"प्रेम ही सत्य है"

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17 Jun 2010
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अपने देश के साँचें में अनफिट... !!!!!

कई साल विदेश रहने के बाद लगता है कि अब अपने देश के साँचें में फिट नहीं हो पाते....दोस्त बना कर उल्लू सीधा करने में माहिर नहीं है इसलिए लगता है कि हमें अपने देश में रहने का कोई हक नहीं है..... चालाकी...धूर्तता....स्वार्थ साधने की कला में कुशल नहीं तो यहाँ
Jun 17 2010 03:51 PM
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आज भी उसे इंतज़ार है .. !

एस.एम. बेहद खुश थी...बारटैंडर ने वोडका का तीसरा गिलास उसके सामने रख दिया था... तीसरे गिलास के बाद न पीने का वादा मन ही मन किया...लज़ानिया ठंडा हो चुका था...उसने काँटे से एक टुकड़ा काटना चाहा लेकिन चीज़ का लम्बा धागा खिंचता चला गया और उसने उसे वापिस प्लेट
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मन ही मन वे बिखर रहे थे....!

एक था मुन्ना , एक थी नन्हीं नट्खट मुन्ना, चंचल नन्हीं भाई बहन में कभी न बनती सुबह शाम झगड़े में कटती नए नए खिलौने आते मुन्ने को फिर भी न भाते तोड़-फोड़ करता था मुन्ना फिर भी था मम्मी का बन्ना नन्हीं की थी बस इक गुड़िया वही थी उसकी बस इक दुनिया नन्हे
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मेरे घर के आँग़न में

एक जून , मंगलवार की रात शारजाह एयरपोर्ट उतरे.. ज़मीन पर पैर रखते ही जान में जान आई... जब भी हवाई दुर्घटना की खबर पढ़ते तो एक अजीब सी बेचैनी मन को घेर लेती... फिर धीरे धीरे मन को समझा कर सामान्य होने की कोशिश करते.... लेकिन रियाद से दुबई आने से पहले एक
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काश.... शब्दकोष में ‘वाद’ शब्द ही न होता

ज़रूरी नहीं कि जो कहते नहीं,,,बोलते नहीं... या ब्लॉग पर लिखते नहीं...उन्हें समाज में हो रही घटनाओं से कुछ फर्क नहीं पड़ता.... सब अपने अपने तरीके से उन घटनाओं के प्रति अपने भाव प्रकट करते हैं...उन घटनाओं को देखते सुनते हुए कभी मौन धारण कर लेते हैं तो कभी
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गुस्सा बुद्धि का आइडेंटिटी कार्ड है

इस पोस्ट का शीर्षक फुरसतिया की पोस्ट ‘एक ब्लॉगर की डायरी’ से लिया गया है. नेट की परेशानी के कारण कुछ रचनाओं के प्रिंट आउट करवा कर पढ़ते हैं सो फुरसतिया पोस्ट को तो फुरसत होने पर ही पढ़ा जा सकता है.. पढती जा रही हूँ और सोचने के लिए कई विषय मिलते जा रहे
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बेबसी, छटपटाहट और गहरा दर्द

आज शाम भारत से एक फोन आया जिसने अन्दर तक हिला दिया. उम्मीद नहीं थी कि अपने ही परिवार के कुछ करीबी रिश्ते इस मोड़ पर आ जाएँगे जहाँ दर्द ही दर्द है. रिश्ते तोड़ने जितने आसान होते हैं उतना ही मुश्किल होता है उन्हें बनाए रखना. पल नहीं लगता और परिवार बिखर
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त्रिपदम (ग्रीष्म ऋतु के)

लू सी जलतीऋतु गर्मी की आईधू धू करती*किरणें तीलीसूरज की माचिसधरा सुलगी*सड़कें कालीतपती रेत जलेखुश्क हवाएँ * दम घुटता धूल में घर डूबादीवारें रोतीं * रेतीला सायादबी चहुँ दिशाएँघुटी हवाएँ
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त्रिपदम (हाइकु)

डरा कपोतबिल्ली टोह में बैठीबचेगा कैसे पंछी आज़ादआँख कान थे बंदध्यान मग्न था मैं-मैं या म्याऊँकरते प्राणी सबशेष हैं मूर्खसोचा मैंने भीखामोश हूँ क्योंबैठी जड़ सीक्या ऐसी हूँ मैंतटस्थ या नादानभावुक जीव सभी निरालेगुण औगुण संगस्वीकारा मैंने
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मेरे तो लगभग सभी दिन ऐसे ही खास होते हैं..!

आज न जाने क्यों सुबह नींद ही नहीं खुली.... विजय ऑफिस चले गए..बच्चे भी कब उठ गए पता ही नहीं चला.... छोटे की आवाज़ से नींद खुली कि चाय नाश्ता तैयार है मम्मी.... फ्रेश होकर किचन में गई तो मुस्कुराते हुए बच्चों ने ‘हैप्पी मदर्ज़ डे’ कह कर स्वागत किया... मन
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एक घर की कहानी ऐसी भी

सुमन दमकते सूरज को देखती तो कभी कार के खराब ऐ.सी को कोसती....आज कई दिनों बाद निकले सूरज देवता जैसे अपनी मौजूदगी का एहसास कराने की ठान कर उदय हुए थे...पिछले हफ्ते हल्की फुल्की फुहार से मिली शांति आज न जाने कहाँ काफ़ूर हो गई थी.... अम्माजी के लिए आँखों की
टैग: कहानी
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हम बुरा ही क्यों सोचते हैं.....!

ऑफिस के लिए विजय निकले ही थे कि इधर दुबई वाला मोबाइल बज उठा, सालिक का सन्देश था जिसमें टॉलगेट पार करने के लिए अब एक भी दहरम नहीं बचा था. वहाँ के आठ बजे का सन्देश मिला तो एक दम ख्याल आया कि शायद बेटे ने उसी वक्त टॉलगेट पार किया होगा... कल ही उसकी वार्षिक
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रेप फिश

मौसम बदलने की इस प्रक्रिया में ऐसे लगता है जैसे जलते तपते सूरज से बचने के लिए धरती रेत का आँचल ओढ़े इधर से उधर भाग रही हो... तेज़ धूप में झुलसते पेड़ पौधों को भी उसी आँचल से छुपा लेती है जैसे कोई माँ अपने बच्चे को अपनी गोद में ले लेती है...... उसी तरह हरेक
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रेतीली हवाओं में संगीतमय फिल्म

गुरुवार की शाम घर से बाहर जाने का जोश ठंडा पड़ गया ..... रेतीला तूफ़ान (सैण्ड स्ट्रॉम) ऐसा शुरु हुआ कि घर के अन्दर भी साँस लेना मुश्किल हो गया... जान गए कि अभी फिलहाल कुछ देर के लिए तो बाहर निकलना नामुकिन है....सो चाय नाश्ता करते हुए एक फिल्म देखना निश्चित
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ख़ानाबदोश ज़िन्दगी

नियमित न लिख पाने का एक बड़ा कारण है ख़ानाबदोश ज़िन्दगी... एक सूटकेस लिए कभी यहाँ तो कभी वहाँ... ब्लॉगजगत की पुरानी यादों ने झझकोरा तो एक पोस्ट के रूप में अपने ब्लॉग के बगीचे से एक नई कोंपल फूटी....14 अप्रेल को...सोचा तो यही था कि अब से नियमित लिखना शुरु
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भूली बिसरी यादों की खुशबू....

भूली बिसरी यादों की खुशबू फिर से मन को महकाने लगी.... भूली बिसरी यादें ! नहीं नहीं.......... यादें तो बस यादें होती हैं..शायद यादें कभी भुलाई ही नही जा सकती........खूबसूरत यादें...ज़िन्दगी की दिशाओं को महकाती यादें.... पिछले दिनों जाना कि जीवन प्याला जो
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'प्रेम ही सत्य है' ब्लॉग का जन्मदिवस

मोबाइल का अलार्म बजते ही सन्देश पढ़ा कि आज हमारे छोटे भाई के बेटे समर्थ का जन्मदिन है और अनायास याद आ गई अपने ब्लॉग़ की जिसका जन्म भी आज के ही दिन(27 अगस्त 2007) हुआ था... समर्थ सात साल का हुआ है और ब्लॉग मात्र दो साल का नन्हा सा बालक है जो दो साल का लगता
Aug 27 2009 12:36 PM
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समझदार को इशारा काफी !

आज माँ की बहुत याद आ रही है.... और उसका मौन... एक भी गलती हो जाने पर भयानक सज़ा मिलती....वह भी उसका अनंत मौन..... चारों दिशाओं में गहराती खामोशी.... और मेरे मन में हलचल.... मन ही मन चिल्लाती..... 'मम्मीईईईईईईईई ...... चिल्लाओ मुझ पर.... चीख चीख कर डाँ
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रियाद की शान -- बुलन्द ईमारतें

खाड़ी के देशों में साउदी अरब सबसे अलग अपने ही कानूनों के साथ चलने वाला देश है. मक्का-मदीना जैसे पवित्र तीर्थ स्थान वाले इस देश में दुनिया भर से हज करने के लिए लोग आते हैं...यहाँ पर्यटन के लिए वीज़ा की कोई गुंजाइश नहीं है.. हज और उमरा के अलावा लोग यहाँ
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रेगिस्तान का रेतीला आँचल

धरती माँ के बेलबूटेदार हरयाले आँचल की अपनी ही सुन्दरता है....खुश्बूदार रंगबिरंगे महकते फूल, तने खड़े छायादार पेड़, आँखों को सुकून देती हरी भरी नर्म दूब धरती के आँचल की निराली छटा है.... अरब पहुँचते पहुँचते धरती के आँचल के रूप रंग दोनो ही बदल जाते हैं..
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किसके दिल में है क्या किसे पता

उड़न तश्तरी की आज की पोस्ट ने इस गीत की याद दिला दी .....यह गीत सुन रहे है जो समीरजी की आज की पोस्ट पर सही लगा.....आप भी सुनिए लेकिन वहाँ से लौटते हुए ..... अबूझमाड़! --- मात्र यह टिप्पणी किस ब्लॉगर का हो सकती है....यह भी बताइए..... देखो जो गौर से चेहर
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बच्चों का दुस्साहस या उत्सुकता

हर उम्र में बच्चे कुछ न कुछ नया जानना चाहते हैं...ज्यों ज्यों बच्चे बड़े होते है...उनकी उत्सुकता भी बढ़ती जाती है...किशोरावस्था में तो दुस्साहसी हो जाते हैं.... डर तो जैसे जानते ही नही........ इस उम्र में जोश तो होता है लेकिन होश खो बैठते हैं। विद्युत
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अपने वजूद के होने का एहसास एक नई उर्जा भर देती है.

दुबई से निकलते वक्त हमने पति महोदय से कहा कि साउदी के बॉर्डर तक हम ड्राइव करते हैं...लेकिन मना करते हुए खुद ड्राइव करने लगे.... हमने भी बहस न करते हुए चुप रहना बेहतर समझा और दूसरी सीट पर जा बैठे... मन ही मन सोचने लगे कि यह भी एक तरह से ताकत का खेल है
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नीर क्रीड़ा

छोड़ो कल की बातें , कल की बात पुरानी.... आज हम दुबई के सबसे बड़े दुबई मॉल में 'डांसनिंग फाउण्टैन' देख कर आए, दुबई की सबसे ऊँची ईमारत बुर्ज दुबई के सामने अलग अलग भाषाओ के गीतों पर झूमते हुए पानी को देख कर हम भी झूम उठे... नीर क्रीड़ा कहें या नीर नृतक अभी
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दूर के ढोल सुहावने.....!

आज बस जी चाहा कि किसी अनाम की टिप्पणी पर हम भी कुछ कहें.... काश ... सरहदें न होतीं .....सिर्फ अपने परिवार से दूर होने की चाहत से नहीं बल्कि कई ऐसे बिखरे परिवारों के दर्द को देख कर....जो चाह कर भी एक साथ नहीं रह सकते..... पिछली पोस्ट पर एनोनिमस महोदय/
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काश ..... सरहदें न होतीं..... !

गर सरहदें न होती तो इस वक्त बेटा वरुण भी अपने पापा के साथ दमाम से दुबई आ रहा होता. पूरा परिवार लम्बे अर्से के बाद एक साथ होता....एक साथ मिलकर उसका जन्मदिन मनाते..... लेकिन ज़रूरी नहीं कि जो हम चाहें सब वैसा ही हो..... अक्सर ऊँची शिक्षा के लिए बच्चे वि
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दिल्ली से दुबई

दुबई में हूँ छोटे बेटे के साथ ... जहाँ छोटे बेटे से मिलने की खुशी है वहीँ बड़े बेटे से बिछुड़ने का दुख भी है. माँ बनते ही औरत की बाकि सभी भूमिकाएँ धूमिल होने लगती है. शायद तभी माँ को सबसे ऊँचा दर्जा दिया जाता है. अचानक हिन्दी फिल्म 'औरत' का एक गीत याद
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फिर से मिलने की ललक

याद आई अपने बोंजाई पौधे की जो पिछली बार आखिरी साँसें ले रहा था.....पूरा पौधा सूख कर कंकाल सा लग रहा था....मरते हुए पत्ते की अंतिम साँस जैसे अटकी हुई थी हमसे मिलने को .... जिसे देखते ही दिल दहल गया..... चाह कर भी बेटे को कुछ न कह पाई ...हमारी भीगी आँख
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ज़िन्दगी के फलसफ़े

पड़ोस में दीपा जी रहती हैं जिनके दोनों बच्चों की शादी हो चुकी है. दोनो बच्चे अपने-अपने घर संसार में खुश हैं. दीपाजी का दिल और दिमाग अब एक नए तरह के खालीपन से भरने लगा. बरसों से घर गृहस्थी को ईमानदारी से निभाते निभाते वे अपने आप को भूल चुकी थी. उस खाली
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पदम तले त्रिपदम

हरिद्वार के पतजंलि योगपीठ में प्रकृति के साथ बिताए कुछ पल यादगार बन गए। बेटे वरुण ने पूरे आश्रम में घूम घूम कर सभी फूल पौधों के चित्र खींचें. उसकी स्वीकृति लेने के बाद इन तस्वीरों में त्रिपदम सजा दिए. पदम तले त्रिपदम पले हैं सुगन्ध भरे नवयौवना गुलाना
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एक कोशिश

महीनो से ब्लॉग बैराग ले कर उचटते मन को सही राह दिखाने में ब्लॉग जगत के कई मित्रों ने कोई कसर नही छोड़ी... आज अनायास ही मन में लहर उठी, शायद संगीत सुरा का सुरूर ..... चिट्ठाचर्चा पढ़ने लगे और मन में आया कि टिप्पणी देने की बजाए एक पोस्ट ही लिख दी जाए....
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प्रहार को रोकें और प्रहरी बनें

प्रकृति पर होते प्रहार को हर पल रोकें प्रहरी बन बचाएं धरती को हर पल सोचे ! कल शनिवार 28 मार्च 2009 पूरी दुनिया में ‘अर्थ ऑवर’ मनाकर धरती को ग्लोबल वॉर्मिंग से बचाने का स्कंल्प लिया गया था. कह सकते हैं कि साढ़े आठ से साढ़े नौ तक सिर्फ एक घंटे के लिए प्र
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कुछ मेरी कलम से भी ......

उम्र.... कोरे काग़ज़ जैसी कभी हरकत करती उंगलियों सी कभी काँपती कलम सी ..!! उम्र ..... खाली प्याले सी कभी लबालब झलकती सी कभी आखिरी बूँद को तरसती सी... !! उम्र..... सिगरेट के धुएँ सी कभी लबों से कई रूप लेती सी कभी सीने में सुलगती सी.. ! उम्र..... पतझर का
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लिंक्स टू दिस पोस्ट !

पिछली पोस्ट को ज़ारी रखते हुए कायदे से 'सफ़र का अगला सफ़ा' दर्ज करना था लेकिन उस पोस्ट की टिप्पणियाँ पढते पढ़ते नीचे नज़र गई तो 'लिंक्स टू दिस पोस्ट' में लगे तीन ब्लॉग खोल कर पढ़ने का लालच न रोक पाई..... पारुल और कंचन दोनो ही प्यारी लगती हैं ....पारुल छोटी
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सफ़र के कुछ सफ़े - 1

ब्लॉग जगत के सभी मित्रों को नमस्कार.... ! 6 अक्टूबर 2009 को अपने देश की ज़मीन पर पैर रखते ही सोचा था कि हर दिन का अनुभव आभासी डायरी में उतारती जाऊँगी लेकिन वक्त हथेली से रेत की तरह फिसलता रहा....आज पूरे चार महीने हो गए घर छोड़े हुए... घर कहते ही मन सोच
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आपकी अभिव्यक्ति पर मेरे भाव

दूर दूर तक गहराते कोहरे में अपने वजूद को गुम होते देख कर स्तब्ध रह जाना और फिर उसी वजूद की तलाश में निकल जाना .... बस ऐसे ही दिन पर दिन , हफ्ते दर हफ्ते और महीनों निकल गए.... कोहरा, कलम और मैं जब एक जुट हुए तो शब्दों को एक नया आकार मिलने लगा जिसे आप
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कोहरा, कलम और मैं

कोहरा सर्द आहें भरता हुआ अपने होने का एहसास कराता है... दूर दूर तक फैले नीले आसमान के नीचे मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लेता है , उसके आगोश में कसमसाती मैं और मेरे हाथों में कराहती कलम जिसके गर्भ में शब्द आकार लेने से पहले ही दम तोड़ते जा रहे हैं.... नहीं
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नेह निमंत्रण सस्नेह स्वीकर...! ...

मन हर्षायानिमंत्रण जो पायाछाया उल्लासउर्जा पाऊँगीहर एक स्त्रोत सेनए भाव कीसौहार्द चर्चा के लिये नेह निमन्त्रण सभी ब्लॉग लिखती महिला को नेह निमन्त्रण हैं सौहार्द चर्चा मे आने का । मिलने का दिन रविवार ९ नवम्बर तय किया गया हैं । समय और स्थान पता करने के
Nov 04 2008 10:39 PM
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आशा का दीप जलाया जाए तो प्रकाश होगा ही...

आजकल हम दिल्ली में हैं.....दुबई से चलते हुए मन में कई मंसूबे बाँधे थे कि भारत भ्रमण के बहाने ब्लॉगजगत की परिक्रमा ज़रूर करेंगे लेकिन यहाँ आकर दिन में तारे नज़र आने लगे... सबसे पहले तो एयरपोर्ट पर उतरते ही प्रीपेड टैक्सी के काउंटर पर ही मज़ेदार अनुभव हो
Nov 01 2008 01:05 AM