया। इन बम धमाकों में जिन्होंने अपने खोए उनका दुख तो वैसे का वैसा है, वो कुछ नहीं भूले हैं। लेकिन निकम्मी सरकारें और पुलिस प्रशासन भूल चुका है वो दर्द और आंसू जो इन लोगों की आंखों से बहे हैं। कल का दैनिक भास्कर
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अभी पाठ मुझए याद नहीं कामरेड

अकसर मेरे दोस्त मुझसे इस बात पर आर्ग्युमेंट करते हैं कि मैं राजनीति पर बात करने से बचती हूं। उन लोगों के साथ राजनीतिक बहसों में भी भाग नहीं लेती। पर मुझे लगता है कि अभी राजनीति पर मैं उतना नहीं पढ़ पाई हूं जिसे मैं पर्याप्त मानती हूं। मार्क्स और कम्य
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टैक्नोलाजी, बच के रहना

कल एक ब्रिटिश अखबार पढते-पढते एक ऐसी खबर सामने आई कि लगातार दिमाग में घूम रही है। एक महिला का अपने पति से झगड़ा हो गया और गुस्से में एज यूजअल हम सब की तरह वो भी नेट की शरण में आ गईं। इसी नाराजगी में उन्होंने फेसबुक पर अपना स्टेटस मैरिड से सिंगल कर दि
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एक और शुरुआत के लिए राजीव को बहुत बधाई

हमारे पुराने कलिग और ब्लागर साथी राजीव जैन को कल फोन किया तो पता चला कि वे सगाई करके लौटे हैं। फोन तो मैंने किताब के सिलसिले में किया था पर मुझे पूर्वाभास हो गया था कि वो कोई अच्छी खबर सुनाने वाले हैं। राजीव से जब खुशखबरी पूछी गई तो बड़े शरमाते हुए ब
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आचार संहिता के नाम पर लोगों को ठगती निकम्मी अफसरशाही

हमारे देश में लालफीताशाही के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के किस्से तो हर कोई जानता - सुनता है लेकिन हद तो यह हो गई है कि अब बाबू लोग चुनावों के दौरान लगने वाली आचार संहिता के नाम पर भोलेभाले लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं। वो काम जिनका संहिता से दूर दूरतक क
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ये जेंडर के साथ-साथ संख्या का भी प्रॉब्लम है

एनडीटीवी से जुड़े पत्रकार रवीश कुमार ने कुछ दिन पहले अपने ब्लाग पर एक पोस्ट लिखा था, क्या ये जेंडर का प्राब्लम है? वाकई अच्छा पोस्ट था। टीवी पर वही समस्या जो हम-सब आप रोजाना फेस करते हैं, रवीशजी ने उसी प्राब्लम को बहुत बढ़िया तरीके से विश्लेषित किया
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13 साल का बच्चा बना पिता

ब्रिटेन में 13 साल का एक लड़का पिता बन गया है। उसकी गर्लफ्रेंड और बच्चे की मां 15 साल की है। मजेदार बात यह है कि एल्फी अभी खुद ही बच्चा लगता है। एल्फी तो अभी ये नहीं जानता कि एक नैपी की कीमत क्या होती है और वह बच्ची का खर्च कैसे उठाएगा। हालांकि एल्फी
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डोंट फाल इन लव

वाकई प्यार में पड़ना आसान नहीं है और यदि प्यार हो गया तो इसे निभाना और भी मुश्किल है। वो कहते हैं न ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है बस मुझे ये फोटो मेल पर इतना पसंद आया कि मैंने सोचा क्यूं न ब्लाग पर डाल दिया जा
Feb 09 2009 08:30 PM
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मुझे कुछ कहना है

दीपक या प्यार से मैं उसे दीपू कहती हूं, दो साल पहले तक मैं उसे जानती भी नहीं थी और आज वो मेरा छोटा भाई है। रिश्ता तो कुछ नहीं था, पर कई बाद जिन्दगी में रिश्ते यूं ही जुड़ते चले जाते हैं। रिश्ता था तो केवल इतना ही को वो मेरे शहर का है, जिसे मैं १२ साल
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लिटरेचर फेस्टिवल के बहाने

लिटरेचर फेस्टिवल की रिपोर्टिंग में इतनी व्यस्त रही इन दिनों कि ब्लाग पर कुछ भी लिखना नहीं हो पाया। दिन भर रिपोर्टिंग फिर फोटोज छांटो, पेज देखो रोज रात लगभग ११-१२ बज जाते थे, ऐसे में ब्लाग लिखने का टाइम ही नहीं निकाल पा रही थी। मुझे फेस्टिवल में दो लो
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मनाली में ऐसा रहा नया साल

इस बार नया साल जयपुर की बजाय मनाली की बर्फ से ढकी पहाड़ियों में मनाने का फैसला किया गया। तो नरेन्द्र और मैंने सामान पैक किया और निकल पड़े एक हफ्ते की छुट्टियों पर। लिखने की बजाय तस्वीरों में देखिए कैसी रही हमारी छुट्टियां। कई दिनों से यह मेल प्रकाशित
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तैनूं काफर काफर आखदे, तूं आहो आहो आख

पिछले कुछेक दिनों से थोड़े तनाव में थी, छुट्टियों से लौटकर आई तो लगा कि कहीं एक हवा सी बन रही है जो ठीक नहीं है। ऐसी बातें की जा रहीं थी जो सही नहीं थी। ये थोड़ा अजीब सा था, जब कहीं कुछ बोल रहे होते हैं और आप जानते हैं ये झूठ है। शाम को जब ये तनाव चे
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मुझे कुछ कहना है

हर आंख में आंसू और सीने में गर्व पोस्ट पर मेरे मित्र नवीन ने कमेंट लिखा है। यह कमेंट आपको सोचने पर मजबूर कर देता है कि अगर हम राजनेता नहीं चाहते , घटिया राजनीति नहीं चाहते तो क्या चाहते है। क्या हम फिर से किसी और की गुलामी चाहते हैं या फिर हम पाकिस्त