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18 Jun 2010
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दिव्‍य रौशनी के सौदागरो - विनय कुमार

प्रिज्ममेरे भीतर एक प्रिज्म है जब भी कोई रोशनी मुझसे होकर गुज़रती है फट जाती है और सात रंग की चिंदियाँ झिलमिला उठती हैं यह प्रिज्म मेरी जान है मेरे होने की पहली शर्त मेरे बचपन का पहला खिलौना पहली किताब इसकी ढलान पर चढ़ने की कोशिश में जवान हुआ गिरा-पड़ा घायल
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जब मित्र ने पहला झापड मारा - ताकत के संस्‍मरण - कुमार मुकुल

पिता के पढा लिखा कर नवाब बनाने के कायदों का नतीजा यह था कि जब मैं इंटर में गया तो एकदम ललबबुआ था। वह पिता के कडे प्रशासक वाली छवि का प्रभाव था कि मुझे कहीं दबकर नहीं रहना पडा। पर जीवन है तो आपको हर स्थिति का सामना कभी ना कभी करना पडता है और समय जीने के
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दस करोड ये गधे क्‍या बनेंगे हुक्‍मरां....अपनी तो दुआ है ये सदर तू रहे सदा ...मैंने उससे ये कहा...

हबीब जालिब के इस गीत की रिकार्डिंग को लगातार सुना मैंने। इसमें पाकिस्‍तान के सदर और वहां की राजनीतिक परिस्थितियों पर गहरा व्‍यंग्‍य है। मैंने उससे ये कहा – हबीब जालिब – गीतमैंने उससे ये कहा ...................................... ये जो दस करोड है जहर का
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इससे बडी शर्म की बात और क्‍या हो सकती है - किशन कालजयी - सबलोग

सबलोग का यह दूसरा साल है। किशन कालजयी लगातार इसे एक जनोन्‍मुख पत्रिका के रूप में विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। उनका लक्ष्‍य दिनमान की कमी पूरी करना है। अगर देश के अन्‍य इलाकों में हो रहे बदलावों पर भी यह पत्रिका अपना ध्‍यान दे पाती और क्षेत्रीयता की
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आत्‍मा और अमरता - कविता

एक कौंध है आत्‍माबशर्ते कि तुम्‍हारे पास निगाह हो हलचल है अंतरमन की कि छलकता चला आता है जलकिनारे के पारभिंगोता त्‍वचाऔर अमरताएक स्‍वप्‍न है अगर हमारे पास कदम होंउधर बढाने कोनहीं तो मिटटी का सूखा ढेर है आत्‍माजिसे हवा जब चाहे उडा सकती
May 28 2010 09:56 AM
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वहां मेले में - कविता - कुमार मुकुल

वहां मेले में रोशनी थी बहुत पर इससे मेंले के बाहर का अंधेरा और गहराता सा डरा रहा था एक जगह लाउडस्‍पीकर चीख रहा था ...लडकी लडकी लडकी बस अभी कुछ ही देर में जादूगर इस लडकी को नाग में बदल देगा लडकी लडकी लडकी... वहां मंच पर दो लडकियां चाइनों की तरह मुस्‍कुरा
May 26 2010 10:25 AM
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घृणा पर आधारित अरविंद अडिगा का उपन्यास - द वाइट टाइगर

राजेश जोशी ने अपनी एक कविता में लिखा है कि घृणा इतनी गैरजरूरी चीज भी नहीं कि जहां उसकी जरूरत हो वहां भी ना की जाए। सीमित तौर पर इसी बात को आधार बनाकर अरविंद अडिगा ने अपना उपन्याहस द वाइट टाइगर लिखा है। सीमित इसलिये कि उपन्यारस में घृणा का प्रयोग अधिकतर
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कॉरपोरेट नेतृत्व में लोकतंत्र : विकास या विकास का आतंकवाद?

साथियों, 14 मई 2010 को पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के संघर्षरत साथियों - ग्रामीणों पर धिनकिया ग्राम में हुए गोलीचालन, 12 मई 2010 को कलिंग नगर में गोलीचालन, नियमागिरि एवं पोटका झारखण्ड में दमनकारी कार्रवाई के खिलाफ जननेत्री दयामनी बारला के नेतृत्व में
May 24 2010 06:20 PM
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जनगणना और जाति की जटिलताएं - श्रीकांत

मैटर को पढने के लिए जूम करें करें
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जन संस्कृति मंच की ओर से गांधी शांति प्रतिष्ठान में कविता पाठ तथा विचार विमर्श

जन संस्कृति मंच की ओर से गांधी शांति प्रतिष्ठान में कविता पाठ तथा हिंदी कविता समकालीनता से आगे विषय पर विचार विमर्श का आयोजन हुआ। पहले सत्र में रंजीत वर्मा, रोहित प्रकाश, गौरव सोलंकी और संजीव कौशल ने अपनी कविताओं का पाठ किया। रंजीत वर्मा ने ‘अंतिम जन की
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वे अकेली जलाती हैं चूल्‍हे काली पडती हैं और मां हो जाती हैं - गौरव सोलंकी

कल रविवार की शाम गांधी शांति प्रतिष्‍ठान में जसम की ओर से कराए गए कविता पाठ में गौरव सोलंकी ने कुछ कविताएं पढीं थी जिनमें एक यह है...छूटी हुई लिपस्टिक वे तुम्हारी पागल रातों में तलाशती हैं अपनी छूटी हुई लिपस्टिक और यकीन करती हैं तबाह होती हैंवे चली जाना
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शातिर की थेंथरई - कविता - प्रिय कवि विष्‍णु नागर को पढते हुए - कुमार मुकुल

नागर जी का कविता संग्रह घर के बाहर घर अंतिका प्रकाशन से आया है इस साल। पडोसी कव‍ि,पत्रकार मित्र पंकज चौधरी से लेकर पिछले सप्‍ताह यह संग्रह पढा मैंने। पिछले संकलन की तरह व्‍यौरों की बारीकी और व्‍यंग्‍य की धार इस संग्रह की कविताओं की भी खासियत है। कई
May 16 2010 02:50 PM
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बुधवा मुंडा को नींद नहीं आती - अच्युतानंद मिश्र

बुधवा मुंडा को नींद नहीं आती रात भर कोईउसके सपनो में कहता है उलगुलान उलगुलान उलगुलान ! के है रे खाट पर लेटा बुधवाइंतज़ार करता है उसका पठारी मन पूछता है जाने कब होगा विहान जाने कब निकलेगा ललका सूरज जाने कब ढलेगी ये अँधेरी रात और फैलने लगती है चुप्पी जंगल
May 16 2010 09:59 AM
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निरुपमा को न्याय अभियान - प्रेस विज्ञप्ति/ 15 मई, 2010

निरुपमा पाठक हत्याकांड की सीबीआई जांच की मांग को लेकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, द इंडियन वूमेन प्रेस कॉर्प, निरुपमा पाठक को न्याय अभियान और आईआईएमसी एलुमनी एसोसिएशन के संयुक्त आह्वान पर प्रेस क्लब से गृह मंत्रालय तक मौन जुलूस निकाला गया. निरुपमा पाठक को
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एक दोस्त के लौटने पर- कविता- सुधीर सुमन

एक दोस्त के लौटने परसब वहां सिर्फ अवसर की तलाश में थेउसी का फलसफा गूंजता था चारों ओरतुम लेके गए थे मेहनत की पूंजीबराबरी का ख्वाबअभावों में पले स्वाभिमान की आंच।तुम्हें लगा होगा किशायद तुम्हारी जरूरत है वहांयार-दोस्तों के मश्वरे थेमदद भी थीफिर भी लौट आए
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इस लज्जित और पराजित युग में - अच्‍युतानंद मिश्र

इस लज्जित और पराजित युग मेंदेखिए तो कैसे हहाकर बढ रहा हूं मैंदेखिए तो अपने घर के चारों तरफकैसे उगा लिया है हरापन मैंनेमेरे बच्‍चे का विज्ञापनी चेहरा देखकरमेरे पडोसी के बच्‍चे को इंसान का बच्‍चामानने की भूल नहीं कर सकेंगे आपइस लज्जित और पराजित युग मेंअभी
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मेरे मालिक - 1 - आइडियल एक्‍सप्रेस - बनारस - नौकरी के संस्‍मरण

अब तक कुल दर्जन भर पत्र-पत्रिकाओं में काम कर चुका हूं मैं तो वहां के कुछ संस्‍मरण मेरे मालिक सीरीज में...यह चौरानबे पिचानबे की बात होगी। 28-29 का रहा होउंगा। विवाह हो चुका था एक बेटा एक साल का। अखबारों में लिखता था खूब,हिन्‍दुस्‍तान में एक-एक पेज की कवर
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एक अनंत से दूसरे अनंत तक: अनामिका की कविताएं - कुमार मुकुल

अनामिका की कविताएँ औसत भारतीय स्त्री जीवन की डबडबाई अभिव्यक्तियाँ हैं-‘‘मैं उनको रोज झाड़ती हूँ-पर वे ही हैं इस पूरे घर में जो मुझको कभी नहीं झाड़ते!’’‘फर्नीचर’ कविता की ये पंक्तियाँ आधी आबाद के गहन दुख को उसकी सांद्रता के साथ जिस तरह अभिव्यक्त करती हैं वह
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ये पैसे मैं आपको कहां लौटाउंगा - संस्‍मरण - कर्म और भाग्‍य

घटना पंद्रह साल पहले की है। पटना रेलवे स्‍टेशन से दिनकर चौक के लिये टेम्‍पो पर बैठ रहा था मैं। पीछे की तरफ मेरे बाद एक सीट और खाली थी आटो में। तभी एक बूढा आदमी आया और आटो ड्राइवर चलने के पहले सबसे भाडा वसूलने लगा। बूढे के पास सवा रूपये थे जबकि भाडा डेढ
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ज़िन्दगी का कारवाँ / महेंद्रभटनागर

ज़िन्दगी का कारवाँ रुकता नहीं, रुकता नहीं !.ये क्षणिक तूफ़ान तो आते गुज़र जाते,केश केवल कुछ हवा में उड़ बिखर जाते !पर, सतत गतिमय क़दम इंसान के कब डगमगाये ?और ताक़त से इसी क्षण पैर जनबल ने उठाये !ज़िन्दगी का कारवाँ यहआफ़तों के सामने झुकता नहीं, झुकता नहीं !.रह
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मोरनी के पैर - लवली कुमारी

बदसूरत सी मोरनी, सुन्दर सा मोरमोरनी को रिझाने की कोशिश मेंनाच नाच कर कलाबाजियाँ दिखाता है मोरतब उसे उसकी बदरंग देह नही दिखतीन ही बदसूरत पैर दिखते हैंजैविक उद्धेश्य सर्वोपरी होता हैजैसे प्यास लगाने पर नही होता फर्ककुवें और गंदे नाले के जल मेंखत्म होती है
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मृत्‍यु गीत - गाब्रियला मिस्‍त्राल

1945 में नोबेल से सम्‍मानित चीले की इस्‍पाहानी कवयित्री गाब्रियला मिस्‍त्राल की कविताओं से गुजरना एक आत्‍मीय अनुभव रहा। अनुपस्थिति का देश तथा अन्‍य कविताएं नामक इस संकलन की कविताओं का अनुवाद गंगाप्रसाद विमल,विनोद शर्मा और आलोक लाहड ने किया है। प्रस्‍तुत
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ग्‍लोबलाइजेशन चीजों को टुकडों में देखता है - प्रभाष जोशी - बातचीत - 1997 प्रभात खबर

राष्‍ट्रीय पुनरनिर्माण के मुद्दों पर बहस में भाग लेने आए लोगों में वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभाष जोशी भी अन्‍य वक्‍ताओं के साथ अनुग्रहनारायण संस्‍थान की अतिथिशाला में ठहरे थे। सुबह नौ बजे मैं पहूंचा तो कमरे में आसा के एकाध लडके थे। बेड पर उनकी चौडे पाढ वाली
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छुटटी के दिन का कोरस - प्रियंबद का उपन्‍यास - कुमार मुकुल

छुटटी के दिन का कोरस विन्सेंट डगलस यानि विवान के 1947 की ऐतिहासिक तारीख के दोनों ओर फैले जीवन की बिखरी स्मृतियों का कोलाज है। इस कोलाज में इतिहास और यथार्थ, स्वप्न और जीवन, कल्पना और वास्तविकता एक दूसरे पर ओवरलैपिंग करते नजर आते हैं और इस सब से उपजा
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सृजनोत्सव: जनसंघर्ष और प्रतिरोध के संस्कृतिकर्म को राष्‍ट्रीय मंच देने की पहल

  एक ओर सामाजिक-आर्थिक प्रगति के झूठ के प्रचार और अपने लूट को ढंकने वाली सत्ता संस्कृति के विज्ञापन और दूसरी ओर अराजक तरीके से किए जा रहे उपभोक्ता उत्पाद कंपनियों के विज्ञापन, बिहार में आजकल पहली नजर में इसी की भरमार दिखती है. जनता के बुनियादी
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सबसे बडका सियार - संस्‍मरण

यह कहानी चाचा सुनाया करते थे। कहानी उस समय की है जब पिता कालेज में पढते थे। मेरा गांव सोन नदी के तट पर है। तो वह बाढ का समय था तो नदी किनारे गांव के कुछ लडके जो बाढ देखने और नहाने को वहां जमा थे , उन्‍होंने देखा कि नदी किनारे एक बडा सा जंगली जानवर थका सा
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मैं भी अमरीका का गीत गाता हूं - लैंग्‍स्‍टन ह्यूज - अनुवाद - रामकृष्‍ण पाण्‍डेय

मैं भी अमरीका का गीत गाता हूंमैं उसका एक काला बाशिंदा हूंजब मेहमान आते हैंवे मुझे रसोईघर में भेज देते हैंपर मैं हंसता हूंऔर खा खा कर पेट भर लेता हूंऔर पहलवान की तरह मोटा होता रहता हूंकल जब मेहमान आएंगेमैं सीधे मेज पर बैठ जाउंगाऔर किसी की हिम्‍मत नहीं
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तो तय है कि हमें होश में रहने की बीमारी है ...

फुटपाथ के मल-मूत्र में डूबे हिस्से परअगर एक आदमीअपने स्वप्न की गठरियां सजाता हैरात ढलेऔर चांदनी बिखरने लगती हैउससे फूटती उबकाई परऔर आखिरकार मुंह बाएंसो जाता है वहऔर यह दृश्य देख हम होश में हैंतो तय हैकि हमें होश में रहने की बीमारी हैकौन डरता है यहां पागल
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इससे पहले कि मारे जाओ - डी एच लारेंस

किशोर उम्र में पिता के बक्‍से से लेकर छुपाकर पढी थी लेडी चैटर्लीज लवर। फिर बाद में जब पढने लगा तो लाइब्ररी से लारेंस की कविताओं का अनुवाद आत्‍मा की आंखें लाया जो दिनकर ने किया था,उसका उस समय बहुत असर पडा था, साल भर पहले चेतन से लेकर उनका एक उपन्‍यास बेटे
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प्‍यार : एक बनावटी चिथडा - डी.एच.लारेंस - अनुवाद - कृष्‍ण खुल्‍लर

बनाया है प्‍यार को हमने एक विशाल विरूपजब से उसे आदर्श बनाया हैजिस क्षण मैंने शपथ लीजीवनपर्यंत एक स्‍त्री से प्‍यार करने की,एक तयशुदा स्‍त्री सेउसी क्षण शुरू कर दी उससे नफरतउस क्षण ज‍ब मैं यह भी कहता हूं किसी स्‍त्री से:मैं तुम्‍हें प्‍यार करता हूंमेरा
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गुड खाएं और सैम संग गुलगुले भी - कुमार मुकुल

नामवर सिंह का कथन है-‘नेहरू की दृष्टि में संस्कृति एक ‘एलीटिस्ट’ अवधारणा थी और उन्होंने रवींद्रनाथ की परंपरा में ही भद्रवर्गोचित अकादमियों की स्थापना की।’ अब भद्र वर्ग अंकल सैम के संग गुलगुले खाए या टाटा बिड़ला संग, कोउ नृप होहीं हमैं का हानि...। सब जानते
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थोडा सा स्त्री होना चाहता हूं - रणेन्‍द्र

कौन जाने उसके बिरहोड. टंडा मेंबसंत आता था या नहीं,अकाल-मृत्यु आ ही जाती अक्सरकई-कई रूप धर कररणेन्द्र की कविताओं से गुजरना जैसे दुखमय जीवन की स्मृतियों से गुजरना है। दुख जो हमें सालता है बारहा, चालता है हमारे भविष्यत के स्वप्नों तक को। हतवाक् करती हैं ये
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दिमाग के साथ दिल की सुनने की वकालत करता उपन्यास-बंधन

बंधन  मनोज सिंह का मनोरोगी के परिवार को केन्द्र में रखकर लिखा गया उपन्यास है। इसकी मुख्य पात्र निकिता अपनी पारिवारिक सामाजिक पृश्ठभूमि में मनोरोग का षिकार होती है। मनोरोग किस तरह पूरे परिवार और समाज की परेषानी का कारक हो सकता है और किस हद तक हमारा
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अपनी माटी को जकड़ी दूब हैं -गिरीश रंजन- नरेन

सत्यजित राय के साथ  गिरीश रंजनयह 1970 के दषक के शुरूआती दिनों की बात होगी। गिरीष ‘दा को मैंने पहली दफा कलकत्ता के सेंट्रल एवेन्यु के उस प्रख्यात कॉफी हाऊस में देखा था, जिसमें तमाम बांग्ला बुद्विजीवी और फिल्मकार आदि ‘अड्डेबाजी’ के लिये आया करते थे।
Mar 03 2010 09:36 AM
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रचनात्मक साहस को सलाम - डा. विनय कुमार

यूनान में गु़लामों के बदन पर निषान बनाने की प्रथा थी। निषान देखिए और समझ जाइए कि यह आदमी गु़लाम है । अपने यहाँ भी चोरों को दागने का रिवाज था। ऐसे चोरों को दागी चोर कहते थे । चोरी कोई भी करे पकड़ा जाता था दागी चोर। ये दाग गुलामों के भीतर के इंसान सिरे से
Feb 27 2010 08:43 PM
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झरना से मनोवेद तक का सफर - कुमार मुकुल - संस्मरण

    यह 2000 के अंतिम महीनों की बात होगी जब पटना स्टेशन के निकट सीटीओ के मीडिया सेन्टर में पहली बार राजस्थान पत्रिका के पटना से संवाददाता और मित्र प्रियरंजन भारती ने मनोचिकित्सक डॉ.विनय कुमार से यह कहकर परिचय कराया था कि ये भी अच्छी गजलें
Feb 27 2010 08:24 AM
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तुम्हारी ट्रेन तो चली जा रही है मिनी

देखो ना मिनीतुम्हारी ट्रेन चली जा रही हैकोइलवर पुल परछुक छुक करतीऔर एक लडकादूर इधर नदी के पारहाथ हिला रहा है तुम्हेंदूर से तुम्हें वह लाल झंडे सा दिख रहा होगाऔर तुम चिढ रही होगीकि तुम्हारा यह प्यारा रंग उसने क्यों हथिया लिया हैपर उसने हथियाया नहीं है यह
Feb 10 2010 10:08 PM
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मैंने निचोड़कर दर्द - स्नेह

मैंने निचोड़कर दर्दमन कोमानो सूखने के ख्याल सेरस्सी पर डाल दिया हैऔर मनसूख रहा हैबचा-खुचा दर्दजब उड़ जायेगातब फिर पहन लूँगा मैं उसेमाँग जो रहा है मेराबेवकूफ तनबिना दर्द का मन !
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बूधन बिरिजिया और शहर - रणेन्‍द्र - कविता

अपनी फटी हुई गमछी पहन करशहर आ गयाबूधन बिरिजियाजब शहर में चारों ओर छाई थीऐश्वर्या रायऔर उनका नौलखा परिधानराजपथ पर सवारी निकली थीऐश्वर्या राय कीफुटपाथों पर कटआऊट्स खड़े थेमैदानों में मंच सजा थाऐश्वर्या राय काटीवी स्क्रीन से निकल करहर घर में मटक रही थी