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10 Mar 2010
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प्रेम में डूबी औरत

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कौन हो तुम जो सपनो मे छेड जाती हो !!!!!

(एक बार फिर पूरानी यादे जो अपके सामने प्रस्तुत है)कौन हो तुमजो अकसरमेरी यादो के झरोखे सेझांक झांक जाती होऔर घूंघट उठाते हीदूर दूर तक भीकही नजर नही आती होअजीब बात है यहकि जब बन्दकर देता हूँदरवाजे खिड्कियाँ सबतभी तुम आती होचुपके चुपकेपता नही किधर
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एक खत

बडे भैया लौट आओ अब अपना भी गांव कोई बुरा नही बड्की भाभी के पांवो की रुनझुन बडे उदास है तुम्हारी बिन तुम्हे ही ढुंढते है हर पल हर दिन ! गांवभर के बच्चे जवार भर की गाये आंचल मे सहेजे वह ठंडी हवाये कर रही तुम्हारी प्रतीक्षा लौट आओ अब ! हल वे अब भी चडमडा
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दिमाग में शिवजी की जटा से भी ज्यादा उलझाव है

ओम जी को भूल गये? आपने उन्हें याद ही कब किया कि भूलेंगे. क्या पता आप उन्हें जानते ही न हो. दिल्ली में रहने वाले कई मिले जिन्होने लाल किला ही नहीं देखा जब कि उनकी उम्र भी लाल किला से कम न होगी. अब आप ये न कहाना कि मेरा इतिहास कमजोर से भी ज्यादा कमजोर
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वो हमारे गांव की पगडडी थी ये हमारे महानगर की सड़के है

वो हमारा गाँव था और वे थी हमारे गाँव की सडकें सडकें भी कहाँ? पगडंडियाँ! टूटी फ़ूटी, उबर ख़ाबर पर उन पर चल कर हम न जाने कहाँ कहाँ पहुँच जाते थे दोस्तों , रिश्तेदारो , नातेदारों और न जाने किनके किनके घरों तक ये हमारा महानगर है यहाँ की सडकें बहुत सुन्दर ह
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आज ना छोड़ेंगे

आज ना छोड़ेंगे बाये से है. राकेश जोशी , देवमणि पांडेय , यूनूस खान् , देवमणि पांडेय , महेश दूबे , महेन्द्र मोदी , बसंत आर्य , वीनू महेन्द्र और बैठी है कांचन प्रकाश और कुसुम जोशी. मौका होली का था.और साल 2007. होलीके लिए विशेष प्रोग्राम की कल्पना की थी व
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रानी मुखर्जी साँवली है और रेखा तो एकदम काली

साँवली यों तो मुहल्ले में कोई भी नई लड़की आये तो लड़कों में दस दिनों तक आहें भरा जाना अनिवार्य है. पर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ. क्योंकि चम्पा साँवली था और साँवली लड़की में रूचि दिखा कर कोई भी अपनी घटिया पसन्द का प्रदर्शन नहीं करना चाहता था. हाँ, यह बा
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कवि सम्मेलन आयोजक

आदरणीय ग़ाडियाजी, नमस्कार् ! आपको यह पत्र लिखने की जरूरत इसलिए महसूस कर रहा हूँ क्योंकि पिछले कई सालों से परिवार काव्योत्सव का निमंत्रण आप भेजते रहे है और मैं कई सालों से नियमित पुरस्कार समारोह और कवि सम्मेलन का आनन्द उठाता रहा हूँ. इस बार भी आपने निम
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हमने बेचारे माँ बाप को परिवार से छाँट दिया है

पिछले दिनों अखबार में ये खबर पढकर कि मुम्बई के मालाबार हिल इलाके की एक बहुमंजिली इमारत से कूद कर दो वृद्ध दम्पत्ति मर गये मेरे दिल मे उदासी और आंखों में आंसू भर गये बहुत देर तक मैं उनके बारे में सोंचता रहा और उनकी ही बिल्डिंग के नीचे पडे उनके मृत देह
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एक नेताजी, एक श्मशान और उसका उद्घाटन.

केंन्द्र से लेकर ग्राम पंचायत तक, जहाँ भी देखो निर्माण ही निर्माण चल रहा है. लेकिन सारे निर्माण की तब तक कोई महत्ता नही है, जब तक किसी मंत्री जी के हाथों से उसका उद्घाटन न हो जाये. कई महीनों तक मुम्बई मे एक फ्लाई ओवर का उपयोग शान से शहर के आवारा कुत्
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ये बात भी झूठी है

आप कहते हैं ये दुनिया झूठी है यहाँ के लोग झूठे हैं उनकी बातें झूठी है फिर ये बात सच्ची है इसकी क्या गारंटी है सच तो ये है कि ये बात भी झूठी है.
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दूसरा ईसा मसीह

कच्ची नींद से जागता हूँ काम पे भागता हूँ यहाँ वहाँ भटकता हूँ रोज सूली पर लटकता हूँ सोंचता हूँ जब हम नहीं रहेंगे लोग हमें कहीं दूसरा ईसा मसीह तो नहीं कहेंगे.
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चूहेदानी

एक चूहे को मैने चूहेदानी मे पकड़ा पकडे जाने पर उसकी छटपटाहट देख मै भी छटपटा उठा और चूहेदानी खोल दी सोंचता हूँ मैंने चूहे को पकड़ा जरूर पर आखिर में चूहे ने मुझे पकड लिया
Dec 29 2009 11:50 AM
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पत्नियाँ पतियों को क्यों डांटती रहती है?

पिछले दिनों फ्रेंडशिप डे आया तो मोबाइल पर कई दोस्तों के सन्देश आये. कुछ मित्रो को हमने भी सन्देश भेजे. एक दोस्त ने बंबइया हिंदी में कुछ उस तरह इजहार ए मोहब्बत की- गॉड अपुन से पूछा किधर जाना मंगता? स्वर्ग या नर्क? अपुन बोला- नर्क. अपुन को मालूम, तुम स
Dec 29 2009 11:50 AM
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दुनिया के पुराने सात आश्चर्य

दुनिया के सात आश्चर्यों की बड़ी चर्चा रही पिछले दिनों. पर मेरे दोस्त रवीन्द्र प्रभात ने जिन नये सात आश्चर्यों की चर्चा की तो मुझे लगा ये तो आठवाँ आश्चर्य है कि दुनिया जिन चीजों को सात आश्चर्यों में शुमार करती है वे दरअसल एक बचकानेपन की बात है. लिजिए
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एक लघुकथा में एक बड़ी कहानी

अंतिम इच्छा जब तक उसकी बांहों में बल रहा , उसने मेहनत मशक्कत करने से कभी जी नहीं चुराया और हमेशा अपने दोनों बेटों की नाजो नेमत में लगा रहा. लेकिन जब उसी जवानी के जोश में बुढ़ापे का जंग लगना आरंभ हुआ तो बेटों को भी अंगूठा हीन एकलव्य् सदृश मां बाप की उ
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न हँसे कोई, न मुस्कुराए, बस ठहाका लगाया जाय

ज सुबह सुबह् एक मेल मिला प्रिय बसंत जी, किसी ने ख़ब ही कहा है- हँसना रवि की प्रथम किरण सा, कानन मेंनवजात शिशु सा . हमारा वर्तमान इतना विचित्र है,की अपनी इस सहज ,सुलभ विशिष्टताको हमने ओढ लियाहै, हर आदमी इतना उदास है,की उसे हँसने के लिए लाखों जतन करनेप
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तन किसमिस पर मन अंगूर

तकते हुए न कभी थकते है रूप बूढे रूप देख झुर्रियों पे रंग चढ जाता है, तन किसमिस पर मन अंगूर बन पल में ही सातों आसमान चढ जाता है, बूढो का न दोष कोई इसमे है रंचमात्र रूप देखके जो रूप पर मर जाता है, सच तो ये है कि रूप सामने दिखाई दे तो मरे मुर्दे का हर्ट
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त्वरित टिप्पणियों की टकसाल: हिन्दी कवि सम्मेलन

टिप्पणियों के बेताज बादशाह: श्याम ज्वालामुखी ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने का चलन आम है. मेरी जानकारी में हिन्दी ब्लाग पर टिप्पणियाँ देने मे उड़न तश्तरी वाले कनाडियन भारतीय समीर लाल जी का कोई तोड़ नहीं है. ब्लागर दोस्तों से टिप्पणियों के सन्दर्भ में बात चीत
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रोजगार ढूंढना भी एक रोजगार है

आजकल बेरोजगारीका यह आलम है कि रोजगार दफ्तर भी अब बेरोजगार पडॆ हैं . बल्कि लेटे - लेटेकराह रहे हैं. पहले एक - आध बेरोजगार कहीं से घूमता - भटकता दफ्तर मे आ जाता था कि मुझे रोजगार दो. तो दफ्तर वाले उसे समझाते थे कि फलाँ फार्म भर दो, ढिकाँ जगह जमा करा दो
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किस्सा प्याज और अपनी लुटी हुई लाज का

पत्नी बोली- तुम क्या कमाते हो असल में तो पडोस का शर्मा कमाता है उसके बीवी रोज एक किलो प्याज खरीदती है और सारा परिवार खाता है तुमसे तो कुछ लाने को बोलूँ तो आंखें लाल पीली होने लगती है और प्याज के नाम पर पतलून ढीली होने लगती है. मैने कहा- फिजूल के खर्च
Dec 29 2009 11:50 AM
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ये है मुंबई मेरी जान : जाने पहचाने अनजाने लोग

सो‍चता हूं और सं‍भव है कि शीर्षक पढ कर आप भी सों‍चने लगे़‍ कि जो जाने पहचाने हैं वे अनजाने कैसे हो सकते हैं‍. और जो अनजाने है वो जाने पहचाने कैसे हो सकते हैं. कबीर की उलटवांसी जैसी लगती है न? पर मुम्बई शहर ही उलटवासियो‍ का है. सुबह सुबह उठता हूं. प्र
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कविता पर क्रिकेट भारी है

ये वो है जो रिमोट पर कब्जा कर लेती हैं दफ्तर से देवमणि पांडेय के साथ लौटते हुए चर्चगेट मे विनय पत्रिका वाले बोधिसत्व से मुलाकात हो गयी. उन्होने शिकायत की और कहा कि मेरा ब्लाग अच्छा है पर मै नियमित क्यो नही लिख रहा हूँ? मैने कहा कि कोशिश करूंगा.. फिर
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एक सपनो का महल हो गर्ल्स होस्टल के सीधे सामने

खिड़कियां मेहरा साहब उस दिन विमान मे बैठे बैठे किसी फिल्मी पत्रिका मे एक अभिनेता के सपनों के घर के बारे मे पढकर चौंक गये थे. चौंकना स्वाभाविक था, क्योकि वह अपने सपनों का महल किसी सुरम्य वादी या स्वर्ग मे नही बसाना चाहता था. वह तो बस इतना चाहता था कि उ
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बाद तुम्हारे विदा होकर

कुछ यादे अनकही ही रह गयी जीवन मे -दोस्तो मै आपको यह बताना चाहूंगा कि यह रचना हमारे काँलेज के दिनों मे लिखी गयी थी) बाद तुम्हारे विदा होकर चले जाने के नही रह पाउंगा दुखी नही होऊँगा घडी घडी उदास और भी बहुत कुछ है जिसे पाया जा सकता है या इसी तरह की जा स
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किस्सा प्याज और अपनी लुटी हुई लाज का

प त्नी बोली- तुम क्या कमाते हो असल में तो पडोस का शर्मा कमाता है उसके बीवी रोज एक किलो प्याज खरीदती है और सारा परिवार खाता है तुमसे तो कुछ लाने को बोलूँ तो आंखें लाल पीली होने लगती है और प्याज के नाम पर पतलून ढीली होने लगती है. मैने कहा- फिजूल के खर्
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हम एक राह के मुसाफिर है

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इंतजार है उस चिड़िया का

वो नन्हीं चिड़िया भी अजीब थी हमारे छोटे से घर के छोटे से बरामदे के एक कोने में बना रही थी अपना छोटा सा घोंसला बरसात शुरू होने के बिल्कुल पहले हम हैरान होते बिना किसी कैलेंडर के चिड़िया को कैसे लग जाती है खबर मानसून के आमद की ? सुबह की पहली किरण फूटने स
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प्रेम गली से गुजरो तो

एक अरसा बीत गया आप लोगों से मिले हुए. ये कहना भी कुछ सही नहीं है. कहना चाहिए एक अरसा हो गया आप लोगों को मुझ से मिले हुए. आप लोगों से तो मैं मिलता ही रहता हूँ. एक मुक्तक से अभी अभी मुक्त हुआ हूँ तो इस बार वही आपके हवाले-- दिल को दिल तक जाने में एक जमा