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14 Jun 2010
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‘राजनीति’ में राजनीति

फिल्म राजनीति चार जून को परदे पर आई तो इससे जुड़े विवाद एकबारगी थम गए। फिल्म देखकर लौटे सिने प्रेमियों के मुताबिक राजनीति में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का अक्स दिखलाई नहीं पड़ता। हालांकि, कांग्रेसी कार्यकर्ता कुछ ऐसा ही दावा कर रहे थे। वे शोर मचाते
 
खंभा
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अजीब विरोधाभास

कीर्ति चौधरी की एक कविता पढ़ें। फिर याद करें, राष्ट्रमंडल खेल के बाबत किए जा रहे विकास कार्यों को। यकीनन, अजीब विरोधाभास पाएंगे।प्रगतिअभी कुछ ही दिन तो बीतेइधर से निकलेकैसा सुनसान था !...और अब ये नए रास्ते हर ओरछज्जों, बालकनियों से उठता हुआ शोरलॉन पर
 
खंभा
May 29 2010 04:17 PM
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मेरे राम

तुमसे इक प्रश्न पुछूं मेरे रामतुमने स्वयं क्यों नहीं दी अग्निपरीक्षा.......तुम्हारी चलाई इस परंपरा मेंआज भी कितनी औरतों को देनी पड़ रही हैं अग्निपरीक्षाएं.....इतिहास दुहरा रहा है स्वयं कोअंतहीन-सीमाहीनतुम्हें कैसे मांफ कर दूंमेरे रामअरसा पहले इस कविता को
 
खंभा
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आम आदमी का नहीं यह शहर

सरकार को खूबसूरत दिल्ली दिखाना है। इस बहाने हक की लड़ाई लड़ने वालों को महानगर से हटाया जा रह है। कई दिन हुए जंतर-मंतर का वजूद खत्म कर दिया गया। सरकार के खिलाफ अब यहां कोई चौबीस घंटे आवाज नहीं उठा सकता। ऐसा लगता है कि यहां से मुखर होता असहमति का स्वर
 
खंभा
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नजर पैदा कर

इस तस्वीर को देखकर इक बात याद आ गई। वह यह- शौके दीदार अगर है, तो नजर पैदा कर...
 
खंभा
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एक खत शांति के लिए

इंटरनेट पर तफरीह के दौरान यह खत मिला। बढ़िया लगा। सो यहां चस्पा कर रहा हूं।
 
खंभा
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महिला दिवस पर रजिया सुल्तान

चांदनी चौक के नजदीक तुर्कमान गेट से एक पतला रास्ता बुलबुली खान की तरफ जाता है। यही वह इलाका है जहां रजिया सुल्तान यानी इतिहास की पहली महिला सुल्तान को दफनाया गया था। आज इस कब्रगाह की हालत देखेंगे तो महिला दिवस का डंका बजाने वालों की हकीकत समझ में आएगी।
 
खंभा
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जीवन में होली

हर कहीं छुपा है होली का रंग। अब, शौके दीदार अगर है तो नजर पैदा करइस नजर से देखेंकला में होली का बिंबएक जरूरी परिपाटी होली कीसाथ का त्योहार
 
खंभा
Mar 03 2010 05:06 PM
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भांग- एक रंग कई चेहरे

यहां भी है भांगदेशी पदार्थ को गटक करने की नई रिवायतइधर भी देखेंजड़ की तरफ लौटेंभांग का सही ठिकानाइस तरल पदार्थ का मुरीद समाज का हर वर्ग है। होली का त्योहार हो तो फिर क्या कहने हैं। तस्वीर सही बताती है। बज्र देहात के चौपाल से ड्राइंग रूम तक भांग का सफर-
 
खंभा
Mar 02 2010 03:01 PM
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वादी में पहली बर्फबारी

ये दिन क्या आएलगे फूल खिलने बसंती-बसंती हुए सारे सपने
 
खंभा
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आखिर भाजपा में क्यों जाऊं ? गोविंदाचार्य

दलीय राजनीति से परे हो गए के.एन. गोविंदाचार्य जवाबी सवाल पूछ रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी में मैं क्यों जाऊं ? इसमें उनका जहां सवाल है वहीं जवाब भी है। सवाल यह कि भाजपा जिसे उन्होंने सोच-समझकर नौ साल पहले छोड़ दिया, वहां अब क्यों जाना चाहिए ? जाहिर है कि
 
खंभा
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नया वर्ष, नई आकांक्षाएं

लो आ गई नई उम्मीद- नया साल मुबारक हो।आप जैसा चाहें, वैसा हो। आप जैसा बनाएं, वैसा बने।
 
खंभा
Dec 31 2009 05:13 PM
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पीला जो रंग है

इक साथी ने कहा कि पीला भी कोई रंग है। रोग का सूचक है। तब हमने कहा,पीला ही रंग है- जैसे यह फूल। जैसे कि हल्दी आदि-आदि। कभी पराग को देखा है? इस शहर में तो लोग पराग भी नहीं जाते-अब क्या रहें! तपाक से इक अन्य साथी ने कहा- न जानें अपनी बला से। उससे पराग क
 
खंभा
Dec 29 2009 11:43 AM
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सड़क के पार

मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है। क्योंकि, इस तरह एक उम्मीद-सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो, सड़क के उस तरफ। गिरींद्र के ब्लॉग पर यह पंक्ति टंगी है। हर बार नई मालूम पड़ती है। सो यहं भी लागा दिया।
 
खंभा
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अब वो बात कहां

के कैमरे में कैद कश्मीर वादी की कुछ पुरानी तस्वीरें। हालांकि अब वो बात कहां! शाम ढलने पर शिकारा से हाउस बोट की तरफ जाते लोग। वादी में चैन से अपनी फसल काटता किसान वादी में घूमते हुए फिल्म "यहां" का इक संवाद खूब याद आता रहा- कैप्टन अमन: यकीन नहीं होता
 
खंभा
Dec 29 2009 11:43 AM
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क्यों गए हबीब ?

हबीब तनवीर रंगमंच की दुनिया का वह चेहरा था, जिससे आंदोलन की ताप अंत समय तक महसूस होती रही। अब वे नहीं रहे। हालांकि, वे अभी जीना चाहते थे। अपने संघर्ष के दिनों को किताब की शक्ल देने में जुटे थे। सुना है इक भाग लिखा भी है, पर किताब पूरी न हो सकी। आखिर
 
खंभा
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खारे पानी के नीचे का गंदा

उत्तरी दिल्ली के कुछ इलाकों में सप्लाई का पानी पीने योग्य नहीं है। मुखर्जी नगर, परमानंद कॉलोनी, ढक्का आदि इलाकों में लोगों को खरीद कर पानी पीना पड़ रहा है। प्रवासी छात्रों की इन कॉलोनी में कुछ-एक दिन पहले छात्र आपस में बतिया रहे थे- ‘गंदा पानी सप्लाई
 
खंभा
Dec 29 2009 11:43 AM
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रोमांच का स्थल सिनेमाघर

दिल्ली में कभी मोती सिनेमाघर का जलवा था। यह चांदनी चौक इलाके में स्थित है। पुराने लोग बताते हैं कि यह राजधानी के पुराने सिनेमाघरों में से एक है। शायद सबसे पुराना। सिनेमाघरों पर दृश्य-श्रव्य माध्यम से सराय/सीएसडीएस में शोध कर चुकीं नंदिता रमण ने कहा,
 
खंभा
Dec 27 2009 12:26 AM
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भीड़ा का एकांत स्थल ‘ रीगल ’ सिनेमाघऱ

फिजूल की बात लग सकती है ! पर ताज्जुब न हो, कई बार ऐसा होता है कि सिनेमाघर आपको उस शहर की ठीक-ठीक उम्र बतला दे। अब दिल्ली के कनॉट प्लेस में आबाद रीगल सिनेमाघर को ही लें। यह इमारत सन् 1920 में तैयार हुई थी। इसकी काया वास्तुकार वाल्टर जॉर्ज की दिमागी उप
 
खंभा
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इक कड़ी की अंतिम तस्वीर

प्रभाष जोशी के करीबी लोग बताते हैं कि उनका 73वां जन्म दिन ऐसा पहला जन्मदिन था, जिसे उन्होंने राजी-खुशी मनाया। इससे पहले तक तो वे दबाव से ही मनाते आ रहे थे। सन् 1997 में पहली बार उनका साठवां जन्म दिन इंदौर में मनाया गया था। तब से यह सिलसिला जारी था। य
 
खंभा
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ऐसी भी क्या जल्दी थी

एक शाम हिमांशु का फोन आया। उसने कहा, “क्या करें! प्रभाष जी तो हाथ ही नहीं आ रहे हैं। अब बिना बातचीत के रिपोर्ट कैसे बनाएं।” तत्काल उनकी (प्रभाष जोशी) माताराम की इक बात दिमाग में चक्कर काटने लगती है, जिसका जिक्र स्वयं उन्होंने अपने कागद कारे में किया
 
खंभा
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छोटी-छोटी बातों के मतलब बड़े

दफ्तर से निकलने की तैयारी अभी कर ही रहा था कि एक साथी ने पूछा- संजीव गया क्या ? दूसरे ने कहा, “ हां, वह किसी मेहरारु वगैर की बात कर रहा था। इsके होवे है ? तभी जोर की हंसी आई। लोग खूब हंसे। सवाल करने वाले साथी अब भी गंभीर थे। वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश क
 
खंभा
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शेरोशायरी का मजा ले, न मन करे तो छोड़ दें

सुबह-सबेरे एक व्यक्ति को अलग-अलग समय इस पंक्ति को दोहराते-तिहराते सुना। कुछेक घंटे बाद अपन ने भी तोता पाठ जारी किया। शाम क्या, रात तक चला। नहीं आती तो याद उनकी महीनों तक नहीं आती। मगर जब याद आते हैं तो अकसर याद आते हैं।। -हसरत मोहानी कितना अच्छा होता
 
खंभा
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खंभा

अब त्योहार भी आतंक के साये में मना रहे हैं लोग । खैर, कोई गल नहीं। आएं जमकर मनाते हैं, रोशनी के इस उत्सव को। आप सब को दीपावली की बधाई। पर किसी की एक कविता याद आती है। आपको भी सुनाए देता हूं। रोशनी की जनमगाती फुहार के नीचे अंधेरा सहसा और भी घना हो चला
 
खंभा
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राह से भटका छात्र संघ

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव चार सितंबर को होना है। शायद ही किसी दूसरे विश्वविद्यालय में छात्र संघ का चुनाव इतनी नियमितता से होता है, जितना कि दिल्ली विश्वविद्यालय में। पर यहां कि छात्र राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है।वैसे तो युवाओं की बढ़ती
 
खंभा
Aug 31 2009 07:37 PM
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याद आए ढिंगरा

ठीक सौ वर्ष पहले आज ही के दिन क्रांतिकारी मदन लाल ढिंगरा को फांसी दी गई थी। उनपर अंग्रेज अधिकारी कर्जन वैलि को मारने का आरोप था। ढिंगरा का जन्म सन् 1883 में हुआ था और उनके पिता सिविल सर्जन थे।हालांकि उनका परिवार अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादार था। फिर भी
 
खंभा
Aug 17 2009 01:58 PM
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रैगिंग का रोग बड़ा बुरा

देश के तमाम विश्वविद्यालयों में नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है। पर अदालती लगाम के बावजूद रैगिंग का रोग छूटता नहीं दिख रहा। जेएनयू, डीयू समेत कई प्रतिष्ठित संस्थानों से इसकी शिकायते आई हैं। किरोड़ी मल कॉलेज ‘छात्रावास’ का मामला तो मीडिया में खूब आया।यह
 
खंभा
Aug 16 2009 03:01 PM
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खबरनबिशों की खबरनबीशी और सिनमा

खबरनबीसी की दुनिया को हिंदी सिनेमा ने खूब खंगाला है। इसके कई रंगों से दर्शकों को वाकिफ कराया है। कुंदन शाह ने एक फिल्म बनाई थी। नाम था 'जाने भी दो यारो'। तब इसकी जमकर तारीफ की गई थी। आज भी सिने प्रेमी इस फिल्म को याद करते हैं। जब यह फिल्म आई तो आम लोगों
 
खंभा
Jul 29 2009 12:04 AM
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गीत से लोकप्रिय हुए कठिन शब्द

हिन्दी सिनेमाई गीत ने विशुद्ध हिन्दी व अरबी-फारसी के कठिन शब्दों को बेहद सरल बनाने का काम किया है। ब्रज देहाद में भी ठेठ आंचलिक बोली में बतियाने वाले लोग इन शब्दों को प्रेम से इस्तेमान करते हैं। यकीनन, यह यहां गीतों को तवज्जो मिलने के कारण ही हुआ। सि
 
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क्या रौब था उस शख्स का !

मौलाना सैयद अब्दुल्लाह बुखारी के इंतकाल से जामा मस्जिद की राजनीति का वह दौर खत्म हो गया जो इमरजंसी से शुरू हुआ था। उस दौर में जामा मस्जिद मुस्लिम समुदाय की राजनीति का केंद्र बनकर उभरा था। जानकार के मुताबिक इसके कई प्रत्यक्ष और परोक्ष कारण थे। इमरजंसी
 
खंभा
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कमला नगर मार्केट व ‘चाचे-दी-हट्टी’

मुंबई में ‘बड़ा-पाव’ जितना लोकप्रिय व्यंजन है। दिल्ली में उतना ही छोला-भटूरा। बड़ी सहजता से हर चौराहे पर मिल जाता है। पर इसकी कुछ खास दुकानें भी हैं। जैसे- कमला नगर मार्केट में स्थित ‘चाचे-दी-हट्टी’ । छोला-भटूरा की ये दुकान जमाने से खूब लोकप्रिय है।
 
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चलो दिलदार चलो...

कई लोगों का मानना है कि मीना कुमारी की मौत ने ही ‘पाकीजा’ को जीवन और यश प्रदान किया। हालांकि, इस बात को कमाल अमरोही ने कभी स्वीकार नहीं किया। यह फिल्म सन् 1972 के पहले महीने में आई थी। जबकि इसे दिसंबर 1971 में ही प्रदर्शित होना था। लेकिन, भारत-पाक यु
 
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उस गीत का नशा

बात साठ के दशक की है। हैदराबाद के नवाब अपने परिवार के साथ सिनेमाघर में फिल्म- हातिमताई देखने आए। उस फिल्म में मोहम्मद रफी का गाया हुए एक सूफियाना गीत था- परवरदिगार आलम तेरा ही है सहारा। इस गीत ने नवाब साहब को भाव विभोर कर दिया। वे सिनेमाघर में ही सिस
 
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झुमरी तिलैया और न्यूज रूम

जब कभी फिल्म पर कुछ लिखता या नकलचेपी करता हूं तो एक बात खूब याद आती है। और हंसी भी। तब मैं एक निजी समाचार एजेंसी में था। मैनें झुमरी तिलैया में रहने वाले फिल्मी गीतों के कदरदानों पर एक स्टोरी बनाई। स्टोरी को कायदे से सुबह चलाया जाना था। दोपहर को जब म
 
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यूं तैयार हुआ फिल्म उत्सव का संगीत

शशिकपूर की इस फिल्म का निर्देशन गिरीश कर्नाड कर रहे थे। तब लोकप्रिय व्यावसायिक फिल्मों में संगीत देकर ख्याति पा चुके लक्ष्मीकांत जब कभी उन्हें नई पर चालू किस्म की धुन सुनाते तो वे बड़े अदब से कहते, “यह धुन बड़ी उम्दा है, पर इस फिल्म के लिए प्रासंगिक
 
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आप जैसा कोई, मेरी जिन्दगी में आए

नाजिया हसन के गाए गीत “ आप जैसा कोई, मेरी जिन्दगी में आए” को गजब की लोकप्रियता मिली थी। यह गीत लगातार चौदह सप्ताह तक बिनाका गीत माला की पहली पायदान पर कायम रही। तब नाजिया ‘बात बन जाए गर्ल’ नाम से पहचानी जाने लगी थी। वे जब पहली दफा भारत आईं तो बंबई के
 
खंभा
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दौलत गई है, दानत नहीं

जो लोग हिन्दी सिनेमा के बारे में थोड़ा-बहुत भी जानते हैं वे चंद्रमोहन को जानते होंगे। वे ऐसे अभिनेता थे जिनके अभिनय का प्रमुख अस्त्र उनकी आंखें थीं। इसी अस्त्र से वे सबों के दिल पर राज करते थे। उनका जलवा था। मोतीलाल की चंद्रमोहन से खूब छनती थी। पर दि
 
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‘हिवरे बाजार’ इक गांव ऐसा भी

हिवरे बाजार यानी गांधी के सपनों का गांव। इक ऐसा गांव, जहां खुशहाल हिन्दुस्तान की आत्मा निवास करती है। बाजारवाद के अंधे युग में लौ का काम कर रही है। क्या वैसे दिन की कल्पना की जा सकती हैं, जब देश का सात लाख गांव हिवरे बाजार की तरह होगा। उसका अपना ग्रा
 
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मिटाना-विटाना तो इक दर्द देने वाली प्रक्रिया है

आगे आकर कुछ ऐसा लिखने की आदत नहीं जिसे आखिरकार मिटाना पड़े। क्योंकि सीखा यही है कि मिटाना-विटाना दरअसल, इक दर्द देने वाली प्रक्रिया है। वह भी किसी पत्रकार के लिए। यह बड़े शिद्दत से महसूस करता हूं। ऐसे में जब किसी पत्रकार की पूरी खबर ही मिटा दी जाए तो
 
खंभा
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डा. सिंह के शपथ ग्रहण की खबर पढ़ें

डा. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण को लेकर एक निजी समाचार एजेंसी की ओर से चलाई गई निहायत गलत स्टोरी को कई लोग पढ़ना चाह रहे थे। अंततः यहां लगाना ही मुझे सही लगा। दूसरी स्टोरी की चर्चा जो मैंने की थी उसे आप कुछ कहानियों के साथ कल पढ़ पाएं
 
खंभा