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खिज़ां को बुलाने चलो
हर फ्रिक्र-ए-ज़हां को दिल से भुलाने चलो ।
चलो ख़्वाब में सूकून की नींद सोने चलो ।
खिज़ा में भी रंगो को याद रखना सदा ,
मौसम-ए-ग़म में भी , खुशी को पाने चलो ।
राहतों के शहर की तलाश में मर ना जाना ,
आफतों के जहां में ही , घर बसाने चलो ।
खिज़ा के बिन बहार क
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Dec 03 2009 01:19 AM


Shuffle








