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मालवी जाजम......बोलोगा तो बचेगी मालवी

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08 Mar 2010
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सब हिल-मिल आज खेलो होली - सुनिये ये मालवी गीत

सब हिल-मिलआज खेलो होरीअध-बूढ़ा ने बूढ़ा-आड़ाबण ग्या है छोरा-छोरीगेंद-गुलाबी रूप लजीलीमान करे क्यूं ए गोरीफ़ागण तो रंगरेज हठीलोरंग दियो अंगो और चोलीबिरहण ऊबी पीहर कँवरेमन में भरम भर्यो भोरी(भाव:बिरहन अपने प्रीतम से दूर मायके में हैऔर उसके मन में कई भोली भ्रम
Mar 01 2010 11:21 AM
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प्रेम अबीर उछाल;होली लाई रंग गुलाल

आप सभी को होली की राम-रामलोक पर्वों का मज़ा ग्रामीण अंचलों में कुछ अलग ही रंगत के साथ मौजूद है.जैसी होली मैंने अपने मालवा के गाँवों में देखी है;खेली है वैसी बात अब शहरों में नज़र नहीं आती. मेरी बोली मालवी में राजस्थानी और गुजराती भाषा का वैभव बड़ी मधुरता के
टैग: मालवा
Feb 28 2010 12:58 PM
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जाजम पे नवा पामणा..विवेक चौरसिया

विवेक चौरसिया नौजवान खबरची हे.दैनिक भास्कर,रतलाम में काम करे हे.वरिष्ठ मालवी कवि दादा शिव चौरसिया का बेटा हे ; पेला-पेल मालवी जाजम पे आया हे अपणी उज्जैन की मीठी मालवी लई के.बाँचो आप उणकी चार कविता. १) नीरी री...नीरी री घर में आटो पीसी री नानो खाए रोट
Dec 29 2009 11:49 AM
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दादा बैरागीजी पाछा वेगा आजो

खबर पक्की हे ने खुसी की भी हे.मालवी का घणा-मानेता कवि दादा बालकवि बैरागी विश्व-हिन्दी सम्मेलन में भाग लेवा वास्त अमेरिका जई रिया हे.हिन्दी का पेला बैरागी जी पे मालवी को हक़ हे.म्हाको योज केणो हे के दादा पधारो आप राजी खुसी..और माँ भारती की धजा ऊँची करज
Dec 29 2009 11:49 AM
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मालवी के विस्तार के लिये

मालवी बोली सरल एवं कर्णप्रिय तो है ही, इसकी मिठास भी लाजवाब है। मालवा में शुरू से मालवी ही बोली जाती है। परंतु जैसे-जैसे अँगरेज़ी घरों में घुसपैठ करती जा रही है, वैसे-वैसे नई पीढ़ी इसे पिछड़ेपन का प्रतीक मानने लगी है। नईदुनिया ने मालवी को (थोड़ी-घणी) स्थ
Dec 29 2009 11:49 AM
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चार लाईन में रिस्ता की बात

मालवी जाजम पे आज मालवी में लिखी कविता पेश हे.रिश्ता की गंध अपणी बोली ज्यादा मीठी वई जाए हे. म्हारो यो भी प्रयास हे कि इण चिट्ठा पे गीत,कविता,गजल,हाईकू,दोहा,मुक्तक सबका सब नमूदार वे.म्हारो यो भी केणो हे कि बोली को मानकीकरण मुश्किल काम हे. बोली को आँचल
Dec 29 2009 11:49 AM
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मालवी लोक-नाट्य....माच..गणपति गजल

मालवी जाजम पे आज पधारिया हे मालवी माच का मान...दादा सिध्देश्वरजी सेन .भोला,सरल ओर प्रतिभा का धनी सेनजी नया जमाना का माच का पुरोधा.गाँव-गाँव, गली-गली जईके सेनजी ने मालवी माच मो मान बढायो.जिन्दगी भर अभाव में रिया पर माच को दामन नीं छोड्यो.आकाशवाणी,सूचन
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मालवी का प्रथम कवि दादा दुबेजी जाजम पे

मालवी कविता का दादा बा आनन्दरावजी दुबे की मुहावरादार मालवी को कई केणो ? पचास का दशक में शिप्रा का घाट पे पेलो कवि-सम्मेलन व्यो थो तब मालवी को कोई एसो आयोजन नीं व्यो जीमे आनन्दराव दादा की धारदार मालवी को रंग नीं बिखरयो ।रामाजी रई ग्या ने रेल जाती री द
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मानसून के पहले ..ये मनभावन मेवला गीत

मालवा पर प्रकृति की सदा मेहर रही है.कुदरत की सौजन्यता से ही मालवा 'पग पग रोटी,डग डग नीर' से सम्पन्न बना है.,मालवा के लोक-गायकों ने सदैव से अलमस्त प्रकृति से स्वार्थ की जगह जन-मन के शुभ-भावों को उजागर करने का आग्रह किया है.मालवा मे चौमासे को बड़ा आदर द
Dec 29 2009 11:49 AM
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दादा तोमरजी का हाथ से..ठूंठ का ठाठ

नरेन्द्रसिंह तोमर मालवी का लाड़का लोक-गीत गायक हे.वणाको नाम आयो नी के आपका मन में गजानंद भगवान को ऊ लोक-गीत याद अई जावे हे जींके आपने विविध-भारती ओर मालवा हाऊस से खूब सुण्यो हे...गवरी रा नंद गनेस ने मनावां..दादा तोमर जी अबे अस्सी पार का हे ओर रामजी क
Dec 29 2009 11:49 AM
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भाटो फ़ेकीं ने माथो मांड्यो..

मालवी का यशस्वी हास्य कवि श्री टीकमचंदजी भावसार बा अपणीं रंगत का बेजोड़ कवि था.घर -आंगण का केवाड़ा वणाकी कविता में दूध में सकर जेसा घुली जाता था.मालवी जाजम में या बा की पेली चिट्ठी हे....खूब दांत काड़ो आप सब.आगे बा की नरी(अनेक) रचना याद करांगा. कविता को
Dec 29 2009 11:49 AM
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म्हारो हस्ताक्षर गीत...दादी थारी चरखो चाले

चरर मरर ,चरर मरर,चरखो चाले.... दादी थारो चरखो चाले...... अणी गीत से आखा देस मे म्हने पेचाण मिली.घर-आंगण का मीठा रिस्ता को गीत हे यो.अपणा घर-घर में इ रिस्ता त्याग,संघर्ष ओर प्रेम की पावन डोर वे हे.ईंमे भी घट्टी की चरर - मरर हे और हे परिवार की मंगल काम
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कसी लुगायां हे...

सीधी सादी,कसी लुगायां हे भोली भाली,कसी लुगायां हे जनम की मां,करम की अन्नपूर्णा भूखी तरसी, कसी लुगायां हे पन्ना,तारा,जसोदा मां, कुन्ती माय माड़ी, सकी लुगायां हे कुंआरी बिलखे हे,परणी कलपे घर से भागी,कसी लुगायां हे गूंगी-गेली,वखत की मारी हे खूंटे बांधी,
Dec 29 2009 11:49 AM
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तपते मौसम में हिन्दी तर्जुमे के साथ मालवी की ग़ज़ल !

बोली की अपनी ख़ूबसूरती है. हालाकि भाषा पंडित बोली से थोड़े नाराज़ ही रहते हैं . अपने अपने अंचल में बोली का अपना विन्यास,मुहावरे,लहजा और कहन है.मालवी भी इससे अछूती नहीं है. आलम ये है कि इन्दौर, उज्जैन,रतलाम,धार या मंदसौर (तक़रीबन २०० कि.मी के रेडियस में)म
Dec 29 2009 11:49 AM
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विख्यात मालवी लोकगीत गायक रामअवतार अखण्ड को भेराजी सम्मान

जाने माने मालवी लोक-गीत गायक श्री रामअवतार अखण्ड को सन 2008 का भेराजी सम्मान दिया जा रहा है। उज्जैन में 18 अप्रैल को आयोजित एक भव्य समारोह में अखंडजी इस सम्मान से नवाज़े जाएंगे। अभी तक इस सम्मान से बालकवि बैरागी,नरहरि पटेल,नरेन्द्रसिंह तोमर,आनन्दराव द
Dec 29 2009 11:49 AM
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मालवा के लोक-नाट्य माच में थिरकतीं हैं मानवीय संवेदना

मालवी माच में केवल मनोरंजन नहीं है, इसमें लोकरंजन है। मनोरंजन तो केवल मन रंजन करता है और वह केवल मन को रास आता है। मनोरंजन तो बदलता रहता है, व्यक्ति की मानसिक स्थिति के अनुसार और इसीलिए वह अपनी-अपनी रूचि से बनता-बिगड़ता भी है। इसमें केवल आमोद, प्रमोद,
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रे मनवा रंग तन,रंग मन,होली आई रंग गुलाल !

रे मनवा रंग तन रंग मन होली लाई रंग गुलाल। प्रीत को काजल आँख में आँजो कारा कारा मन ने चॉंदी सा मॉंजो पाताला में गाढ़ी दो मलाल हेत को मंदर कितरो बड़ो है अंदर जीके सांवरो खड़ो है श्रम के आगे हार्यो काल भूख गरीबी को कीचड़ कारो कई नी है थारो ने कई नी है म्हार
Dec 29 2009 11:49 AM
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संजय पटेल की मालवी कविता

जमानो नीं बदलेगा लुगई रोज रिसावे लाड़ी पाणी नीं बचावे तेंदूलकर रन नीं बनावे छोरो घरे नीं आवे छोरी सासरे नीं जावे माड़साब सबक नीं करावे टाबरा भणवा नीं जावे नेता झूठी कसम खावे अखबार सॉंच छुपावे हेडसाब थाणा में खावे भई-भई रोज कुटावे बेसुरो नाम कमावे मालवी
Dec 29 2009 11:49 AM
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मालवी को समर्थ सम्बल चाहिए

भारत के पश्चिम मध्यप्रदेश में विन्ध्य की तलहटी में जो पठार है उसे कम से कम दो हज़ार वर्षों से मालव (मालवा) कहा जा रहा है। यहॉं के लोग भाषा और पोषाक से कहीं भी पहचान में आते रहे। मौसम की यहॉं सदा कृपा रही है। इसीलिए सदा सुकाल के सुरक्षित क्षेत्र के रूप
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आज पढिये वेद हिमांशु के मालवी हाईकू

वेद हिमाशु शुजालपुर मे रेवे हे.खूब अच्छो लिखे हे..मालवी में , हिन्दी में. आज बाँचो वेद हिमांशु का मालवी हाईकू.थोड़ा सा शब्द हे पण घाव केसो गेरो करे हे आप भी देखो. > ऊ पियासो थो नद्दी में उतरियो ने डूबी गयो > घणी उदास चुपचाप वा देखे मनी पिलांट > क्रांत
Dec 29 2009 11:49 AM
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पहले मालवी कवि-सम्मेलन का दुर्लभ चित्र और श्रीनिवास जोशी की कविता

२४ फ़रवरी के मालवी गद्य का दादा बा श्रीनिवासजी जोशी की दूसरी बरसी हे. इण मोका पे बाँचो दादा जोशी जी की या कविता पटवारी.इका साथे उज्जैन में सन ५२ में कार्तिक मेळा मे आयोजित पेला मालवी कवि सम्मेलन की फ़ोटू भी हे. इण चित्र में दादा जोशी का साथे मालवी-हिन्
Dec 29 2009 11:49 AM
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सुमनजी ! वागाँ में पधारिया जाणे दुनिया में वास उड़ी

दन नागपंचमी को ने तारीख हे आज १८ अगस्त.हिन्दी कविता का घणामानेता कवि डाँ शिवमंगलसिंहजी सुमन को जनम दन.सुमनजी उज्जेण आया ने आखा मालवी मनख वई गिया. नरहरि पटेलजी की मालवी गीत की किताब सिपरा के किनारे में एक गीत सुमन जी पे हे...आज बाँचां और इण मालवी आत्म
Dec 29 2009 11:49 AM
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जिने देखी नी टूटी नाव कदी ऊ पार लगाणों कईं जाणे.

नरेन्द्रसिंह तोमर मूल रूप से तो मालवी लोक गीत गायक हैं लेकिन एक सशक्त गीतकार के रूप में भी उनकी विशिष्ट पहचान है.आज़ादी के आंदोलन में उनके गीतों ने खू़ब धूम मचाई थी..कभी उन गीतों में से कुछ रचनाएं जारी करेंगे ..आज पढि़ये उनका एक लोकप्रिय गीत जो मालवी
Dec 29 2009 11:49 AM
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विक्रम विश्वविद्यालय में मालवी के लिये रचनात्मक पहल

उज्जैन मालवा का स्पंदित नगर रहा है.महापर्व कुंभ की विराटता,शिप्रा का आसरा,भर्तहरि की भक्ति और महाकालेश्वर का वैभव इस पुरातन पुण्य नगरी को विशिष्ट बनाता है. मालवी के सिलसिले में बात करें तो पद्म-भूषण प.सूर्यनारायण व्यास के अनन्य प्रेम से ही पचास के दश
Dec 29 2009 11:49 AM
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याँ सेर में सब देखा देखी का चोचला हे

चतरलाल की चिट्ठी भई कचरा जी, राम राम।अठे सब मजा में है। अपरंच समाचार यो है कि मालवा में पाणी खूब बरस्यो ओर दादा आनंदरावजी दुबे की कविता याद अई गई... बस बसंत्या बरसात अई गई रे। जीवी ने जस जाण जे जसंत्या, जिंदगी जई री थीपण अब हाथ अई गई रे, बस बसंत्या ब
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कवि मोहन सोनी को गीत

दादा मोहन सोनी उज्जैन में रे हे और मालवी की सेवा करे हे.देस का म्होटा म्होटा मंच पे वणा की चुटकीली कविता/गीत पसंद कर्या जाए हे.चोमासा की बेला में यो गीत आपका मन के स्पर्श करेगा.मालवी की बढोत्तरी का वास्ते यो जरूरी हे की इमें खालिस मालवी शब्द का साथ ह
Dec 29 2009 11:49 AM
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सतीश श्रोत्रिय की मालवी ग़ज़ल

वी दूध रो दूध ने पाणी सो पाणी करे हे वणाती(उनसे) अणी वाते,हगरा(सभी)मनक(मनुष्य)डरे हे गरीब लोगाँरी हालत तो घणी खराब हे वी रोज कूडो(कुँआ)खोदे,रोज पाणी पिये हे गूँगा,बेरा ने चालवाती(चलने से)मोताज झाडका(पेड़) पाणी वना(बिना)हूकी ने (सूख कर)वणा रा पाना झड़े