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20 Apr 2010
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रक्तकुंड

१ जिस्म पर बम बंधवा वो जा रहा है खुदा से मिलने कैसा खुदा है यार तू बिना मरे मारे मिलता ही नहीं २ अल्लाह बम बनाता है ईसा मिसाइल भगवान रचता है चक्रव्यूह दुनियां डरती जाती है दुनियां मरती जाती है ३ दुनियां भर में बिछी है लाशें लाशों की जेब में है
 
Avanish Gautam
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न जाने क्यों पीता हूँ ..

सिगरेट की तरह उँगलिओं में फंसा तुम्हारा नाम सुलगता है हर कश के साथ जलता है जिगर और चढता है नशा सारे कमरे में भर जाती हो जब धुँए की तरह तुम तब मिलता है सुकून हर सांस के साथ आती जाती हो तुम जानता हूँ यह धुँआ धोखा है हाथ नहीं आएगा फिर भी न जाने क्यों पी
 
Avanish Gautam
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सुबह आ ही जाएगी

रात होने से पहले कहीं खो कर जो लौट आते हैं उन्हे क्या पता रात की कसीदाकारी देखो मेरे पूरे वज़ूद पर बने हैं शानदार बेल-बूटे सुईयां भी चुभी है बे-हिसाब उनका दर्द है लाज़वाब नहीं लौटना है मुझे कहीं रात खत्म होगी तो सुबह आ ही जाएगी
 
Avanish Gautam
टैग: poetry
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प्रेम

बादलों की गड़गड़ाहट में वो कौन सा शब्द है बारिश जिसे जड़ों पर लिखती है जिसे पढ़ा जाता है डालियों पर पत्तियों की तरह
 
Avanish Gautam
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यह जरूरी भी नहीं

अगर पहाडों के रोने से बनी है नदी तो चिडियों के हँसने से बना होगा आकाश और यह जरूरी भी नहीं कि महज़ प्यार करने से नहीं बनती है दुनिया
 
Avanish Gautam
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दुख

किसी गर्भाशय में नौ महीने रह कर नहीं जन्मता है वो न है बैठता है गिद्ध की तरह किसी सूखे वृक्ष पर मुर्दे के इंतज़ार में दुख में इंतज़ार इंतज़ार में दुख बहुत फर्क है लेकिन वह वहाँ भी नहीं होता सांस छोड देने के बाद सांस लेने के लिये उतावले फेफडों के अंकुचन
 
Avanish Gautam