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इंडियन बाइस्कोप

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20 Apr 2010
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मार्डन टाइम्सः महामंदी की अद्भुत दास्तान

क्या अतीत आज का वक्त समझने की कुंजी बन सकता है। मुझे मालूम नहीं कि इतिहासविद और राजनीति के विशेषज्ञों के पास इस बात का क्या जवाब होगा मगर विश्व का महान सिनेमा सिर्फ तत्कालीन नहीं बल्कि मौजूदा समय की पर्तें भी खोलता है। यह माध्यम जो सिनेमैटोग्राफी के जरिए
Apr 20 2010 06:52 PM
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मन का रेडियो

आजकल पुराने दिनों को याद करना एक फैशन सा हो चला है। बहुत पुराने नहीं- यानी रिसेंट पास्ट। फिल्में भी कुछ इसी अंदाज में बन रहीं हैं, वे सत्तर या साठ के दशक में झांकने की कोशिश करती हैं। रेट्रो लुक तो फैशन और डिजाइन का एक अहम हिस्सा बन चुका है। पश्चिम के
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साइंस फिक्शन के ‘अवतार’

यह महज संयोग नहीं है कि जेम्स कैमरॉन हॉलीवुड की जिस सबसे महत्वाकांक्षी साइंस फिक्शन को लेकर आए हैं, उसका शीर्षक अवतार हिन्दू माइथोलॉजी में गहरे अर्थ रखता है। अंग्रेजी में स्वीकार्य यह शब्द इन दिनों इंटरनेट की दुनिया में भी खूब पॉपुलर है, जहां यह साइब
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लो दिल की सुनो दुनिया वालों...

सिनेमा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह अपने आसपास भी एक खूबसूरत सा रचनात्मक संसार रचता हुआ चलता है. मेरे बचपन में ग्रामोफोन के रिकार्ड्स बिक्री और लोकप्रियता के मामले अपने चरम पर पहुंचकर आहिस्ता-आहिस्ता विलुप्त हो गए. मगर अवचेतन में उनके खूबसूरत कलात्म
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किस्सा-ए-बॉलीवुडः गतांक से आगे

एंपायर स्ट्राइक्स बैक जैसे साइंस फिक्शन और फ्लैश गार्डेन और स्पाइडर मैन स्ट्राइक्स बैक जैसी कॉमिक चरित्रों पर आधारित फिल्मों के बाद उम्र का वह दौर आया जब हम- यानी मैं और मेरे साथी वयस्कों की दुनिया में कदम रख रहे थे. हमारी उम्र थी करीब 16-17 बरस... उ
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अतीत के कुछ और चलचित्र या किस्सा-ए-हॉलीवुड

अभी सलीमा की एक ताजा प्रविष्ठि में हमारे वरिष्ठ फिल्म समीक्षक प्रमोद सिंह ने अतीत के प्रति मुग्ध होकर देखने के खतरों के प्रति चेताया भी मगर उसके बावजूद मैं उन पुरानी फिल्मों के जादू से छुटकारा नहीं पा सका हूं. मुझे पता है कि आज मेरी संवेदना का स्तर द
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अतीत के चलचित्र

कभी निर्मल वर्मा ने यह उपन्यास के सिलसिले में कहा था कि एक अच्छे उपन्यास की पहचान यह होती है कि उन शब्दों में बसा जीवन हमारे खुद के जीवन में उतर आता है. क्या यह सिनेमा का भी सच नहीं है? सिनेमा उतना ही मेरी यादों में बसा है, जितनी कि मेरे वास्तविक जीव
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जेम्स कैमरॉन का नया 'अवतार'

पेंडोरा नाम के सुदूर ग्रह पर एक अनजान सभ्यता और मानव जाति के बीच जंग और उसके बीच पनप रही कोमल संवेदनाओं को बचाने की जद्दोजहद। कथानक उत्सुकता जगाता है न! और बहुत सारी संभावनाएं भी। जेम्स कैमरॉन से मुझे हमेशा बहुत उम्मीदें रहती हैं। वे सही मायनों एक ऐस
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पोलर एक्सप्रेसः भविष्य का सिनेमा

चार साल पहले क्रिसमस के मौके पर सारी दुनिया में रिलीज की गई दुनिया की पहली 'आल डिजिटल कैप्चर फिल्म' पोलर एक्सप्रेस को इस क्रिसमस पर याद किया जाना चाहिए। इसलिए भी शायद यह भविष्य के सिनेमा की शुरुआत है। इस कला माध्यम को शायद वे ज्यादा बेहतर एक्सप्लोर क
Dec 29 2009 11:51 AM
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मुंबईः हादसों की तस्वीर

दहशत के साए में जीती मुंबई बॉलीवु़ड के फिल्मकारों के लिए कोई नया विषय नहीं है। महान फिल्में हमेशा से वास्तविक जीवन की त्रासदियों से अपनी प्रेरणा लेती रही हैं। बहुत सी आधुनिक यूरोपियन फिल्में द्वितीय विश्व युद्ध में बेहद क्लांत मानवीय तकलीफों से उपजी
Dec 29 2009 11:51 AM
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महान निर्देशकों की बेवफा स्त्रियां

पिछले दिनों फ्रांसुआ त्रूफो की फिल्म 'वीमैन नेक्स्ट डोर' देखते हुए यह सवाल मेरे मन में कौंधा कि तमाम महान निर्देशकों का बेवफा स्त्रियों के प्रति इतना ज्यादा रुझान देखने को क्यों मिलता है? 'वीमेन नेक्स्ट डोर' में पति और पूर्व प्रेमी के बीच फंसी एक स्त
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बारिश में भीगता हुआ पोस्टर

अगर सिनेमा को याद करूं तो मैं उन तमाम पोस्टरों को नहीं भूल सकता, जिन्होंने सही मायनों में इस माध्यम के प्रति मेरे मन में गहरी उत्सुकता को जन्म दिया। जबसे मैंने थोड़ा होश संभाला तो सिनेमा के पोस्टरों ने मेरा ध्यान खींचना शुरु किया। मुझे यह पता होता था
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नष्ट होती धरोहर

मेरे लिए यह खबर एक शॉक की तरह थी कि आज की तारीख में भारत की पहली बोलती फिल्म आलमआरा का कोई प्रिंट मौजूद नहीं है। यह देश और समाज की धरोहर के प्रति एक अक्षम्य लापरवाही है। भारतीय सिनेमा का इतिहास आलमआरा का जिक्र किए बिना पूरा ही नहीं हो सकता, मगर आज उस
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उन गर्मियों में मोनिका के साथ....

बर्गमॅन की फिल्मों में प्रकृति सिर्फ श्वेत-श्याम छवियों में कैद होकर नहीं रह जाती. उनकी फिल्मों की चांदनी, समुद्र, बादल, हवाएं आपको याद रह जाते हैं. आप 'समर विद मोनिका' में एक नौजवान जोड़े के साथ शहर, ऊंचे-ऊंचे पुल और जहाजों को पीछे छोड़ते हुए निर्जन
Dec 29 2009 11:51 AM
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डॉयलॉग, डॉयलॉग और डॉयलॉग..

माँ, मै फर्स्ट क्लास फर्स्ट पास हो गया हूँ" "माँ तुम कितनी अच्छी हो" "भैया!" "आज पिंकी का जन्म-दिन है" "मैने इस ज़मीन को अपने खून से सींचा है... " "वो एक गन्दी नाली का कीडा है" "कुत्ते! कमीने! ....." "इसे धक्के मारके बाहर निकाल दो " "ज़बान को लगाम दो
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हॉरर फिल्में: भीतर छिपे भय की खोज

कभी लगातार प्रयोगों से बॉलीवुड सिनेमा को एक नया रास्ता दिखाने वाले राम गोपाल वर्मा ने शायद अब अपने लिए दो सुरक्षित जोन तलाश लिए हैं, अंडरवर्ल्ड और हॉरर। लंबे समय से इन्हीं दो विषयों को बदल-बदल कर प्रस्तुत करने वाले रामू इस बार फूंक लेकर आए हैं। वैसे
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नायक हमारे भीतर है...

मेरे लिए हमेशा यह जानना बड़ा ही दिलचस्प होता है कि कोई भी फिल्म कैसे लोगों के दिलो-दिमाग को छू जाती है और कई बार सफलता का इतिहास रच जाती है। पिछले वर्षों में देखी कुछ फिल्मों की विषय वस्तु लंबे समय तक मुझे कुरेदती रही। इनमें से दो फिल्में थीं बागबान
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छोटी सी बात मुहब्बत की...

घर लौटते वक्त, कभी कोई काम करते समय या अनायास सड़क से गुजरते हुए... न जाने कितने सालों से यह गीत मैं गुनगुना उठता हूं. बहुत सादा से शब्दों वाले इस प्रेम गीत का न जाने क्या जादू है.. जो कभी खत्म नहीं होता. लगता है कि किसी के दिल से कोई बहुत सीधी-सच्ची
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कॉमिक्स और सिनेमाः फ्रेम-दर-फ्रेम

बीते दिनों चैनल जूम पर डायरेक्टर्स कट में शेखर कपूर का इंटरव्यू देखा. इंटरव्यू लेने वाले कबीर बेदी थे. जितने उत्साह से मैं देखने बैठा था, उस लिहाज से निराशा हुई. बहुत सतही से सवाल पूछे गए. जहां कहीं भी शेखर किसी मुद्दे पर खुलने को होते, सवालों का रुख
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दक्षिण का सिनेमा

बैंगलोर के शुरुआती महीनों में वीडियो कोच वाली बस से सफर करते हुए बहुत सी दक्षिण भारतीय फिल्में देखते वक्त कटा. दक्षिण के सिनेमा ने अपनी एक खास सिनेमाई भाषा विकसित कर ली है. यहां तक कि उनका व्यावसायिक सिनेमा भी हिन्दी सिनेमा के मुकाबले ज्यादा भारतीय क
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दिलीप चित्रे और सेल्यूलॉयड पर लिखी उनकी एक कविता के बारे में

धीरे धीरे आओ, जैसे आता है शोक या फुर्सत से आओ जैसे आती है दर्द की याद जो सुन्न हुए दर्द से भी गहरी यातना देती है दिलीप चित्रे की कविता 'धीरे धीरे' से लिखना तभी सार्थक होता है जब तक कि वह एक विवशता न बन जाए। मैं काम करते, सड़कों पर चलते, सिनेमा देखते,
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'सेंसुअस साउथ'

दक्षिण भारतीय सिनेमा को लेकर उत्तर भारतीयों के मन में बहुत से पुर्वग्रह हैं। मसलन वे अविश्वसनीय होती हैं। उनमें काफी हिंसा होती है। तड़क-भड़क वाली पोशाकें और भड़कीले नृत्य होते हैं। कुल मिलाकर यह तस्वीर काफी हद तक सही भी बैठती है। इन टाइप्ड इमेजेज के साथ
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रजत कपूर से एक मुलाकात

रजत कपूर ने बतौर अभिनेता सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा था फिल्म 'दिल चाहता है' में। उनकी शख्सियत में कुछ-कुछ गिरीश कर्नाड जैसी गंभीरता भरी सादगी थी। एक खास तरह की डिग्निटी, सहजता और अभिजात्य का मिला-जुला रूप। उस वक्त तक मैं रजत कपूर के बारे में ज्यादा कुछ
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बंबई रात की बाहों में

राजकपूर के लिए सदाबहार हिट फिल्में देने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास ने खुद के निर्देशन में भी बहुत सी फिल्में बनाई हैं और आम तौर पर उनकी फिल्में तत्कालीन आलोचकों द्वारा खारिज कर दी जाती थीं। यह माना जाता था कि जब अब्बास खुद के निर्देशक में फिल्म बनाते थे
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अनजान टापू पर नफरत और प्रेम

किताबों और फिल्मों का गहरा रिश्ता है। गौर करें तो भारतीय समांतर सिनेमा या जिसे हम कला सिनेमा कहते हैं उसकी बुनियाद में ही आधुनिक हिन्दी साहित्य है। इस पर मैं कभी अलग से लिखना चाहूंगा। इसे छोड़ भी दें तो दुनिया भर में स्तरीय सिनेमा का निर्माण किताबों
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वो जमाना 'थ्रिलर्स' का!

हिन्दी सिनेमा ने थ्रिलर की अपनी एक दिलचस्प स्टाइल डेवलप की थी, जो अचानक खत्म हो गई। अगर गौर करें तो सत्तर-अस्सी का दशक का हिन्दी सिनेमा इन थ्रिलर फिल्मों के लिहाज से बहुत समृद्ध था। इसमें विजय आनंद, बीआर चोपड़ा और राज खोसला जैसे निर्देशकों का काफी यो
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सुचित्रा फिल्म सोसाइटी

यह असफल सा प्रयास है अपने वर्तमान को अतीत की तरह टटोलने का। यदि बैंगलोर कभी अपना डेरा उठ जाए तो क्या ऐसा होगा जो मेरी स्मृति में बसा रह जाएगा। जाहिर तौर बारिश, बारिश और बारिश। हर शाम क्षितिज से उमड़ते काले बादल और उनमें बिजली कि हल्की कौंध। हवा, हवा
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एक थी लड़की, नाम था नाजि़या

यह भारत में हिन्दी पॉप के कदम रखने से पहले का वक्त था, यह एआर रहमान के जादुई प्रयोगों से पहले का वक्त था, अस्सी के दशक में एक खनकती किशोर आवाज ने जैसे हजारों-लाखों युवाओं के दिलों के तार छेड़ दिए। यह खनकती आवाज थी 15 बरस की किशोरी नाजिया हसन की, जो प