parul chaand pukhraaj kaa.....'s Image

parul chaand pukhraaj kaa.....

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15 Jun 2010
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किसे पुकार रहा था वो डूबता हुआ दिन-आबिदा-नसीर तुराबी

आबिदा जिस मौज में कहती हैं हम उसी मौज में सुनते हैं... डूबते उतराते गुनते हैं... समझ आती है बात थोड़ी -थोड़ी...बिन मोल बिकें…थम जाएँ किसी चादर का कोना पकड़…वहीं के हो रहें..धंस जाते हैं रेत में गहरे बहुत गहरे पैर जैसे..उतरे अँधेरी बावड़ी कोरा भरोसा लिए तब
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दो गीत-मन्ना डे/गीता दत्त

कुछ गीत बार बार याद आते हैं .लौट लौट सुने जाते हैं. तीन साल पहले अगस्त की बारिशों भरी दोपहर मन्ना डे के स्वर में पहली बार सुना हँसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है. जिसके बोल थे कपिल कुमार के . फिर ढूँढ़ कर फिल्म देखी . १९७३ में बनी - अविष्कार . फिल्म
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काही पत्तों वाला पेड़

बच्चा, गए दिनों चौक पे बैठेकिसी गुमशुदा फ़कीरके साथ खेलने लगा बाबा - बाबा...फ़कीर,उसे काही पत्तों वाले ऊँचे पेड़ सेनारंगी फूल लाकर दिया करताबच्चा भोलेपन का कायलफ़कीर के बेसुध जीवन,खोयी खोयी आंखों मेंआस की कनी सा चमकने लगा…पर आजबड़े सबेरे सेबच्चा रो रो के
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मौसम 5 मई

दूर बहुत दूरधरती के सुदूर कोनों में बसेज़रा -ज़रा पहचाने लोग,उनकेमृतप्राय रिश्तों में उठाहल्का सा स्पंदन…रोप गया मेरे मन की रुठी मिट्टी मेंउम्मीद का नन्हा हरियाला बिरवा …यहाँआस-पास नहींन सहीमै खुश हूँ कहीं तो मौन पे बौछारे हैंथमे हुए संवादों में बीजकहीं
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कुछ चित्र छुट्टियों में/बचपन के दिन---

मुट्ठी भर छुट्टियों के दिन……क्या-क्या तो कर लें……कैसे-कैसे आसमान उठा लें……अभी न रोको…अभी न टोको……कल पर निकल आयेंगे……हम भी परिंदे हो जायेंगे…फिर खोजते फिरोगे हमेंयहाँ - वहाँ कहाँ -कहाँ ? :)बचपन के दिन भी क्या दिन थेफ़िल्म-सुजाता चित्र-क्लब के स्वीमिंगपूल से
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मधुकरी

स्मृतियों में,अपने बचपन से बहुत पीछे…अपनी माँ के बचपन सेयाद आते हैं मुझे कभी- कभी कूड़ी वाले बाबादेखना तो असंभव रहा उन्हेंमगर सुन सुन करजैसे कोई गीत याद हो जाता है, छप जाता है मानस परवैसे ही जाने अनजाने उनका अनदेखा व्यक्तित्व अंकित रहाकहीं अंतस में
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इतनी इफ़रात इनायात सुनो ठीक नही

तुकबंदियों के सिलसिले ………एक और सही ***************** ************ ******** ***** **वक़्त-बेवक्त मुलाक़ात सुनो ठीक नही इतनी इफ़रात इनायात सुनो ठीक नही खेल कर तोड़ ही डालोगे ये खिलौना भी ऐसे मासूम ख़यालात सुनो ठीक नही चौथ के चाँद की अब चांदनी भी दुनयावी
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सुमन कल्यानपुर-तीन गीत

गाढ़ी धूप के दिनकभी कभी पुरवाई चलती हैहरे पत्तों वाले छोटे गाछ परबेली नियमित फूलती हैजीनिया के चटख रंगों वाले फूलबाहर काम करते मज़दूरों का हौसला बढ़ाते हैंकोयल अलसुबह ही कूक करचुप ओढ़ लेती हैपहर बीतते न बीततेसाँसे उमसा जाती हैं पत्ता,एक भी नही डोलता जब
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मारीच

अंत की ओरभर-भर चौकड़ीचला मारीचसानंदमृत्यु के निमंत्रण परमोक्ष की पुकार पेस्नेहसिक्तभरता कुलाचेराम नेह पगाराम मयराम के लिएसंजोयेअभंग,अखंड प्रेमप्रेमसींचता है,खींचता हैजन्म-जन्मान्तरनिरंतरअपनी ओर ……छली ,पातकी जग जाने……राम कथा सुनते-सुनते…हम जाने-प्रेमी
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आज की शब -परवीन शाकिर

परवीन शाकिर की बहुत सी ख़ूबसूरत नज़्मों में से ये वाली बीते मार्च कई दफ़ा गुनगुनाई . मन हुआ नज़्म के साथ अपनी कच्ची-पक्की गुनगुनाहट भी सहेज लूँ यहाँ .धुन बहुत सुनी सुनाई सी है.आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी रात गहरी है मगर चाँद चमकता है अभीमेरे माथे पे
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बच्चे,खेल,बागान

गर्मियों के लम्बे शुरुआती दिनों मेंदुमंजिले पर बसे बच्चेअधिक बेसब्री से करते हैं सांझ घिरने का इंतज़ारपाँच बजते न बजतेचहकने लगतीं हैं सेक्टर कीसूनी गलियाँखटकने लगते हैं फोनबजती हैं घंटियाँकभी छुपाये तो कभीजान कर लुढ़काये जाते हैंदूध के आधे-पौने ग्लासऊपर
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इतना मत बोलो…

इतना मत बोलोमत बोलो इतनाबोलने सेज़्यादाहोती है बारिशमचता है शोरमानस में द्वंदों कान बोलो इतना……बोलने सेअतिशय आती है बाढ़चढ़ता सैलाबपलकों में बूंदों काइतना न बोलो…बोलने सेअधिक उड़ती है आँधीउठता बवंडरप्रश्नों पे प्रश्नों कामत इतना बोलो…बोलने सेबेहदउपजता है
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पूरे चाँद की इस ख़ामोश रात

पूरे चाँद की इस ख़ामोश रातदिवंगत हुए फागुनऔर चैत के झुटपुटे मेंकिसी उनींदे सायबान सेझिर-झिर कर,पहाड़ की तलहटी में ये किसके जी का ख़ालीपनये किसके जी का उजासनदी की छप-छप के उस पार रिस रिस उसके स्वरों में गुंथा जा रहा है .ये कौन ख़ल्वतों में आधी रातबैंगनी
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एक कविता/एक आबिदा

काशमेरा प्यारतुम परइस तरह बरसता हैजैसे किसी पत्थर परलगातारकोई झरनागिरता हैकाशतुम्हे कभी बारिश मेंकिसी वृक्ष की भाँतिभीगने कीकला आ जायेडॉ अमरजीत कौंके की कविता उनकी पुस्तक अंतहीन दौड़ से साभारसाथ ही आबिदा जो हर समय भली लगतीं हैं इस दौर में क्या क्या है
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मुहँ पे पल्लू रख/चाहे भड़भड़ा के गिर जा

बुखार में लिखी कविता ...कविता ? मुमकिन है बुखार उतरते ही ब्लाग पर से भी उतार दूँ ...बल्कि उतार ही दूंगी ...पर अभी तो लिख ही लीओह ! बेचारी नारीज़रूर दिलाएं सम्मानरोटी मिले न मिले उसेसम्मान ज़रूर दिलाएं साथ मेंसाड़ी , पायलऔर अगर हो सकेतो एक अदद बुर्का
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घर /कुछ शब्द कुछ चित्र

चालीस कमरे ,चार ड्योढ़ियाँएक बाड़ी ,छह छतों वालेइस सवा सौ साल पुराने घर सेमेरा तेरह वर्ष पुराना नाता है ..यहाँ की देहलीज़ ने कभी किसी सेपरायापन नहीं बरता,उस वक्त भी नहीजब आलता भरे पैरों सेमैदे की रोटियों पे चलकरइसके देवता घर में नई दुल्हनों नेपहला कदम
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लग गैल रंगरेजवा से लाग

रंग लगे सो दाग होएनेह लगे सो दाग़ ....होली आए -होली जायेमल मल लेयो नहायेतन का रंग धूमिल पड़ेछूटे अबिर गुलाल ....छूटे अबिर गुलालपहर पड़े, फीका पड़ेसाँवल तन से फागपर मन का, का कीजिये?जहाँ पड़े प्रीत के दाग़सभी मित्रों को होली की शुभकामनायें .सुने सविता देवी के
टैग: ठुमरी
Feb 27 2010 03:10 PM
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ओ छोटी कलियों इतनी नासमझी क्यों

आज बाग़ मे बड़े सबेरेउचक रही नन्ही कलिका कोपूरे खिले,युवा फूल से ज़रा ओट जो सरकायातुरत लचक वह टूट गयीझुक बैठी डाली के बीचगंध,रूप,रंग हीन ओ छोटी कलियोंइतनी नासमझी क्यों ?बीज रूप रोपा था तुमकोअभी समय था,बहुत समय तुम्हे सयानी होने में कल तड़के पूछूँगी फिर मैहाल
Feb 24 2010 06:59 PM
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तुम्हारे प्रेम में स्वार्थी हो कहती हूँ

तेज़ी से बदलते माहौल में आस-पास देखते भय लगता है… सायेदार दरख्त भी समय आने पर झुकते ,कमज़ोर पड़ते हैं ……हमनें जिनसे अथाह प्रेम किया उन्हे लाचार देखना पसंद नहीं करते । मुमकिन है उम्र के किसी पड़ाव पर खुद अपने लिये यही दुआ माँगूं ....कुछ दिन पहले लगा तुम ७० के
Feb 19 2010 10:09 AM
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मै इसकी पनाह में हूँ

ये दुःखदुःख सा नहीं हैहंसते -मुस्काते करवट दर करवटबड़े भीतर धसाँ साँस लेता है,ये दुख ओढ़ते-बिछाते शाना ब शाना साथ देता है ....ये दुःखदुःख सा नही हैज़बाँ पे मीठा ,तासीर में ठंडाछुअन मखमली,संदली अहसासरूह से पाक-साफ़..ये दुःखदुःख सा नहीं हैअकसर बिना जिस्म
Feb 17 2010 12:03 PM
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तुम तक़ल्लुफ़ को भी इख़लास समझते हो "फ़राज़/ग़ुलाम अली

पिछ्ले कुछ दिनों दौड़-भाग रही……कानपुर जाना हुआ,समय बचाने के लिये राजधानी पकड़ने का इरादा हुआ मगर इरादा इरादा ही रह गया । देश की सुपर फ़ास्ट ट्रेन मात्र 7-8 घटे के विलम्ब से आ जा रही है जानकर तसल्ली हुई । समय बचने के बजाय कितना अधिक ख़र्च हुआ सोचना और ज़्यादा
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कुछ चित्र/गहरी होती परछाई

इन दिनों बगीचा पूरे शबाब पर है…मौसम बदल रहा है तेजी से …कुछ दिन पहले तक फूलों को सेंक देने के लिये गमले इधर-उधर किया जा रहे थे्…वहीं उन्हे अब तेज़ धूप से बचाने के प्रयास चल रहें हैं…कोशिश… कि बसंत कुछ दिन और बसा रहे/ठहरा रहे बगीचें में मेरे/आस-पास …धूप से
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किसी के दिल की हकीक़त किसी को क्या मालूम-शोभा गुर्टू

इस खूबसूरत आवाज़ के बारे क्या लिखा जाये ? और क्या-क्या न लिखा जाये ?कुछ सूझता नहीं…बसंत उतर रहा हैदबे पाँव…एक सुबह ऊठँगीतो फीका पड़ चुका होगाफूलों,शाख़ों,पेड़ों औरशायद खुद मुझपरभीबदलते मौसम मेंसुनना औरसिर्फ़ सुननासुखद है… शोभा गुर्टू के स्वरों में सुनें-अभी
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हाजरी

पाँच लाख भक्त होते क्या हैदिखते कैसे और उनके इर्द-गिर्द महसूस कैसा होता हैये सारी बातें जहाँ पहली बार जान पाईउसी तीर्थ स्थल की बात करते-करतेएक मित्र बोल पड़ेआपको आधा दिन लगामुझे मात्र बीस मिनट में दर्शन हुएमै ज़्यादा सौभाग्यशाली हूँ ..मैंने सयंत स्वर में
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मेरी आहों में असर है के नही देख तो लूँ -मेंहदी हसन

मेरी आहों में असर है के नही देख तो लूँउसको कुछ मेरी ख़बर है के नही देख तो लूँ मेंहदी हसन साहब की गाई ये ग़ज़ल कुछ कम सुनी- सुनी सी रह गई मेरी .सो बार बार सुनी जाये इसलिए यहाँ सहेजना ठीक लग रहा है.चित्र -साभार गूगल
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टोहते

चाहें तो रूख़ कर लें अपनी -अपनी देहरियों काचाहे तो भटकन ही बना लें शेष जीवन का उद्देश्यजो भी हो ,जो भीपर तय कर लेंकर लें सुनिश्चित क्योंकिजीवन में इत्मीनान बहुत ज़रूरी है ......... ...... ... .बरसों बाद ख़ुद को टोहतेअपने निपट एककाकीपन में जाना के तुम्हारे
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फूल खिले बगियन में आमद फसले बहार

सुना है बसंत आ गयाबिछ गया है फूलों पेशाखों पे,हरी घास के इर्द गिर्द..हमने बहार ढूँढीजो मिली, सो बजीऔर खूब सजी उस्ताद क़व्वाल बहाउद्दीन खान के स्वरों में ...फूल खिले बगियन में आमद फसले बहार फ़रीद ऐयाज़ और अबुमुहम्मद के स्वरों में ..सखी का से कहूँ मोहे लाज
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रंग डालूँ एक लैंडस्केप

कलेजे में धुआँ-धुआँ सर्दियों का अलावपलकों में चौथ का चाँद होजी में हो कोहरे से नहायी काची- काची धूपहवा में, उड़ती-बिखरती मार्च की मदमाती महीन गंध ..गले में हों सोहनी के उनींदे सुरतबीयत ज़रा-ज़रा गिलहरी सीमन में जलते-बुझते मोरपंख रहेंहोंठों पर व्याकुल हो
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मुक्तेश्वर:7 जुलाई 1976/निर्मल वर्मा

निर्मल वर्मा की दूसरी दुनिया से- पढ़ने का खास सलीका न होते हुए भी अपने स्पेस में इस अंश को स्वर में सहेजने का मन हुआ… मुक्तेश्वर:7 जुलाई 1976हमें उन चीज़ों के बारे में लिखने से अपने को रोकना चाहिए ,जो हमें बहुत उद्वेलित करती हैं ,जैसे - बादलों में बहता हुआ
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तीस पार

तीस पारपहली बारएकाएक उठाघुटने का दर्दतकलीफ के साथमुस्कुराहट भी खींच लाया चेहरे परके लो ,समय हो गयासम्हलने का
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सिलवटों में

ज़हन की सिलवटों में अब यूं ही बल रहने दोबड़ी मुश्किल से तो कोई यहाँ पे आता है
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आबिदा परवीन -अब किसी रोज़ न मिलने के बहाने आओ

कितना कुछ सुना जाता है ....कभी धुन उलझा लेती है ,कभी गीत के बोल तो कभी कलाकार की गायकी ..... पर आबिदा आपा की आवाज़ सुनते-सुनते फितूरी हो जाना अजब सा है . इनमे कुछ फ़ितूर यहाँ दर्ज़ हुए हैं ... कुछ यूँ ही आवारा हो गए ..... रोज़ गुज़रना उस पुल से जिसके न
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डैम्प

अक्सर गहरे,घने,डूबे दिनों में लोगों को तुरपाई करते,अचार के डिब्बे पोंछ्ते कबाड़ बेचते ,कार सर्विसिंग करवाते और पुरानी फाइल्स निबटाने जैसे तमाम उबाऊ काम करते देखा… फिर मैने भी ऐसे किसी एक मौसम पुराने मकान को नया बनाने की वर्षों से स्थगित योजना पर विचार
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मौसम 28 नवम्बर

उस दौर घरों में बहुत से लोग एक साथ रहा करते थे सांझे चूल्हे के बाहर अंगारे निकाल उसपे दाल की बटोई रख दी जाती अंगीठी के उपर आटें की चिरैया बना - बना भूनते थे बच्चे थाली के नीचे गिटक लगा ज़रा टेढ़ी कर रसेदार सब्ज़ी परोस दो लोग साथ- साथ जीमते ... माँ नयी
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दुआ करना

किसी मित्र से बात हो रही थी पंजाब के बारे में .पंजाब की मिट्टी के बारे ...मै कह बैठी बड़ा मन है "हीर " का हिन्दी अनुवाद पढ़ सकूँ किसी रोज़ .. गा सकूँ उसी शिद्दत से ......बोले दोस्त "हीर" पढ़ने /समझने के लिए हीर बनना पड़ेगा पहले ....बात आई -गई हो गई मगर
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मौसम 6 सितम्बर 2009

काँच की खिड़कियों के पार दुकानों ,मकानों,घास और बगीचों पर एक ही रफ़्तार में मुसलसल गिर रही है बारिशदो दिनों सेबेहिसाब... हवा न जाने किस तर्ज़ पर काट रही है चक्कर गोल-गोल भेदती हुई दुछ्त्ती के परदे खड़खड़ाती गैरेज की छत… कुछ-कुछ देर में खिड़की से झाँकते हम खबर
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नवम्बर की बारिश

मित्र ने कहा खेतों के लिए मुफ़ीद बारिश मिस्त्री ने बताया ढलाई की भलाई .. आँगन के कोने सूख- सूख भीजे बूँदें अटपटी टप- टप भूल चूक बरस जाएँ यहाँ वहाँ ... आसमान सुबक -सुबक ले डूबें दिन बादल घनेरे न जाने कहाँ कहाँ... छज्जे के ऊपर से मैल निरा बुहार लाई थकी
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ग़ालिब /रफी /जगजीत

आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक ग़ालिब स्वर -जगजीत सिंह नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाये न बने ग़ालिब स्वर- रफ़ी इस पोस्ट में कुछ और कहने की गुंजाइश नही…… सिवाय इसके कि दोनों ही ग़ज़लें ख़ूब सुनी हुई हैं और एक ख़त्म होते ही दूसरी सुन ने की ललक होती ह
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घट घट में पंछी बोलता-वीणा सहस्रबुधे-येसुदास

भोर के स्वर हैं... ईश है... आशीष है .. दो गीत अलग अलग आवाजों में ... घट घट में पंछी बोलता आप ही डंडी आप तराजू आप ही बैठा तौलता ... स्वर--वीणा सहस्रबुधे ज़िंदगी को संवारना होगा कोई सूरज उतारना होगा स्वर -येसुदास
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दो बातें

खिंची हुई नस, घूमी हुई फिल्ली की तरह आहत विश्वासों से उठने वाले एहसास, रह-रह टीस देते हैं निरंतर ... ***************** *********** **** ** * तुम विश्वस्त थे नही सो आश्वस्त हो जीने का सुख भी ईश्वर ने तुम्हे दिया नहीं सब पा कर भी कितने दरिद्र रहे, मित्