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01 Jun 2010
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आई लव माय इंडिया

Inclusion of the Rural Poor (Courtsey DNA-1-06-2010)आज के डी एन ए अखबार में छपी एक लेख के साथ ये तस्वीर वर्तमान भारत की सही छवि है, है न? शायद  बैल महाराज और मुर्गा( वही दिख रहा है न?) बिटवा से कह रहे हैं कि भाई हमें भी भारत मेट्रिमोनी डाट कॉम में
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कुछ हम कहें

ये खबर पढ़ के जितनी खुशी हुई उतना ही उस बच्चे के लिए खराब भी लगा। एक होनहार बच्चा सिर्फ़ गरीब होने की वजह से अपना सपना पूरा न कर पाये, ये नहीं होना चाहिए। पि्छले महीने का एक वाक्या याद आ गया। स्टाफ़ रूम में बैठे थे, मेरी सहकर्मी और सहेली रमा ने बताया कि एक
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रिटायर्ड लोगों के स्वर्ग की यात्रा

मार्च के अंत में चैटियाते हुए संजीत ने कई बार एक पोस्ट का लिंक देते हुए इसरार किया कि हम जरूर देखें। अब संजीत जैसे दोस्त की बात टालना बहुत मुश्किल है। सो अगले ही दिन हमने वो पोस्ट देखी/ पढ़ी। पढ़ते पढ़ते अपनी आखों की चमक हम खुद महसूस कर सकते थे। हंस हंस के
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गर की बोर्ड बने जूँ?

Normal 0 MicrosoftInternetExplorer4 /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0cm 5.4pt 0cm 5.4pt;
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ब्लोगर मीट और आलसीराम

बम्बई में हुई कल की ब्लोगर मीट की खबर तो आप तक पहुंच ही गयी। हम ठहरे आलसी बंदे, इसी लिए आप से देर से मुखातिब हो रहे हैं। जब तक घर पहुंचे नौ बज चुके थे और आ कर देखा तो घर पर महफ़िल लगी हुई थी। मेरा परिवार, भाई सपरिवार, सचिन तेंदुलकर और धोनी सब ड्रांइग रूम
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होली रे होली तेरा रंग कैसा

होली मेरा और मेरे पतिदेव का सबसे प्रिय त्यौहार। कारण अलग अलग हैं। हमें याद आती है बचपन की होली, हल्की हल्की सर्दी में सुबह तीन बजे मैदान में होलिका दहन, जिसमें लोग गेहूँ की बालियां भूनते थे और एक दूसरे को गेहूँ के भुने दाने देते, गले मिलते और होली की
Mar 01 2010 11:39 AM
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गीतकार या अदाकार

आजकल अखबार रात को पढ़ा जाता है। अभी अभी पढ़ रहे हैं कि आमीर और जावेद अख्तर जी में कुछ झड़प हो गयी इस बात को ले कर कि गीतों को यादगार कौन बनाता है? आमीर का कहना है कि गीत कैसा भी लिखा हो उसे यादगार बनाने में अभिनेता का बहुत बड़ा हाथ होता है। जावेद जी को ये
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Feb 16 2010 11:51 PM
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रण

पिछले पंद्रह दिनों से झेल रहे अथक तनाव से तंग आ कर सोचा कि आज सनीमा…:) देखा जाए। अखबार तो आज कल बहुत कम देख पाते हैं उस पर फ़िल्मों की रेटिंग वेटिंग देखने का तो सवाल ही नहीं उठता। खबरें भी जो पढ़ते हैं वो आधे घंटे तक भूल चुके होते हैं । खैर दिमाग पर जोर
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आगरे का ठग

अचानक एक आदमी मेरे भाई के पास आया और एक्दम धीमे स्वर में कुछ कहा जो हमें सुनाई नहीं पड़ा। भाई ने साफ़ इंकार कर दिया। अब उस आदमी ने जरा तेज आवाज में कहा, आप मदद करने से भी इंकार कर रहे हैं? मेरे भाई ने हां कहते हुए सर हिला दिया। वो आदमी वहां से हट गया। हमने
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आगरा कैंट ( भाग 1)

मौसी के यहां से शादी का कॉर्ड आया तो हम समझ गये थे कि इस बार जाना अनिवार्य है। उत्तर भारत में शादियों का मौसम जाड़ों में ही पड़ता है और हर बार या तो छुट्टी न मिलने के कारण या गरम कपड़े न होने के कारण हम शादियों में शामिल न हुए। पिछले साल दिल्ली में एक शादी
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कुछ ख्याल

परसों से बहुत से चिठ्ठों पर मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बारे में ढेरों पोस्ट लिखी गयीं, कविताएं लिखी गयीं। किसी में नेताओं के प्रति आक्रोश(और वो सही भी है)था तो किसी में हम हिन्दूस्तानियों की बेबसी पर मौन आसूँ थे, कहीं युद्ध का ऐलान था तो कहीं 'हम
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आवाज़: चलो, एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

आवाज़: चलो, एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों
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चाँद की सैर

चाँद की सैर सुबह के सात बजते ही एफ़ एम गोल्ड पर पहले गाने की स्वर लहरियां गूंजी । " चांद को क्या मालूम चाहता है उसे कोई चकोर्…", अहा! जब दिन की शुरुवात इतनी मधुर है तो दिन तो मधुमास ही समझो। कार में रेडियो सुनने का मजा ही कुछ और है। बंद खिड़कियां, ए सी
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जानने का हक है

जानने का हक है आज की ताजा खबर ये है कि विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि हमारा दिमाग और मन छुट्टी से लौट रहे हैं। आज 14 सेप्टेंबर है, गणपति जी के जाने का दिन आ गया, हर साल की तरह इस साल भी बरखा की झड़ी लगी है। ऊपर की फ़ोटो हमारे कमरे की बैकसाइड है लेकि
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मोरया रे बप्पा मोरया रे

मोरया रे बप्पा मोरया रे कल गणेश चतुर्थी है। महाराष्ट्र में गणेश पूजा का महत्त्व उतना ही है जितना बंगाल में दुर्गा पूजा का। चारों तरफ़ हर्षोल्लास का वातावरण है, ये बिगुल है कि त्यौहारों का मौसम आ चला। अब बीच में श्राद्ध पक्ष को छोड़ दें तो दिवाली तक सब
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कुलबुलाहट

कुलबुलाहट इधर हम कुछ दिनों से कुछ नहीं लिख पा रहे। मन और मस्तिष्क दोनों छुट्टी पर हैं। उनके लौटने का इंतजार है। हमने कई नोटिस भेजे हैं पर दोनों टस से मस नहीं हो रहे, बिमार हैं कह कर टाल दिया जब की हम जानते हैं कि दोनों बारिश की रिमझिम का मजा ले रहे ह
Dec 29 2009 11:43 AM
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और वो लटक लिए

और वो लटक लिए ============= पता नहीं क्या बात है पर अचानक आत्महत्या की कई खबरें, चर्चाएं सुन रहे हैं। अनूप जी ने कहा, उनसे प्रेरित हो कर अकुंर जी बोले, दोनों को आई आई टी में हुई छात्रों की आत्महत्या ने द्रवित किया। पिछले ही हफ़्ते अपनी ही बिल्डिंग में
Dec 29 2009 11:43 AM
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नकुल कृष्णा - भाग ५

नकुल कृष्णा - भाग ५ ==================== आप लोगों की बात मानते हुए, इस कहानी को थोड़ा और आगे ले जा रहा हूँ। छह में से चार सिफ़ारिश के पत्रों को यहाँ पेश करना चाह रहा था। इनमे से तीन कॉलेज के वरिष्ठ शिक्षक के लिखे हुए थे और चौथा उसके नाटक का दिग्दर्शक क
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नकुल: भाग 4

नकुल: भाग ४ ============ इस चौथे किस्त में आपको यह बताना चाहता हूँ कि समाज सेवा और पर्यावरण रक्षा के क्षेत्र में नकुल की क्या भूमिका रही। मैं नहीं सोचता कि उसने यह सब इस छात्रवृत्ति हासिल करने कि लिए किया था क्योंकि इन गतिविधियों में बहुत पहले से वह
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नकुल कृष्णा: भाग 3

नकुल कृष्णा: भाग ३ ======== तीसरे किस्त में आपको यह बता दूँ कि नकुल ने ऐसा क्या किया अपने को इस छात्रवृत्ति के योग्य बनने के लिए। जैसा मैंने बताया, योग्यता के लिए तीन शर्तें और छह लोगों से सिफ़ारिश की चिठ्ठियों की जरूरत थी। पहली शर्त पहली शर्त थी शिक्
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क्या कहूँ

बम्बई की घटनाओं से अभी उबर नहीं पाये हैं। इतनी जल्दी उबर जाते तो हम ही न ग्रह मंत्री हो जाते…।:) अब इन अंधियारे 59 घंटों का जिक्र सब तरफ़ है तो मन में कुछ न कुछ तो चलेगा ही। (ज्ञान जी से इस शीर्षकचोरी की माफ़ी मांगते हुए)मेरी मानसिक हलचल के कुछ और उदगा
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नेह निमंत्रण

बेटे के आंचल में आते ही हर भारतीय मां उसके सर पर सेहरा बंधने के सपने देखने लगती है। हम भी कोई अपवाद नहीं हैं। जैसे ही हमारे बेटे ने अपने पिता के जूतों, कपड़ों पर हाथ साफ़ करना शुरु किया और पतिदेव रोज सबेरे शिकायत करते अपना रेजर, शेविंग क्रीम ढ़ूंढते पाय
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संगोष्ठी: भाग 2

कल मसिवी जी पहली बार हमारे ब्लोग पर टिपियाये, उन्हें हैरानी थी कि मनोविज्ञान विभाग ने मीडिया पर संगोष्ठी आयोजित की…। उनकी हैरानी जायज है हमारे कॉलेज के टीचरों का भी पहला रिएक्शन यही था। लेकिन समाज में ऐसा कोई मुद्दा है जिसके आधार में मनोविज्ञान न हो ?
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ब्लोगर मीट और संगोष्ठी

मुख्य अतिथी श्री कुमार केतकर और गेस्ट ऑफ़ ऑनर श्री वी एल धारुरकरब्लोगजगत से जुड़े तो पहली बार पत्रकार नामक जीव से पाला पड़ा, इससे पहले इतनी लंबी जिन्दगी में कभी पत्रकारिता की ओर ध्यान न गया था। सौभाग्यवश ब्लोगजगत के हर गली कूचे में किसी न किसी पत्रकार का
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हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैने सोचा था

शाम यही कोई साढ़े पाँच बजे घर लौटे थे, पेट में चूहे वर्ल्ड कप जीत चुके थे, बहुत दिनों के इंतजार के बाद वर्षा रानी का मूड ठीक हुआ है और बम्बईवासियों ने राहत की सांस ली है। बरखा रानी ने घर की बाहरी दिवारें धो पौंछ दी हैं और कमरे के अंदर की छत पर भी सो च
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मुझे कुछ कहना है

छब्बीस की चिठ्ठाचर्चा में अनूप जी ने हमारे बेटे की सगाई की खबर जोड़ हमारी पारिवारिक खुशी को ब्लोगजगत से जोड़ दिया है और सभी ब्लोगर मित्रों की शुभकामानाएं पा कर हम दुगुनी खुशी महसूस कर रहे हैं। आज से दो साल पहले( जी हां दो साल हो गये) जब हम ब्लोगजगत में
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गोली दिमाग के आरपार, महिला ने चाय बनायी"

गोली दिमाग के आरपार, महिला ने चाय बनायी" वैसे तो हमने अखबार पढ़ना बहुत कम कर दिया है। अखबार हमारी सेहत के लिए हानिकारक हैं। पूरा अखबार रेप, इनसेस्ट, या राजनीतिज्ञों की फ़ैलायी नफ़रत, धोखागड़ी के मामलों से पटा पड़ा रहता है, पढ़ते पढ़ते बेकार में रक्तचाप बड़ ज
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ये दिल मांगे मोर

ये दिल मांगे मोर 18 मार्च हर साल आता है और चला जाता है। हर साल इस तारीख के मायने हमारे लिए बदल जाते हैं। किशोरावस्था में इस बात की उत्सुकता होती थी कि क्या होली 18 मार्च को पड़ी और कई बार ऐसा हुआ कि छोटी होली या रंगपंचमी उसी दिन पड़ीं। उससे हमारी दिनचर
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तेरा नाम क्या है बसंती?

तेरा नाम क्या है बसंती? शेक्सपियर ने कहा “अरे नाम में क्या रखा है?” लेकिन सोचने वाली बात तो ये है भई कि नाम के बिना हमारा क्या अस्तित्व? किसी भी व्यक्ति से पहली मुलाकात, पहला वार्तालाप, स्टेज से भाषण में उवाचे पहले शब्द, टेलिफ़ोन पर उवाचे दूसरे शब्द (
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कुछ हम कहें

गांव वाले घर में अम्मा आप सबकी तरह ब्लोग जगत ने मुझे भी बहुत से दोस्त दिए हैं भिन्न भिन्न प्रदेश, व्यवसाय,और उम्र के। आप सब से मिल कर मेरी सोच मेरी जिन्दगी बहुत समृद्ध हुई है। अपनी जिन्दगी में इतनी संतुष्ट मैं पहले कभी न थी,खैर उसके बारे में फ़िर कभी।
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और ट्रेन से कूद गये

और ट्रेन से कूद गये कॉलेज के आखरी दिनों में लोकल ट्रेन के सफ़र के मजे लूटने का अवसर मिला। लोकल ट्रेन बम्बई का आइना है, जिन्दगी है। लोकल ट्रेन की अपनी एक दुनिया है। पूरी ट्रेन में सिर्फ़ दो डिब्बे महिलाओं के लिए आरक्षित होते थे। अब आम तौर पर तीन होते है
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होली के दिन भी क्या दिन थे ,

होली के दिन हम बहुत उदास रहते थे। बम्बई की होली में वो बात नहीं जो अलीगढ़ की होली में थी। वहां तो सुबह तीन बजे उठ कर होलिका जलायी जाती थी और उसी आग में गेहूं की नयी बालियां भूनी जाती थी , होली की मुबारकबाद देने का सिलसिला वहीं से शुरु हो जाता था, लोग
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भारत में बसे अप्रवासी भारतीय

भाग 2 कल अनूप जी ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मुझे अपने मायके वालों के बारे में अच्छा सोचना चाहिए। हम कहां इंकार कर रहे हैं जी। बंबई आये थे किशोरावस्था में, तब तक आस पास के पुरुषों को देखा जाना नहीं था, आप कह सकते हैं कि अभी तो आखें भी न खुली थीं। बोम्
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जरा बच के, ये है मुंबई मेरी जान

पिछले हफ़्ते संजीत ने कहा कि आप बम्बई में इतने सालों से रह रही हैं , जरा अपने अनुभवों में झांक कर बताइए तो क्या क्या बदलाव दिखते हैं आप को बंबई( नहीं , नहीं मुंबई) में , मुंबई की जीवन शैली, संस्कृति, इत्यादी में। संजीत हमें जनादेश नामक ई-पेपर के लिए ल
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पिछली पोस्ट हमने करीब दो महिने पहले लिखी थी( पता है बहुत बेकार स्कोर है), इस बीच बहुत कुछ घट गया, बहुत कुछ पढ़ा, कहीं टिपिया पाये कहीं नहीं। अक्सर ऐसा हुआ कि हमने पोस्ट पढ़ी, मन ही मन में टिपियाया और निकल गये। कारण ये था कि हम पिछले दो महीने से एक कोर्