शब्दलेख सारथी's Image

शब्दलेख सारथी

http://deepkraj.blogspot.com/
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
05 Jun 2010
कुल प्रविष्टियां
238
पाठक भेजे
22764
पसंद
176
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
95.65
पसंद करें
0
नापसंद करें

अपने सदगुरु स्वयं बने-विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष लेख (apne sadguru svyan bane-paryavaran par lekh)

पर्यावरण के लिये कार्य करने पर माननीय जग्गी सद्गुरु को सम्मानित किया जाना अच्छी बात है। जब कोई वास्तविक धर्मात्मा सम्मानित हो उस पर प्रसन्नता व्यक्त करना ही चाहिए वरना यही समझा जायेगा कि आप स्वार्थी हैं। आज विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। दरअसल
 
दीपक भारतदीप
टैग: article
Jun 05 2010 07:58 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

श्री गुरवाणी-अहंकार और आडम्बर बढ़ाने वाला दहेज़ किस काम का (dahej ki kaam ka-shri gurvani)

होर मनमुख दाज जि रखि दिखलाहि,सु कूड़ि अहंकार कच पाजोश्री गुरू ग्रन्थ साहिब के अनुसार लड़की के विवाह में  ऐसा दहेज दिया जाना चाहिए जिससे मन का सुख मिले और जो सभी को दिखलाया जा सके। ऐसा दहेज देने से क्या लाभ जिससे अहंकार और आडम्बर ही दिखाई दे।‘हरि
 
दीपक भारतदीप
May 30 2010 05:33 AM
पसंद करें
1
नापसंद करें

संत कबीर के दोहे-मनुष्य माया रूपी दीपक के इर्द गिर पतंगे कि तरह चक्कर काटता है

संत कबीरदास जी के अनुसार---------------------------------माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवैं पड़ंतकह कबीर गुरु ग्यान तैं, एक आध उमरन्तइसका आशय यह है कि मनुष्य एक पंतगे की तरह माया रूपी दीपक के प्रति आकर्षण में भ्रमित रहता है। वह अपना जीवन उसी के इर्द
 
दीपक भारतदीप
May 29 2010 11:04 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

संत कबीर दर्शन-समाज हित न करे वह बड़ा आदमी किस काम का

संत शिरोमणि कबीर दास कहते हैं कि-----------------------------------हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुरायलोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जायअनेक बड़े लोग   हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं तो अन्य  लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका
 
दीपक भारतदीप
टैग: hindu relition
पसंद करें
0
नापसंद करें

संत कबीर दास के दोहे-प्रेम के घर तक पहुंचना आसान नहीं (prem ka ghar-sant kabir vani)

प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोयउत्तम प्रीति सो जानिए, सतगुरू से जो होयसंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में प्रेम करने वाले बहुत हैं और प्रेम करने के अनेक तरीके  और विधियां भीं हैं पर सच्चा प्रेम तो वही है जो परमात्मा से किया
 
दीपक भारतदीप
टैग: dharm
May 21 2010 08:30 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

भर्तृहरि नीति दर्शन-ज्ञान का अहंकार मनुष्य को मदांध बना देता है (gyan ka ahankar-hindu dharma sandesh)

यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनःयदा किञ्चित्किाञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतःहिंदी में भावार्थ -जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने
 
दीपक भारतदीप
May 20 2010 08:41 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

भर्तृहरि नीति शतक-बदलाव दुनिया का स्वाभाविक नियम (badlav ka niyam-hindu dharma sandesh)

महाराज भर्तृहरि अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर कहते हैं -----------------------------------------------------------------------परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायतेस जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्हिंदी में भावार्थ-परिवर्तन होते रहना संसार का
 
दीपक भारतदीप
टैग: hindu darshan
May 19 2010 09:13 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

भर्तृहरि नीति शतक-जीवन रूपी नदी में राग और अनुराग नाम के मगरमच्छ रहते हैं (jivan men rag aur anurag-hindu dharma sandesh)

आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुलारामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी।मोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटीतस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराः।।हिन्दी में भावार्थ- आशा एक नदी की भांति इसमे हमारी कामनाओं के रूप में जल भरा रहता है
 
दीपक भारतदीप
May 18 2010 09:26 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

रहीम सन्देश-सच्चे परमार्थी कभी भेदभाव नहीं करते (sachche parmarthi-rahim ke dohe)

कविवर रहीम कहते हैं कि_____________________ रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीचमांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच जिस मनुष्य को  परोपकार का काम  करना है वह जरा भी नहीं हिचकता। दूसरों के  परोपकार करते हुए उच्च कोटि कि मनुष्य कभी
 
दीपक भारतदीप
May 16 2010 10:49 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

भर्तृहरि नीति शतर्क-आशा की लहरें धीरज का बांध तोड़ देती हैं (asha aur dhiraj-hindu adhyamik sandsh)

महाराज भर्तृहरि कहते हैं ---------------------------आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुलारामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनीमोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटीतस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराःहिन्दी में भावार्थ-आशा एक नदी
 
दीपक भारतदीप
टैग: hindu religigion
May 16 2010 08:44 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

शब्दलेख सारथी

मनु महाराज के अनुसार -------------------------अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन्न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्। हिन्दी में भावार्थ-सन्यासी और श्रेष्ठ पुरुषों को दूसरे लोगों द्वारा कहे कटु वचनों को सहन करना चाहिए। कटु शब्द (गाली) का
 
दीपक भारतदीप
May 15 2010 09:19 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

शब्दलेख सारथी

प्रीति ताहि सो कीजिये, जो आप समाना होयकबहुक जो अवगुन पडै+, गुन ही लहै समोयसंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रीति उसी से करना चाहिए, जो अपने समान ही हृदय में प्रेम धारण करने वाले हों। यह प्रेम इस तरह का होना चाहिए कि समय-असमय किसी से भूल हो जाये तो उसे
 
दीपक भारतदीप
टैग: धर्म
May 14 2010 08:51 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

संत कबीर के दोहे-बियावन वन के फूल बिना काम किसी के काम आये मुरझा जाते हैं

हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुरायलोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जायसंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।बड़ा
 
दीपक भारतदीप
पसंद करें
1
नापसंद करें

संत कबीरदास के दोहे-मित्रता से भक्ति और सत्संग में बाधा आती है (bhakti aur satsang-kabir das ji ke dohe)

दुनिया सेती दोसती, होय भजन के भंग। एका एकी राम सों, कै साधुन के संग।।संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोगों के साथ मित्रता बढ़ाने से भगवान की भक्ति में  बाधा आती है। एकांत में बैठकर भगवान राम का स्मरण करना चाहिये या साधुओं की संगत करना
 
दीपक भारतदीप
टैग: dharm
पसंद करें
0
नापसंद करें

संत कबीरदास के दोहे-स्वयं ठग जायें, पर दूसरे को न ठगे(sant kabir das ke dohe-khud kisi ko na thagen)

कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोयआप ठगै सुख, ऊपजै और ठगे दुख होयसंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर आपको कोई ठग जाता है तो कोई बात नहीं है, पर आप स्वयं किसी को ठगने का प्रयास मत करो। हम ठग जायें तो एक तरह से इस बात का तो सुख होता है कि हमने स्वयं कोई
 
दीपक भारतदीप
पसंद करें
0
नापसंद करें

रहीम संदेश-सुख दुःख तो चौसर की गोट की तरह हैं (rahim ke dohe-sukh dukh)

जब लगि जीवन जगत में, सुख दुख मिलन अगोटरहिमन फूटे ज्यों, परत दुहुंन सिर चोटकविवर रहीम कहते हैं कि इस जगत में जीवन है तब तक सुख और दुख और मिलते रहेंगे। यह ऐसे ही जैसे चौसर  की गोट को गोट मारने से दोनो के सिर पर चोट लगती है।वर्तमान संदर्भ में
 
दीपक भारतदीप
May 10 2010 09:14 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

संत कबीर के दोहे-मोल लिया ईश्वर बोलता नहीं (parmatma ka mahatva-kabir ke dohe)

मूरति धरि धंधा रखा, पाहन का जगदीशमोल लिया बोलै नहीं, खोटा विसवा बीससंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग मूर्ति का भगवान बनाकर उसकी सेवा करने के बहाने अपना धंधा करते हैं, पर वह मोल लिया ईश्वर बोलता नहीं है इसलिये नकली है।वर्तमान संदर्भ में व्याख्या
 
दीपक भारतदीप
पसंद करें
1
नापसंद करें

संत कबीर के दोहे-अपनी मति नहीं तो बड़े होने से क्या लाभ (bade hone se kya labh-hindu dharma sandesh)

हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुरायलोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जायसंत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।बड़ा
 
दीपक भारतदीप
टैग: dharm
May 08 2010 09:51 AM
पसंद करें
1
नापसंद करें

मनुस्मृति-श्रेष्ठ लोगों के साथ ही संबंध बनाने चाहिए (shreshth purush se sambandh-manu smruti)

उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं संबंधनाचरेत्सह।निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधर्मास्त्यजेत्।हिन्दी में भावार्थ-अपने परिवार की रक्षा तथा सम्मान में वृद्धि के लिये अच्छे परिवारों के साथ अपनी कन्या और पुत्र के संबंध बनाने चाहिए। खराब आचरण तथा धर्म विरोधी पुरुषों के
 
दीपक भारतदीप
टैग: astha
पसंद करें
0
नापसंद करें

रहीम संदेश-सूख तालाब पर जाने से लाभ नहीं (sukhe talab se labh nahin-rahim sandesh

तेहि प्रमाण चलिबो भलो, जो सब दिन ठहराइ। उमड़ि चलै जल पार तें, जो रहीम बढ़ि जाइ।। कविवर रहीम का कहना है कि जिससे सब दिन आनंद प्राप्त हो वही सुख प्रमाणिक माना जाना चाहिये।  ऐसे सुख से क्या लाभ जो क्षणिक हो और वह ऐसे ही उतर जाये जैसे बाढ़ का पानी। तासो ही
 
दीपक भारतदीप
पसंद करें
0
नापसंद करें

पतंजलि योग दर्शन-जातीय सीमाओं से मुक्त होने पर मनुष्य बन जाता है महावत (patanjali yog darshan-manushya aur jatipati)

जातिदेशकालसमयानमच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्।हिन्दी में भावार्थ-जाति, देश, काल तथा व्यक्तिगत सीमा से रहित होकर सावैभौमिक विचार का हो जाने पर मनुष्य एक महावत की तरह हो जाता है।वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि यहां पर मनुष्य को संकीर्ण
 
दीपक भारतदीप
May 01 2010 09:10 AM
पसंद करें
2
नापसंद करें

कबीरदास जी के दोहे-मनुष्य की खोपड़ी उल्टा काम करती है (mind of men-kabir sandesh)

कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिंतीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिंसंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा
 
दीपक भारतदीप
Apr 30 2010 09:07 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

विदुर दर्शन-दुस्साहसी की अनदेखी करने पर प्रजा नाराज होती है

साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः।सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।हिन्दी में भावार्थ-यदि राज्य प्रमुख  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा या उसे अनदेखा करता है तो उसका अतिशीघ्र विनाश हो जाता है क्योंकि तब प्रजा में उसके विद्वेष की
 
दीपक भारतदीप
पसंद करें
0
नापसंद करें

रहीम के दोहे-कमाने के लिये दूसरे के घर में सिर झुकाना बुरा लगता है (kamane ke vaste desh se bahar jana-rahim ke dohe)

भला भयो घर से छुट्यो, हंस्यो सीस परिखेतकाके काके नवत हम, अपन पेट के हेत कविवर रहीम कहते हैं कि घर से छूटकर दूसरी जगह पर कमाना बहुत अच्छा लगता है पर इसके लिये वहां पर दूसरों के आगे सिर नवाना पड़ता है और हमारे ऊपर बैठा सबका रक्षक परमात्मा हंसता है।वर्तमान
 
दीपक भारतदीप
Apr 28 2010 08:36 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

संत कबीर दर्शन-जैसे पदार्थ भक्षण करते हैं वैसे ही विचार हो जाते हैं

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होयजैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होयसंत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार
 
दीपक भारतदीप
Apr 26 2010 08:18 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

पतंजलि योग दर्शन-संयम से होते हैं अनेक लाभ (patanjali yog darshan-sanyam se labh)

शब्दार्थप्रत्ययानामितोसराध्यासात् संक्रस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम्हिन्दी में भावार्थ-शब्द, अर्थ और ज्ञान का निरंतर अभ्यास हो जाने के कारण मिश्रण होता है। उसके विभाग में संयम करने संपूर्ण प्राणियों के वाणी का ज्ञान हो जाता
 
दीपक भारतदीप
Apr 24 2010 08:38 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मनुस्मृति-जिस से मानसिक तनाव हो, वह काम न करें (mansik tanan n palen-manu smruti

यद्यत्परवशं कर्म तत्तद्यलेन वर्जयेत्।यद्यदात्मवशं तु स्यात्तत्तत्सेवेत यत्नतः।हिन्दी में भावार्थ-जिस काम के लिये दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है उनका त्याग कर देना चाहिये तथा अपने हाथ से ही संपन्न होने वाले अनुष्ठान करना चाहिए। यत्कर्मकुर्वतोऽस्य
 
दीपक भारतदीप
Apr 23 2010 09:16 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-झगड़ा करने से झगड़ा ही मिलता है (shri gurugrantha sahib-Jhagada n karen)

कलह बुरी संसारि।’हिन्दी में भावार्थ-संसार में कलह बुरी चीज है।‘झगरु कीए झगरउ पावा।‘हिन्दी में भावार्थ-झगड़ा करने से झगड़ा ही हासिल होता है।‘उना पासि दुआसि न भिटीअै जिन अंतरि क्रोधु चंडालु।’हिन्दी में भावार्थ-जिन मनुष्यों के हृदय में क्रोध रूपी चंडाल रहता
 
दीपक भारतदीप
Apr 22 2010 09:07 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

विदुर नीति-मित्र का पहले से परिचित या संबंधी होना जरूरी नहीं (hindu dharma sandesh-religion of friendship)

सत्कृतताश्च श्रुतार्थाश्च मित्राणं न भविन्त ये।तान् मुतानपि क्रव्यादाः कृतध्नान्नोपर्भुजते।।हिन्दी में भावार्थ-जो अपने मित्र से सम्मान और सहायता पाने के बाद भी उनके नहीे होते ऐसे कृतघ्न मनुष्य के मरने पर उनका मांस तो मांस खाने वाले जंतु भी नहीं खाते। न
 
दीपक भारतदीप
Apr 20 2010 08:44 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

पतंजलि योग दर्शन-प्राणायाम से मन और विचार दृढ़ होते हैं (patanjali yog darshan-pranayam aur man)

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य।हिन्दी में भावार्थ-प्राणवायु को बाहर निकालने और अंदर रोकने के निरंतर अभ्यास चित्त निर्मल होता है।विषयवती वा प्रवृत्तिरुपन्न मनसः स्थितिनिबन्धनी।।हिन्दी में भावार्थ-विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर भी मन पर नियंत्रण
 
दीपक भारतदीप
टैग: yog sadhna
Apr 18 2010 11:25 AM
पसंद करें
1
नापसंद करें

श्रीगुरु ग्रंथ साहिब-प्रभु का नाम कभी पुराना नहीं पड़ता (shriguru granth sahib

‘निरभउ निरंकार सच नाम।जा का कीआ सगल जहान।।हिन्दी में भावार्थ-निर्भय निरंकार का नाम ही सच है। उसी परमात्मा का यह पूरा संसार है।‘सचु पुराणा होवे नाही।’हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में समय के साथ सब वस्तु पुरानी हो जाती है लेकिन प्रभु का नाम कभी भी पुराना
 
दीपक भारतदीप
टैग: astha
पसंद करें
0
नापसंद करें

पतंजलि योग दर्शन-राग, द्वेष तथा भय का भाव स्वाभाविक (patanjli yog darshan-raag dwesh aur bhay ka bhav)

सुखानुशयी रागः।।हिन्दी में भावार्थ-सुख के भाव के पीछे राग है।दुःखानुशयी द्वेषः।।हिन्दी में भावार्थ-दुःख के भाव के पीछे रहने वाला भाव क्लेश है।स्वरसवाह विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः।।हिन्दी में भावार्थ-मनुष्य स्वभाव में भय का भाव परंपरा से चला आ रहा है जिसे
 
दीपक भारतदीप
Apr 16 2010 08:19 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

पतंजलि योग दर्शन-क्लेशों से मुक्ति दिलाती है समाधि (patanjali yog darshan-samadhi)

तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रिया योग।।हिन्दी में भावार्थ-तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर की शरण लेना-ये तीनों क्रियायोग हैं।समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च।हिन्दी में भावार्थ-जब समाधि में सिद्धि प्राप्त हो जाती है तब अज्ञान तथा क्लेश का नाश होता है।वर्तमान
 
दीपक भारतदीप
पसंद करें
0
नापसंद करें

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-संकटों से सामना करने का उपाय करें (apne sankatmochak swyan bane--kautilya arthshastra)

हुताश्नो जलं व्याधिर्दुभिक्षो मरकस्तया।इति पंवविंधं दैव व्यसनं मानुषं परम्।।हिन्दी में भावार्थ-अग्नि, जल, व्याधि,अकाल तथा मौत यह पांच तो भाग्य से निर्मित होकर मनुष्य को पीडा़ देते हैं पर व्यसन करना उसका निजी दोष है।दैवं पुरुष्कारेण शान्तया चं
 
दीपक भारतदीप
Apr 14 2010 09:49 AM
पसंद करें
1
नापसंद करें

मनु स्मृति-अपने ऊपर निर्भर काम को ही हाथ में लें (apna hath jagnnath-manu smriti)

यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः।तत्प्रयतनेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।हिन्दी में भावार्थ-जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा को शांति मिलती हो वही करना चाहिए। जिससे इसके विपरीत स्थिति हो तो उस काम को त्याग देना चाहिए। सर्वे परवशं दुःखं
 
दीपक भारतदीप
पसंद करें
0
नापसंद करें

मनुस्मृति-‘बक वृत्ति’ के लोगों की पहचान (manu dharma sandesh in hindi)

अधोदृष्टिनैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः।शठो मिथ्याविनीतश्च बकव्रतवरो द्विजः।।हिन्दी में भावार्थ-असत्य बोलने, कठोर वाणी में वार्तालाप करने तथा दूसरे के धन पर बुरी नज़र रखने वाले को बक वृत्ति का माना जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने कल्याण की बात भी नहीं समझता और
 
दीपक भारतदीप
पसंद करें
0
नापसंद करें

संत कबीर वाणी-परखने के बाद किसी से संपर्क बढ़ायें (sant kabir vani-manushya ko parkhen)

कबीर देखी परखि ले, परिख के मुखा बुलाय।जैसी अंतर होयगी, मुख निकसेगी आय।संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति मिले तो पहले उसे परखो फिर उसके मुंह से कुछ बुलवाओ। जैसी बात उसके अंदर होगी वैसी ही बाहर निकल आयेगी।पहिले शब्द पिछानिये, पीछे कीजै
 
दीपक भारतदीप
Apr 10 2010 09:28 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

पतंजलि योग दर्शन-अभ्यास से ही चित्त दृढ़ होता है (patanjali yog darshan-abhyas

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।हिन्दी में भावार्थ-चित्तवृतियों पर नियंत्रण अभ्यास तथा वैराग्य से होता है।तन्न स्थितो यत्नोऽभ्यासः।हिन्दी में भावार्थ-चित्त की स्थिरता के लिये जो प्रयास किया जाता है उसे अभ्यास कहा जाता है।स तु
 
दीपक भारतदीप
पसंद करें
0
नापसंद करें

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-चिंता तो अनहोनी घटना की करना चाहिये (shri guru granth sahib-chinta n karen

‘चिंता ता की कीजीअै जो अनहोनी होइ।’इहु मारगु संसार को नानक थिरु नहीं कोइ।।हिन्दी में भावार्थ-चिंता तो उस घटना की करना जो अनहोनी हो। इस संसार में तो सभी कुछ स्वाभाविक रूप घटता रहता है और यहां कुछ भी स्थिर नहीं है। ‘सहस सिआणपा लख होहि त इ न चलै
 
दीपक भारतदीप
टैग: धर्म
Apr 04 2010 12:24 PM
पसंद करें
1
नापसंद करें

भर्तृहरि शतक-अल्पज्ञानियों के स्वर्ग पाने की इच्छा

उन्मतत्तप्रेमसंरम्भादारभन्ते यदंगनाः।तत्र प्रत्यूहमाधातुं ब्रह्मापि खलु कातरः।हिन्दी में भावार्थ-प्रेम में उन्मत होकर युवतियां अपने प्रियतम को पाने के लिये कुछ भी करने लगती हैं। उनके इस कार्य को रोकने का ब्रह्मा भी सामर्थ्य नहीं रखता।स्वपरप्रतारकोऽसौ
 
दीपक भारतदीप