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यूनुस खान का हिंदी ब्‍लॉग : रेडियो वाणी

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06 Jun 2010
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'उड़ जायेगा हंस अकेला' :कुमार गंधर्व। अफ़सोस उनकी फ़रमाईश पूरी न हो सकी और वो चली गयीं।

विविध-भारती और रेडियोवाणी दोनों ही प्‍लेटफार्म ऐसे हैं जहां गाने सुनने सुनाने का सिलसिला चलता रहता है। अब तो इसमें फेसबुक भी शामिल हो गया है। ज़ाहिर है कि सोशल-नेटवर्किंग के ज़रिए 'अपनी तरह' के लोग आपको अपने आप ही मिलते रहते हैं।  मुझे ख़ुशी है कि
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मंज़ूर सेठ, सुरैया, नूरजहां और वो पुरानी हवेली।।

  रेडियोवाणी पर अमूमन हम एक गाना सुनवाते हैं और बातें उससे जुड़ी होती हैं। ये पोस्‍ट हमारे रोज़मर्रा के सांचे से अलग है। यहां बीते वक्‍त का एक मार्मिक किस्‍सा है, जिसमें समाए हैं कुछ गाने। सोचा ये था कि बिना गानों वाली पोस्‍ट होगी पर आखिर में हम एक
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'रेडियोवाणी' के तीन साल पूरे हुए.

तीन साल......ब्‍लॉगिंग के तीन साल पूरे हुए आज। 'ब्लॉगिंग' किसी 'ऐजेन्‍डे' या किसी 'नारे' के तहत शुरू नहीं की थी। ये समझ लीजिए कि अपना निजी स्‍वार्थ था..संगीत की दुनिया में कुछ और गहरा ग़ोता लगाने का। और इन तीन सालों में ये ग़ोता सचमुच गहरा होता चला गया
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पंचम और होमी मुल्‍लां दो अद्भुत कलाकार । castenets और resso resso दो अद्भुत वाद्य ।

रेडियोवाणी पर पिछली पहेली क्‍या पूछी, यूं लगा कि हमारे सुधि-पाठकों की बत्‍ती गुल हो गई है । इस बार तो सूरत के भाई पियूष मेहता भी कन्‍फ्यूज़ से हो गए लगते हैं । दअरसल बत्‍ती तो हमारी भी गुल हो गई थी जब हमसे ये पहेली पूछी गई थी । हमारे मित्र डाक-साब की इस
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संगीत की तरंगित बातें और एक instrumental पहेली-2

फिल्‍म-संगीत का संसार सचमुच बड़ा ही निराला है । इस सागर में जितना गहरा ग़ोता लगाएं उतने ही अनमोल मोती सामने आते हैं । आप किसी भी गाने को कई स्‍तरों पर सुनते हैं । गाना अपने बोलों ज़रिए आपके जज्‍़बात जगा देता है । गाने वाले की आवाज़ दिल पर गहरा असर करती
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सलिल दा की याद, सबिता चौधरी की आवाज़, चांद कभी था राहों में

    सबिता जी की याद आ गयी । उन्‍हें सबिता बैनर्जी कहा जाए या सबिता चौधरी । या फिर ये कहा जाए कि वो जाने-माने और हमारे प्रिय संगीतकार सलिल चौधरी की पत्‍नी हैं । लेकिन इस सबसे ऊपर उनकी एक और पहचान है । सबिता बैनर्जी एक बहुत मीठी आवाज़ हैं । लेकिन
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ये रातें ये मौसम ये हंसना हंसाना: पंकज मलिक की सोंधी आवाज़

बरसों पहले की बात है । लता मंगेशकर का अलबम श्रद्धांजली जारी हुआ था । शायद 1992 में । वो कैसेटों का दौर था । हमने फ़ौरन ही अपना जेब-ख़र्च इस कैसेट के हवाले कर दिया था । और उसके बाद बरसों-बरस तक लता जी की आवाज़ में ये नग़्मे गूंजते रहे थे हमारे स्‍टीरियो
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'लो अपना जहां दुनिया वालो' आसासिंह मस्‍ताना की विकल याद

पिछली पोस्‍ट में दूरदर्शन के सुहाने दिनों से निकालकर 'सरब सांझी गुरबानी' का सबद 'कोई बोले राम राम' क्‍या सुनाया यादों का पिटारा ही खुल गया है । हल्‍की-सी याद बाक़ी है दूरदर्शन के दिल्‍ली केंद्र से आसासिंह मस्‍ताना को सुनने-देखने की । आसासिंह मस्‍ताना
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कोई बोले राम-राम कोई ख़ुदाय- दूरदर्शन के सुहाने दिनों का वो शबद

                                  ब्‍लैक एंड व्‍हाईट वाले दूरदर्शनी दौर की यादें ताज़ा हैं ज़ेहन में अब तक । इतने दिन गुज़र गए लेकिन टी.वी. देखने का वो रोमांच दोबारा
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मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम' : गुलज़ार, भूपिंदर और 'चांद परोसा है'

कल यानी चार जनवरी को 'पंचम' की याद का दिन होता है । पंचम : आर.डी.बर्मन । 'पंचम' को गए सोलह बरस हो गए पर सोलह पल भी ऐसा नहीं लगा कि वो हमसे दूर हैं । दरअसल  इस दौरान रोज़ाना पंचम के गाने कैसेट्स, कंपेक्‍ट डिस्‍क, आइ पॉड्स और एफ.एम.स्‍टेशनों पर लगातार
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हरियाणा की लोकरंग में रंगा--'तू राजा की राजदुलारी मैं सिर्फ़ लंगोटे वाला सूं' : मास्‍टर राजबीर की आवाज़

रेडियोवाणी' पर 'नीरज' का जिक्र बार-बार होता रहा है । लेकिन आज एक फिल्‍मी-गीत के बहाने हो रहा है । मज़े की बात ये है कि ये गीत नीरज जी ने नहीं लिखा है ।  तकरीबन एक साल हुआ हमने दिबाकर बैनर्जी की फिल्‍म 'ओए लकी ओए' देखी थी कांदीवली के एक थियेटर मे
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ख़ुश रहो अहल-ए-वतन हम तो सफ़र करते हैं--रामप्रसाद बिस्मिल की रचना, भूपिंदर सिंह की आवाज़ ।

भूपिंदर सिंह हमारे प्रिय गायकों में से एक हैं । और 'रेडियोवाणी' पर भूपी जी पर केंद्रित एक पूरी श्रृंखला भी हो चुकी है । अगस्‍त की ही तो बात है, हमारे मित्र 'डाकसाब' ने हमसे एक गाने की फ़रमाईश की । सन 1977 में आई फिल्‍म 'आंदोलन' का गीत--'दरो-दीवार पर
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सभी सुख दूर से गुज़रें : आरंभ फिल्‍म का गीत । मुकेश की आवाज़ । हरीश भादानी को विनम्र श्रद्धांजली

रेडियोवाणी पर मन्‍ना दा के बारे में अपनी नई पोस्‍ट की तैयारी कर ही रहा था कि तभी जयपुर से भाई प्रेमचंद गांधी का मेल आया । हरीश भादानी नहीं रहे ।  हरीश जी को मैं ज्‍यादा नहीं जानता । उनकी कुछ रचनाएं ज़रूर पढ़ी हैं । प्रेम भाई ने उनके फिल्‍म 'आरंभ
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नथली से टूटा मोती रे : मन्‍ना डे का ग़ैर-फि़ल्‍मी गीत ।।

ये शायद 1986 से 1988 के बीच के किसी साल की बात है । दूरदर्शन के दोपहर के प्रसारण में black and white era के कुछ नायाब गाने दिखाए जाते थे । इसमें कुछ ऐसे गाने हुआ करते थे जो ना हमने कभी देखे थे और ना सुने थे । ऐसे गानों में शामिल थे --मन्‍ना डे का गाय
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घिरी घटाएं आसमान पर : लता मंगेशकर का ग़ैर-फिल्‍मी गीत । जन्‍मदिन पर विशेष ।

     लता मंगेशकर की आवाज़ तमाम विशेषणों से ऊपर है । उनके जन्‍मदिन पर 'रेडियोवाणी' के ज़रिए हम आपके लिए उनकी एक ग़ैर-फिल्‍मी रचना लेकर आए हैं । अपने ग़ैर-फिल्‍मी गीतों में लता मंगेशकर का स्‍वर एकदम अलग ही रहा है । हालांकि उनके
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आईये सुनें शंकर-जयकिशन के नायाब instrumental अलबम raga jazz style से राग तोड़ी

रेडियोवाणी के नियमित पाठक अब तक जान गए होंगे कि हम वाद्य-संगीत यानी instrumental music और वाद्यों दोनों के ही ख़ासे शैदाई हैं । अपने चिट्ठों पर पहले भी अधूरी-‍तमन्‍नाओं का जिक्र कर चुके हैं जिनमें से एक है गिटार सीखना । इस तमन्‍ना को पूरा करने के लिए हम
Sep 24 2009 11:46 AM
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आईये सुनें 'चल उड़ जा रे पंछी'- रफ़ी नहीं तलत की आवाज़ में

गानों की खोजबीन का सिलसिला ऐसा है कि ये अकसर आपको हैरत में डाल देता है । आज हम आपको जो गाना सुनवाने जा रहे हैं वो तकरीबन तीन-चार महीने पहले ही 'इंटरनेटी-यायावरी' में हमारे सामने अचानक आ गया था और हम 'ठिठक' गए थे । हुआ यूं कि एक दिन रेडियो पर हम फ़रमाईशों
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Sep 23 2009 08:36 PM
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धार धार बरसे- छाया गांगुली फिल्‍म थोड़ा-सा रूमानी हो जाएं

अनेक कारणों से 'थोड़ा सा रूमानी हो जाएं'  हमारी पसंदीदा फिल्‍म रही है । इस समय हम पुरानी पोस्‍टों की लिस्‍ट में घुसकर पुराना संदर्भ निकालने के 'मूड' में नहीं हैं । पर मुमकिन है  कि 'रेडियोवाणी' पर इसके कुछ गीत मौजूद हों । बल्कि हमें पूरा यक़ीन
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कब याद में तेरा साथ नहीं : संगीतकार ख़ैयाम की गाई एकमात्र ग़ज़ल

रेडियोवाणी पर जगजीत कौर का जिक्र पहले भी हुआ है, ये अलग बात है कि 'लाइफ-लॉगर' की कृपा से उस पोस्‍ट पर अब गाना नहीं बजता । जल्‍दी ही हम उस पोस्‍ट के गाने को पुन: सक्रिय कर देंगे । जगजीत कौर ने ज्‍यादा गाने नहीं गाए हैं, लेकिन इतने-कम गानों के बावजूद उनके
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लुग़दी और भोंपू देशभक्ति गीतों के बीच तलाश एक ईमानदार तराने की ।

कुछ चीज़ों से हमें खास तरह की एलर्जी है । जैसे कि ज़रूरत से ज्‍यादा 'मेलोड्रामा' से । चाहे वो जीवन में हो या फिर छोटे-बड़े परदे पर । चूंकि पंद्रह अगस्‍त के दिन देशभक्ति की 'खु़राक' ज़ोरों पर होती है तो आपको बता दें कि यहां भी हमें एक चीज़ से ख़ासी
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संगीत की तरंगित बातें और एक instrumental पहेली

एक बार विविध-भारती पर संगीतकार ख़ैयाम ने कहा था कि संगीत एक इबादत है जिसे लोग भूलते जा रहे हैं । अब आप बताईये कि सही कहा था या ग़लत । आज की इस पोस्‍ट का ख़ैयाम साहब की इस बात से कोई ख़ास लेना-देना नहीं है । आज तो हम अपने मन की 'तरंग' में हैं । लेकिन
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अधरं मधुरं वदनं मधुरं: मधुराष्‍टकम: पंडित जसराज की आवाज़ में

संगीत खोजने की यायावरी में बड़ा आनंद है । इंटरनेट पर खोजें या स्‍वयं घुमक्‍कड़ी करके । अकसर ही ये होता है कि आप खोजने कुछ चलते हैं और हाथ कुछ और लग जाता है । ज़ाहिर है कि जो खोजने चले थे वो धरा-का-धरा रह जाता है और आप इस नये 'हासिल' की ख़ुशी में फूले
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बारो घी के दीयना : नायाब क़व्‍वाली, जाफ़र हुसैन ख़ां बदायूंनी की आवाज़

रेडियोवाणी पर कल्‍ट-क़व्‍वालियों की श्रृंखला अपने अनियमित तरीक़े से जारी है । इसी सिलसिले में आज हम एक ऐसी क़व्‍वाली लेकर आए हैं जिसे हज़रत पैग़ंबर मोहम्‍मद के जन्‍मदिन के मौक़े पर ख़ासतौर पर गाया जाता है । इसके बारे में सबसे पहले मुझे भाई अनामदास ने
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सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते : अहमद फ़राज़ की याद में

आज नामचीन शायर अहमद फ़राज़ की याद का दिन है । पिछले बरस आज ही के दिन फ़राज़ इस दुनिया से रूख़सत हुए थे । फ़राज़ एक बिंदास शायर थे । सारी दुनिया में उनके चाहने वालों का कारवां फैला है । कविता-कोश पर आप फ़राज़ के अशआर यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं  ।
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ज़रा-सी बात पे हर रस्‍म तोड़ आया हूं : मुकेश की याद में जां निसार अख्‍़तर की ग़ज़ल

आज पार्श्‍वगायक मुकेश की पुण्‍यतिथि है । रेडियोवाणी पर हम मुकेश को पहले भी याद करते रहे हैं । आपको याद होगा मुकेश की आवाज़ में रामचरित मानस गान के अंश और बजरंग बाण भी रेडियोवाणी के ख़ज़ाने में मौजूद है । हम सोच रहे थे कि मुकेश को याद करने का कौन सा
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Sep 10 2009 07:56 PM
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अठन्‍नी-सी ये जिंदगी : फिर रविवार-फिर गुलज़ार

    कुछ गाने कैसे अनायास याद दिला दिए जाते हैं । 'फेसबुक' पर पवन झा ने आज लिखकर टांग दिया 'कभी चांद की तरह टपकी, कभी राह में पड़ी पाई, अठन्‍नी-सी ये जिंदगी' । और ये गाना अचानक हमारे ज़ेहन में ताज़ा हो गया । जहां तक याद आता है, मुंबई में हमारे
Aug 09 2009 03:12 PM
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तुम्‍हें याद होगा कभी हम मिले थे : फिल्‍म सट्टा बाज़ार : श्रद्धांजलि गुलशन बावरा

    रेडियोवाणी पर गुलशन बावरा का जिक्र पहली बार नहीं हो रहा है । हम उनके पक्‍के शैदाईयों में से रहे हैं । चाहे पंचम के तूफानी युवा गीत हों या फिर पुराने ज़माने वाले मेलोडीयस गाने.....गुलशन की कलम ने हमें गुनगुनाने के कई बहाने दिए । दिलचस्‍प बात
टैग: gulshan bawra
Aug 08 2009 09:49 AM
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प्‍यासी हिरणी बन बन धाए : लता, कैफ़ी, हेमंत ।

रेडियोवाणी पर अपनी पिछली पोस्‍ट में हमने आपको बताया था कि संगीत के हमारे शौक़ ने कैसे हमें फंसा दिया था । लेकिन दिलचस्‍प बात ये है कि इस उलझन, इस पहेली को हल करने के लिए कुछ संगीत-प्रेमियों ने हाथ बढ़ाया । हालांकि कोशिश तो सब ने की । पर कामयाबी कुछ लोगों
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Aug 07 2009 10:09 AM
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संगीत के शौक़ ने फंसा दिया, आप भी फंसिए और इन धुनों को पहचानिए

हमारा बचपन भी वैसा ही गुज़रा है जैसा छोटे शहर के किसी आम मध्‍यवर्गीय परिवार के लड़कों का बीतता है । गाडियों के एक्‍सल से निकले मेटल के पहिये को तार से बने 'ड्राइवर' से चलाते हुए दौडते थे और लगता था कि धरती के उस पार तक चले जायेंगे । धूप में 'पिट्ठू'
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'ओ हंसिनी' 'गोरी ओ गोरी' और 'फटाफट'--बमचिक किशोर दा की जै हो

किशोर कुमार के अनगिनत किस्‍से सुने हैं उनके परिवार वालों और मित्रों से । कई बरस पहले 'यूनियन पार्क' चेम्‍बूर में दाद‍ामुनि अशोक कुमार से मिलने का मौक़ा मिला था । लगभग एक पूरा दिन उनके साथ बिताया । जो किस्‍से दादामुनि ने सुनाए उनमें किशोर दा के भी किस्‍से
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रफ़ी साहब का एक अनमोल प्राइवेट गीत- मैंने सोचा था अगर मौत से पहले-पहले

मैं 'रेडियोवाणी' पर हमेशा कहता हूं कि महान कलाकारों की याद के लिए हम तारीख़ों के मोहताज नहीं होते । उनकी याद तो किसी भी वक्‍त और किसी भी बहाने से आ सकती है । पिछले तकरीबन एक महीने से रफ़ी साहब के गाने सुनने का मन करता रहा है और मैंने कुछ ऐसे गीत ख़ासतौर
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यूं तेरी रहगुज़र से दीवानावार गुज़रे : मीनाकुमारी के अशआर उन्‍हीं की आवाज़ में ।

मैंने अभी कुछ दिन पहले की अपनी पोस्‍ट में कहा था कि गीता रॉय की याद कभी भी आ सकती है, वही वाक्‍य मीना आपा के लिए दोहराना चाहता हूं । मीना कुमारी की याद कभी भी आ सकती है । उनके लिए हम तारीख़ों के मोहताज नहीं । ख़ूबसूरत लोग अपने साथ अपनी पीड़ा लेकर भी आते
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यार जुलाहे : गुलज़ार की नज़्म के दो रूप ।

'रेडियोवाणी' पर मैंने पहले भी गुलज़ार, विशाल भारद्वाज और सुरेश वाडकर के अलबम 'बूढ़े पहाड़ों पर' की चर्चा की थी । लेकिन तब 'सुनवाने' की उन तकनीकों का ज्ञान नहीं था, जिनका प्रयोग अब 'रेडियोवाणी' पर अब किया जाता है । बहरहाल पिछले कुछ दिनों से भूपिंदर-मिताली
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Jul 27 2009 08:03 AM
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गीता रॉय का गीत : ठहरो ज़रा सी देर तो । फिल्म सवेरा ।

गीता रॉय की विकल याद कभी भी आ सकती है । इसके लिए हमें तारीख़ों का मोहताज होने की ज़रूरत नहीं है । गीता रॉय फिल्‍म-संसार की बेहद  'ट्रैजिक-जीवन'  वाली एक शख्सियत रही हैं । उनके जीवन का संत्रास बहुत विकट था । अफ़सोस कि वो ज्‍यादा नहीं जी पाईं
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'जिहाले-मिस्किन मकुन तग़ाफुल' इस बार फ़रीद-अयाज़ क़व्‍वाल की आवाज़ में ।

पिछले हफ्ते 'रेडियोवाणी' में हमने हज़रत अमीर ख़ुसरो की रचना 'ज़ि‍हाले मिस्‍कीन मकुन तग़ाफुल' छाया गांगुली की आवाज़ में सुनवाई थी । और आपको ये भी बताया था कि हमारी इच्‍छा है इस रचना को अलग-अलग कलाकारों की आवाज़ों में सुनवाया जाए । रेडियोवाणी पर फ़रीद-
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जिहाले मिस्किन मकुन बरंजिश- छाया गांगुली की आवाज़

पिछले दिनों मैंने अपनी फेसबु‍क प्रोफाइल पर 'थोड़ा-सा रूमानी हो जाएं' फिल्‍म के गाने लगाए थे और तब छाया जी की याद आ गयी थी । छाया जी यानी छाया गांगुली जिन्‍हें 'गमन' फिल्‍म के गी‍त 'रात भर आपकी याद आती रही' के लिए संभवत: सन 1980 में सर्वश्रेष्‍ठ गायिक
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वो जो हममें तुममें क़रार था-बारिश के दिन, मोमिन की ग़ज़ल, गुलाम अली की तान

बंबई में बारिश का मतलब होता है pot-holes, ट्रैफिक-जाम, लोकल-ट्रेनों और बेस्‍ट की बसों में देरी और परेशानियां । लगभग सारे देश में यही हाल होता है बारिश के बाद । रेन-कोट और छातों से रिसता....आत्‍मा तक धंसता पानी । गीले कपड़ों को छूती ठंडी हवा ठिठुरते ब
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पिता: कुछ कहना है मुझे आपसे ।।

कई बार हम अपने बेहद आत्‍मीय संबंधों में अपने प्‍यार का इज़हार नहीं करते । हम अपनी 'मां' ने ये नहीं कहते कि हम उन्‍हें कितना प्‍यार करते हैं । 'पिता' से नहीं कहते कि जीवन में उनकी उपस्थिति एक सूर्य की तरह है । 'बहन' से नहीं कहते कि भले ही फ़ोन पर बाते
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कोई दिल में समाया चुपके चुपके चुपके: तन्‍हाईयों की आवाज़ सुरैया

उनकी आवाज़ तन्‍हाईयों की आवाज़ है । उनकी आवाज़ बेक़रार और नाकाम मुहब्‍बत की आवाज़ है । सुरैया को याद करने का कोई ख़ास दिन नहीं होता । उनकी याद तो संगीत के क़द्रदानों को बरबस आ ही जाती है । सुरैया उस दौर में फिल्‍मों में आईं जब सिनेमा अपने शुरूआती दौर
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एक जंगल है तेरी आंखों में: दुष्‍यंत कुमार की ग़ज़ल-मीनू पुरूषोत्‍तम की आवाज़ ।

पिछले दिनों मनीष ने अपने ब्‍लॉग पर 'दुष्‍यंत कुमार' की याद दिला दी । दी । और वो स्‍कूल-कॉलेजिया दिन याद आ गये जब मध्‍यप्रदेश के छोटे-से शहर सागर के दो पुस्‍तक भंडारों से दुष्‍यंत की 'साये में धूप' अकसर ख़रीदी जाती थी । होता ये था कि जो भी मित्र देखता