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वाङ्मय

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08 Mar 2010
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होली की एक स्मृति

मॉरीशस में होली बहुत अच्छी तरह से मनायी जाती है। 1968 के आस पास की घटना है। जब हम मारीशस में थे तो होली मनाने के लिए बो बासें चले जाते थे जहाँ चाचा ठाकुर प्रसाद मिश्र जी रहा करते थे। एक बार होली के दिन उनके यहँा कोई बुजुर्ग मेहमान आये हुए थे। वे कुर्सी
Mar 01 2010 07:51 AM
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कल के लिए

सम्मान्य महोदय/महोदया,हमारा समय एक कठिन दौर रहा है जिसमें समाज और संस्कृति को अनेकानेक समस्याओं से रूबरू होना पड़ रहा है। अपसंस्कृति, साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, आर्थिक और सामाजिक विसंगतियाँ लेखन को सामाजिक दायित्व समझने वाले हमारे-आप जैसें लेखकों के
टैग: सूचना
Feb 13 2010 06:05 PM
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वाङ्मय

बाल ठाकरे को अनायास मिली चुनौतीयह संभवत: इस समय विचार का विषय नहीं है कि शाहरुख खान की फिल्म माई नेम इज खान किस प्रकार की फिल्म है? कला की दृष्टि से वह ठीक ठाक है या नहीं? उसकी विषयवस्तु क्या है या उसका मैसेज कैसा है? फिल्म में विषय या कहानी के साथ
टैग: डायरी
Feb 12 2010 09:08 PM
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लेखक और प्रकाशक

लेखक और प्रकाशक हिन्दी जगत में लेखक और प्रकाशक के बीच बनते बिगड़ते सम्बन्धों पर अक्सर अनौपचारिक चर्चाएँ होती रही हैं। बातचीत के दौरान लेखकगण पारिश्रमिक कम मिलने या न मिलने की शिकायत करते रहे हैं। इसके विपरीत प्रकाशक पुस्तकों के न बिकने का रोना रोते रह
Dec 29 2009 11:47 AM
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एक स्त्रीवादी चुटकुला

एक स्त्रीवादी चुटकुला एक दिन उल्लू बहुत उदास था। वह रात भर चुप्पी साधे रहा। लक्ष्मी जी ने उससे पूछा, ''प्रिय उल्लू तुम इतने उदास क्यों हो? अपनी उदासी का कारण मुझे बतलाओ।'' उलूक महोदय ने जवाब दिया, '' लक्ष्मी जी मैं आपको रोज ढोता रहता हूँ। आपकी इतनी स
Dec 29 2009 11:47 AM
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साहित्य/संस्कृतिकर्म और राजनीति

साहित्य और संस्कृतिकर्म की अवस्थिति को यदि सूक्ष्मतापूर्वक देखें तो वह राजनीति की अपनी अवस्थिति से अलग केन्द्रित मिलेगी। राजनीतिक लोगों की प्राथमिकताएँ भिन्न प्रकार की होती हैं। अपनी व्यावहारिक अपरिहार्यताओं के चलते वे तमाम साहित्यिक/सांसकृतिक मूल्यो
Dec 29 2009 11:47 AM
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मंदी और मसीहा

डायरी मंदी और मसीहा 19.12.2007 को विकास परिषद को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने वैश्विक मंदी की संभावना व्यक्त की और आगाह किया कि आने वाले समय में भारत भी इससे प्रभावित हो सकता है। अमेरिका और दूसरे बड़े विकसित देशों में अर्थव्यवस्था
Dec 29 2009 11:47 AM
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मुग़ल-ए-आजम और साधू

डायरी मुग़ल-ए-आजम और साधू बात बहुत पुरानी नहीं है, मगर बहुत नयी भी नहीं। मुगले-ए-आजम फिल्म रंगीन होकर आ रही थी और यह फिल्म प्रेमियों के बीच काफी चर्चा का मामला था। हमारे परम मित्र स्वप्निल श्रीवास्तव हैं जो मनोरंजनकर अधिकारी हैं। वे हिन्दी के जाने-मान
Dec 29 2009 11:47 AM
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चे ग्वेरा की अन्तिम यात्रा

अनुवाद चे ग्वेरा की अन्तिम यात्रा [ गार्जियन के लिए रिचर्ड गॉट की रिर्पोट का हिन्दी अनुवाद ] वेलेग्राण्ड, 10 अक्टूबर 1967 पिछली रात पाँच बजे चे ग्वेरा का पार्थिव शरीर दक्षिणी-पश्चिमी बोलीविया के इस पहाड़ी कस्बे में लाया गया। हेलिकाप्टर से स्ट्रेचर पर
Dec 29 2009 11:47 AM
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बौध्दिक घृणा के दौर में गाँधी जी

डायरी बौध्दिक घृणा के दौर में गाँधी जी अंग्रेजी के प्रसिध्द कवि डब्लू. बी. यीट्स ने लिखा है कि बौध्दिक घृणा सबसे बुरी चीज होती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस बात की प्रासंगिकता हमारे आतंकवादग्रस्त समय में यीट्स के समय से थोड़ा ज्यादा ही है। हालांकि ह
Dec 29 2009 11:47 AM
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प्रजातंत्र के पराभव की कहानी

समीक्षा प्रजातंत्र के पराभव की कहानी - रघुवंशमणि हिंदी साहित्य में व्यंग लेखन की स्थिति पहले से ही बहुत अच्छी नहीं रही है। इसलिए यह क्षेत्र चुनौतियों से भरा रहा है और अक्सर व्यंग के नाम पर बेहद सतही चीजें ही सामने आती रही हैं। हिन्दी व्यंग लेखन को सम
Dec 29 2009 11:47 AM
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बिछलन भरी जमीन पर आलोचना का संतुलन

बिछलन भरी जमीन पर आलोचना का संतुलन रघुवंशमणि कुछ दिनों पहले हिन्दी साहित्य में ज्ञानोदय पत्रिका में प्रकाशित विजय कुमार के लेख पर लम्बा विवाद छिड़ा। इस विवाद में हिन्दी आलोचना के कई काले पक्ष नज़र आये। विवादों में न केवल अतिरेकपूर्ण बातें सामने आयीं बल
Dec 29 2009 11:47 AM
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कुपत्र

कुपत्र प्रिय मणि जी 21.9.07 नमस्कार आषा हेै आप साहित्य कर्म में लीन होंगे। निराला की तोड़ती पत्थर वाली कविता की मजदूरनी की तरह। यह उपमा यदि ठीक नहीं लगी तो मैं आप को मर्दवादी समझूंगा और किसी ब्लागिये से मिल कर आप को बदनाम भी कर सकता हूु। इसलिये इसे स्
Dec 29 2009 11:47 AM
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प्रारम्भ

कविता प्रारम्भ एक बच्चा खींचता है एक पड़ी लकीर और एक बेंड़ी बायीं ओर एक गोला दायीं ओर एक पूँछ बना देता है 'क' यहीं से शुरू होती है कविता इसी तरह लिखा जाता है इतिहास रघुवंशमणि
Dec 29 2009 11:47 AM
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एक बहादुर युवती की याद

डायरी एक बहादुर युवती की याद मैं उस युवती को पूरी तरह से भूल चुका था। यदि शिमला जाते वक्त दिल्ली से कालका जाने वाली कालका शताब्दि ट्रेन में वह अखबार न मिला होता तो फिर याद भी न आती। कैसा दुखद है कि हम उन्हें भूल जाते हैं जो अच्छे काम करते हैं। मीडिया
Dec 29 2009 11:47 AM
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कविता का परिवेश

कविता का परिवेश रघुवंशमणि जिस दौर में आज हम कविता की चर्चा कर रहे हैं वह सापेक्षित दृश्टि से तेज परिवर्तनों का समय है। जो परिवर्तन पहले सौ-पचास सालों में होते थे अब वे दो-चार सालों में सम्पन्न हो जाते हैं। आज हम जिस सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश में रह र
Dec 29 2009 11:47 AM
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एक पीड़ादायक परिवर्तन

सूचना एक पीड़ादायक परिवर्तन ब्लाग मित्रो, आप लोग मेरे ब्लाग वांगमय को लम्बे समय से पढ़ते रहे हैं। जहाँ तक मुझे जानकारी मिली है इस ब्लाग को देश-विदेश में पढा जाता रहा है। मुझे अपने लेखन पर समय-समय पर टिप्पणियाँ भी प्राप्त होती रही हैं। इस सब के लिए मैं
Dec 29 2009 11:47 AM
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बिहारी होने का मतलब

डायरी बिहारी होने का मतलब महाराष्ट्र में राज ठाकरे के वक्तव्यों और उसके बाद की हिंसक घटनाओं से बड़ी गहरी चिन्ताएँ पैदा होती हैं। यह बड़ी ही अजीब सी बात है कि अपने ही देश में एक प्रदेश का निवासी दूसरे प्रदेश में नौकरी की तलाश में न जा सके। हाल में जो घट
Dec 29 2009 11:47 AM
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झाँसी की गौरव गाथा

झाँसी की गौरव गाथा हमारे देश के इतिहास में 1857 का स्वाधीनता संघर्ष स्वर्णाक्षरों में लिखित कालखण्ड है और इस समय की शौर्य गााथा की सबसे उज्ज्वल नक्षत्र महारानी लक्ष्मीबाई हैं। झाँसी की छोटी सी रियासत की भूमिका उस संघर्ष काल के एक दौर में केन्द्रीय हो
Dec 29 2009 11:47 AM
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ईश्वर, सत्ता और कविता (4)

ईश्वर, सत्ता और कविता (4) बदलती हुई राजनीतिक परिस्थितियों में ईश्वर के प्रति कविता में भाव बदलते गये हैं। भारतीय जनता पार्टी की धर्म को राजनीतिक हथकण्डे के रूप में अपनाने की नीति का सामान्य जीवन पर प्रभाव पड़ा । आस्तिक लोगों के ड्राइंग रूमों में आशीर्
Dec 29 2009 11:47 AM
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ईश्वर, सत्ता और कविता 3

ईश्वर, सत्ता और कविता 3 चिन्तन की एक खास अवस्था में ईश्वर के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगने शुरू होते हैं और नास्तिक दर्शन का प्रारंभ होता है। भारत में भगत सिंह के प्रसिध्द लेख '' मैं नास्तिक क्यों हूँ'' से अधिकांश पाठक परिचित होंगे। यह नास्तिकता एक
Dec 29 2009 11:47 AM
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ईश्वर, सत्ता और कविता 2

ईश्वर, सत्ता और कविता 2 ईश्वर और धर्म को लेकर प्रचलित मानववादी दृष्टि का हिन्दी कविता में अभाव नहीं। गांधीवाद के दौर मेें इस व्यापक दृष्टि की राजनीति भी बड़ी व्यापक थी जिसका सैध्दान्तिक प्रतिफलन 'सर्वधर्म समभाव' में देखा गया। धर्म निरपेक्षता का यह व्य
Dec 29 2009 11:47 AM
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ईश्वर, सत्ता और कविता (1)

ईश्वर, सत्ता और कविता (1) आपातकाल के पश्चात्, प्र्रकाशित हुए अपने कविता संग्रह 'हजार हजार बाहों वाली' में जनकवि नागार्जुन की एक कविता थी 'कल्पना के पुत्र हे भगवान'। अपने शीर्ङ्ढक को सार्थक करती हुई यह कविता ईश्वर के अस्तित्व पर लिखी गयी उस कालखंड की
Dec 29 2009 11:47 AM
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वाङ्मय

कविता हम मॉंझी हुए फटी नाव के प्रेमशंकर मिश्र धूप के हुए न हुए छझांव के हम मॉंझी हुए फटी नाव के। चलना फिरना हंसना बोलना किस्त किस्त क़रजो की वापसी इनकी उनकी पीली नीली बातें ऑंच चढ़े उड़ जाती भाप सी ऐसे में कैसे कोई पंक्षी पर साधे छिन पछुवा, छिन पछियांव
Dec 29 2009 11:47 AM
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पं. प्रेमशंकर मिश्र का अवसान

पं. प्रेमशंकर मिश्र का अवसान डॉ. रमाशंकर तिवारी त्रिभुवन ट्रस्ट 10, गंधमादन, लक्ष्मणपुरी फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश शोक प्रस्ताव कल 16.07.2008 की रात हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण कवि और संस्कृतिकमी पं. प्रेमशंकर मिश्र जी का 83 वषZ की अवस्था में फैज़ाबाद
Dec 29 2009 11:47 AM
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विकास की अवधारणा पर पुनर्विचार की आवश्यकता

रघुवंशमणि विश्व भर में एक खास समूह ने, जो व्यापार से सीधा जुड़ा रहा है और सफलता अर्जित करता रहा है, विकास की एक निश्चित परिभाषा की है। यह परिभाषा आर्थिक और अर्थशास्त्रीय संदर्भों में एक विशेष ढाँचे के रूप में देखी जाती रही है। द्वितीय विश्वयुध्द के बा
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पुस्तक का संपादन

ब्लाग बंधुओ, इधर मैने एक पुस्तक का संपादन किया है जो पंडित प्रेमशंकर मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर है। इस पुस्तक को फैजाबाद शहर के ही भवदीय प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। पं. प्रेमशंकर मिश्र जी अपने समय के महत्वपूर्ण कवि थे। करीबन साल भर पहले
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फ्रीडा

डायरी फ्रीडा 'यह शव अभी भी साँस ले रहा है।' फ्रीडा फिल्म के बारे में मुझे बहुत पहले हिन्दी कवि अनिल सिंह ने बताया था। उन्होने यह फिल्म किसी टीवी चैनल पर देखी थी और मुझसे इस फिल्म की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। मैं इस फिल्म को तत्काल नहीं देख पाया। मैने
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कपिलदेव की आलोचना पुस्तक

डायरी कपिलदेव की आलोचना पुस्तक कपिलदेव हिन्दी साहित्य के सुपरिचित आलोचक हैं। ब्लागर मित्रों में साहित्यिक रुचि के लोग इस नाम से बखूबी परिचित होंगे। उनकी समीक्षाएँ और लेख विभिन्न पत्रि में प्रकाशित होते रहे हैं। बहुत समय से उनकी उनकी आलोचना पुस्तक की