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हृदय गवाक्ष

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01 Jun 2010
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पाज़ के बटन

उन्होने मुझसे कहा था " दो शेरों की बहन किसी चीज की चिंता नही करती"उस सड़क छाप बैद्य ने जब जाने कौन कौन सी दवा बता कर कहा था कि ये ६ महीने में दौड़ने लगेगी तो मैने रो कर विरोध किया था कि "मुझे तमाशा मत बनाओ, ये कुछ नही कर पायेगा।" और उन्होनेसमझा के कहा था।
 
कंचन सिंह चौहान
Jun 01 2010 01:38 PM
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जेठ और बैसाख की ये दोपहर

जेठ और बैसाख की ये दोपहर,तुमको अपने साथ अब भी खींच लाती है।सामने अंबर तले धरती जले,और हम तुम शांत थे महुआ तले।प्रेम की शीतल छवि वह याद करये धरा अब भी स्वयं का जी जलाती है।लू हुई थी साँझ की मलयज पवन,ताप यूँ पावन कि ज्यों दहका हवन,पांव जलते, ले प्रतीक्षा
 
कंचन सिंह चौहान
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शहीद को श्रद्धांजली में ना पसंद क्या ?

अभी दो दिन पहले मेजर गौतम राजरिशी ने एक पोस्ट लगाई, जो कि एक मेजर की शहादत पर थी। एक साथी फौजी का अचानक जाने से शायर फौजी का दुखी होना लाज़मी था। ब्लॉग जगत के टिप्पणी व्यवहार से हम सभी परिचित हैं। इसी के चलते मेजर राजरिशी ने इस संवेदनशील पोस्ट पर टिप्पणी
 
कंचन सिंह चौहान
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ये प्यार नहीं है।

किसी खूबसूरत परों वाली चिड़िया कोचुगाओ हीरे के दाने,पिलाओ झरनों का पानी,उसके लिये बनाओ,सोने का एक विशाल महल,जड़ो,शीशे के दरवाजे खड़कियाँसजाओ उसमें,जन्नत के फूल, कलियाँ, हरियाली।और उसके उड़ने के लिये आसमानतुम करो निर्धारित ये प्यार नहीं है।
 
कंचन सिंह चौहान
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गली में आज चाँद निकला

सबकी तरह मैं भी माँ से कहानियाँ सुनते बड़ी हुई। उन कहानियों के विषय अधिकतर देशभक्ति के हुआ करते थे। राणा प्रताप का राष्ट्र प्रेम से मौत तक समझौता ना करना। उनकी बच्ची का कहना वो कौन शत्रु है जिसने, हम सब को वनवास दिया है एक छोटी सी पैनी सी तलवार मुझे भी दे
 
कंचन सिंह चौहान
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काकः काकः, पिकः पिकः

ये आवाज़ अक्सर परीक्षा के समय कूजती थी। जब सारी दुनिया से ध्यान हटा कर एक लक्ष्य परीक्षा होती दिन रात के परिश्रम में जब इसकी आवाज़ कान में पड़ती तो मन कुछ हलका सा प्रतीत होता था। अब भी जब ये आवाज़ सुनती हूँ तो हाथ में पु्स्तक लिए बाउंड्री के भीतर पड़ी
 
कंचन सिंह चौहान
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एक मुक्तक

बहरे मुतकारिब सालिम मक़बूज असलम (१६ रुक्नी) जिस पर इस बार की तरही भी है और गुरु जी ने ढेरों गीत इस बहर पर बता रखे हैं। इसी बहर पर ये ताज़ा ताज़ा मुक्तक गुरु जी के आशीष से....मिलो किसी से तो अपना दिल तुम,ना पूरा पूरा उठा के रखना।वो जैसा दिखता है, हो कि ना
 
कंचन सिंह चौहान
Feb 17 2010 03:58 PM
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तुमने इश्क का नाम सुना है, हम ने इश्क किया है

बेतहाशा चूमते हुए होंठो परअपना हाथ रख के,उस दिन जब पूंछा था तुमने कि "अब क्यों नहीं लिखता मै कविता तुम पर"कहना चाहता था कि "लिख ही तो रहा था अभीजब तुमने अचानक रख दिया हाथ.......!!"नोट: किसी ने किसी से कहा ऐसा और मैंने जस का तस लिख दिया कभी कभी यूँ भी हो
 
कंचन सिंह चौहान
Feb 15 2010 01:51 PM
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बाबुल तेरे प्यार ने तो मुझे सिर पर चढ़ा लिया

और आज फिर याद आया सब कुछ .....! पांडे जी की बेटियों को उनकी थाली में खाते देख याद आया आपका कौर तोड़ कर मिर्च अलग कर कर के खाना खिलाना। उन सबका मचलना देख कर याद आया अपना बचपन जो शायद आज ही के दिन बहुत हद तक खतम हो गया था।ऐसा नही कि आपके जाने के बाद ही आपकी
 
कंचन सिंह चौहान
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इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।

कौन है जो जिंदगी तनहा बिताना चाहता है,जिदगी को चुन लिया तनहाइयों नें किंतु मेरी,अब मुझे जैसी भी मिली, वैसी बिताना चाहती हूँ, इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।छूट जाने के लिये ही मीत जब सारे मिले हैं,दिल जलाने के लिये ही दीप जब सारे जले हैं,क्यों
 
कंचन सिंह चौहान
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मुझे नज़र से डर लगता है।

Saving...प्यार तुम्हारा मुझ में रम कर,नित मुझको सुंदर करता है,मुझे नज़र से डर लगता है।आँखों में काजल बन बैठे, होंठों पर लाली बन साजन,तिल बन कभी कपोल सजाते,कभी दृष्टि बन पूरा तन मन,कभी मुझे प्रतिबिंबित करते,यूँ जैसे दर्पण करता है,मुझे स्वयं से डर लगता
 
कंचन सिंह चौहान
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विदा नई शुरुआत के लिये

यूँ ये वर्ष जाते जाते कुछ ऐसा कर गया कि सारहीन संसार के विषय में फिर से सोचना पड़ गया..मगर ऐसा तो होता ही है, जब जब कोई ऐसी घटना घटती है जिसके लिये हम तैयार भी नही होते और चाह कर भी कुछ नही कर सकते, तब तब, ईश्वर, सृष्टि, पुरुषार्थ आदि आदि पर प्रश्नचिह
 
कंचन सिंह चौहान
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एक इंसान हूँ मैं तुम्हारी तरह

हरिश्चंद्र श्रीवास्तव जी पूर्णतः दृष्टिहीन हैं। उनकी दवा के पर्चे पर देखकर मुझे पता चला कि उनकी उम्र ७० वर्ष है, अन्यथा मुझे तो ५५ ही लगती थी। और इसके बावज़ूद वो एक दृष्टिबाधित विद्यालय चलाते हैँ। जिसमें कभी ४० विद्यार्थी पढ़ा करते थे। कई बार सोचा था
 
कंचन सिंह चौहान
Dec 17 2009 05:19 AM
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कोई संग इमाम खुदा ने बख्‍शा ना ...मगर संग है गुरु जी के विवाह की वर्षगाँठ

ये अच्छा हुआ कि अपनी गज़ल के चक्कर में इतनी बार गुरु जी को फोन करना पड़ा कि इस डर से कि कहीं कल भी मुझे बार बार फोन कर के पकाये ना गुरु जी ने अपरोक्ष रूप से प्रकट किया कि कल अर्थात आज उनकी शादी की सालगिरह है और प्रवेश वर्जित खैर... ऐसा गुरु जी ने कुछ
 
कंचन सिंह चौहान
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रब ने बना दी जोड़ी

मुझसे ठीक १० साल छोटी है वो। कुछ चीजें अनोखी हुई उसके साथ‍‍...... जैसे कि ११वें महीने की ११ तारीख को ११ बज कर ११ मिनट पर जन्म हुआ उसका। २८ अगस्त को जब बाबूजी दीदी के घर पर पहुँचे तो वो ९ माह की लड़की चलने नही बल्कि दौड़ने लगी थी और जब एक हाथ में एक किल
 
कंचन सिंह चौहान
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कल फिर.....

अरे नही भाई....! अभी शादी निपटी थोड़े ना है बिटिया की। वो तो २७ नवंबर को है। इतने पहले से छुट्टी ले ली है कि आप लोगों को पता लग सके कि हम बिटिया की शादी ऐसे ही नही कर ले रहे, हमें भी टेशन है। लड़की की शादी कोई आसान बात थोड़े ना है। हाँ ऽऽऽऽऽ नही तो। अफि
 
कंचन सिंह चौहान
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यूँ ही

सुबह से रोक रही हूँ खुद को, मगर नही रुक पाई आख़िर....! बस लिखती चली जा रही हूँ जुनून में...यहाँ क्यों लिख रही हूँ ? पता नही.... सुबह से कई जगह दिमाग लगाना चाहा मगर नही.... यही आ कर लग जता है। बार बार प्रश्न आ रहे हैं। क्या जिंदगी का कोई फॉर्मूला भी ह
 
कंचन सिंह चौहान
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तुम्हारी खुशबू अभी भी यही पे बिखरी है,तुम्हारी मुस्कुराहटें हैं आस पास वही....

कुछ दिन हुए .....पता नही किस के ब्लॉग पर पढ़ा था "अग़र किसी जगह से आपकी मीठी यादे जुड़ी हों तो वहाँ दोबारा कभी नही जाना चाहिये... " बात सच थी क्योंकि यादे वहीं रह जाती हैं, और वक़्त आगे निकल जाता है। हम सब कुछ यादों के अनुसार ढूँढ़ते हैं... छोटी छोटी बा
 
कंचन सिंह चौहान
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Oct 22 2009 12:59 PM
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कबिरा को रामान्द मिलें,हमको बस गुरु का प्यार मिले- गुरु जी के जन्म दिन पर

११ अक्टूबर का ये आज का दिन , जब तारीख की इकाई दहाई एक ही होती है, एक समान... अंक ज्योतिष में सुना है कि इस तारीख को इसी कारण से शुभ मानते हैं और शुभ मानने के साथ ही अमिताभ बच्चन जी का उदाहरण भी दे दिया जाता है कि कैसे इस तारीख ने उन्हें शहंशाह बना दि
 
कंचन सिंह चौहान
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घटनाओं के पीछे-श्रीमती गौतम राजरिशी (संजीता भाभी) के लिये - करवाचौथ पर

२२ सितं० और आज ०७ अक्टूबर... बीच मे बहुत कुछ गुज़रा... जाने क्या क्या... ठीक से दर्ज़ भी नही है..याद करूँ तो कहीं से कुछ और कहीं से कुछ उग आता है। बहुत कुछ २२ सितंबर से भी पहले का..लगता है कि ये जो उस दिन हुआ था.... वो जो उस दिन कहा था क्या सब इस २२
 
कंचन सिंह चौहान
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मिलना अजीज़ों का

पिछले दिनो मौका मिला दिल्ली जाने का जिस सुबह ९ बजे पहुँची और रात नौ बजे चल दी। मिलना तो बहुत लोगो से था मगर मिल पाई कुछ ही लोगो से। मगर हाँ जिन से मिली उनका मिलना जीवन भर ना भुला पाऊँगी।वरुण की तबीयत के चलते मीनाक्षी दीदी से अक्सर मिलने की बात हुआ करती
 
कंचन सिंह चौहान
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अपील एक माँ की

ज़रा सोचिये....! एक बार अपनी जिंदगी पर नज़र डालिये...! आपकी जिंदगी में भी कोई ना कोई तो ऐसा होगा ही ना जो हर मंदिर में जा कर आपके लिये प्रार्थना करता होगा, हर दरगाह पर आपके लिये धागा बाँधता होगा, हर मज़ार पर आपकी लंबी उम्र के लिये चराग जलाता होगा। दुनिया
 
कंचन सिंह चौहान
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Sep 11 2009 02:00 PM
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कितने काग कबूतर भेजूँ, इक खत हर पल होता है।

ये गीत जिसे मैने गज़ल बनाया था, अचानक जैसे पैदा हो गया था। कमज़ोर गणित के कारण बिल्स सम्मिट करने का काम हमेशा मुझे तनावपूर्ण ही लगता है और उस तनाव में अचानक जाने कहाँ से इन्हे जन्म लेने की ज़िद आ गई। मैं मना कर रही हूँ, मगर ये बस अभी की जिद लगाये पड़ी है।
 
कंचन सिंह चौहान
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Aug 28 2009 03:58 PM
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पत्थरों का गीत

८ साल पहले एक पत्थर की आँख में आँसू देख कर ये कविता लिखी थी। बाद में ये कुछ लोकल पत्रिकाओं में छपी भी। मगर जैसा मैने लिखा था वैसा इसे समझा नही गया। इसलिये ब्लॉग पर लगाने का मन नही हुआ। बहुत दिनो बाद फिर अभी पिछले रविवार इस गीत को फिर किसी पत्थर के सामने
 
कंचन सिंह चौहान
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Aug 17 2009 12:46 PM
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मेरा पहला दोस्त

ये संजोग ही था कि मेरे जन्म के कुछ पहले से जो त्रासदियाँ परिवार के ऊपर आई थीं वो लवली के जन्म के साथ ही सुधरीं। जिसका कभी न मुझे ताना मिला ना उसे बधाई।वो मुझ से तीन साल छोटा है। अपनी जनरेशन में मैं सबसे छोटी और अगली जनरेशन में वो सबसे बड़ा। मेरा सबसे बड़ा
 
कंचन सिंह चौहान
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ज़रा सा और दो पल को.ज़रा सा और दो पल को-१०० वीं पोस्ट

कुछ आम से दिनो को कुछ अपनो का साथ खास बना देता है। उन्ही आम दिनो में ये भी दिन है..आज का दिन। जो खास बस इसलिये हो गया क्योंकि बहुत से अपने आज एक ही दिन दुआयें देते हैं। आज की पोस्ट मेरी १०० वीं पोस्ट है। आप मुस्कुरा रहे होंगे और मन ही मन कह रहे होंगे कि
 
कंचन सिंह चौहान
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Jul 24 2009 08:15 AM
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औरत नही पाठक नेचरिका जी

नेचरिका जी की टिप्पणी के जवाब में जो टिप्पणी लिखी वो इतनी लंबी थी कि टिप्पणी बॉक्स में आई ही नही। अतः यह पोस्ट लिखनी पड़ गई। श्रीमान नेचरिका कृपया ध्यान दें। श्रीमान नेचरिका जी! सादर अभिवादन ! आप मेरे ब्लॉग पर आये। श्री राजेंद्र यादव जी की आत्मकथा मुड़
 
कंचन सिंह चौहान
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मुड़ मुड़ के देखता हूँ-राजेंद्र यादव

मुड़ मुड़ के देखता हूँ.... राजेंद्र यादव जी की ये आत्मकथा पढ़ने का मन हुआ मेरा मन्नू भंडारी की आत्मकथा एक कहानी ये भी पढ़ने के बाद। चूँकि राजेंद्र यादव की आत्मकथा पहले लिखी गई थी और मन्नू जी की बाद में तो सोचा पहले इस की चर्चा कर लें। मगर ये भी सच है कि
 
कंचन सिंह चौहान
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लहर की खामोशी

लीजिये पढ़िये आज वो गज़ल जिस के एक शेर को गुरु जी के ब्लॉग पर आयोजित तरही मुशायरा में हासिल-ए-मुशायरा का खिताब मिला। इस मुशायरे में आई सभी गज़लो के रचनानाकार का नाम ना बताते हुए स्वनामधन्य श्री प्राण शर्मा जी के पास हासिल-ए-मुशायरा का खिताब हेतु चुनने
 
कंचन सिंह चौहान
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किसी से नही, एक तुमसे......

किसी से नही, एक तुमसे निभाने की खातिर, जली मैं युगों से युगों तक किसी को नही हर किसी शख्स में है किया याद तुमको निशा से सुबह तक तुम्ही आदि में हो, तुम्ही अंत मे हो, तुम्ही मंजिलों में तुम्ही पंथ में हो, नही दीखते तुम कहीं भी तो क्या है? खुली आँख में
 
कंचन सिंह चौहान
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हृदय गवाक्ष की दूसरी वर्षगाँठ और आप सब को शुक्रिया

जी हाँ आज ही है वो दिन जो २ साल पहले इस अद्भुत ब्लॉग विश्व में लाया। जब आई थी तो नही पता था कि जिंदगी का सब से बड़ा फितूर, जुनून बन जायेगा ये काम। वो दुनिया जो मुझे सब से अधिक सुकून देती है। वो जगह जहाँ मुझे खुद जैसे कई सनकी मिल जाते हैं। जहाँ मेरा कह
 
कंचन सिंह चौहान
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बिखरी कहानी के बाद

तो क्या करूँ मैंऽऽऽ...?? क्या करूँ मैं अब्बू..?? किस के सहारे छोड़ दूँ इन दोनो नासमझों को जिनका पेट नही समझ पाता कि ये किस घर की औलाद हैं ? सुबह शाम भूख..भूख..! कहाँ से लाऊँ इन नासमझों के लिये अनाज..! सर्दी लगे तो कहाँ से लपेटूँ इन्हे गरम कपड़ों में.??
 
कंचन सिंह चौहान
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तुम सा कौन पुजारी होगा,

पता नही मौसम का असर है या माहौल का कुछ लिखा नही जाता आजकल या फिर सोचा ही नही जाता होगा....! मशीनी जिंदगी क्या सोचे..?? जब सोचती भी है तो बस पुराना सोचती है। तब ऐसा था..अब ऐसा है..! तब ऐसा क्यूँ था..?? अब ऐसा क्यूँ है..?? अतीतजीवी हो गई हूँ शायद। लीजि
 
कंचन सिंह चौहान
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घर की तामीर चाहे जैसी हो, इसमें रोने की एक जगह रखना।

घर की तामीर चाहे जैसी हो, इसमें रोने की एक जगह रखना। निदा फाज़ली सच घर में एक कोना तो ऐसा होना चाहिये, जहाँ इंसान जी भर के रो सके। फूट फूट कर ज़ार ज़ार। जहाँ कोई ना हो। हम हों.... हमारे आँसू हों। हमें कोई चुप ना कराये बल्कि अंदर से कोई बार बार कहे, "
 
कंचन सिंह चौहान
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परिंदे हमसे कोई घोसला बना ना सके।

जहाँ तक याद है कि पिछले डेढ़ साल से गुरु जी की गज़ल क्लासेज़ ले रही हूँ, लेकिन सिवाय तहरी मुशायरों या होमवर्क के कभी भी गज़ल लिखने की खुद से हिम्मत नही पड़ी। हाँ ये ज़रूर है कि गज़ल सझ के जो लिखती थी उसे भी लिखना छोड़ दिया, क्योंकि पहले तो उतना ही जानती
 
कंचन सिंह चौहान
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स्वागत करें प्रेरणा का

यह पोस्ट मुझे पिछले हफ्ते ही दे देनी थी और मन की गति देखूँ तो अभी भी नही। कुछ पारिवारिक और मानसिक उलझनो के चलते ना दे सकी। फिलहाल ब्लॉग परिवार ऐसा परिवार है जिसकी याद अब अपने अपनो के साथ ही आती है और इस बार भी आई और जितनी मदद हो सकती थी मिली भी। डॉ०
 
कंचन सिंह चौहान
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गीत बंदिनी के -अतिम भाग

और अब बारी है मेरी पसंद की...! यूँ तो बंदिनि फिल्म के सारे ही गीत बहुत ही अच्छे हैं, अतः भाग १ और भाग दो में भी मेरी ही पसंद के गीत थे, मगर कुछ गीत होते हैं, जो आपकी जिंदगी का हिस्सा होते हैं। उन्हे कितनी ही बार गुनगुना कर आप अकेले में रोते/हँसते है
 
कंचन सिंह चौहान
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बादिनी भाग -२

बात निकली है, तो फिर दूर तलक पहुँची है....! अब देखिये ना मुफलिस जी की पसंद के दो गीतों को ले कर चली बात जब मेरे तक पहुँची तो मैने उसमें दो गीत और बढ़ाने की सोच ली और जब मैने आप लोगो के साथ पहले दो गीत बाँटे तो आप लोगो ने दो गीत और याद दिला दिये। पहला
 
कंचन सिंह चौहान
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गीत बंदिनी के‍-भाग १

आज की पोस्ट है मुफलिस जी के नाम..! वो मुफलिस जो असल मे लोगो पैसे देने का काम करते हैं। मतलब ये बैंक में सर्विस करते हैं और यहाँ खुद को मुफलिस बताते हैं..! खैर ये तो उनका बड़प्पन है। रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मोरा मोल तो इन मुफलिस जी से यूँ तो ब्लॉग जग
 
कंचन सिंह चौहान
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ऐसा भी लेकिन हो पाया कई दिनो के बाद और क्षमा

आज बढ़ी इतनी तनहाई, खुद को अपनी बात बताई, ऐसा भी लेकिन हो पाया, कई दिनो के बाद, खुद से मिलने की फुरसत थी कई दिनो के बाद। वक़्त नही खुद से मिलने का ऐसा तो कुछ यार नही, पर खुद से मिलने की खातिर मैं खुद ही तैयार नही, क्योंकि खुद से मिलने का मतलब होगा तुम
 
कंचन सिंह चौहान