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शब्द सृजन

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31 Dec 2009
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इस होली पर कैसे, करलूं बातें साज की

अभी हरे हैं घाव, कहां से लाऊं चाव, नहीं बुझी है राख, अभी तक ताज की खून, खून का रंग, देख-देख मैं दंग, इस होली पर कैसे, करलूं बातें साज की उसके कैसे रंगू मैं गाल जिसका सूखा नहीं रुमाल उन भीगे होठों को कह दूं मैं होली किस अंदाज की इस होली पर कैसे, करलूं
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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जीना चाहते है वह मर कर.

नाखुश इतने, नफरत कर कर. रक्त पीपासा, उर में भर कर. अपना नया ईश्वर रच कर, जीना चाहते हैं वह मर कर. हाथ नहीं हथियार हैं उनके, मस्तक धड से अलग चले है. ईच्छा और विवेक से अनबन, आस्तीन में सांप पले हैं. काम धर्म का मान लिया है. जाने कौन किताब को पढ कर. अपन
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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पिया जी अबकी होली में

रंग मोय ऐसा दीजो लाय पिया जी अबकी होली में कै जासै मगज तैरो फिर जाय पिया जी अबकी होली में अबके फाल्गुन बम्बई जईयो, वहां राज कै रंग लगईयो प्यार भरी ठंडई पियईयो बडे ठाकरे से मिलयईयो कौन मराठा कौन बिहारी अंतर सब मिट जाय पिया जी अबकी होली में अबकी होली प
 
योगेश समदर्शी
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कुछ तो बात बात बस बात बात की खाते हैं

कुछ तो बात बात बस बात बात की खाते हैं कुछ मेहनत सौ की दो पाकर पछताते हैं मूल ने अपना दाम खो दिया, चमक दमक का लगता मोल. आलू १० का धडी तुलेगा चिप्स बिके चांदी के मोल एक वक्त में रुपये हजारों खाते कुछ कुछ ऐसे हैं जो पानी पी सो जाते है. श्रम देवता खडा खड
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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प्यार के व्यापारिकरण का उत्सव....

आज सवेरे से ही वेलेअटाईन डे का माहोल था मैने अपने जीमेल टैग पर टांक दिया... "प्यार के व्यापारिकरण का उत्सव...." इसे देख कर मेरे एक मित्र मोहिन्दर जी ने मुझसे कुछ बाते की बात क्योंकी सामाजिक नजरिये से संबंधित थीं अत मेरे लिये संग्रहणीय हैं और आपके लिय
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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गुर्दे चोरी हो रहे, कैसा भया गजब

कैसा अजीब दौर है, इस जहां में अब गुर्दे चोरी हो रहे, कैसा भया गजब बेदिल फिरती देहों से क्या चाहते हैं आप जीव जीव सब एक हैं हत्या माने पाप जो नित कलेजे चीर कर करते देखे मौज महानगर में देखिये, मांसाहारी की फौज फिर गुर्दों का व्यापार भी उतना नहीं अजब गु
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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अपने लिये वोट मांगना ठीक नहीं ; मेरा मत

मेरे एक मित्र हैं नाम तो याद नही आ रहा पर सर नेम गांधी हैं. पिछले वर्ष ही उनसे भेंट हुई थी. उन्होंने नारा दिया कि नोट नहीं तो वोट नहीं. सार यह था कि देश की कुल सकल आय में देश के नागरिकों का हिस्सा होना चाहिये. और जो नेता ऐसा करने का वादा करेगा उसे हम
 
योगेश समदर्शी
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आई मुझको याद गांव की.......

आज सवेरे बींच शहर मे एक नन्हे बालक को देखा साहब देखे एक कार में, एक रिक्शा चालक को देखा साहब ब्रेड चबाते देखे, रिक्शा चालक पैर चलाते बालक रोटी मांग रहा था मैं था दर्शक पथ पर जाते पेड के नीचे रुक कर झाडी मैने मैली धूल पांव की आज ना जाने क्योंकर आई, आई
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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यह जमीं है गांव की

गौर से देखो इसे और प्यार से निहार लो आराम से बैठों यहा पल दो पल गुजार लो सुध जरा ले लो यहां पर एक हरे से घाव की कि यह जमीं है गांव की, हां ये जमीं है गांव की...... कुल कुनबा और कुटुम का अर्थ बेमानी हुआ ताऊ चाचा खो गये सब खो गई बडकी बुआ गांव भर रिश्तो
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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कुछ बात कर

आज के हालात पर कुछ बात कर आज टूटे हाथ पर कुछ बात कर मै पिता से दूर हूं क्योंकर भला एक बयां के घोंसले की बात कर गांव का बरगद बुजुर्गों का कहा बदहाल से अब होंसलों की बात कर है पेट की पीडा रिवाजों से बडी त्योहार के इस फांसले की बात कर आंगन मे उगी दीवार
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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जिंदगी तलाशता रहा हूं मैं

खुद को ही तराशता रहा हूं मैं जिंदगी तलाशता रहा हूं मैं उसके सुख को प्यार जो भी कह सके दिवानगी तलाशता रहा हूं मै अब हुनर की कद्र करता कौन है बंदगी तलाशता रहा हूं मैं उच्चता विचार की है खो रही सादगी तलाशता रहा हूं मैं जिसको मिलके दिल वाह वाह कहे बानगी
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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अहसासों की बात न कर

है भीड भरा ये शहर यहां पर अहसासों की बात न कर इन गर्म मिजाजी लोगों से, ठंडी सांसों की बात न कर पोखर, नदियां, ताल, जलाशय सब उनके कब्जे में आऐ बिजली बनने दे पानी से तू अब प्यासों की बात न कर रिश्ते सब पैसों की खातिर देख गुलामी झेल रहे हैं जब हाथ हाथ से
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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जमाने से

आओ कुछ ऐलान सा करदें हम भी आज जमाने से हर रिश्ता रिश्ता होता है, केवल मित्र निभाने से हमको अपनी सोच के जैसा एक खिलोना मिला नहीं बाग में मेरे कोई अनोखा फूल सलोना खिला नहीं नहीं धूप से बच पाओगे धूप धूप चिल्लाने से नई जीत की राह मिलेगी हार से हाथ मिलाने
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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हमने चाहा हम भी लिखदें दिल की बात किताबों में

हमने चाहा हम भी लिखदें दिल की बात किताबों में पर महबूबा के उस आंचल की, संगीत भरी छम छम पायल की हर बात बता कैसे पऊंगा, शायद मैं न लिख पाऊंगा उसने जो नजरों से बोली वो हर बात किताबों में हमने चाहा हम भी लिखदें दिल की बात किताबों में कान तरसते सुनने को आ
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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आंसू पानी हो जाते हैं

आंसू पानी हो जाते हैं लोग रुमानी हो जाते हैं पल भर मिलकर कभी कभी कुछ, लोग कहानी हो जाते हैं एक बदन के हिस्से देखे मौन आंख मे किस्से देखे दूर दूर से प्यार की खातिर लोग जवानी खो जाते हैं पल भर मिलकर कभी कभी कुछ, लोग कहानी हो जाते हैं कोई बिछडे कोई रोए
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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मतलब जानिए

आज बस हसने और र्रोने का मतलब जानिए गांव में एक पेड के होने का मतलब जानिए खेत से फसलें उठाने वाले लोगों ये सुनो, खेत में पहले फसल बोने का मतलब जानिए वातानुकूलित जगह पर सब्जियों को देखकर कडकडाती धूप के होने का मतलब जानिए बेटे को परदेश भेजा था तो था वह
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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मतलब

आज बस हसने और र्रोने का मतलब जानिए गांव में एक पेड के होने का मतलब जानिए खेत से फसलें उठाने वाले लोगों ये सुनो, खेत में पहले फसल बोने का मतलब जानिए वातानुकूलित जगह पर सब्जियों को देखकर कडकडाती धूप के होने का मतलब जानिए बेटे को परदेश भेजा था तो था वह
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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झुलसा फकीर

पीपल, बरगद, महुआ, नीम, धीमर, छिप्पी, टौंक, हकीम, पंडित, ठाकुर, राम, रहीम, कैसे सबकी बदल गई है देखो तो तकदीर, गांव गांव में छांव ढूंढता फिरता एक फकीर. रामू पंडित, भोला धोबी, दल्लू धीमर, कालू छिप्पी बलबीरे ठाकुर की खोली वो बदलू कुम्हार की बोली जात बतात
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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विचार सारांश में ब्लोगिंग पर आर्टिकल प्रकाशित हुआ है.

पढने के लिये इमेज पर डबल क्लिक करें
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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हम हौंसलों की ढाल लेके बढते जाएंगे.

आहिस्ता आहिस्ता हम भी सीख जाएंगे आपकी तरह ही हम भी मुस्कुराएंगे. शब्द एक अर्थ सबके अपने अपने हैं आपकी पसंद का गीत हम न गाएंगे. रास्तों की दूरियों के मायने हैं क्या मंजिलों से पहले हम तो रुक न पाएंगे. हाथ में हथियार लेके लड रहे है सब, हम हौंसलों की ढा
 
योगेश समदर्शी
Dec 29 2009 11:45 AM
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आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...

"असली भारत" आज अकेलाढूंढ रहा है कहां तिरंगा?आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...नारंगी उस रंग का मतलबजो था हमको गया बतायाभ्रष्ट हुआ ईमान घूमताधन का रंग है सब पर छायादेश प्रेम का भाव घट रहा,चिंतन घूम रहा बेढंगा..आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...ध्वल सफेदी का संदेश,आज भला
 
योगेश समदर्शी
Aug 21 2009 03:46 PM
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...जो विकसित तो न थे पर सुखी अवश्य थे...

आज फिर देश के ऐतिहासिक स्मारक पर प्रधान मंत्री जी का भाषण हुआ. बातें बहुत बडी बडी हुई. ठीक वैसे ही जैसे होती हैं. मैं कोई विश्लेषक नहीं और न ही कोई कोलमिस्ट हूं किं मैं इस भाषण पर टिप्पणी करूं. फिर मैं कौन हूं. जी हां यह सवाल सही है. मैं हूं एक आम आदमी.
 
योगेश समदर्शी
Aug 15 2009 06:23 PM
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गांव का घर मानव मंदिर, पत्थर का माकान नहीं है.

गांव लोगों के रहने का, केवल एक स्थान नहीं है. गांव का घर मानव मंदिर, पत्थर का माकान नहीं है. सभ्यता के चरम पै जाकर, भाव सरल मन में जब आएं. प्रकृति की गोद में खेलें, पछी संग बैठे बतियायें. खुली हवा में करें ठिठोली, अंदर तक चित्त खुश हो जाए. गांव छोड क
 
योगेश समदर्शी
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मैं न जाने कहां आ गया हूं प्रदेश के गांव मे.

मैं न जाने कहां आ गया हूं प्रदेश के गांव मे. कच्चा एक माकान, मिट्टी का सामान, रेतीला सा आगन, एक भोला सा मन, लकडी वाला हल, सरसों वाली खल, लोटा भर के छाय, काली वाली गाय, यदि कहीं दिख जाय, तब बोलूंगा आज आ गया अपने देश के गांव में., मैं न जाने कहां आ गया
 
योगेश समदर्शी
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गांव वाले घर मे अम्मा सब कुछ थी कुछ भी न होकर

सुबह सवेरे जग जाती थी, गाय धू कर दूध बिलोकर. गांव वाले घर में अम्मा, सब कुछ थी कुछ भी न होकर. दूध मलाई और पिटाई, तक उसके हाथों से खाई. रोज सवेरे वह कहती थी, उठो धूप सर पे है आई. उपले पाथ रही अम्मा को, याद करूं हूं अब मैं रोकर. गांव वाले घर में अम्मा,
 
योगेश समदर्शी