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संजीवनी

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11 May 2010
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पहले किसको फांसी दोगे तुम कसाब या अफज़ल को

कैसे रोक सकोगे बोलो उग्रवाद के हलचल को . पहले किसको फांसी दोगे तुम कसाब या अफज़ल को ?
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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रात की क़ैद में हैं उजाले

रात की क़ैद में हैं उजाले ।बैठे हम हाथ पर हाथ डाले लाश पहचान में आ सकी ना -चील कौओं ने यूँ नोच डाले।राज फैला है तब तब असत् का -सत्य ने जब भी हथियार डाले ।राह में आ गया जो भी पत्थर -पाँव से हम उसे तोड़ डाले ।रोएगी मौत पर मेरे दुनिया -देखकर के मुझे मुस्करा
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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मुफ्त और जबरदस्ती शिक्षा-

अभी हाल में केन्द्र सरकार ने एक विधेयक पारित किया है, जिसका नाम है मुफ्त और जबर्दस्ती शिक्षा अधिनियम ( फ्री एंड कम्पल्सरी एजुकेशन ऍक्ट)। यह एक केन्द्रीय मंत्री जो कि पेशे से वकील हैं, के उर्वर मस्तिष्क की उपज है । जैसा कि वकीलों का मस्तिष्क बहुत उर्व
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
Dec 29 2009 11:44 AM
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आंधियों में दिए हम जलाते रहे

आँधियों में दिये हम जलाते रहे । नीद अँधियारों की हम उड़ाते रहे ॥ बस उन्ही को ही मंज़िल मिली दोस्तों - ठोकरें खाके जो मुस्कराते रहे॥ ये न पूँछो कि कैसे कटी ज़िन्दगी- अश्क पीते रहे ग़म को खाते रहे॥ गर न पाया कभी काट खाया उन्हें - दूध साँपों को जो थे पिला
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
Dec 29 2009 11:44 AM
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दोहे

शेख जाहिरा देखती कठिन न्याय का खेल। सच पर जोखिम जान की झूठ कहे तो जेल॥ खल नायक सब हैं खड़े राजनीति में आज। जननायक किसको चुनें दुविधा भरा समाज।। क्या हिंदू क्या मुसलमाँ ली दंगो ने जान। गिद्ध कहे हैं स्वाद में दोनो मॉस समान॥ जिसको चक्की पीसनी थी जाकरके
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
Dec 29 2009 11:44 AM
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कता

कभी इधर कभी उधर दिखाई देते हैं । हर एक मुद्दे पर मुखर दिखाई देते हैं ॥ दिलों में उनके सियासत के ऐब हैं सारे - जो नैन -ओ नक्श से सुंदर दिखाई देते हैं ॥ 'विनय ओझा 'स्नेहिल'
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
Dec 29 2009 11:44 AM
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आज का शेर

यहाँ मन्दिर के दहलीजों पे भी जामा- तलाशी है- जाने किस थैले में दहशतगरों का रक्खा बम निकले । - विनय ओझा 'स्नेहिल'
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
Dec 29 2009 11:44 AM
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कता

कहते हैं वो इन मुद्दों पर सवाल मत करो। इन छोटी छोटी बातों का ख्याल मत करो॥ कोई नहीं है दूध का धुला हुआ यहाँ- एक दूसरे के दाग़ पर बवाल मत करो॥ -विनय ओझा स्नेहिल
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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क्या कहें ?कैसे कहें?

क्या कहें कैसे कहें कुछ कहना भी दुश्वार है । सिर पे सच्चाई के अब लटकी हुई तलवार है ॥ सोंच में बैठा हुआ मांझी करे तो क्या करे? बिक चुकी तूफ़ान के हाथों सभी पतवार है॥ जिन दियों से रोशनी मिलती नहीं वो फोड़ दो- उन दियों को ताख पर रखना ही अब बेकार है॥ खौफ
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
Dec 29 2009 11:44 AM
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कविता

मुझे मालूम न था ऐसे भी दिन आएंगे। रहनुमा राह्जनों के शिविर में लाएंगे ॥ बढ़ा के दोस्ती का हाथ वे हमारी तरफ - हमारे दुश्मनों से हाथ भी मिलाएँगे॥ सियाह रात भी रोशन हो चाँदनी जैसी- दिए हम आस के पलकों पे यूँ जलाएँगे॥ घर पे रह जाएगा मालिक भी हाथ मलता हुआ-
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
Dec 29 2009 11:44 AM
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ग़ज़ल

अब सुनाई ही नहीं देती है जनता की पुकार। इस तरह छाया हुआ है उनपे गद्दी का खुमार ॥ अब दुकानों से उधारी दूर की एक बात है- जब बगल वाले नहीं देते हैं अब हमको उधार ॥ लाँघ पाना या गिरा पाना जिसे मुमकिन नहीं - हर दिलों के दरमियाँ नफरत की है ऊँची दिवार॥ सैकड़
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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“समलैंगिकों और किन्नरों को सरकारी पदों पर शत प्रतिशत आरक्षण”

मैं सोच रहा हूं कि केन्द्र सरकार को एक पत्र लिखूं और कुछ सुझाव दूँ ताकि अरसों से अपनी गरिमा और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करते आ रहे लोगों (समलैंगिकों तथा किन्नरों) के आन्दोलन में सहभागिता का गौरव अर्जित कर सकूँ। इससे देश की ढेर सारी सामाजिक और र
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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जागो-जागो बचालो वतन साथियों

जागो जागो बचालो वतन साथियों,लुटता माली के हाथों चमन सथियों ।जिनके पुरखों ने सींचा लहू से चमन,जिनके हक के लिए बाँधा सिर पर कफन;उनकी संतानें यूँ धन की प्यासी हुईं-कर रहीं हैं गबन पर गबन सथियों॥त्याग बलिदान अब तो किताबों में है,हर कोई मस्त अपने हिसाबों में
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
Oct 08 2009 01:24 PM
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जनता बनाम पशु – एक व्यंग्य

भारतीय लोक तंत्र में कार्यपालिका और न्यायपालिका की समझ में थोड़ा फर्क है। न्यायपालिका बार बार अपने निर्णयों में कहती रहती है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार का आशय पशुवत जीवन से नहीं है, अपितु मनुष्य के प्रतिष्ठा-पूर्ण जीवन का अधिकार है।
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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“राम तेरी गंगा मैली हो गई” - एक व्यंग्य

राम तेरी गंगा मैली हो गई’ फिल्म देखी होगी। यह फिल्म प्रधान मंत्री ने भी देखी। प्रधान मंत्री जी भले आदमी हैं। उन्होंने मंत्रियों की एक बैठक बुलाई और यह चर्चा की कि गंगा हमारी माता के समान है, और मैली हो गई हैं लिहाज़ा उनकी सफाई हमारी जिम्मेदारी है और इस
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
Sep 25 2009 03:26 PM
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सच का सामना

कुछ दिनों से टेलीविजन पर एक धारावाहिक दिखाया जा रहा है, जिसका नाम है ‘सच का सामना’। जिस प्रकार भारतीय संविधान में राजनेताओं के योग्यता की कोई लक्षमण रेखा नहीं निर्धारित की गई है उसी प्रकार टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों के स्तर की कोई सीमा
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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‘हिन्दी का श्राद्ध’

मैं अतिथि कक्ष में सोफे पर बैठ कर कुछ लिख रहा था कि तभी दरवाज़े पर कॉल बेल की आवाज़ सुनाई दी दरवाज़ा खोला तो देखा कि इष्टदेव जी जो मेरे मित्र हैं और जिनका सिर घुटा हुआ है, दरवाज़े पर खड़े हैं। मैने प्रश्न किया कि क्या हुआ? सब कुशल है न? सिर क्यों घुटा रखा है?
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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धन्य धन्य यह लोक तंत्र

धन्य धन्य यह लोक तंत्र-भारत का लोक तंत्र दुनिया का बड़ा लोक तंत्र है। केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, सैद्धांतिक दृष्टि से भी। यहाँ का लोक तंत्र कुछ मूल भूत सिद्धान्तों पर चलता है। पहला यह कि यहाँ जन प्रतिनिधि बनने के लिए यदि कोई योग्यता निर्धारित है तो
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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आखिर कब तक टालेंगे पुलिस सुधार ?

आखिर कब तक टालेंगे पुलिस सुधार ?जम्मू कश्मीर के शापियाँ बलात्कार और हत्या मामले चीख-चीख कर कह रहे हैं कि जिस विभाग पर जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वही अगर उसके अधिकारों का भक्षक बन जाए तो उनके विरुद्ध जाँच की कोई निष्पक्ष संस्था नहीं है.उसी पुलिस के
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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सब कुछ राम भरोसे-

सब कुछ राम भरोसे- इस देश की स्थिति को देख कर किसी ने सच ही कहा था कि भगवान अगर कहीं है तो वह भारत में ही हो सकता है. क्यों कि जहाँ लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों को भ्रष्टाचार के दीमक चाल चुके हों वह फिर भी खड़ा हो, इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?य़हा
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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शिक्षा की छीछालेदर और निजी दुकानेंi

शिक्षा की छीछालेदर और निजी दुकानें कल टाइम्स आफ इंडिया में दो समाचार एक साथ छपे। एक यह कि टाइम्स नाउ ने केन्द्रीय मंत्री के निजी मेडिकल कालेज को कैपिटेशन फीस अवैध रुप से उगाही करते स्टिंग ऑपरेशन के तहत पकड़ा और दूसरा यह कि निजी डीम्ड युनिवेर्सिटीज में
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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'पड़ गया खतरे में'

आतंकी हमलों से हिन्दुस्तान पड़ गया खतरे में . देश का बच्चा बच्चा हर इंसान पड़ गया खतरे में .. चला मुकद्मा सालों तक और दोष सिद्धि तक जा पहुंचा – पर अफज़ल की फांसी का फरमान पड़ गया खतरे में.. बेशर्मी का आज एक पर्याय बन गयी है खादी - वीर सुभाश और बिस्मिल क
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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'कोई तो होगा'

इतनी बड़ी है दुनिया तो मुझ जैसा कोई तो होगा । मैं जितना प्यासा हूं उतना प्यासा कोई तो होगा।। जाने कितने ऐसे हैं जो ज़ाम ज़हर का पीते हैं- जो मेरे आँसू पी जाए ऐसा कोई तो होगा ॥ देख के तुमको दिल मे मेरे एक कशिश सी उठती है- तेरे दिल का मेरे दिल से रिश्ता क
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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लोकतंत्र के कहांर ही कहर बने.

लोकतंत्र के कहांर ही कहर बने। देश और समाज के लिए ज़हर बने ॥ आतंक के आरोप में जो दोषसिद्ध हैं- वो ही समाजवाद के हैं पक्षधर बने ॥ सबको पता है आती है हर साल यहाँ बाढ़ - किस हाल में नदी के तटों पर हैं घर बने॥ कीचड उछालते हैं या हैं दाग दिखाते- वे सिर्फ़
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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वक्त भर देता है ...

वक़्त भर देता है हर एक ज़ख्म की गहराईयाँ । फिर भी रह जाती हैं क्यों ये मातमी परछाइयाँ ॥ या खुदा एक पल में दिखता दो तरह ज़लवा तेरा- एक तरफ मातम का डेरा एक तरफ शहनाइयाँ ॥ स्याह रातों से न जाने दिल क्यों घबराने लगा- साँप सी डसती हैं मुझको शाम की तन्हाइया
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
Mar 18 2009 10:31 PM
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चिराग अपनी उम्मीदों के....

बहुत अँधेरा है पर दिल को मत उदास रखो । चिराग अपनी उम्मीदों के आस पास रखो ॥ मेरी तस्वीर तुम्हे जाम में दिख जाएगी - अपने होठों पे मेरे नाम की एक प्यास रखो ॥ हार ख़ुद जीत का बन हार गले आ के पड़े - बुलंद इतना दिल में जीत का एहसास रखो॥ - विनय ओझा 'स्नेहिल'
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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सन्जीवनी क्या है ?

इस दुनिया में जितना आलस्य और निराशा ने नुकसान पहुंचाया है उतना असफलताओं ने नहीं। मनुष्य के जीवन में जब सिलसिलेवार असफलता आती है तो उसका आत्मविश्वास टूट जाता है और वह उन्हें ही अपनी नियति मान कर बैठ जाता है । जब मनुष्य के जीवन में निराशा की घनघोर बदली
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'