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15 Jun 2010
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नक्सलवाद और सरकार के अंतर्विरोध

देवाशीष प्रसूनभारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा हर साल प्रकाशित वार्षिक रपटों के मुताबिक़ नक्सलवादी, प्रशासनिक और राजनैतिक संस्थानों की अकर्मण्यता द्वारा सृजित माहौल में कार्य करते हैं, स्थानीय मांगों को भड़काते हैं और जनसंख्या के शोषित वर्गों के बीच
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भास्‍कर समूह की मासिक पत्रिका अहा जिंदगी और लक्ष्‍य के नये संपादक होंगे आलोक श्रीवास्‍तव।

कभी धर्मयुग, साप्‍ताहिक हिंदुस्‍तान जैसी पत्रिकाएं हिंदी क्षेत्र में जो सांस्‍कृतिक प्रभाव रखती थीं, वैसे ही कुछ इरादों के साथ भास्‍कर समूह ने अहा जिंदगी का प्रकाशन छह साल पहले शुरू किया था। अहा जिंदगी यशवंत व्‍यास के संपादन में शुरू हुई थी और लोकप्रियता
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लोकतंत्र में जाति का सवाल

चन्द्रिका २०११ की जनगणना में जाति गिनाने का सवाल आरक्षण के सवाल से जुड़ा हुआ नहीं है. उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण को लेकर ५० प्रतिशत का जो मानक तैयार किया था वह ४९.५ प्रतिशत के साथ लगभग पूरा हो चुका है, लिहाजा जनगणना में अब जाति गिनवाने से जो अहम फायदा
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प्रेम एक राजनीतिक मसला है...

· देवाशीष प्रसूनसमगोत्रीय शादियों के ख़िलाफ़ खाप पंचायतों ने ख़ूब हो-हल्ला मचा रखा है। डंके के चोट पर उन दंपत्तियों की हत्या कर दी जा रही है, जो एक ही गोत्र होने के बावज़ूद अपने प्रेम को तवज्जो देते हुए परिवार बसाने का निर्णय लेते हुए शादी करते हैं।
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शुड वी एब्यूज आर......

खड़गपुर की पटरियों से रेलगाड़ियाँ फिर से गुजरने लगी हैं........ देश की सरकार ने लासों की कीमत अदा करनी शुरु कर दी है..... हर मरने वाले के जिंदगी की कीमत छः लाख रूपये, छः लाख की रकम का मतलब, वह रकम है जिसका आधा भी देश के ८० प्रतिशत लोगों द्वारा उनकी जिंदगी
May 31 2010 11:09 AM
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छत्तीसगढ़ में ...(डायरी के कुछ अंश):- - देवाशीष प्रसून

९ दिसंबरसूचना मिली कि १२ और १३ दिसंबर २००९ को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पूरे देश से लगभग पच्चीस नारी अधिकार संगठनों की कार्यकर्त्ताएँ इकट्ठा होने वाली हैं, जो राज्य सत्ता द्वारा किए जाने वाले दमनों के दौरान किए जाने वाली यौन-हिंसा पर अपनी
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May 26 2010 01:42 PM
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संसद की बातें और युद्ध का सच --- अनिल चमड़िया

लाल कृष्ण आडवाणी ने नवंबर 1999 में जब ये कहा कि आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करने के लिए सैनिक बलों की संख्या पर्याप्त नहीं है तो राज्यसभा में इस बाबत एक सवाल किया गया।तब सरकार ने जवाब दिया था कि इस समय जम्मू कश्मीर में मिलिटेंसी से प्रभावित
May 18 2010 05:58 PM
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छत्तीसगढ़ में हुयी शांति-न्याय यात्रा

देवाशीष प्रसूनएक तरफ, वर्षों से शोषित व उत्पीड़ित आदिवासी जनता ने माओवादियों के नेतृत्व में अपने अधिकारों को हासिल करने के लिये लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को नाकाफी समझते हुये हथियार उठा लिया है। दूसरी तरफ, असंतोष के कारण उपजे विद्रोह के मूल में विद्यमान
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा उपेक्षित

देश का कोई भी संस्थान जब नयी नीतियां पारित करता है तो यह अपेक्षा की जाती है कि नयी नीतियों के तहत बनने वाले नियम, कानून, पहले की अपेक्षा ज्यादा सरल और जन सुलभ होंगे. उच्च शिक्षा के विकास के लिये जब १९५३ में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) बनाया गया
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नारको टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने नारको टेस्ट पर कानूनी प्रतिबंध लगाते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया है. नारको टेस्ट का मामला व्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन से जुड़ा है जिसमे उसे बोलने या चुप रहने दोनों का अधिकार दिया जाता है. एक आरोपी को अपने ऊपर लगे आरोप को कुबूल करने या न
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मजदूरों का बंधुआ बनना जारी है...

- देवाशीष प्रसूनअगर भारत सरकार या देश के किसी भी राज्य सरकार से पूछा जाये कि क्या अब भी हमारे देश में मजदूरों को बंधुआ बनाया जा रहा है, तो शायद एक-टूक जबाव मिले - नहीं, बिल्कुल नहीं। सरकारे अपने श्रम-मंत्रालयों के वार्षिक रपटों के जरिए हमेशा ऐसा ही कहती
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पंकज विष्ट कों एक खुला ख़त

समयांतर के मार्च, 2010 अंक में नवीन पाठक के नाम से आपने पृश्ठ 39 पर लिखा है: ... इधर उभरे वामपंथी प्रकाषनगृहों से मुख्य तौर से वे किताबें नए सिरे से छप कर आई हैं जो सोवियत रूस के जमाने में प्रगति प्रकाषन मास्को से छपती थीं. इनकी लोकप्रियता देखते हुए यह
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तुम्हारी चुप्पियाँ और उनकी हत्यायें

वहाँ की खबरें नहीं आ रही हैं बेसक ये खबरें हत्या और कत्ल के रूप में आयेंगी पर युद्ध की खबरों के चेहरे ऐसे ही होते हैं. उनके लिये और उन सबके लिये सूचना क्रांति असफल हो चुकी है, जो जंगलों की रक्षा महज खनिज संसाधनो की लूट के लिये नहीं करते, जिनके लिये
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सरकार अपना भरोसा खो चुकी है

जिंदगी की कीमतें रुपयों से नहीं चुकायी जा सकती। चाहे वह 40 लाख हो या उससे भी अधिक। आदिवासियों की जिंदगी की भी और सेना के जवानों की भी। न ही किसी की जिंदगी को कम करके आंका जा सकता है – पर यह होता रहा है। स्थान, व्यक्ति, वर्ग के लिहाज से घटनाओं की महत्ता
Apr 19 2010 03:10 PM
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दंतेवाड़ा से भोथरी होती संवेदना

दंतेवाड़ा में ऑपरेशन ग्रीन हंट को अंजाम देने निकले सीआरपीएफ के 75जवानों का माओवादी हमले में मारा जाना माओवादियों पर भारी पड़ने वाला है. गृहमंत्री पी चिदंबरम अब सवाल करने पर यह बता रहे हैं कि वे छत्तीसगढ़ के उस हिस्से में वायु सेना का इस्तेमाल नहीं करने
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जब देश की सरकार बर्बर हो जाय.

छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा में माओवादीयों द्वारा किया गया हमला अब तक का सबसे बड़ा हमला है, कुछ महीने ही बीते हैं राजनांद गांव के उस हमले को जिसे सबसे बड़ा हमला माना गया था, उसके पहले गड़चिरौली में हुआ हमला सबसे बड़ा हमला था और उससे पहले बिहार का जहानाबाद जेल
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कहानी: जो अखबारों में दर्ज नहीं हुई

संजय और संगीता लौट गये हैं पर यह कैसे कहा जाय कि वे घर लौट गये हैं. उनके पिता विक्रम सिंघ सूर्यवंशी ने जब ज़हर खाकर आत्महत्या की थी तो दोनों की उम्र इतनी कम थी कि पिता को पिता कहने का ठीक-ठीक एहसास भी नहीं रहा होगा, महज ३ साल और ५ साल. आज पाँच वर्षों बाद
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पंजाब में किसान नेताओं पर दमनचक्र

प्रधानमंत्री जब इस चुनाव के दौरान पंजाब में चुनावी सभायें कर रहे थे तो लग रहा था कि फिर से पंजाब में हरित क्रांति की तैयारी में हैं और चुनावी व्यस्तता से जैसे ही वे मुक्त होंगे यह क्रांति पल्लवित होती दिखने लगेगी. आज़ादी के बाद किसी सरकार ने किसानों के
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सीमा अरुंधती नहीं हैं

आवेश तिवारीसीमा आजाद की गिरफ्तारी के 24 घंटे भी नहीं हुए थे, जब उनके एक बेहद करीबी दोस्त ने, जो एक नामचीन कवि भी हैं, उनसे कोई नाता होने से इनकार कर दिया था। सीमा की एक और मित्र, जिसे खुद की गिरफ्तारी का भी अंदेशा बना हुआ था, पुलिसवालों से मिलकर अपनी
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दंडकारण्य से लौटकर: अरुंधति राय

दंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केंद्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।दंतेवाड़ा में पुलिस सादे कपड़े पहनती है और बागी पहनते
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क्या जो घर्म निरपेक्ष होगा वो लोकतांत्रिक भी होगा?

अनिल चमडियाजब दिल्ली स्थित आल इंडिया इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंस ( एम्स) मंडल-दो विरोधी आंदोलन का केन्द्र बना हुआ था उस समय उसके निदेशक डा. के वेणुगोपाल थे। एम्स के आरक्षण विरोधी आंदोलन का केन्द्र बनाने में हृदय रोग विशेषज्ञ डा. वेणुगोपाल की महत्वपूर्ण
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हरप्रीत कौर के हस्ताक्षर पंजाबी कविताओं में दर्ज किये जाने बाकी हैं

हरप्रीत कौर के हस्ताक्षर पंजाबी कविताओं में दर्ज किये जाने बाकी हैं. उनके पास ढेरों सारी कहानियां हैं जिन्हें दादियों और नानियों के किस्से में बदल जाना था और गाँव के बचपन में उन कहानियों को बिखर जाना था यह एक पीढ़ी के लिये मिसाल और नसीहत बनती. दादियों और
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सरकार की बढ़ती असुरक्षा

हमारी सरकार हमे सुरक्षित रखना चाहती है, यह कोई कल्याणकारी काम नहीं बल्कि वह अपनी जिम्मेदारी निभा रही है. इस सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में एक व्यक्ति की आजादी छिनती जा रही है आज के समय में यह लोकतंत्र को व्यापक बनाने का एक संकट है. यात्राओं, सार्वजनिक
Mar 17 2010 02:21 PM
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कहां चले आए मेरे देश?

ओ मेरे अभागे देशरोओ अपनी उन संतानों के नामजिनकी तुम हत्या करते होओ मातृभूमिये किनके खून से सने हैं तुम्हारे हाथ?तुम्हारी स्याह रातों में यह कौनरोता जाग रहा हैकिसे तुमने कल फिर मिट्टी बना दिया?सुदूर बस्तियों में, राहों में, जंगलों मेंतुम्हारे ही बेटेभूखे,
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जंगल चल कर शहर आ गए

ये जंगल के इलाके नही हैं. न ही ये किसी राज्य के पहाड़ियों के पार बसे आदिवासी हैं जो माओवाद के नाम पर घाव बन चुके हैं. यहाँ टाटा एस्सार जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने जमीन अधिग्रहण के लिये लोगों का विस्थापन अभियान भी नही चलाया है. सर्वजन हिताय का नारा
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Mar 09 2010 10:55 AM
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एक उम्र के बाद लड़की

एक उम्र के बादहिकारत भरी नज़र से देखती है लड़कीअपने ही घर कोजैसे देख रही हो डर कोघर से निकलती हुई लड़की को देखकर तुम कैसे कह सकते होकि वह लौटेगी...........उसी उदासी संकोच और चुप्पी के साथअपनी ठीक वही उम्र लेकरकिसी निखालिस खाली जगह परअब तक के भरोसे कोउड़ेल कर
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आदिवासी और माओवादी एक तरफ हैं और राजसत्ता दूसरी तरफ

‘पुलिस दुश्मन के साथ है’क्रांतिकारी कवि और विचारक वरवर राव बता रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में पुलिस कैंप पर हमला ऑपरेशन ग्रीन हंट के बदले में किया गया था. तहलका में प्रकाशित शोभिता नैथानी से बातचीत से अंश-साभार.पश्चिम बंगाल में जवानों की निर्मम हत्या पर
Mar 05 2010 09:44 AM
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सुनो यह विलाप -आलोक श्रीवास्तव

अवध की एक शाम पुकारती हैलोगो सुनोलहू में डूबी, वह शाम फैलती जाती है चारो ओर बिछा दो तुम जाजमरौशनियांतुम्हारी कोई होली, कोई दीवाली, कोई ईदउस मातम को छिपा नहीं पाएगीजो इस मुल्क के बाशिंदों पर डेढ़ सौ साल से तारी पूरा अवध खून में डूबा आज भी पुकारता हैढही
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Mar 02 2010 10:45 AM
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हर जगह नहीं हैं तिरुपति राव, छात्र अपनी लड़ाई खुद लड़ें!

♦ आवेश तिवारीतिरुपति राव का नाम शायद आपमें से बहुत कम लोग जानते हों। दक्षिण के श्रेष्ठ विद्वानों में गिने जाने वाले तिरुपति राव हैदराबाद स्थित उस्मानिया विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। ये वही राव हैं, जिनकी कार पर अभी कुछ ही दिनों पूर्व अलग तेलंगाना राज्य
Feb 24 2010 11:32 AM
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आजमगढ़ की आबोहवा में फिर सरगर्मी

पिछले कुछ महीनों से शांत चल रहे आजमगढ़ की आबोहवा में फिर सरगर्मी है। खालिसपुर के शहजाद की इनामी आतंकवादी बताकर गिरफ्तारी, फिर पुणे धमाके में उसकी संलिप्तता का संदेह जैसे समाचार सुनकर आजमगढ़ की खौफज़दा और खिसियाई जनता पूछने लगी है, मुल्क में मुसलमानों का भी
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नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों से एक अपील

साथी,पत्रकार बंधुओं, देश में नक्सलवाद/माओवाद/आतंकवाद के नाम पर चल रहे सरकारी दमन के बीच मीडिया और आप सभी की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। सत्ता जब मीडिया को अपना हथियार व पुलिस पत्रकारों को अपने बंदूक की गोली की भूमिका में इस्तेमाल करे तो ऐसे
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श्री विभूति नारायण राय, कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के नाम एक पत्र

दिल्ली 9 फरवरी 2010प्रिय विभूतिजीअभिवादन !उम्मीद है, स्वस्थ होंगे .लम्बे समय से इस उधेड़बुन में था कि चन्द बातें आप तक किस तरह संप्रेषित करूं ? व्यक्तिगत मुलाकात संभव नहीं दिख रही थी, सोचा पत्र के जरिए ही अपनी बात लिख दूं. और यह एक ऐसा पत्र हो, जो सिर्फ
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सत्ता , साजिश और सीमा -आवेश तिवारी

यूपी की मान‍वाधिकार कार्यकर्ता सीमा आज़ाद और उनके पति विश्‍वविजय को पुलिस ने नक्‍सली बताकर गिरफ्तार किया है। हमें मालूम है कि इस एक विशेषण की आड़ पुलिस किन मंसूबों के साथ लेती है। और आजकल इस नक्‍सली शब्‍द पर केंद्र भी सजग है। उसे मालूम है कि पहाड़ों पर
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“न किसी से जाति पूछता हूं, न किसी को जाति बताता हूं -अनिल चमड़िया

अनिल चमड़िया को हटाये जाने के इस वर्धा प्रकरण में एक वेबसाइट ने उनकी राय जानी और जो बताया गया, उसमें कुछ मसाला जोड़ कर छापा गया। पूरे मामले को जातीय रंग देने की कोशिश की गयी। वीसी का पक्ष भी उसी आधार पर ले लिया गया। यानी जो है, उस पर बात करने के बजाय
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स्वास्थ्य पर घटे बाजार का प्रभुत्व

डॉ. ए.के. अरुण न दिनों भारत ही नहीं, लगभग पूरी दुनिया गंभीर रोगों की चुनौतियों से जूझ रही है। प्रचलित पुराने रोगों के अलावा नये उभर रहे रोगों की जानलेवा किस्में बड़े पैमाने पर कहर बरपा रही हैं। इन रोगों के खात्मे के नाम पर चलाए जाने वाले सरकारी
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इंडिया, भारत और मैनहट्टन

देविन्दर शर्मा देश ने जब उदारीकरण के रास्ते पर चलना तय किया, उसके ठीक बाद तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने सदन में जो भाषण दिया उसके पहले पैरे में उन्होंने कहा कि कृषि हमारा मुख्य सेक्टर है और इसे जब तक बिल्ड अप नहीं किया जाएगा देश की अर्थव्यवस्था
Jan 15 2010 05:26 PM
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फेल हो चुका है बाजारीकरण का मॉडल

प्रोफेसर अरुण कुमार वैश्वीकरण की शुरूआत हमारे देश में नब्बे के दशक से नहीं हुई है। यह प्रक्रिया हजारों साल से चल रही है, लेकिन शुरूआती दौर में वैश्वीकरण दोतरफा था। यानी हम दुनिया से लेते भी थे और दुनिया को देते भी थे। 1750 के बाद से यह एकतरफा होता
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बीते साल

यह साल बहुत हल्का रहाइतने हल्के रहे रात और दिनकि चुरा ले गया कोईपूरा का पूरा बरसऔर हमें पता भी नहीं चलागर्मी में नहीं हुई कोई गर्मीबारिश में हम उतना भीनहीं भींगे जितनाकोई पेड़कोई पुलियाकोई रास्ता हर बार की तरहएक मोड़ तक आते आतेबदल गया पूरा मौसमएक छत है
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आइये- दुनिया को आज़ाद कराने के लिये लडें

द ’ डिक्टेटर का समापन भाषण चार्ली चैप्लिन चार्ली चैप्लिन ने लोगों को ऎसे दौर में हसना सिखाया जब दुनिया विश्वयुद्ध और फासीवाद के दौर में जी रही थी . द ग्रेट डिक्टेटर फिल्म १९४० में बनी जिसमे चर्ली चैप्लिन ने हिटलर की भूमिका निभाते हुए एक भाषण दिया था
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कश्मीर में मीडिया

शेवंती निनन अनुवाद: सत्यम कुमार सिंह शांति अहिंसा विभाग महात्मा गाधी अंतर्राष्ट्रिय हिंदी विश्वविद्यालय मीडिया और कश्मीर के बीच एक अलग तरह का रिश्ता है शायद देश में कोई ऐसा राज्य नही है जिसने कश्मीर जितना राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय कवरेज प्राप्त किया
Dec 29 2009 11:41 AM