दिल के दरमियाँ PRESENTS

दिल के दरमियाँ PRESENTS "कोई आवाज़ देता है"

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17 Apr 2010
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वो लहरें कहाँ वो रवानी कहाँ है...

वो लहरें कहाँ वो रवानी कहाँ हैबता ज़िन्दगी ज़िन्दगानी कहाँ हैज़रा ढूँढिए इस धुँए के सफ़र मेंहमारी-तुम्हारी कहानी कहाँ हैबड़ी देर से सोचते हैं कि आएमगर अब हमें नींद आनी कहाँ हैबताएँ ज़रा उँगलियाँ पूछती हैंहमारी पुरानी निशानी कहाँ हैफ़कीरी में है बादशाहत
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बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो ..

बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहोबस एक तुम पै नज़र है हमारे साथ रहो।हम आज एक भटकते हुए मुसाफ़िर हैंन कोई राह न घर है हमारे साथ रहो।तुम्हें ही छाँव समझकर यहाँ चले आएतुम्हारी गोद में सर है हमारे साथ रहो।कहीं भी हमको डुबा देगी ये पता है हमेंहरेक साँस भँवर है
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शुभकामनाएं

जब से होली के मिले प्यार भरे ये रंगमन की चुनरी उड़ चली जैसे उड़े पतंग।लेकर आये साथ में रंगों का त्यौहारहोली की शुभकामना करें आप स्वीकार।कुँअर बेचैनआप सभी को परिवार सहित होली की ढेर सारी शुभकामनाएंडॉ० कुँअर बेचैन
Mar 01 2010 12:03 PM
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आँगन की अल्पना सँभालिए...

दरवाज़े तोड़-तोड़ कर घुस न जाएँ आँधियाँ मकान में, आँगन की अल्पना सँभालिए। आई कब आँधियाँ यहाँ बेमौसम शीतकाल में झागदार मेघ उग रहे नर्म धूप के उबाल में छत से फिर कूदे हैं अँधियारे चंद्रमुखी कल्पना सँभालिए। आँगन से कक्ष में चली शोरमुखी एक खलबली उपवन-सी आ
Dec 29 2009 11:51 AM
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सुबह

सोई खिड़कियों को जगा गई नर्स-सी हवा। देकर मधुगंधिनी दवा। रोगी दरवाज़ों की बाजू में किरणों की घोंपकर सुई सूरज-चिकित्सक ने रख दी फिर धुली हुई धूप की रुई होने से बच गई चौखट विधवा। जगा गई नर्स-सी हवा। कुँअर बेचैन
Dec 29 2009 11:51 AM
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पेड़ बबूलों के

संघर्षों से बतियाने में उलझा था जब मेरा मन चला गया था आकर यौवन मुझको बिना बताए ज्यों अनपढ़ी प्रेम की पाती किसी नायिका के हाथों से आँधी में उड़ जाए। चलते रहे साँस के सँग-सँग पेड़ बबूलों के पड़े रहे अपने-अपने घर गजरे फूलों के कई गुत्थियाँ सुलझाने में उ
Dec 29 2009 11:51 AM
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अँधेरी खाइयों के बीच

दुखों की स्याहियों के बीच अपनी ज़िंदगी ऐसी कि जैसे सोख़्ता हो। जनम से मृत्यु तक की यह सड़क लंबी भरी है धूल से ही यहाँ हर साँस की दुलहिन बिंधी है शूल से ही अँधेरी खाइयों के बीच अपनी ज़िंदगी ऐसी कि ज्यों ख़त लापता हो। हमारा हर दिवस रोटी जिसे भूखे क्षणों
Dec 29 2009 11:51 AM
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दिन से लंबा ख़ालीपन

नींदें तो रातों से लंबी दिन से लंबा ख़ालीपन अब क्या होगा मेरे मन? मन की मीन नयन की नौका जब भी चाहे बीती-अनबीती बातों में डूबे-उतराए निष्ठुर तट ने तोड़ दिए हैं बर्तुल लहरों के कंगन। अब क्या होगा मेरे मन? जितनी साँसें रहन रखी थीं भोले जीवन ने एक-एक कर
Dec 29 2009 11:51 AM
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चीज़े बोलती हैं

अगर तुम एक पल भी ध्यान देकर सुन सको तो, तुम्हें मालूम यह होगा कि चीजें बोलती हैं। तुम्हारे कक्ष की तस्वीर तुमसे कह रही है बहुत दिन हो गए तुमने मुझे देखा नहीं है तुम्हारे द्वार पर यूँ ही पड़े मासूम ख़त पर तुम्हारे चुंबनों की एक भी रेखा नहीं है अगर तुम
Dec 29 2009 11:51 AM
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बीजगणित-सी शाम

अंकगणित-सी सुबह है मेरी बीजगणित-सी शाम रेखाओं में खिंची हुई है मेरी उम्र तमाम। भोर-किरण ने दिया गुणनफल दुख का, सुख का भाग जोड़ दिए आहों में आँसू घटा प्रीत का फाग प्रश्नचिह्न ही मिले सदा से मिला न पूर्ण विराम। जन्म-मरण के 'ब्रैकिट' में यह हुई ज़िंदगी
Dec 29 2009 11:51 AM
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रात कहाँ बीते

पेटों में अन्न नहीं भूख साहस के होठ गए सूख खेतों के कोश हुए रीते जीवन की रात कहाँ बीते? माटी के पाँव फटे तरुवर के वस्त्र छीन लिए सूखे ने फ़सलों के शस्त्र हाय भूख-डायन को आज़ कौन जीते? हड्डी की ठठरी में उलझी है साँस मुट्ठी भर भूख और अंजलि भर प्यास बीत
Dec 29 2009 11:51 AM
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पिन बहुत सारे

जिंदगी का अर्थ मरना हो गया है और जीने के लिये हैं दिन बहुत सारे । इस समय की मेज़ पर रक्खी हुई जिंदगी है 'पिन-कुशन' जैसी दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया है और चुभने के लिए हैं पिन बहुत सारे। निम्न-मध्यमवर्ग के परिवार की अल्पमासिक आय-सी है जिंदगी वेतनों का
Dec 29 2009 11:51 AM
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मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यों डर रखूँ

मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यों डर रखूँ जिंदगी आ, तेरे क़दमों पर मैं अपना सर रखूँ जिसमें माँ और बाप की सेवा का शुभ संकल्प हो चाहता हूँ मैं भी काँधे पर वही काँवर रखूँ हाँ, मुझे उड़ना है लेकिन इसका मतलब यह नहीं अपने सच्चे बाज़ुओं में इसके-उसके पर रखू
Dec 29 2009 11:51 AM
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सर्दियां १

छत हुई बातून वातायन मुखर हैं सर्दियाँ हैं। एक तुतला शोर सड़कें कूटता है हर गली का मौन क्रमशः टूटता है बालकों के खेल घर से बेख़बर हैं सर्दियाँ हैं। दोपहर भी श्वेत स्वेटर बुन रही है बहू बुड्ढी सास का दुःख सुन रही है बात उनकी और है जो हमउमर हैं सर्दियाँ
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हम सुपारी-से

दिन सरौता हम सुपारी-से। ज़िंदगी-है तश्तरी का पान काल-घर जाता हुआ मेहमान चार कंधों की सवारी-से। जन्म-अंकुर में बदलता बीज़ मृत्यु है कोई ख़रीदी चीज़ साँस वाली रेजगारी-से। बचपना-ज्यों सूर, कवि रसखान है बुढ़ापा-रहिमना का ग्यान दिन जवानी के बिहारी-से। डॉ०
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शोकपत्र के ऊपर

ऊपर-ऊपर मुस्कानें हैं भीतर-भीतर ग़म जैसे शोकपत्र के ऊपर शादी का अलबम। समय-मछेरे के हाथों का थैला है जीवन जिसमें जिंदा मछली जैसा उछल रहा है मन भीतर-भीतर कई मरण हैं ऊपर कई जनम जैसे शोकपत्र के ऊपर शादी का अलबम। अपना-अपना दृष्टिकोण है अपना-अपना मत लेकिन
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चिट्ठी है किसी दुखी मन की...

बर्तन की यह उठका-पटकी यह बात-बात पर झल्लाना चिट्ठी है किसी दुखी मन की। यह थकी देह पर कर्मभार इसको खाँसी, उसको बुखार जितना वेतन, उतना उधार नन्हें-मुन्नों को गुस्से में हर बार, मारकार पछताना चिट्ठी है किसी दुखी मन की। इतने धंधे। यह क्षीणकाय- ढोती ही रह
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तुम्हारे हाथ में टँककर ...

तुम्हारे हाथ में टँककर बने हीरे, बने मोती बटन, मेरी कमीज़ों के। नयन को जागरण देतीं नहायी देह की छुअनें कभी भीगी हुईं अलकें कभी ये चुंबनों के फूल केसर-गंध-सी पलकें सवेरे ही सपन झूले बने ये सावनी लोचन कई त्यौहार तीजों के। बनी झंकार वीणा की तुम्हारी चूड
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लोहे ने कब कहा ...

लोहे ने कब कहा कि तुम गाना छोड़ो तुम खुद ही जीवन की लय को भूल गए। वह प्रहार सहकर भी गाया करता है सधी हुई लय में, झंकारों के स्वर में तुम प्रहार को सहे बिना भी चिल्लाए किया टूटने का अभिनय दुनिया भर में लोहे ने कब कहा कि तुम रिश्ते तोड़ो तुम्हीं टूटने
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मन रीझ न यों...

मन ! अपनी कुहनी नहीं टिका उन संबंधों के शूलों पर जिनकी गलबहियों से तेरे मानवपन का दम घुटता हो। जो आए और छील जाए कोमल मूरत मृदु भावों की तेरी गठरी को दे बैठे बस एक दिशा बिखरावों की मन ! बाँध न अपनी हर नौका ऐसी तरंग के कूलों पर बस सिर्फ़ ढहाने की ख़ाति
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चेतना उपेक्षित है...

कैसी विडंबना है जिस दिन ठिठुर रही थी कुहरे-भरी नदी, माँ की उदास काया। लानी थी गर्म चादर; मैं मेज़पोश लाया। कैसा नशा चढ़ा है यह आज़ टाइयों पर आँखे तरेरती हैं अपनी सुराहियों पर मन से ना बाँध पाई रिश्तें गुलाब जैसे ये राखियाँ बँधी हैं केवल कलाइयों पर कैसी
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जिस रोज़ से पछवा चली...

जिस रोज़ से पछवा चली आँधी खड़ी है गाँव में उखड़े कलश, है कँपकँपी इन मंदिरों के पाँव में। जड़ से हिले बरगद कई पीपल झुके, तुलसी झरी पन्ने उड़े सद्ग्रंथ के दीपक बुझे, बाती गिरी मिट्टी हुआ मीठा कुआँ भटके सभी अँधियाव में उखड़े कलश, है कँपकँपी इन मंदिरों क
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रिश्तों को घर दिखलाओ...

माँ की साँस पिता की खाँसी सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं। छोड़ चेतना को जड़ता तक आना जीवन का पत्थर में परिवर्तित पानी मन के आँगन का- यात्रा तो है; किंतु सही अभियान नहीं। सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं। संबंधों को पढ़ती है केवल व्यापारिकता बंद कोठ
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मीठापन जो लाया था मैं गाँव से...

मीठापन जो लाया था मैं गाँव से कुछ दिन शहर रहा अब कड़वी ककड़ी है। तब तो नंगे पाँव धूप में ठंडे थे अब जूतों में रहकर भी जल जाते हैं तब आया करती थी महक पसीने से आज इत्र भी कपड़ों को छल जाते हैं मुक्त हँसी जो लाया था मैं गाँव से अब अनाम जंजीरों ने आ जकड़
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वर्षा-दिनः एक ऑफ़िस

जलती-बुझती रही दिवस के ऑफ़िस में बिज़ली। वर्षा थी, यों अपने घर से धूप नहीं निकली। सुबह-सुबह आवारा बादल गोली दाग़ गया सूरज का चपरासी डरकर घर को भाग गया गीले मेज़पोश वाली- भू-मेज़ रही इकली। वर्षा थी, यूँ अपने घर से धूप नहीं निकली। आज न आई आशुलेखिका कोई
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गोरी धूप चढ़ी

रात) जाते-जाते दिवस, रात की पुस्तक खोल गया। रात कि जिस पर सुबह-शाम की स्वर्णिम ज़िल्द चढ़ी गगन-ज्योतिषी ने तारों की भाषा ख़ूब पढ़ी आया तिमिर, शून्य के घट में स्याही घोल गया। (सुबह) देख भोर को नभ-आनन पर छाई फिर लाली पेड़ों पर बैठे पत्ते फिर बजा उठे ताल
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शाम

संध्या के केशों में बँध गया 'रिबन' -सूरज की लाली का। हँसुली-सा इंद्रघनुष बिंदिया-सा सूर्य मेघों की माला में ज्योतित वैदूर्य्य सतरंगे वेशों में बस गया बदन -फूलभरी डाली का। कुंडल-से झूम रहे क्षितिजों पर वृंत चूम रहा अधरों को मधुऋतु का कंत तन-मन के देशो
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दिल के दरमियाँ PRESENTS "कोई आवाज़ देता है"

पेटों में अन्न नहीं भूख साहस के होठ गए सूख खेतों के कोश हुए रीते जीवन की रात कहाँ बीते? माटी के पाँव फटे तरुवर के वस्त्र छीन लिए सूखे ने फ़सलों के शस्त्र हाय भूख-डायन को आज़ कौन जीते? हड्डी की ठठरी में उलझी है साँस मुट्ठी भर भूख और अंजलि भर प्यास बीत