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08 Mar 2010
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बीबीसी मुझे माफ करना, मैं हिंदुस्तानी हूं

मेरा कसूर सिर्फ इतना था कि मैंने बीबीसी की भाषा को लेकर एक सवाल उठाया था। सवाल यह था कि दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी और इंसानियत का दुश्मन ओसामा बिन लादेन सम्मान का हकदार कैसे? अभी तक तो हमने यही सुना है कि व्यक्ति के कर्म ही उसे महान बनाते हैं। कर्म ही
 
रवीन्द्र रंजन
Mar 07 2010 08:38 AM
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'फिदा' के जाने पर ये स्यापा क्यों?

-कुंदन शशिराजमकबूल कतर जा रहे हैं। अब वहीं बसेंगे और वहीं से अपनी कूचियां चलाएंगे.. ये खबर सुनकर हिंदुस्तान में कुछ लोगों को बड़ा अफसोस हो रहा है। इस गम में वो आधे हुए जा रहे हैं कि कुछ अराजक तत्त्वों के चलते एक अच्छे कलाकार को हिंदुस्तान छोड़कर जाने के
 
रवीन्द्र रंजन
Feb 26 2010 06:19 AM
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पत्रकार के कातिल डॉक्टर पर कानून का शिकंजा

इस कहानी के दो अहम किरदार हैं। एक हाईप्रोफाइल और रसूखदार है, जो इस कहानी का खलनायक है। दूसरा पीड़ित है और एक अदना सा पत्रकार है, जो अब इस दुनिया में नहीं है। कहानी राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के एक जाने माने डॉक्टर और एक छोटे से अखबार में काम करने वाले
 
रवीन्द्र रंजन
Feb 26 2010 02:59 AM
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बीबीसी की इस पत्रकारिता को स‌लाम!

बीबीस‌ी हिंदी डॉट कॉम में प्रकाशित इस रिपोर्ट में किसी रिपोर्टर का नाम तो नहीं है, लेकिन जिसने भी इस खबर को लिखा है उसके हाथ चूम लेने को जी चाहता है। यकीन मानिए मैंने तो जबसे ओसामा बिन लादेन जैसी 'महान' शख्सियत के बारे में ये रिपोर्ट पढ़ी है और बीबीस‌ी
 
रवीन्द्र रंजन
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गधे का गुस्सा

बचपन में एक अखबार में पढ़ी थी यह बाल कविता। कविता लंबी थी और अच्छी भी। लेखक का नाम तो नहीं याद लेकिन उसकी कुछ पंक्तियां मुझे अब भी याद हैं। आपस‌े यह स‌ुंदर कविता इसलिए बांट रहा हूं कि अगर किसी को लेखक का नाम पता हो तो जरूर बताएं स‌ाथ ही पूरी कविता मि
 
रवीन्द्र रंजन
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इधर स‌े गुजरा था स‌ोचा स‌लाम करता चलूं...

चुनाव के मौसम पर गर्मी का मौसम भारी पड़ने लगा है। मतदान की तारीख तेजी स‌े नजदीक आती जा रही है, लेकिन चुनाव प्रचार उतनी गति नहीं पकड़ रहा है। वजह, मौस‌म की मार। हिम्मत जुटाकर, कार्यकर्ताओं को जोश दिलाकर उम्मीदवार मैदान में निकलते भी हैं तो जनता इतनी '
 
रवीन्द्र रंजन
Dec 29 2009 11:43 AM
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अब कौन करेगा 'कागद कारे'

खामोश हो गई एक मुखर आवाज। हमेशा के लिए खामोश हो गए प्रभाष जोशी। हिंदी पत्रकारिता का एक युग खत्म हो गया। पत्रकारिता जगत में प्रभाष जोशी के मुरीद भी हैं और आलोचक भी। पैसे लेकर चुनावी खबरें छापने वाले अखबारों के खिलाफ अगर कोई सबसे पहले बोला तो वह प्रभाष
 
रवीन्द्र रंजन
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बेनामियों के मारे ब्लॉगर बेचारे

ऐतिहासिक शहर इलाहाबाद में संपन्न हुई दो दिनी 'ब्लॉगर मीट' (कुछ लोगों को इस शब्द पर आपत्ति है) के दौरान वैसे तो बहुत कुछ उल्लेखनीय हुआ। लेकिन मेरे खयाल से इस संगोष्ठी को सबसे ज्यादा याद किया जाएगा अराजकता के लिए। अराजकता का आलम यह था कि संगोष्ठी के लि
 
रवीन्द्र रंजन
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जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना...

स‌च कहूं तो त्योहारों को लेकर मैं कोई खास उत्साहित नहीं रहता। त्योहार वाला दिन मेरे लिए आम दिनों जैसा ही होता है। घर पर टीवी देखना या इंटरनेट पर वक्त बिताना ज्यादा अच्छा लगता है। पूजा-पाठ, पटाखों का शोर और बाजार स‌े ढेर स‌ारा स‌ामान जुटाने का झंझट, प
 
रवीन्द्र रंजन
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ब्रेकिंग न्यूज की मजबूरी क्यों?

कुछ दिन पहले कई चैनलों वाले बड़े मीडिया ग्रुप के एक छोटे या फिर कहें मंझोले हिंदी चैनल के संपादक को पढ़ रहा था। वह छोटे और मध्यम श्रेणी के चैनलों की परेशानियां गिना रहे थे। उनका कहना था कि छोटे चैनलों की कई मजबूरियां हैं। बकौल संपादक, छोटे चैनल कितना
 
रवीन्द्र रंजन
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स‌नसनी बोले तो स‌न्नाटे को चीरते श्रीवर्धन

एंकर श्रीवर्धन त्रिवेदी के बगैर सनसनी के बारे में सोचना भी मुश्किल है। आज की तारीख में सनसनी और श्रीवर्धन एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं। कल्पना कीजिए किसी दिन स्टार न्यूज पर सनसनी हो, लेकिन एंकर के तौर पर सेट पर श्रीवर्धन न हों तो क्या होगा? जाहिर है सब
 
रवीन्द्र रंजन
Sep 19 2009 12:10 PM
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हिंदी ब्लॉग जगत के चोरों से सावधान

इंटरनेट पर कुछ सर्च कर रहा था तभी अचानक कुछ ऐसा मिला जिसे देखकर अचरज में पड़ गया। निगाह वहीं पर अटक गई। पहली बार तो यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है। मुझे याद है कि ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर में एक ब्लॉगर ने मुझ पर किसी दूसरे का आयडिया चुराने का आरोप
 
रवीन्द्र रंजन
Aug 14 2009 10:06 AM
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द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम-10

सर्कस में लंगूरों की भी अच्छी तादाद है। लंगूर अकेले नहीं रहते। टोलियों में रहते हैं। टोलियों में खेल दिखाते हैं। जंगल की तरह ही सर्कस में भी लंगूरों ने अपना-अपना इलाका बांट रखा है। एक लंगूर दूसरे के इलाके में दखल नहीं देता। अगर कोई ऐसा करने की हिमाकत
 
रवीन्द्र रंजन
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ताकतवर होते बेजान पत्ते

स‌ूखे बेजान पत्ते उड़ रहे हैं हवा के स‌ाथ पत्तों को इधर स‌े उधर ले जाकर बेरहमी से पटक देती है हवा पत्ते असहाय हैं ताकतवर हवा के स‌ामने हवा के बाद आ गई बारिश बारिश में भीगकर कृशकाय हो गए हैं सूखे बेजान पत्तों के झुंड पैरों स‌े कुचले जाने पर भी अब वो क
 
रवीन्द्र रंजन
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मार्केटिंग का हिंदी फंडा

एक लड़के को सेल्समेन के इंटरव्यू में इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि उसे अंग्रेजी नहीं आती थी। लड़के को अपने आप पर पूरा भरोसा था। उसने मैनेजर से कहा कि आपको अंग्रेजी से क्या मतलब ? अगर मैं अंग्रेजी वालों से ज्यादा बिक्री न करके दिखा दूं तो मुझे तनख्वाह
 
रवीन्द्र रंजन
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इंटनरेट से ऐसे करें कमाई

इंटरनेट पर आमतौर पर आजकल लोग कुछ घंटे तो बिताते ही हैं। ब्लागिंग से जुड़े लोग नियमित तौर पर इसका इस्तेमाल करते हैं। ब्लागिंग भले ही मुफ्त हो, लेकिन इंटरनेट सर्विस मुफ्त में नहीं मिलती। इसके लिए हर महीने पैसा अदा करना पड़ता है। ब्लागिंग करने वाले लोग
 
रवीन्द्र रंजन
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द ग्रेट स‌र्कस आफ न्यूजरूम-9

स‌र्कस में हाथी, गैंडे और बैल भी हैं। हाथियों की तादाद जरा ज्यादा है। इनमें भी ज्यादातर स‌फेद हाथी है। जितना बड़ा स‌र्कस उतने ज्यादा स‌फेद हाथी। स‌र्कस के इन कलाकारों ने खुद को इतना ज्यादा मांजा है कि काले स‌े स‌फेद हो गए हैं। लंबा वक्त लगा है। इस प्
 
रवीन्द्र रंजन
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...तो फिर कौन है असली पप्पू?

प्रशांत अगर आप भारत के नागरिक हैं और लोकसभा चुनावों में वोट डालने नहीं जाते हैं, तो आप पप्पू हैं, ये हम नहीं कह रहे चुनाव आयोग की ओर से जारी सारे विज्ञापनों में यही बताने की कोशिश की गई है... लेकिन आप अगर पोलिंग बूथ पर जाएं, आपके पास मतदाता पहचान पत्
 
रवीन्द्र रंजन
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आशियाना

कुछ दिन पहले मुझे एक ईमेल प्राप्त हुआ। यह ईमेल मेरे एक अजीज दोस्त ने भेजा था। फारवर्डेड मेल था लिहाजा यह नहीं पता चल पाया कि इसका जनक कौन है। लेकिन यह जरूर बताना चाहूंगा कि जिस दोस्त ने मुझे यह मेल भेजा वह मराठी है। मेल अंग्रेजी में था। मेरा ब्लॉग हि
 
रवीन्द्र रंजन
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तुम्हारा नाम क्या है? (2)

नेहा और प्रिया दो साल से एक गर्ल्स हास्टल में साथ-साथ रह रही थीं। पहले प्रिया दूसरी जगह नौकरी करती थी। लेकिन आठ महीने पहले उसे भी नेहा के आफिस में नौकरी मिल गई। उस पब्लिकेशन हाउस में प्रिया के आने से नेहा को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई। अब दोनों ही
 
रवीन्द्र रंजन
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द ग्रेट स‌र्कस आफ न्यूजरूम-8

लोमड़ी बेहद चालाक है। सर्कस की पुरानी कलाकार है। नए-नए शो करती रहती है। शो आते हैं। फ्लाप होते हैं। बंद हो जाते हैं। लोमड़ी हार नहीं मानती। डटी रहती है। भिड़ी रहती है। हिट होने की कोशिश में जुटी रहती है। नए-नए शो के जरिए। हर नए शो में नई-नई स्टाइल मा
 
रवीन्द्र रंजन
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द ग्रेट स‌र्कस आफ न्यूजरूम-7

स‌र्कस का स‌ियार बहुत फैशनेबल है। रंगा स‌ियार है। बूढ़ा हो चुका है। जवान दिखने की हसरत है। यह हसरत हर वक्त उसके दिल में हिलोरें मारती रहती है। कई बार तो छलक कर बाहर तक आ जाती है। पूरे रिंग पर बिखर जाती है। हसरतें उससे बहुत कुछ कराती हैं। रंगा स‌ियार
 
रवीन्द्र रंजन
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द ग्रेट स‌र्कस आफ न्यूजरूम-6

स‌र्कस में कलाकारों का आना-जाना लगा रहता है। पुराने जाते हैं। नए आते हैं। नए जाते हैं। पुराने आते हैं। कुछ धूनी रमाकर एक ही स‌र्कस में जम जाते हैं। गोया वहीं स‌े रिटायर होंगे। वहीं स‌े जनाजा उठेगा। वैसे आजकल स‌र्कस के स्मार्ट कलाकार एक को छोड़कर दूसर
 
रवीन्द्र रंजन
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स्टोव! मेरे स‌वालों का जवाब दो

स्टोव तुम स‌सुराल में ही क्यों फटा करते हो? मायके में क्यों नहीं ? स्टोव तुम्हारी शिकार बहुएं ही क्यों होती हैं? बेटियां क्यों नहीं ? स्टोव तुम इतना भेदभाव क्यों करते हो ? स‌मझते क्यों नहीं ? स्टोव कहां स‌े पाई है तुमने ये फितरत ? बताते क्यों नहीं ?
 
रवीन्द्र रंजन
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द ग्रेट स‌र्कस आफ न्यूजरूम-5

स‌र्कस में 'पूछ' का बड़ा महत्व है। पूछ जितनी 'लंबी' होती है कलाकार का रुतबा भी उसी हिसाब स‌े बढ़ जाता है। चीफ रिंग मास्टर के बाद स‌र्कस में स‌बसे ज्यादा पूछ होती है 'स‌ूत्रधार' की। तीसरे नंबर पर आते हैं कबूतर। कबूतरों औऱ स‌ूत्रधारों की कला को चीफ रि
 
रवीन्द्र रंजन
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द ग्रेट स‌र्कस आफ न्यूजरूम-4

स‌र्कस के इस खेल में कभी-कभी चीफ रिंग मास्टर को भी अपना हुनर दिखाने का शौक चढ़ता है। तब वह चीफ रिंग मास्टर नहीं रहता। कलाकार बन जाता है। चीफ को अपनी कला दिखाने में कोई परेशानी ना आए इसलिए स‌ारे छोटे-मोटे कलाकार स‌े लेकर जूनियर-सीनियर रिंग मास्टर तक ए
 
रवीन्द्र रंजन
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द ग्रेट स‌र्कस आफ न्यूजरूम-3

इस स‌र्कस में चूहों की तादाद स‌बसे ज्यादा है। बिल्लियों और लोमड़ियों की तादाद भी ठीक-ठाक है। लेकिन चूहों का कोई जवाब नहीं। तरह-तरह की कलाओं के साथ-साथ चूहों को चमचागिरी में भी महारत हासिल है। लोमड़ियों और बिल्लियों को थोड़ा अलग तरह का हुनर दिखाना पड़
 
रवीन्द्र रंजन
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द ग्रेट स‌र्कस आफ न्यूजरूम-2

यह नए जमाने का स‌र्कस है। फटे-पुराने और पैबंद लगाए गये टेंट में नहीं चलता। मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में चलता है। बिल्डिंग भी बहुत शानदार है। जितनी खूबसूरत बाहर स‌े है उससे भी ज्यादा चमकदार अंदर स‌े है। रात भर रोशनी स‌े जगमगाती रहती है इस स‌र्कस की बिल्ड
 
रवीन्द्र रंजन
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द ग्रेट स‌र्कस आफ न्यूजरूम

आज कमेंटरी का मूड है। मैं कमेटरी करूंगा एक स‌र्कस की। यह एक ऎसा स‌र्कस है जिसका शो रोज होता है। 24 घंटे चलता है यह स‌र्कस। यहां भी एक रिंग है। रिंग के अंदर कई कलाकार हैं। चीफ रिंग मास्टर भी है। चीफ रिंग मास्टर अच्छा आदमी है। लेकिन कभी-कभी उस‌े भी गुस
 
रवीन्द्र रंजन
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कुत्ता कहीं का...

कब का आ चुका है। दो महीने गुजर भी चुके हैं। अचानक याद आया कि इस स‌ाल अभी तक हमने कुछ लिखा ही नहीं। स‌ोच रहा हूं कहीं लिक्खाड़ लोग मुझे बिरादरी स‌े बाहर न कर दें। इसीलिए कुछ तो लिख ही डालता हूं। नए स‌ाल के दो महीने गुजर चुके हैं। स‌ब ठीक ही चल रहा है।
 
रवीन्द्र रंजन