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अपना घर

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15 Jun 2010
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भानी के ग्यारह रूप...... देखिए

ये ग्यारह रूप हैं मेरी दुलारी के। बहुत दिनों से सोच रही थी।पिछले बहुत दिनों से मैंने भानी के बारे में न कुछ लिखा न कोई चर्चा की। आज भानी की पसंद की कुछ तसवीरें छाप रही हूँ। देखिए और मेरी इस प्यारी बेटी को अपना आशीष दीजिए
 
आभा
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लीजिए भई –प्रेमचंद, महादेवी, हरिऔध, पंत सब मर गए

मै स्त्रीवादी हूँ, सदियों से लानत मलामत झेलती स्त्री के किसी गलत निर्णय पर कई बार मेरा रिएक्शन भी अजीब बेतुकाना हो जाता हैं, साथ ही उस गलत स्त्री को कुल्टा, कंलंकिनी, कुलबोरनी कहने के बजाय मैं भावावेश मे कह बैठती हूँ कि ठीक किया फलाँ ने..जरूरत से ज्यादा
 
आभा
Jun 14 2010 03:30 PM
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सीता नहीं मैं

क्या महिला आरक्षण से देश में स्त्रियों की दुनिया बदल जाएगी। एकदम न बदले तो भी कुछ न कुछ तो जरूर होगा। आज एक महान दिन है। देश दुनिया में बहुत कुछ घट रहा है। आज के दिन मैं अपनी एक कविता छाप रही हूँ।सीता नहीं मैंतुम्हारे साथ वन-वन भटकूँगीकंद मूल
 
आभा
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उत्सव बना झमेला

खुशी अफसोस में बदल गई मेरे छोटे भाई की शादी तय हो गई थी। 12 फरवरी को शादी और 14 को रिसेप्सन ओ भी बिना लड़की देखे। कि शादी ही तो करनी है। लड़की से करनी है देखना क्या । मुख्य आधार था लड़की का एक सुघड़ भाभी से तुलना। मेरे भाई ने कहा जब लड़की उन भाभी की
 
आभा
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मानस परनानी की गोद में

खोना पाना जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है इसमें जहाँ हम समय के साथ पुराने लोगों को खोते जाते हैं वहीं नए लोगों को पाते जाते हैं । पाने की खुशी की तरह खोने का दुख भी स्वभाविक है । कल 14 .12.09 की शाम मेरी नानी नही रहीं वह 87 वर्ष की थीं। मेरी मौसी ने फोन
 
आभा
Dec 15 2009 08:34 PM
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। कोई बड़े कुल में जन्म लेने भर से बड़ा नहीं होता।

कितनी कितनी बातें जो आप सब से बाटना चाहती थी पर रोजर्मरा की व्यस्तता के बीच बातें आई और गई ऐसा मेरे साथ ही नहीं सभी के साथ होता है ।बेचैनी होती है जब हम चाह कर भी कह नहीं पाते ,पर खुशी होती है तब जब मेरी बात कोई और कह दें। मै या हम और बेफिक्र हो जाते
 
आभा
Nov 30 2009 04:44 PM
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ब्लॉग की हिंदी भविष्य की हिंदी हो के रहेगी

इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन में बहुत कुछ पाया इलाहाबाद ब्लॉगिंग संगोष्ठी में जाने से पहले ही हमारी बनारस की घरेलू यात्रा तय हुई थी, यात्रा सुनिश्चित होना ही था कारण यहाँ मुम्बई मे दीवाली की पंद्रह दिन की बच्चों की छुट्टियाँ, फिर उधर यूपी इहाहाबाद में न स
 
आभा
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इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन से क्या मिला

बहुत कुछ खोया बहुत कुछ पाया यह अक्टूबर का महीना बड़ा अच्छा रहा। इसमें बहुत कुछ खोया बहुत कुछ पाया। खोया यह कि मुंबई के स्कूल रायन इंटर नेशनल में जज बना कर बुलाई गई। हालाकि अचानक खाँसी बुखार से तबियत खराब हो जाने के कारण न जा सकी। खोया यह भी कि मेरे ए
 
आभा
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भविष्य का स्वागत करती हूँ

घर में अकेली हूँ। बच्चे पापा के साथ घूमने गए हैं। मैं न गई। अधकपारी से सिऱ फटा जा रहा है। चाय चढ़ा कर भूल गई। जब जलने की महंक आई तो दौड़ कर किचेन में गई। सब कुछ जल चुका था। चूल्हा बुझा कर लौट आई। चाय पीने का मन है लेकिन बनाने का मन नहीं है। सोच रही ह
 
आभा
Sep 30 2009 08:09 PM
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सुनती हूँ यह सब डरी हुई

बहुत दिनों बाद कोई कविता छाप रही हूँ। कुछ मित्रों को सुनाया तो इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया आई। फिलहाल इसे कुछ और कविताओं के साथ जयपुर के एक अखबार डेली न्यूज में छपने के लिए भेज दिया है। उसके पहले यहाँ पढ़ें।सुनती हूँ यह सब कुछ डरी हुईमैं बाँझ नही हूँनहीं
 
आभा
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क्या आप ने भी आराम के लिए लगाया है झाड़ू की तीली से इंजेक्शन

आज अपनी बेटी भानी के साथ डॉक्टर डॉक्टर खेल रही थी कि अपना बचपन याद आ गया। हमारे पास बहुत सारे खिलौने होते थे लेकिन नहीं होता था तो एक डॉक्टर सेट। हम अपने खेल में इंजेक्शन की कमी को झाड़ू की खूब नुकीली तीली से पूरा करते थे। घर को बुहारने में खूब घीसी तीली
 
आभा
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बच्चों की देख-भाल से आजाद हैं लोग, इस आजादी से बचाओ रे राम

बच्चों की देख-भाल से आजाद हैं लोग इस आजादी से बचाओ रे राम। कैसे आजादी के चक्कर में सारे जग के आँखों के तारे हो गए हैं बेचारे ।बढ़ती महँगाई और तेज रफ्तार जिन्दगी की रेस में जी रही महानगरों की ज्यादातर आबादी यह तो सोच रही है कि उसे क्या कुछ पाना जैसे ढेरों
 
आभा
Aug 09 2009 02:56 AM
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स्वतंत्रता पुकारती है, पर इससे बचाओ रे राम

अस्तित्व की स्वतन्त्रता किसे अच्छी नहीं लगती, हर कोई चाहता है कि उसे आजाद छोड़ दिया जाए, उड़ान भरने के लिए । पर ऐसी आजाद उड़ान क्या सही दिशा में पहुँच कर मुकाम तय करेगी, इसकी किसे खबर। यह बात मैं उनके लिए नहीं कर रही जो 18 की उम्र को पार कर चुके हैं
 
आभा
Aug 03 2009 01:10 AM
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लोक सभा टीवी पर मेरी कविता

लिखने से कुछ बदलेगा क्या बहुत पहले से लिखती रही । लिख लिख के भूलती रही। लेकिन छपने का सिलसिला बहुत देर से शुरू हुआ। न जाने कितनी कविताएँ इधर उधर बिखरी पड़ी हैं। कुछ बदल तो रहा नहीं है। कुछ डायरियाँ मायके के घर में रह गईं। बाद में उन्हें जाकर ले आई। क
 
आभा
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तब तो हर स्त्री, हर पत्नी हर माँ वेश्या है मसिजीवी जी

प्रिय मसिजीवी जी आपकी अनाम निलोफर के मैले तर्कों पर सफाई नुमा पोस्ट देखी। आपने माँ बाप द्वारा बच्चों के लालन पालन में किए गए कार्य को मैला कमाने से तुलना की है - “ अपने बच्‍चे के पाखाना साफ करने से बचने वाली... बच सकने वाली मॉं कहॉं पाई जाती है ? कौन
 
आभा
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सुनों कहानी.......

जागो सोने वालो सुनो ......।बदलों मेरी कहानी। मेरी माँ कहती है औरत ही औरत की दुश्मन है। वही मेरी दुसरी माँ(सास) का कहना है औरत की नाक न हो तो मैला खाए। क्य़ा मेरी दोनों माए अपना जीया अनुभव कहती है या सुनी सुनाई बातें । राम जाने । माँ ने जब यह कहा मै बह
 
आभा
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यूनुस ममता को की बधाई

यूनुस ममता को बेटे की बधाई रेडियोवाणी वाले यूनुस और बतकही वाली ममता के लिए आज का दिन बहुत मुबारक रहा। आज दोपहर में १२ बजकर १० मिनट पर ममता माँ बन गईं और यूनुस पिता बन गए हैं। बच्चा सिजेरियन हुआ है लेकिन माँ बेटे दोनों स्वस्थ । दोपहर में बेटे के जन्म
 
आभा
Feb 26 2009 08:05 PM
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कामनाओं का कंकाल

अनोखे आख्यान की अनुभूति परक प्रवंचना सागर की लहरें छम-छम करती अपने आरोह अवरोह में गुंफित हो हो पुकार रही थीं। सब कुछ । कुछ नहीं। बस । भटकाव और भटकाव और...पंछियों का नीड़ गमन। कहीं बजता राग यमन। पवन का पल्लवित आलोड़न। कौन था कौन कुछ पता न चला। हिला एक
 
आभा
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ये तहरी खिचड़ी की फैशनेबल बहन है

लावण्या दी आप ने मेरी पिछली पोस्ट पर तहरी क्या है और कैसे बनाते हैं यह सवाल किया था। मै जब बता रही थी तभी हमारा लैपटॉप नखरे करने लगा ....करती क्या आजीज आकर सट डाउन करना पड़ा । बड़ी दी की आज्ञा पालन करना था सो आज कर रही हूँ .. 1-तहरी – वह व्यंजन जिसमे
 
आभा
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हम लड़कियाँ हैं, हमारा घर कहीं नहीं होता।

लड़कियों की सामाजिक हैसियत पर १९२५ में लिखे अपने उपन्यास निर्मला में प्रेमचंद ने एक सवाल उठाया था। वो सवाल आज भी जस का तस कायम है। हालात बदले हैं लेकिन लड़कियों की दशा नहीं बदली है। कुछ तबकों में बदली सी दिखती है, उन तबकों में प्रेम चंद के समय में भी
 
आभा
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ठंड की याद में हूँ

जाड़ा चाहिए उत्तर भारत ठंड की चपेट में है। लोग मर रहे हैं। इस कड़ाके की ठंड को देखते हुए मैं रात 10 के बाद किसी संबंधी, किसी दोस्त मित्र को फोन नहीं कर रही हूँ। क्या पता वो रजाई में घुस चुका हो। पर यहाँ मुंबई में स्वेटर सिर्फ निकले हैं और हम सोच रहे
 
आभा
Jan 06 2009 11:40 PM
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पुराने डर फेंक दो तुम भी

साये में धूप पलट रही थी । पता नहीं क्यों मेरा ध्यान इस गजल पर अटक गया। यह गजल आगे बढ़ने और लड़ने बदलने के लिए जागरूक करती है। यह गजल कहती है कि तमाम डर भय कुंठाओं से मुक्ति पाकर आगे बढ़ने को कहती है...इसी लिए मुझे यह प्रासंगिक लग रही है...2008 पुराना
 
आभा
Dec 27 2008 11:32 AM
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क्या हमारी जिन्दगी का स्क्रीन प्ले नेता और आतंक वादियों के हाथ में है ?

हर बार एक नई परत खुल रही है । हर परत के नीचे दबता आम हिन्दुस्तानी दमघोटू माहौल में जी रहा है। राजनेताओं ने अपनी रोटिय़ाँ सेंकी,इतनी सेंकी की आम जनता इनकी रोटियों के नीचे दबती गई । मूढ जनता भी समझ रही है साफ साफ । जिसे भुगत रही आम जनता, हमारे जवान ,हमा
 
आभा
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कितनी पुरानी साध है यह

कितनी पुरानी साध है यह कितनी पुरानी है मेरी इच्छा मैं तुम्हें काजल बनाना चाहती हूँ.. रोज-रोज थोड़ा आँज कर थोड़ा कजरौटे में बचाए रखना चाहती हूँ.... तुम धूल की तरह धरती पर पड़े हो.. धूल ..... पैरों में ही अच्छी लगती है आँखों में नहीं जानती हूँ... फिर भ
 
आभा
Aug 21 2008 01:15 PM
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दादी की सीख

यह पढ़ाई मुझे मेरी दादी ने पढ़ाई थी। वे अक्सर ड. तक पढ़ाने के बाद रोने लगती थी....और मैं उनको रोता छोड़ कर बाहर निकल जाती खेलने । दादी की पढ़ाई आज आप भी पढ़ें। माइ री माइ कितबिया दे स्कूल में जायेके माइ री माई खाना पकायेदे स्कूल में खायेके। हम स्कूल
 
आभा
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नेताओं की नंगई देखेगी जनता जल्द

नेताओं की नंगई देखेगी जनता जल्द ..... कुछ ही महीनों मे देश में आम चुनाव होगें, हमेशा की तरह जनता-नेता की कुर्सी पोछ- पाछ कर बैठाती आई है वैसे ही सही गलत का फैसला होने पर उतारती भी है। जहाँ तक सीपीएम का सवाल है उसने अपना चेहरा ठीक से दिखा दिया । सोमन
 
आभा
Jul 25 2008 12:33 AM
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सब सच सच कह दूँ....

सब सच सच कह दूँ , ठीक है . ..इस संसार मे आया कोई भी माया से बच नहीं सकता जब तक की संसार न छूट जाए,। नहीं कह सकती कि ब्लॉग माया कब तक साथ देगी । यह जरूर है कि जब कभी मन यह सोचता है माई री मै का से कहूँ अपने जिया कि.. फिर खुद ही जवाब भी मिल जाता है कि
 
आभा
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खून अपना रंग दिखाता है

खून अपना रंग दिखाता है मेरी बेटी भानी हर हाल में अपनी बात मनवाती है । उसके इस स्वभाव के चलतेहम सब उसे घर का गुण्डा घोषित कर चुके हैं । भानी के भाई मानस स्कूल से या खेल कर लौटे, बहन के न दिखने पर पूछते हैं, कहाँ हैं अपना गुण्डा, ऐसे ही हम दोनों भी, कह
 
आभा
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भाई की फोटो

एक पुरानी कविता मेरे पास एक फोटो हैमेरे बचपन की पहचानजब तक रही मैं माँ के साथवह अक्सर दिखाती मुझे फोटोकहती यह तुम हो और यह गुड्डूतुम्हारा भाई जो नहीं रहा।माँ अक्सर रोती इस फोटो देख करजबकि फोटो में हम भाई-बहनहँसते थे बेहिसाब,हालांकि भाई के साथ होने या
 
आभा