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सस्ता शेर

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06 Apr 2010
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खुदा कसम.... बहुत ही सस्ता

मच्छरों ने हाय ये क्या कांड कर डाला,अच्छे भले आदमी को भांड कर डाला....दफ्तर की उलझने क्या पहले ही कुछ कम थीं,गृहस्थी के बोझ ने तो हमें सांड कर डाला....देखा जो हमने दोस्तों को तितलियों के साथ,अपने भी दिल ने फौरन डिमांड कर डाला.......किस्मत थी लेकिन फूटी,
 
श्रेयार्चन
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डाली..

डाली डाली डाली हमने छान डाली,मगर ज़ालिम ज़माने ने काट डाली,वो डाली, जिसपे हमने नज़र डाली!!
 
ऋतेश त्रिपाठी
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किस!!!

किस किस्सकी महफिल में.. किस किस्सने किस किस्सको किस-किस तरह किस किया... एक हम है जिसने हर किस को मिस किया.. और एक आप हो जिसने हर मिस को किस किया..
 
ऋतेश त्रिपाठी
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सस्ती शायरी के फ़ायदे

ऐ दोस्त तू भी कर सस्ती शायरी मेरी तरह तेरा भी नाम हो जाएगा लोग फेका करेंगे अंडे-टमाटर शाम की सब्जी का इंतजाम हो जाएगा.
 
विजयशंकर चतुर्वेदी
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आशिक का जनाज़ा उर्फ़ महबूबा की राहत

द जनाज़ा ऑफ़ महबूब निकला फ्रॉम द गली ऑफ़ महबूबा विथ लोट्स ऑफ़ जोर शोर सुनकर महबूबा झांकी फ्रॉम द डोर एंड बोली- 'आखिर मर ही गया हरामखोर'.
 
विजयशंकर चतुर्वेदी
Dec 29 2009 11:38 AM
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देके अमन का पैगाम करते हैं!!

सुबह करते हैं, शाम करते हैं, देके अमन का पैगाम करते हैं, हमें ज़रूरत ही नहीं पैखानों की, खुली हवा में खुलेआम करते हैं, हम चाहते हैं देश में रेल बंद हो, कि पटरियों पे लोग तमाम करते हैं, जब कभी मैखाने में चिल्ला पडे, काँपकर साकी-ओ-जाम करते हैं, क्या हु
 
ऋतेश त्रिपाठी
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सस्ता शेर

अर्ज है.... लाल दीवार पर लिखा था मियां गालिब ने... लाल दीवार पर लिखा था मियां गालिब ने... कि 'यहां लिखना मना है।'
 
श्रेयार्चन
Oct 14 2009 07:31 PM
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चन्द शेर पेशे ख़िदमत हैं मुलाहिज़ा फ़रमाएंगे?

दोस्ती इन्सान की ज़रूरत है ! दिलों पे दोस्ती की हुक़ुमत है !! आपके प्यार की वजह से ज़िन्दा हैं ! वर्ना खुदा को भी हमारी ज़रूरत है !! इससे पहले कि दिल में नफ़रत जागे, आओ इक शाम मोहब्बत में बिता दी जाय करके कुछ मोहब्बत की बातें इस शाम की मस्ती बढ़ा दी जाय न
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कुछ अच्छे किस्म के सस्ते शेर

कुछ तो जीते हैं जन्नत की तमन्ना लेकर !कुछ तमन्ना-ए-ज़िन्दगी सिखा देती है !!हम किस तमन्ना के सहारे जीयें !ये ज़िन्दगी हर तमन्ना टुकरा देती है !!---------------------------------------आपकी याद में मुरझाए फूल पर बहार वही है !आप दूर रहते हों मगर  
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सस्ता शेर

किस्सा यूँ है कि एक जाट सुन्दरी को एक ब्राह्मण युवक से प्यार हो जाता है. लड़का स्वास्थ्य विभाग में नौकरी करता था और उस जाटनी को समझा बुझा के वापस लौटा देना चाहता था. तो उस युवक ने उस युवती को क्या सुझाव दिया, देखते हैं-हरयाणा के ट्रक की मेरी कार से टक्कर
 
ऋतेश त्रिपाठी
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दिलों से खेलने का हुनर हम नहीं जानते

दिलों से खेलने का हुनर हम नहीं जानतेइसलिये इनकी बाज़ी हम हार गये,मेरी ज़िन्दगी से शायद उन्हें बहुत प्यार थाइसीलिये मुझे ज़िन्दा ही मार गये,
Jul 24 2009 01:23 PM
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निहायत ही सस्ता शेर

आज के बाद तुम मुझे कॉल मत करना ! न एस एम एस करना ,बात भी नहीं करना !! मिलने की कोशिश तो भूल कर भी मत करना ! क्यौंकि डॉक्टर ने मुझे !! मीठी चीज़ से दूर रहने को कहा है !!!!
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तू मुझको टिपिया सनम, मैं तुझको टिपियाउं

इन दिनों हमारे ब्‍लाग जगत में एक अजीब सी परंपरा चल रही है । ये परंपरा है महान बनाने की परंपरा । अ की टिप्‍पणी ब को मिलती है कि आप महान हैं तो जवाब में ब की भी नैतिक जिम्‍मेदारी होती है कि वो भी अ को ऐसी ही टिप्‍पणी दे । सब एक दूसरे को महान बनाने में
 
पंकज सुबीर
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ब्‍लागिंग ब्‍लागिंग खेलिये सुबह दोपहर शाम

हमारे एक मित्र को डाक्‍टर के पास ले जाना पड़ा दरअसल में उनको मानसिक कब्‍ज़ हो गया था । शारीरिक कब्‍ज़ तो आप जानते ही हैं । मानिसक कब्‍ज़ में दिमाग में विचार फंस जाते हैं और भड़ास की तरह बाहर नहीं निकलते । डाक्‍टर ने उनको जो पर्चा दिया वो प्रस्‍तुत है
 
पंकज सुबीर
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घर के बुद्धू लौट के घर को आजा

बहुत दिनों से इस गली में आना ही नहीं हुआ । आज बहुत दिनों बाद आया हूं और एक कुंडलिनी टाइप की रचना पेल रहा हूं । कुडलिनी की विशेषता ये होती है कि जिस शब्‍द से शुरू होती है उसी पर समाप्‍त होती है । माही जी की ना गली टी ट्वन्‍टी में दाल फिर भी हैं बेशर्म
 
पंकज सुबीर
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मोहब्बत जुर्म नहीं अगर की जाए उसूल से

मोहब्बत जुर्म नहीं अगर की जाए उसूल से ख़ुदा को भी तो मोहब्बत थी अपने रसूल से लेकिन अबकी बार ईद पर हमारे सितारे हमारी हड्डियां तुड़वा गए हम चाँद के नजारे में खोए थे और चाँद के अब्बू वहीं पर आ गए. (कहीं से उड़ाया है, जाओ नहीं बताते)
 
विजयशंकर चतुर्वेदी
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"लालू" के सपोर्ट जैसा कुछ समझता है

कभी कूड़ा कभी करकट कभी वो कुछ समझता है सिवा आशिक़ मेरा हमदम मुझे सबकुछ समझता है मुझे इस तरह करता ट्रीट है हर तीसरे दिन वो कि गोया "लालू" के सपोर्ट जैसा कुछ समझता है
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है बम के साथ साथ मुहब्बत भी एटमी !!

गोरे मुअशियात* में आगे निकल गये, हम भी कागज़ात में आगे निकल गये, दूल्हा बना गई हमें शादी रक़ीब की, हम इस क़दर बारात में आगे निकल गये, है बम के साथ साथ मुहब्बत भी एटमी, हम दिल के तज़ुर्बात में आगे निकल गये, नाके में कुछ अटक से गये हैं गरीब लोग, डाकू त
 
ऋतेश त्रिपाठी
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सस्ता शेर

बाज़ार मंदा है, पर ज़िंदा है अभी.. पेश हैं ये चार शे'र- कुछ तमंचे शेष चाकू हो गये, यार मेरे सब हलाकू हो गये, ये इलेक्शन में जो हारे हर दफ़ा, खीझकर चंबल के डाकू हो गये, नग्न चित्रों का किताबों में था ठौर दुनिया समझती थी पढाकू हो गये, देख लो बापू ये बं
 
ऋतेश त्रिपाठी
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'नन्हें' कसाई...

जिसमें शामिल साले साली, सास के आने की बात, उससे बढकर और क्या हो दिल के घबराने की बात, सस्ते!हम फ़ाकामस्तों को नादीदः मत समझ, भूख में होठों पे आ ही जाती है खाने की बात, कूचा-ओ-जानाँ में जबसे सिर फ़ुटव्वल हो गई, अहतियातन अब नहीं करते वहाँ जाने की बात,
 
ऋतेश त्रिपाठी
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क़लम & कलम...

यूँ भी नौजवानों से मायूस है अहल-ए-क़लम, जबकि मेरा मशवरा एक नौजवाँ को भा गया, मैनें कहा हज़रत क़लम पर भी तवज्जो दीजिए, अगले ही हफ़्ते नौजवाँ कलमें बढा कर आ गया !!
 
ऋतेश त्रिपाठी
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बददुआ...

 
ऋतेश त्रिपाठी
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मैं मर भी न पाऊँगा अब ज़हर खाके...

मैं गाता हूँ जब मूड अपना बना के, गधे रेंकते हैं मेरे घर में आ के, मेरी नौकरी जब से छूटी है तब से, निकलते हैं सब यार बटुआ छुपा के, हुई बंद बनिये की भी अब उधारी, मैं मर भी न पाऊँगा अब ज़हर खाके, मैं कड़का सही तुम मेरे घर तो आओ, खिलाऊँगा तुमको मैं मुर्ग
 
ऋतेश त्रिपाठी
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आम के आम

गर्मी हुई आँधी चली पेड़ों से गिरे आम । आइए जी चटनी खायें सुबह और शाम। (कृपया इसको पूरा और ग़ज़ल का रूप देने में मदद करें । अच्छा इनाम भी पायें!)
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उसे उर्दू जो आती तो मुझे कच्चा चबा जाता....

ग़रीबी ने किया कड़का, नहीं तो चाँद पर जाता, तुम्हारी माँग भरने को सितारे तोड़कर लाता, बहा डाले तुम्हारी याद में आँसू कई गैलन, अगर तुम फ़ोन न करतीं यहाँ सैलाब आ जाता, तुम्हारे नाम की चिट्ठी तुम्हारे बाप ने खोली, उसे उर्दू जो आती तो मुझे कच्चा चबा जाता
 
ऋतेश त्रिपाठी
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मुंशी मुनक़्क़ा साहब का अगला कता

आज मुंशी मुनक़्क़ा साहब पिछली ख़ता को माफ़ फ़रमाते हुए अगला कता फ़रमाते हैं- __________________ __________________ ______________ ____________ _____________ _______________ ______________ मैं क्यों बनवाऊँ मोची से ख़रीदूं क्यों मैं बाटा से जुमा के दिन त
 
विजयशंकर चतुर्वेदी
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सस्ते पे सस्ता

हर सस्ते शेर में दारू नहीं होता। जैसे कि हर बैल मारू नहीं होता।
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पेश है मुंशी मुनक़्क़ा साहब का एक कता

एक मजाहिया फिल्म अभिनेता हुए हैं मुंशी मुनक़्क़ा . मुग़ल-ए-आज़म और पाकीजा जैसी फिल्मों में उन्होंने काम किया था. मुनक़्क़ा साहब सिर्फ अभिनेता नहीं थे बल्कि मजाहिया शायरी भी किया करते थे. पेश-ए-खिदमत है उनका कता- कभी इज्ज़त का मिलता है कभी ज़िल्लत का मिलता
 
विजयशंकर चतुर्वेदी
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पव्वा संबन्धी शेर

ज़माने से न दब ग़ालिब तू उसके लिए हो जा हऊवा खीसे को कर ज़रा ढीला, हलक से उतर ले पव्वा !!
 
मुनीश ( munish )
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बाइक सम्बन्धी शेर

मुद्द - आ है कमबखत ये अपनी-अपनी लाइकिंग का बुरा है पै क्या कीजे इस शौक़ ऐ अज़ीम बाइकिंग का
 
मुनीश ( munish )
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ऐसे वैसे कैसे

कैसे कैसे ऐसे वैसे हो गए ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गए
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एक बार फ़िर

मेरे शुरुआती शेर रोमन स्क्रिप्ट में हैं चूंकि तब हिन्दी टाइप के जुगाड़ से खाकसार वाकिफ़ न था (अभी भी 'खाक ' के नीचे नुक्ता कैसे बिठाऊँ ये राज़ है मेरे लिए )। बहरहाल , उन तमाम शेर- चीतों , गीदड़ - बघीरों को देवनागरी में लाना चाहता हूँ ताकि देवता भी इन
 
मुनीश ( munish )
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सस्ता शेर

इ मली से खट्टा नीम्बू , नीम से करेला कड़वा और जो न पीवे न पीन दे ऐसा यार भड़वा
 
मुनीश ( munish )
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'सेविंग द' फिग लीफ़' शायरी

नक़्श हुआ कीजे फरियादी किसी की शोखिए तहरीर का हर जतन से रखियो सलामत पत्ता मगर अंजीर का
 
मुनीश ( munish )
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स‌स्ता शेर के लिएइंतखाब के नवाब

देख लीजिये फिर ये जनाब आये हैं स‌ाथ अपने पांच स‌ाला इंकलाब लाये हैं रोटी की शिकायत क्या खाक करते हैं ये तो फिरंगी जूस का स‌ैलाब लाये हैं आपको फुर्सत नहीं ढाई आखर पढ़ने की ये आलमी भाईचारे का किताब लाये हैं जुल्म-सितम की अब कभी बात न होगी ये अमन-ओ-चैन
 
इरफ़ान
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आ जाये मुसीबत....

आ जाये मुसीबत तो हटाये नहीं हटती, उम्र और महँगाई घटाये नहीं घटती, इश्क़ को बैंक बैलेंस ज़रूरी है दोस्त, कँगलों से लड़की पटाये नहीं पटती...
 
ऋतेश त्रिपाठी
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ककहरे का कहर

इस दर पे सीखा है ज़ालिम, मैंने ब्लॉगिंग का ककहरा! इस ब्लॉग पे सीखा है ज़ालिम, मैंने ब्लॉगिंग का ककहरा! मना लेन दे ऐ खबीस यहीं मुज्को ,दीवाली ईद, दशहरा !!
 
मुनीश ( munish )
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साथियो , अबे मेरे कलेजे के टुकडो सुनो.....

दारू छनती बड़ी जगह ,पर नम्बर वन तो सोलन है , सस्ता - शेर कोई ब्लॉग नहीं ये तो इक आन्दोलन है !
 
मुनीश ( munish )
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इत्ता गंदा मत सोचा कर...

जनाब फ़रहत शहज़ाद साहब से माफ़ी की गुज़ारिश के साथ- उल्टा सीधा मत सोचा कर, पिट जावेगा मत सोचा कर, 'भ' से भूत भी हो सकता है, इत्ता गंदा मत सोचा कर, दिन में बीसों बार फ़टी है, इसका फ़टना मत सोचा कर, शाम ढले घर भी जाना है, अद्धा पव्वा मत सोचा कर, लड़की
 
ऋतेश त्रिपाठी
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बिना ऊंट के रेगिस्तान मुकम्मल नहीं होता

बिना ऊंट के रेगिस्तान मुकम्मल नहीं होता बिना मुर्दे के कब्रिस्तान मुकम्मल नहीं होता बिना मुश के पाकिस्तान मुकम्मल नहीं होता और, तारीख गवाह है, बुत परस्तों के लिए बिना बुद्ध के बामियान मुकम्मल नहीं होता हर अच्छाई के बाद बुराई भी जरूरी है, क्योंकि बिना
 
इरफ़ान