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उम्मीद है

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09 Jun 2010
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कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे

बंद करो अब शोर लगती हैं तुम्हारी ये खबरें जान चुका हूं तुम्हारे पुते चेहरों पर झल्लाहट का सारा सच मुझे मालूम है तुम्हारी नेताओं से सांठगांठ की हकीकत मुझे ये भी पता है कि एक हारी लड़ाई लड़ रहे हो तुम सबखुद खरोच रहे हो अपने वजूद को अपने नाखूनों से पैसों की
 
सुबोध
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कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे

तेज आवाज में बात करना सीख नहीं पाया और धीमी आवाज़ अब कोई सुनना नहीं चाहता। खामोशी से अपना काम करना सुस्त होने की निशानी है। चीखने से गले में खराश पैदा हो जाती है। बोलने से ज्यादा वक्त सोचने में बीतता है। सड़क पर चलते किसी शख्स को उसकी गलती के बावजूद भला
 
सुबोध
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पत्रकारिता के गुनहगारों को फांसी दो !

There can be no press freedom if journalists exist condition of corruption, poverty or fearइंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट का पन्ना इसी सच के साथ खुलता है। फेडरेशन की चिंता अरब और मिडिल ईस्ट में पत्रकारिता पर पड़ी बेड़ियों से होते हुए रुस तिब्बत श्रीलंका
 
सुबोध
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यहां अंग्रेज पैदा होते हैं

उन जिंदगियों पर रिसर्च होनी चाहिए जिन्होने सिविल सर्विस को अपना मकसद बनाया और नाकाम रहे। शोध इस बात पर भी होनी चाहिए कि जिन्होने यूपीएससी में टॉप किया उन्होने देश को क्या कुछ नायाब दे दिया। एक बार फिर अखबार यूपीएससी में सफल छात्रों के इंटरव्यू से पटे
 
सुबोध
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यूपीएससी इंतहान और कुछ सुलगते सवाल

अधिकारी तबका अंग्रेजियत से उबर नहीं पाया हैं। शायद इसलिए कि हुक्म चलाना हमारी आदत है। यूपीएससी के इंतहान में पास उम्मीदवारों के इंटरव्यू से जो टीस उठी उससे उठे तमाम सवालों को ब्ल़ॉग पर साझा करने की कोशिश की। जिस तरह हर मसले के कई पहलू होते हैं इस मसले को
 
सुबोध
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निरुपमा...तुम खबर नहीं बन सकती !

आज मेरी जुबान लड़खड़ा रही है। मेरे गले से शब्द नहीं निकल रहे। मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपने बीच से ही किसी को खबर बनते देखूंगा। कल तक जो निरुपमा मेरी एक दोस्त हुआ करती थी और दोस्त से ज्यादा मेरे करीबी दोस्त प्रियभांशु की होने वाली जीवनसंगिनी यानि हमारी
 
सुबोध
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फ्लैश के उस पार

कैमरे का फ्लैश चमकने से पहले,रेडी वन टू थ्री कहते हीकितनों के चेहरे पर आई होगीजबरदस्ती की मुस्कुराहट ।कैमरे ने बड़े सलीके से खींच लिए होंगेहोठों के वो बनावटी एक्सप्रेशन।कैमरों में बड़ी चालाकी से छिप गई होगीजिंदगी से जूझने की जद्दोजहद,मां की बीमारी की
 
सुबोध
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जिंदगी को कैसे देखें...

(कुछ बातें दिल को छू जाती हैं...१७ दिसम्बर २००८ को दैनिक भास्कर में छपे सम्पादकीय में विचारक स्टीफन आर कवी का इंटरव्यू छपा था...उन्होने कुछ ऐसी बातें कही... जिसने मुझे काफी प्रभावित किया...उनके इंटरव्यू के कुछ अंश यहां कोड कर रहा हूं...)सवाल...जिंदगी को
 
सुबोध
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बस इतनी सी पहचान

ख्वाहिश नहीं कि इतिहास की तारीखो की तरह जबरन याद रखा जाऊं। न्यूटन के फार्मूले की तरह किसी पहचान से बंधने का इरादा भी नहीं है। पैसे को पहाड़े की तरह जोड़ने की ना अक्ल है और ना शौक। इतना बड़ा नहीं हुआ कि खुद की पहचान को शब्दों में बांट सकूं। फिलहाल अपने
 
सुबोध
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सानिया की स्कर्ट जैसी छोटी सोच

सानिया की शादी के बाद उनके खेल का मुल्क क्या होगा ये सवाल किसका है। आम लोगों का, नेताओं का. या फिर मीडिया का। अमिताभ सदी के महानायक हैं ये किसने तय किया। उनके फैन्स ने, खुद उन्होने, या फिर मीडिया ने। जो अमर सिंह एक चुनाव लड़ने और जीतने की हैसियत नहीं
 
सुबोध
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खबरों का कूड़ा और उसकी दुकान

हम टीवी पर बोलते नहीं चिल्लाते हैं या कहें झूठे डर क्रिएट करते हैं। मसलन धरती फलाना साल में खत्म होने वाली है। मौत का कुंआ...मौत की कार...मौत की बस वगैरह वगैरह...। मौत से सबको डर लगता है लेकिन जब टीवी वाले मौत की बात करते हैं तो हंसी आती है। कुछ लोग मजे
 
सुबोध
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यूपी को बिहार से खतरा !

यूपी को लंबे अर्से से ये सहूलियत हासिल है कि वो बिहार की बदहाली में खुद की बदहाली छुपा सके। अब बिहार बदल रहा है या कहें वहां बदलाव की छटपटाहट दिखने लगी है। वहीं अभी यूपी से ऐसी कोई खबर नहीं है। सिवाए इसके की मायावती हजार हजार रुपए की नोटों की माला पहन
 
सुबोध
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गरियाना तो सबको आता है पर...

बड़बड़ाते झुंझलाते और काफी हद तक गरियाते लोगों से घिरा हूं। समझना मुश्किल है क्या बोलूं क्या कहूं। बस हां में हां मिलाकर काम चला लेता हूं। ना सहमति ना असहमति। सबकी अपनी शिकायते हैं सबकी अपनी कहानियां हैं। दरअसल दिक्कतें कई हैं। सब अपनी नजरों में सिकंदर
 
सुबोध
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वो गुमनाम खत पार्ट २

साइकिलों का भी क्लास बंटने लगा। हीरो रेंजर साइकिलों का नया संस्करण था। पुराने मॉडल की साइकिलें छात्र के गंवारुपन की पहचान बनने लगीं। इसी बीच हीरो पुक ने आकर साइकिलों को दहला दिया। लड़के एक लीटर में ७० किलोमीटर का सफर मोपेट से तय करने लगे। लड़के लड़कियों
 
सुबोध
Feb 21 2010 12:35 PM
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आई एम नॉट टेररिस्ट !

ओसामा बिन लादेन को सब जानते हैं तालिबान की सोच सबको पता है। लेकिन क्या मुसलमानों की पहचान लादेन और तालिबान पर आकर खत्म हो जाती है। क्यों नहीं लादेन के सामने मुसलमानों का कोई उदारवादी चेहरा उभर पाता है। क्यों तालिबान को हम ठेस मुसलमान की असल परिभाषा मान
 
सुबोध
Feb 18 2010 12:03 PM
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वो गुमनाम खत पार्ट १

कम्बख्त साइकिल को पता नहीं तमाम रास्तों की पहचान कैसे थी। स्कूल जाते वक्त रास्ता भटक जाना, गर्ल्स कॉलेज के सामने अदब से रफ्तार थाम लेना या फिर सिनेमाघर के स्टैंड पर घंटों तक आराम फरमाने की जिद के आगे मेरी ईमानदारी कई बार हारी। कभी हमारी साइकिलों ने
 
सुबोध
Feb 15 2010 03:04 PM
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दिल्ली से तू तू मैं मैं

दिल्ली वाले जश्न मनाने में उस्ताद हैं..मौका दीजिए फिर देखिए नाचेंगे दारू पीएंगे...हुड़दंग मचाएगें पंजाबी और हरियाणवी में चीखेंगे चिल्लाएंगे...३१ की शाम को जश्न में डूबी दिल्ली के जाम में फंसा तो होश ठिकाने आ गए...कनाट प्लेस पर जाम...इंडिया गेट पर ट्रैफिक
 
सुबोध
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कवरपेज पर 'जिन्न' आ

जिन्ना इंडिया टुडे और आउटलुक के कवरपेज पर हैं। जाहिर है जिन्ना का इतिहास वर्तमान के सामने खड़ा है। जिन्ना के बारे में पाकिस्तान के कन्फ्यूजन को समझना हो तो 1998 में बनी फिल्म 'जिन्ना' देखिए। ये फिल्म अंग्रेजी में बनी बाद में उर्दू में भी डब हुई। क्रि
 
सुबोध
Dec 29 2009 11:41 AM
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भगवान इन टीवी के प्रलय से बचाओ

भगवान तू कहां है। तू कहता है कि जब जब हम पर संकट आता है तू कोई ना कोई रूप धर कर संकट से उबारने आ जाता है। भगवान एक रियल संकट घर में घुस आया है। हमारे प्राण रोज संकट में होते हैं प्रभु। ऐसा शायद ही कोई दिन होता होगा जब मौत हमारे पीछे ना पड़ती हो। सब क
 
सुबोध
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कौन खुश रविवार या शनिवार

शनिवार से खास मुहब्बत है...उनको तो और भी होगी जो शनिवार और रविवार दोनो दिन छुट्टी मनाते हैं..लेकिन मेरी किस्मत इतनी मेहरबान नहीं..फिर भी शानिवार बचपन से भाता है...शनिवार हमेशा असलाया हुआ लगता है..जैसे कह रहा हो बैठो यार कितना काम करोगे..बाजार में रौन
 
सुबोध
Dec 29 2009 11:41 AM
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बस यूं ही

कह कर निकल जाना हमेशा मुश्किल रहा मेरे लिए रिश्ते नाते को गणित के सवालों की तरह कभी नहीं सुलझाया मैने दूसरों के लिए हमेशा ज्यादा संभावनाएं छोड़ी चुप रहा क्योंकि ठेस पहुंचाने से डरता था झेलता रहा ताकि दूसरे की उम्मीद टूटने ना पाए खुद को नासमझ मानकर दू
 
सुबोध
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नाकामियों का जश्न

साल की नाकामियों का जश्न कैसे मनाया जाता है। देखना हो तो भोपाल आईए। कैमरे 25 साल पुरानी त्रासदी की भावुकता की खोज में जुटे हैं। पुराने सवालों को झाड़ पोछ कर फिर से जिलाने की कोशिश हो रही है। पहले भी होती रही है और आगे भी होती रहेगी। हादसों को याद करन
 
सुबोध
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अच्छा हुआ खबर ज्यादा नहीं चली

मैं चाहता भी नहीं था कि प्रभाष जोशी के गुजर जाने की खबर टीवी चैनलों पर चले। अमिताभ बच्चन और रणवीर कपूर के फूहड़ ड्रामें के बीच प्रभाष जोशी के निधन की खबर बार बार चुभी। जैसे लगा कोई गलीज और गिरा इंसान किसी भले आदमी के मरने की खबर सुना रहा है। प्रभाष ज
 
सुबोध
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जिंदगी का एहसास

जिंदगी धूप की तरह है,कभी हसीन लगती है,कभी चुभती है,कभी डूबते सूरज की तरह गुम हो जाती है।जिंदगी उस फूल सी भी लगती है,जो तमाम हसरतें लिए खिलता हैफिर मुरझा जाता है,जिंदगी कुछ कुछ हवा के एहसास की तरह भी हैजो कभी ताजगी देता हैतो कभी गर्म थपेड़ों सा जान पड़ता
 
सुबोध
टैग: kavita
Sep 18 2009 08:46 AM
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तुम्हारा न्यूज सेंस तुम्हे मुबारक

खबरों को लेकर खबरदार बनने का नाटक क्यों। क्यों नहीं परचून की दुकान या फिर शराब का ठेका। माफ कीजिएगा न्यूज सेंस आपका मरा है लोगों का नहीं। बारिश केवल दिल्ली और मुंबई में नहीं होती बरखूद्दार, लखनऊ और मुज्जफरपुर में भी होती है। सड़कें वहां भी भरती हैं, जाम
 
सुबोध
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'मोहल्ला' का कीचड़नामा

घटिया आलोचनाओं का इतना ऊंचा ज्वार उठेगा इसके बारे में सोचा नहीं था। मोहल्लेदारी इतने छिछले स्तर पर चली जाएगी इसका भी इल्म नहीं था। प्रभाष जोशी की आलोचना उसके बाद आलोक मेहता की छिछालेदर और अब आलोक तोमर की ऐसी तैसी। सब मिलाकर गाली गलौज का भरपूर इंतजाम।
 
सुबोध
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आडवाणी से क्या कहा भागवत ने (एक्सक्लूसिव)

( आडवाणी से क्या कहा मोहन भागवत ने इसकी जानकारी हमारे संवाददाता विमल कांत के हाथ लगी है...इस इंटरव्यू को आरएसएस के एक निष्ठावान कार्यकर्ता ने हमें मुहैया कराया है...हम आपको इतना भर बता सकते हैं कि ये स्वयंसेवक बीजेपी में बड़ी हैसियत रखता है और आडवाणी का
 
सुबोध
Aug 30 2009 12:45 PM
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क्या कह रिया है

खबर से पहले चेतावनी...'इन खबरों का वास्तविक घटना से कोई लेनादेना नहीं है। ये खबर डेस्क के कुछ खुराफाती लोगों कीदिमाग की उपज है।' हमें खबर मिली है कि कसाब ने सोचना बंद कर दिया है। उसके डॉक्टरों के कहना है कि कुछ चैनल उसके सोचने से पहले ही ये सोचने लगे हैं
 
सुबोध
Aug 29 2009 09:58 AM
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राम राम! अरुण शौरी....

राम कब तक नैया पार लगाते। बीजेपी की राजनीति राम भरोसे कब तक चलती। जब तक चली तब तक बीजेपी ने खूब चलाई। लेकिन जब मुद्दा पुराना हुआ तो ओवरहालिंग भी काम नहीं आई। सत्ता आई और चली भी गई। अब पार्टी की कलह सामने है। जसवंत पार्टी से बाहर हैं और अरुण शौरी बगावत का
 
सुबोध
Aug 25 2009 12:42 PM
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बहस के रास्ते खोल दिए जसवंत ने

देश बंटा, मसले हुए, मुल्क छूटा और दुनिया की तस्वीर में हिन्दु्स्तान और पाकिस्तान का अक्स भी शामिल हो गया। दोनो मुल्कों ने बंटवारे के लिए अपने अपने नायक और खलनायक भी तलाश लिए। जिन्ना भारत के लिए खलनायक बन गए और पाकिस्तान ने उन्हें अपना नायक घोषित कर दिया।
 
सुबोध
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ग्लैमरस अपमान

शाहरुख एक्टर हैं तो अमर सिंह उनसे बड़े कलाकार है। एक पर्दे पर रुलाता और हंसाता है तो दूसरा राजनीति के सीने पर बरसों से मूंग दल रहा है। ड्रामेबाज दोनो हैं, फर्क बस इतना है कि एक ड्रामा करके पैसे बनाता है और दूसरा ड्रामा करके लोगों को बेवकूफ। शाहरुख
 
सुबोध
Aug 19 2009 02:55 AM
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जसवंत को भुक्तभोगी का खत

जसवंत जी हम पर रहम खाइए। इतिहास को लेकर कम कन्फ्यूजन नहीं हैं जो आप भी कन्फ्यूज करने चले आए। खाकी नेकर वालों ने पहले ही हिस्ट्री को मिस्ट्री बनाकर रखा हुआ है। जिस तरह की आपकी ऐतिहासिक सोच है। उस तरह सोचने वाले और भी हैं। अब तो इतिहास जाति के खेमे तक
 
सुबोध
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क्या वाकई नेता लिखते हैं

जसवंत सिंह का पढ़ने लिखने से तारुफ्फ पुराना है। विद्वान हैं। लेकिन इन दिनों इतिहास लिखने का चस्का सवार हुआ है। इतिहास लिख नहीं गढ़ रहे हैं। अपने विचारों को इतिहास का चोला पहनाकर किताब ले आए हैं। ये नेता वेता किताब लिख कैसे लेते हैं, मेरे लिए पहेली की तरह
 
सुबोध
Aug 14 2009 09:49 PM
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ए.आर.रहमान की कहानी तहलका की जुबानी

(रहमान सुर का दूसरा नाम हैं, उनकी शख्सियत संगीत की तरह है, वो बोलते कम हैं लेकिन उनका संगीत सबकुछ कह जाता है। काफी दिनों पहले तहलका पर उनका शोभा चौधरी का एक आर्टिकिल छपा था, तहलका के साभार ये आर्टिकिल अपने ब्लॉग पर पब्लिश कर रहा हूं)विलक्षण प्रतिभा के
 
सुबोध
Aug 13 2009 11:37 PM
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ऐ गमे दिल क्या करूं

बाजार में अब क्या क्या बिकना बचा है। मामला निजता की नीलामी तक जा पहुंचा है। आज से पंद्रह साल पहले हम ग्लोबलाइजेशन और बाजारीकरण के नफे नुकसान के सेमिनारों में हिस्सा लिया करता थे। राम पुनियानी से लेकर कश्यप जी जैसे बड़े बडे धुरंधरों के लेक्चर सुना करते
 
सुबोध
Aug 13 2009 12:27 PM
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मीडिया की दलाली और प्रभात जी का पैगाम

प्रभात रंजनक्योंकि ये अच्छी तरह जानते हैं कि इन्होने क्या गुनाह किया है।सैकड़ो-हजारों बार सुने हुए से अल्फाज...मीडिया और मीडिया के नाम पर थोथे,बेकार से शब्द...बाजार उपभोक्तावाद न्यूज रूम की मजबूरियां...हाय री सिर होने की दुश्वारियां...हाय री दुश्वारियों
 
सुबोध
Aug 08 2009 12:48 PM
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पुलिस और चोर में चोर कौन

(सवाल फेसबुक पर उठा और सवाल पर सवाल खड़े होते चले गए। सवाल कई थे पहला क्या बच्चों में आज भी पुलिस में जाने का कोई क्रेज बचा है और अगर नहीं तो क्यों। दरअसल ब्रिटिश मानसिकता में जीती आई पुलिस आजादी के साठ सालों में लाठी भांजने की मानसिकता से उबर नहीं पाई।
 
सुबोध
Aug 02 2009 10:53 AM
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फरमानों का हाईटाइड

तालिबानी कहें या तुकलकी...शब्द कम पड़ जाएंगे। पानी पी पी कर कोसेगें तो थक जाएंगे। गोत्र के चक्कर में उलझे तो यकीन मानिये सर घूम जाएगा लेकिन समझना मुमकिन नहीं हो पाएगा। फिर भी सवाल यही है कि आखिर गोत्र के नाम पर किसी का कत्ल कैसे किया जा सकता है। मसला वोट
 
सुबोध
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सच का सामना

टीवी चैनल पर मनोरंजन का जायका बदल रहा है। सास बहू और कॉमेडी के दौर से चैनल रियलिटी के मैदान में आ चुके हैं। अब रियल और रियल होने जा रहा है। सामना सच से है और निशाना टीआरपी है। दरअसल आश्चर्य ने हमेशा इंसान को नई खोज के लिए प्रेरित किया, और जब ये प्रेर
 
सुबोध
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पत्थर की माया

मायावती समय का पहिया घुमाना चाहती हैं। वो दलितों के अंदर वही दंभ देखना चाहती हैं जिससे कुछ जातियां लंबे समय से ग्रसित रही हैं। लेकिन ये उपचार नहीं बल्कि मर्ज को बनाए रखने का तरीका है। मायावती राजनीति में चली तो आईं, लेकिन राजनीति को उन्होने हमेशा शतर
 
सुबोध