अनहद नाद's Image

अनहद नाद

http://anahadnaad.wordpress.com
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
14 May 2010
कुल प्रविष्टियां
44
पाठक भेजे
14925
पसंद
387
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
339.20
पसंद करें
2
नापसंद करें

विमलेश त्रिपाठी की दो कविताएं

युवा कवि विमलेश त्रिपाठी की दो कविताएं : अर्थ विस्तार जब हम प्यार कर रहे होते हैं तो ऐसा नहीं कि दुनिया बदल जाती है बस यही कि हमें जन्म देने वाली मां के चेहरे की हंसी बदल जाती है हमारे जन्म से ही पिता के मन में दुबका रहा सपना बदल जाता है और [...]
पसंद करें
2
नापसंद करें

प्रो. योगेश अटल की एक कविता

एक कविता : १९ फरवरी २०१० चुभा कर कृतघ्नता की कटार मेरे वक्ष में वे सब चले गए हैं अपने-अपने कक्ष में मैं उनकी अनुकम्पाओं का अहसानमंद हूं चुपचाप घावों को सहलाता कोठरी में बन्द हूं उन्हें जो कुछ लेना था मुझसे, ले गए उन्हें जो कुछ देना था मुझको, दे गए । ****
पसंद करें
0
नापसंद करें

गोरख पांडे की कविता और अमिताभ बच्चन का अनुवाद

समझदारों का गीत हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं हम समझते हैं ख़ून का मतलब पैसे की कीमत हम समझते हैं क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं हम इतना समझते हैं कि समझने से डरते हैं और चुप रहते
Feb 25 2010 04:37 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

दो प्रेम कविताएं

केदारनाथ अग्रवाल की एक कविता जमुन जल तुम रेत मैं हूं — जमुन जल तुम ! मुझे तुमने हृदय तल से ढंक लिया है और अपना कर लिया है अब मुझे क्या रात — क्या दिन क्या प्रलय — क्या पुनर्जीवन ! रेत मैं हूं — जमुन जल तुम ! मुझे तुमने सरस रस से
Feb 14 2010 10:16 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

बतूता का जूता

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता बतूता का जूता इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में थोड़ी हवा नाक में घुस गई घुस गई थोड़ी कान में कभी नाक को, कभी कान को मलते इब्नबतूता इसी बीच में निकल पड़ा उनके पैरों का जूता उड़ते उड़ते जूता उनका जा पहुँचा जापान
Feb 13 2010 04:43 PM
पसंद करें
1
नापसंद करें

रिश्ता

अनामिका की एक कविता रिश्ता वह बिलकुल अनजान थी ! मेरा उससे रिश्ता बस इतना था कि हम एक पंसारी के ग्राहक थे नए मुहल्ले में । वह मेरे पहले से बैठी थी टॉफ़ी के मर्तबान से टिककर स्टूल के राजसिंहासन पर । मुझसे भी ज्यादा थकी दीखती थी वह फिर भी वह हँसी ! उस हँसी
पसंद करें
7
नापसंद करें

तू अपना इतिहास कहेगा ?

भवानी भाई की एक कविता तू अपना इतिहास कहेगा ? उदय-अस्त में सुख की दुःख की कभी कमल ने बात नहीं की कभी पतिंगे ने रो-रोकर पूरी अपनी रात नहीं की कभी सूर्य के आ जाने पर तारों ने क्या आंसू ढाले वज्राहत होकर क्या बादल ने सुख की बरसात नहीं की फिर ऐसा क्यों हु
पसंद करें
0
नापसंद करें

हिंदी में नहीं रहा ……

सुंदर चंद ठाकुर की एक कविता हिंदी में हिंदी में नहीं रहा शब्द से रोटी मांगने का रिवाज शब्द यहां भूख है दीवानगी है कैद भी और निर्वाण भी शब्द हाशिए पर लड़ाई है जो लड़ी जाती है अंतहीन युद्ध की तरह और याद रहे आपकी शहादत पर न आंसू बहाए जाते हैं न तालियां बज
Dec 03 2009 01:17 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

प्रियंकर की एक कविता

महास्वप्न   कुछ सुना तुमने प्यार की हवाओं ने अब रुख बदल लिया है स्नेह की नदी अब अपने चतुष्कोणीय प्रवाह के साथ हमारी ओर मुड़ चली है खेतों में प्यार की फसल लहलहा रही है कुछ सुना तुमने जमीन की तासीर बदल गई है अब कुछ भी बोओ फसल प्यार की ही उगेगी स्न
Dec 03 2009 01:17 AM
पसंद करें
2
नापसंद करें

विचार आते हैं !

मुक्तिबोध की एक छोटी कविता विचार आते हैं विचार आते हैं – लिखते समय नहीं लिखते समय नहीं बोझा ढोते वक्त पीठ पर सिर पर उठाते समय भार परिश्रम करते समय चाँद उगता है व पानी में झलमलाने लगता है हृदय के पानी में विचार आते हैं लिखते समय नहीं … पत्
पसंद करें
5
नापसंद करें

तार सप्तक में मुक्तिबोध का वक्तव्य

मालवे के विस्तीर्ण मनोहर मैदानों में से घूमती हुई क्षिप्रा की रक्त-भव्य साँझें और विविध-रूप वृक्षों को छायाएँ मेरे किशोर कवि की आद्य सौन्दर्य-प्रेरणाएँ थीं। उज्जैन नगर के बाहर का यह विस्तीर्ण निसर्गलोक उस व्यक्ति के लिए, जिसकी मनोरचना में रंगीन आवेग
पसंद करें
5
नापसंद करें

दूर तारा / गजानन माधव मुक्तिबोध

दूर तारा तीव्र – गति अति दूर तारा वह हमारा शून्य के विस्तार नीले चला है ! और नीचे लोग उस को देखते हैं, नापते हैं गति, उदय औ’ अस्त का इतिहास ! किंतु इतनी दीर्घ दूरी शून्य के उस कुछ-न-होने से बना जो नील का आकाश वह एक उत्तर दूरबीनों की सतत आलोचनाओं को न
पसंद करें
5
नापसंद करें

दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांगउटांग / गजानन माधव मुक्तिबोध

दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांगउटांग स्वप्न के भीतर स्वप्न, विचारधारा के भीतर और एक अन्य सघन विचारधारा प्रच्छन!! कथ्य के भीतर एक अनुरोधी विरुद्ध विपरीत, नेपथ्य संगीत!! मस्तिष्क के भीतर एक मस्तिष्क उसके भी अन्दर एक और कक्ष कक्ष के भीतर एक गुप्त प्रकोष्ठ औ
पसंद करें
5
नापसंद करें

अंधेरे में / गजानन माधव मुक्तिबोध

ब्रह्मराक्षस’ और ’अंधेरे में’ वे प्रतिनिधि कविताएं हैं जिनसे मुक्तिबोध की कविता और उनकी रचना प्रक्रिया को समझा जा सकता है . कुबेरनाथ राय ने लिखा है,जैसे ’टिण्टर्न ऐबी’ और ’इम्मॉर्टलिटी ओड’ को पढ़कर वर्ड्सवर्थ को या ’राम की शक्तिपूजा’ ,’बादल राग’ और ’
पसंद करें
6
नापसंद करें

ब्रह्मराक्षस / गजानन माधव मुक्तिबोध

ब्रह्मराक्षस’ और ’अंधेरे में’ वे प्रतिनिधि कविताएं हैं जिनसे मुक्तिबोध की कविता और उनकी रचना प्रक्रिया को समझा जा सकता है . कुबेरनाथ राय ने लिखा है,जैसे ’टिण्टर्न ऐबी’ और ’इम्मॉर्टलिटी ओड’ को पढ़कर वर्ड्सवर्थ को या ’राम की शक्तिपूजा’ ,’बादल राग’ और ’
पसंद करें
7
नापसंद करें

ब्रह्मराक्षस का सजल उर शिष्य : मुक्तिबोध

छायावादोत्तर प्रगतिशील कविता की एक परम्परा केदारनाथ अग्रवाल,नागार्जुन और त्रिलोचन की है तो दूसरी परम्परा के वाहक हैं मुक्तिबोध . बीसवीं सदी की हिंदी कविता का सबसे बेचैन,सबसे तड़पता हुआ और सबसे ईमानदार स्वर हैं गजानन माधव मुक्तिबोध . मुक्तिबोध की कवित
पसंद करें
4
नापसंद करें

ज्योति-पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं !

तमसो मा ज्योतिर्गमय पुकारें आंधियां चाहे प्रभंजन मत्त सा डोले क्षणों को लौ बनाता ज्वालशिल्पी दीप यों बोले थकन कैसी पराजय क्या हमें अब रात का भय क्या ! ( महादेवी वर्मा ) आप सब को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ! – प्रियंकर पालीवाल
पसंद करें
0
नापसंद करें

जाना ….. अपना आकाश खुद बुनने वाले कवि का

हरीश भादाणी (1933-2009) हरीश भादाणी गीत के बुनकर थे और कलम के हलवाहे . वे हरफ़ों के फूल खिलाने वाले और हरफ़ों का पुल बनाने वाले जनगीतकार थे . जो काम बिज्जी ने अपने गद्य में किया,वही हरीश भादाणी ने अपनी कविताओं और गीतों में किया – हिंदी को राजस्था
पसंद करें
4
नापसंद करें

हिंदी का लेखक

आलोक श्रीवास्तव की कविता-3 हिंदी का लेखक कहां है मुर्शिदाबाद ? कौन आज भी पराजित होता है प्लासी में ? किस दुख को कह नहीं पा रही हमारी हिंदी इस बरस ? विद्यापति कैसे बदल गया राजकमल चौधरी में ? सन ६४ में भी होते थे शोभामंडित आयोजन दिल्ली में जिसमें आज गद
पसंद करें
4
नापसंद करें

एक भाषा का विषाद काल

आलोक श्रीवास्तव की एक कविता-2 एक भाषा का विषाद काल मैंने नाविक से कहा ’ले चल मुझे भुलावा देकर’ युग से कहा ’ओ मेरे युग, ले चल मुझे अपने साथ’ काल से कहा ’तुझमें अपराजित मैं वास करूं’ एक पराजित भाषा की संकरी होती ज़मीन पर खड़े मैंने दुख को ललकारा एक विरास
पसंद करें
4
नापसंद करें

अनहद नाद

आलोक श्रीवास्तव की कविता-1 मूल्यांकन कविगण अमर होना चाहते हैं समकालीन यथार्थ से टकराते-टूटते कविगण कर रहे हैं समय का अनुवाद लुटा-पिटा भारत उनकी भाषा में है कस्बे के दुख हैं महानगर की पीड़ाएं उनके परिजन हैं उनका प्यार है कविगण दुखी नहीं हैं कि लोग क्यो
पसंद करें
4
नापसंद करें

कृतज्ञ हूं मैं ….

प्रियंकर की एक कविता कृतज्ञ हूं मैं कृतज्ञ हूं मैं जैसे आसमान की कृतज्ञ है पृथ्वी जैसे पृथ्वी का कृतज्ञ है किसान कृतज्ञ हूं मैं जैसे सागर का कृतज्ञ है बादल जैसे नए जीवन के लिए बादल का आभारी है नन्हा बिरवा कृतज्ञ हूं मैं जिस तरह कृतज्ञ होता है अपने मे
पसंद करें
4
नापसंद करें

देवितमे मा जलधाराओ, गगन गुहा से रस बरसाओ ……

ज्ञानदत्त जी के आदेश पर कोलकाता के हमारे अत्यंत प्रिय वरिष्ठ कवि-गीतकार दादा छविनाथ मिश्र का एक और ऋचागीत प्रस्तुत है, जल की अभ्यर्थना का गीत : ( शं नो देवीर अभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शं योर अभिस्रवन्तु नः ) – ऋग्वेद संहिता : १०/९/४ पृथ्वी का
पसंद करें
6
नापसंद करें

वैदिक ऋचा का गीतान्तरण / छविनाथ मिश्र

वैदिक ऋचा का गीतान्तरण ( मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः मधु नक्तमुतोषसो मधुमत पार्थिवं रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान्नस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ) – ऋक संहिता : १/९०/६-७-८ हवा चले
पसंद करें
6
नापसंद करें

धरती धोरां री/राजस्थानी उप-राष्ट्रीयता का राष्ट्रगीत

कन्हैयालाल सेठिया (1919-2008) ( विरल ही किसी कवि के गीत को वह मान्यता मिलती है जिसके तहत एक पूरा का पूरा जन-समुदाय उसे अपनी अस्मिता — अपनी पहचान — से जोड़कर देखने लगे . राजस्थानी और हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि कन्हैयालाल सेठिया का यह गीत ऐसा ह
पसंद करें
1
नापसंद करें

गर्जन-तर्जन

मानिक बच्छावत की एक कविता गर्जन-तर्जन बहुत जोर से बोले थे तुम गरजे थे तुम बरसे थे तुम फिर तुम रुके तुमने देखा जहां तुम खड़े थे वहीं तुम खड़े थे कहीं कुछ नहीं हुआ तुम्हारी बातों ने किसी को नहीं छुआ । ***** (काव्य संकलन ’पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार)
पसंद करें
4
नापसंद करें

मरण आएगा जिस दिन द्वार …..

रवीन्द्रनाथ ठाकुर का एक गीत (बांग्ला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल) मरण आएगा जिस दिन द्वार मरण आएगा जिस दिन द्वार उसे तुम दोगे क्या उपहार । रखूंगा उसके सम्मुख आन कि, छलछल करते अपने प्राण विदा में दूंगा उस पर वार – मरण आएगा जिस दिन द्वार ! शरत अनगिन
पसंद करें
3
नापसंद करें

विजयदेवनारायण साही की एक कविता

प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए परम गुरु दो तो ऐसी विनम्रता दो कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ और यह अंतहीन सहानुभूति पाखंड न लगे । दो तो ऐसा कलेजा दो कि अपमान, महत्वाकांक्षा और भूख की गांठों में मरोड़े हुए उन लोगों का माथा सहला सकूँ और इसका डर न
पसंद करें
5
नापसंद करें

तुम्हारे साथ रहकर/सर्वेश्वर

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गयी हैं हर रास्ता छोटा हो गया है दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गयी है जो खचाखच भरा है कहीं भी एकान्त नहीं न बाहर, न भीतर । हर चीज़ का आकार
पसंद करें
4
नापसंद करें

अपनी पीढी़ के लिए

अरुण कमल की एक कविता अपनी पीढी के लिए वे सारे खीरे जिनमें तीतापन है हमारे लिए वे सब केले जो जुड़वां हैं वे आम जो बाहर से पके पर भीतर खट्टे हैं चूक और तवे पर सिंकती पिछली रोटी परथन की सब हमारे लिए ईसा की बीसवीं शाताब्‍दी की अंतिम पीढी के लिए वे सारे यु
पसंद करें
4
नापसंद करें

बीज व्यथा

ज्ञानेन्द्रपति की एक कविता बीज व्यथा वे बीज जो बखारी में बन्द कुठलों में सहेजे हण्डियों में जुगोए दिनोंदिन सूखते देखते थे मेघ-स्वप्न चिलकती दुपहरिया में उठँगी देह की मुं‍दी आँखों से उनींदे गेह के अनमुँद गोखों से निकलकर खेतों में पीली तितलियों की तरह
पसंद करें
2
नापसंद करें

पश्चाताप / राजेन्द्र राजन

राजेन्द्र राजन की एक कविता पश्चाताप महान होने के लिए जितनी ज्यादा सीढ़ियाँ मैंने चढ़ीं उतनी ही ज्यादा क्रूरताएं मैंने कीं ज्ञानी होने के लिए जितनी ज्यादा पोथियां मैंने पढ़ीं उतनी ही ज्यादा मूर्खताएं मैंने कीं बहादुर होने के लिए जितनी ज्यादा लड़ाइयां मैंन
पसंद करें
4
नापसंद करें

विदा

अशोक वाजपेयी की एक कविता विदा तुम चले जाओगे पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे जैसे रह जाती है पहली बारिश के बाद हवा में धरती की सोंधी-सी गंध भोर के उजास में थोड़ा-सा चंद्रमा खंडहर हो रहे मंदिर में अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार तुम चले जाओगे पर थोड़ी-सी
पसंद करें
1
नापसंद करें

भाई मेरे घर साथ न ले

मुहम्मद अल्वी की एक और गज़ल भाई मिरे घर साथ न ले जंगल में डर साथ न ले भीगी आंखें छोड़ यहीं ! देख ये मंजर साथ न ले यादें पत्थर होती हैं मूरख पत्थर साथ न ले नींद यहीं रह जानी है तकिया चादर साथ न ले चुल्लू भर पानी के लिए सात समंदर साथ न ले एक अकेला भाग नि
पसंद करें
4
नापसंद करें

मुहम्मद अल्वी की एक गज़ल

गज़ल अदब की रानी है एक आंख से कानी है गज़ल अदब की रानी है खुशी बिदेसी है तो क्या गम तो हिंदुस्तानी है बन्दर अपना दादा है बिल्ली शेर की नानी है अबके दिसम्बर में सर्दी दिल्ली से मंगवानी है मार्च में थोड़ी-सी गर्मी शिमला पर भिजवानी है रेत ही रेत जमीं पर है
पसंद करें
7
नापसंद करें

बस यही एक अच्छी बात है / राजेन्द्र राजन

राजेन्द्र राजन की एक कविता बस यही एक अच्छी बात है मेरे मन में नफरत और गुस्से की आग कुंठाओं के किस्से और ईर्ष्या का नंगा नाच है मेरे मन में अंधी महत्त्वाकांक्षाएं और दुष्ट कल्पनाएं हैं मेरे मन में बहुत-से पाप और भयानक वासना है ईश्वर की कृपा से बस यही
पसंद करें
6
नापसंद करें

जो मिला है मुझे

युवा कवि नरेश अग्रवाल के अब तक चार काव्य-संकलन प्रकाशित हो चुके हैं . इन काव्य संकलनों को विजेन्द्र, अरुण कमल और विजयकुमार जैसे कवि-समीक्षकों की सराहना प्राप्त हुई है . आप उनकी वेब साइट www.nareshagarwala.com पर जा कर उनके ये काव्य-संकलन तो पढ ही सकत
पसंद करें
7
नापसंद करें

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

 पाश की एक बहुचर्चित कविता सबसे ख़तरनाक मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है सबसे ख़तरनाक नहीं
पसंद करें
5
नापसंद करें

एक कविता खुशी की हो, एक दुख की…

पुरबिया फुटानीबाज प्रमोद सिंह की एक कविता एक मामूली कविता की किताब एक कविता खुशी की हो, धुली लहरीली साइकिल पर चढ़कर आए, जंगले के लोहे में धंसे बच्‍चे का चेहरा मुस्‍कराहट में भर जाए. खुरपी, मटकी, संड़सी, असबेस्‍टस, बेलचा, हेलमेट, बाजा, बंसखट पर हो एक
पसंद करें
5
नापसंद करें

जब एक दिन हांग्जो* शहर की सुंदर लड़की का बटुआ चोरी हो गया

ऋतुराज की एक कविता   जब एक दिन हांग्जो* शहर की सुंदर लड़की का बटुआ चोरी हो गया   कभी इतनी धनवान मत बनना कि लूट ली जाओ   सस्ते स्कर्ट की प्रकट भव्यता के कारण हांग्जो की गुड़िया के पीछे वह आया होगा चुपचाप बाईं जेब से केवल दो अंगुलियों की कलाकारी से