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जो देखा भूलने से पहले

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17 Jun 2010
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रस्साकशी

सच में कहानी कैसीजब सच केवल एक याद होलगातार भूलती हुई,और जीता हो कोई उसे अपना समझ करकिसी आयाम मेंएक दिन यह रस्सी का सिरा छूट जाएगा मेरे हाथों से.©
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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रद्दी में गई लिफाफों में बदल गई कविताओं काविशेष संग्रह यहाँ उपलब्ध है©
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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मेरे पाँवों पर उगी है दूब

तुम दूर से मुझे देखोतो दिखता हूँ पत्थर का बुतनजदीक आ कर देखोतो दिखता हूँ कंकड़ों का समझौता,मेरे पाँवों पर उगी है दूबताजी बस अभी ही उगी.हवा सीटियाँ बजातीचुभोती है अपने नाखून मेरी देह मेंऔर खुरचती है बारिश मेरी त्वचा,मेरी नग्नता के भीतर से गुजरते हैंकई
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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एक समय

कुछ दिनों में आएगा एक मौसमइस अक्षांस मेंकुछ दिनों में आएगा एक समय,जिसे याद रखने के लिए भूलना पड़ेगा सबकुछक्षणभंगुर भविष्य को जीतेमैंने अतीत को नहीं देखा है अब तक©29.3.2009
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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पानी का चेहरा

चिमनी में करती रही बातें हवा कल सारी रात जंगलों की कहानियाँ पहाड़ों की यातना समुंदरों का सीत्कार सो रही और कहीं जागती दुनिया के दुस्वप्न उसके अल्पविरामों के बीच झरती बरसों पहले बुझ चुके अंगारों की राख, चुपचाप नींद में भी सुनता रहा अपने आप को समेटता जूझता
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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इस बरस

जब हम बीच में होते हैं तो किनारों पे चली जाती हैं दूरियाँ,पास आकर भी भूल जाता हूँ निकटता की बेचैनीकिनारों पर टहलते हुए.इस बरस कैद कर लिया पाताल की देवी ने बसंत,फूटते हैं बर्फीले ज्वालामुखीकुछ और दरारें चटखती सतहों मेंगिरे हुए मलबों में अपना घर खोजते
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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Translation

Does language convey anything? except translating the reality defined by the language. What is a translation? .. रुक जाती है सांस, आरंभ होता सपनाwhat happens, when we stop translating : the breath stops. The dream begins.
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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शोक सभा में

बुदबुदाते शब्द झर कर गिर जाते हैं अदृश्य धूल के कणों की तरहचर्च के ठंडे फर्श परप्रार्थना के शब्दशोक के शब्दस्मृति के शब्दअनुपस्थिति को उकेरते शब्दविस्मृति की स्याही मेंएकांत के शब्दइस बार बसंत भी भूल गया जल्दी आना.क्या मैं फुसफुसा दूँ कुछ तुम्हारे कानों
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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कालापानी नीली लहरें

कर दो दान चुराया माल- भला करे भगवानना लिखे भीना सोचे भीना चीख पुकार के भीनानाविध उपकरण और विधियाँ भी बेकार हैंउपाय यही इस मन से मोक्ष काअब खाली दानपात्र में बस बचा मैं ही हूँचुराता नहीं जिसे वहाँ से कोई ,कभी कभी देखना भी जरूरी होता हैआइने को अपने अलावा
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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खग्रास

हमने अँधेरे को मिटाने की कोशिशपर गुलाम हो गए चमकते बल्बों की चौंधियाहट सेकि नहीं दिखता कुछ भी उस चमकते अँधेरे में,गढ़ा एक नया अँधेरा जिसकी रोशनी में मिटा दिया दिन कोखिड़की पे खींच कर पर्दातुम्हारी निराशा को अपनी कोशिश मेंठीक करते करते मैं भूल भी गया अपनी
 
मोहन राणा - Mohan Rana
Feb 15 2010 05:35 PM
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बावली धुन

रात थी सुबह हो गईकरवटों में भी नहीं मिली कोई जगहयह गलत पतों की यात्रा है मेरे दोस्तरास्ता भूलना है तो साथ हो लो,शर्त यही कि भूलना होगा अपना नाम पहले,वैसे डर किसे नहीं लगता लोगों के भूल जाने कायाद दिलाते रहें जनम जनमों तकउन्हें अपनी अनुपस्थिति कीकब होगी
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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कविता ही फिलहाल

पनवाड़ी प्रकाशक हो गए परांठे वाली गली मेंकवि के पान पर चूना लगाकर,अलखनिरंजनकह के कूदी अभिशप्त बरगद से एक छायामेरी जुबान बंद हैमेरे इन्कार में उपस्थित है उसका चेहरा,रजाईयों में दुबकी अभिजात्य आत्माओँ नेबंद कर ली अपनी आँखें अँधेरे से डर कर.©मोहन राणा
 
मोहन राणा - Mohan Rana
Feb 11 2010 04:12 AM
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चाँदनी रात में खामोशी

मैं सहमत हूँचाँदनी रात में खामोशी सेमन में सीत्कारती चिंताओँ सेदिल में कुछ ढोती बेचैनी सेकमर में किसी बोझ की अनुभूति सेमुझ से थक चुकी नींद सेमैं सहमत हूँतुम्हारे भय सेदिन के अँधेरे में चलते आर्तनाद से,असहमतियों के साथ बैठेइस स्थिति से सहमत हूँथक चुका हूँ
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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खोए बच्चों के नाम

एक चिठ्ठी मैं लिखना चाहता हूँ खोए बच्चों के नामशहतूत की टहनियों से टँगेछोटे होते जाते हैं उनके कपड़ेफैलती हैं टहनियाँघना होता जाता है शहतूतऔर सालों में कभी एक बार मैं बूढ़े पेड़ को देखता हूँअपनी छाया पर झुके हुए,तार-तार होते जाते हैं कपड़ेउनकी स्मृतियाँ
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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सैमसंग द्वारा प्रायोजित

यह कविता ना समझ सकतीना लिख सकतीना पढ़ सकतीभाषा सीख के भीना जान सकतीफिरइस बंदर बाँट मेंनई बिल्ली से डर किसको हैराष्ट्रीय हो अंर्तराष्ट्रीय हो बहुराष्ट्रीय होबहुलोकी होयह बहुरूपिया !डर किसको है इस बिल्ली सेकौने बाँधे घंटी इसको,अगल बगलहम निकल भागते , साथ
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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बात कुछ ऐसी कि

ठीक करने में लगा हूँ दूरी मापककाम नहीं करता,कितनी दूर आ गया चला गया पिछली मुलाकात के बादयाद नहीं यह भीअब मैं पैदल ही नाप लेता हूँअनुपस्थित दूरियाँकहीं गए बिनाकहीं से लौटे बिनाबिता देता दोपहरकल आज कल कीकुरसी पर बैठे खिड़की के नजदीक,खुली हुई आँखों में भरता
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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बरफ गिरती रही रातभर

कुछ देर मैं खुश होता हूँ आँखें मूँदे बर्फीले सन्नाटे मेंसुनता जैसे कुछ भी नहीं सुनकर
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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और मैंने एक दिन में हाँ बोल के

....मैंने सिर्फ अपना रोल देखा :-SS he is great fun he has great sense of humour ~X(
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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अंतिम दिन

भीगती शाम ठिठुरती सर्द पानी में दरवाजे के बाहर ही है अब नया साल समय को बाँचता दस्तक देने से पहले कुछ छुट्टे पैसे ही बचे हैं उसकी जेब में ये कुछ दिन, जिनमें ना आशा है ना उदासी वे ना जिंदा हैं ना अचेत बस एक बेचैन धड़कन अगर मैं उन्हें चूम लूँ तो एक ही ड
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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गते गते

गते गते पारगते पारसंगते बोधि स्वाहा (प्रज्ञापारमिताहृदय) photo © mrana
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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अनुवाद

कुछ कविताओँ के अंग्रेजी अनुवाद http://www.poetrytranslation.org/poems/single/201/The_Poets_Fate http://www.poetrytranslation.org/poems/single/202/The_Washerman http://www.poetrytranslation.org/poems/single/203/The_Blue-Eyed_Blackbird
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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आशा नाम छतरी का

बस इतना और कि दोपहर की छाया रात न बन जाय, हो जाय इंतजार पूरा दिन के क्षितिज में ही © मोहन राणा फोटो - वदालूर में दोपहर-फरवरी 2007
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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तिब्बत

तिब्बत की आजादी भारत की सुरक्षा".. यह कहते हुए उगिन हँस पड़ता है. जैसे अचानक उसे कुछ याद आया पहले इस बोध पर विस्मय और फिर उसी पल खगोलीय वास्तविकताओं की पहचान कर एक उदासी.
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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मंजीत बावा

सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया को पढ़ता हूँ खबरों की सूची में एक खबर पर नजर पड़ती है 'मंजीत बावा नहीं रहे', वे पिछले तीन साल से कोमा में थे. मुझे 1986-90 के दौरान उनसे हुई मुलाकातें ध्यान आने लगती हैं रवीन्द्रभवन, गढ़ी स्टूडियो, धूमीमल गैलरी,त्रिवेणी या कहीं
 
मोहन राणा - Mohan Rana
Dec 29 2009 11:43 AM
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गोपन कथा

हमारी जिंदगी ऐसी गोपन कथा सी है हमें सब मालूम फिर भी खोजते रहते हैं हम संकेतों को उस जिंदगी को जीते हुए उसे पहेली मान लगे रहते हैं बूझते पेड़ों से अदृश्य जंगलों में लुढ़कती हुई नींद की ढलानों पर संभालते अपने आपको बटोरते अपनी नग्नता को पतझर के बियाबान
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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सवाल नहीं है आज

सवाल नहीं है आज सुनकर उठता है सवाल इस बात पर , मैं अब आकाश को नहीं ताकता पैरों को घूरता हूँ मुझे करनी थी प्रतीक्षा उनकी इस पल यहीं इस एकांत में इस कोलाहल में इस चुप्पी में अपने भीतर इस चीख में यहीं इस खुशी में इस क्रोध में इस उदासीन समय की करवट में य
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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सबसे ऊँची छत

सबसे ऊँची छत से क्या बादल दिखाई देते हैं क्या वहाँ भी होती है बारिश क्या वहाँ भी बहते हैं पतझर के आँसू गिरती हुई बूँदों में क्या वहाँ भी होती है दोपहर सुबह और शाम के बीच.... क्या वहाँ दुनिया को बनाने वाला मिस्त्री रहता है मिट्टी की बनी यह दुनिया टूट
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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जहाँ बादल सुनाते हैं संदेश

आसीनानाम् सुरभितशिलम् नाभिगन्धैर्मृगाणाम् तस्या एव प्रभवमचलम् प्राप्ते गौरम् तुषारैः। वक्ष्यस्य ध्वश्रमदिनयने तस्य श्रृंगे निषण्ण : शोभाम् शुभ्रत्रिनयन वृशोत्खात्पंकोपमेयाम्।। _ कालिदास, मेघदूत फोटो - मोहन राणा
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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याद करते तुम्हें

कितने दिन बाद मिले यही याद है बीते कितने दिन इस बीच बेलें फैली सूखी दीवारों पर बारिश में बह गईँ छोड़ कर निशान तस्वीरें भी पुरानी हो गईं एकतरफा पहचानते पहचानते पर सपनों में तुम हमेशा मिली बीते वहाँ कई दिन रोशनी और अँधेरा खुशी की सलवटें तुम्हारी आवाज व
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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काबुलीवाला कहता है

मौसम तो जैसा है ठीक ही है गरमी हो या सर्दी पतझर हो या बरसात अगर में जग जाऊँ तो अच्छा है पता नहीं पर दिल्ली में सब सो रहे हैं यह कैसा अनाम मौसम, पता नहीं वे किसके पैर हैं जिन्हें दिखता नहीं कहते हैं अमरीका के पाँव दबाए जा रहे हैं दिल्ली में सब सो रहे
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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क्या सूरज हमारी स्मृतियों का लाइब्रेरियन है?

सुबह का सूरज कहीं छोड़ कर आया दोपहर कहीं खोल आया दरवाजा वह शाम के लिए चमकता आकाश ने ली जैसे एक लंबी सांस दिन खुला मेरी बंद आँखों के भीतर मैं जनमा फिर कल आज कल के दर्पण में © मोहन राणा
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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मरीचिका

गहराती शाम की तंद्रा टूटतीकिलकारी लेती अबाबील लगाती गोता छत की मुंडेर में,छापा जाता है पैसे को मशीनों सेकागज पर लिखा मूल्य तय करता हैसड़क पर अस्मितातय करता है आवश्यकता,महत्व केवल मूल्य के विचार भर से हीऔर सच्चाई जैसे कोई स्मृति!रेत और पानी में छुपी है
 
मोहन राणा - Mohan Rana
Sep 11 2009 04:22 AM
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पहली कविता

बीता हुआ भविष्य©
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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कल परसों कि आज

मेज पर सामान पड़ा है, कतरनें,पुरानी होती रसीदें और चुपके से जमा होती धूल.इतने दिन हो गए कि हर रोज.मैंने डाकिये से कहा होने वाली है बारिशसड़क के दूसरी ओर ही रहना वरना भीग जाओगे.अब इस गीली चिठ्ठी को कहाँ रखूँ © मोहन राणा
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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विदूषक

पब में दो लोग अपने अपने होश को संभालते एक दूसरे को जोरों से बोलते, कुछ खास कहने की कोशिश करते हुए असफल होते हैं और जितना जोर से बोलते उतना ही सुनना कठिन हो जाता है अपने ही शोर को सुनते हुए. कौन है विदूषक इस कोलाहल में.फोटो ©मोहन राणा /2009
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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चाँद के बाहुपाश में सूरज

: सूरज-चाँद के बिना धरती पर जो जीवन है जिसे हम जीवन कहते हैं वह असंभव है, दोनों का अदभुद तालमेल है, उनकी जुगलबंदी में धरती पर जीवन को लय मिलती.(सूर्यग्रहण 22 जुलाई09 6.26 प्रातः)आर्यभट्ट (476 ईस्वी) ने सूर्य ग्रहण को लेकर एक श्लोक की रचना की थी-'छादयति
 
मोहन राणा - Mohan Rana
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विक्रम सेठ I wish

विक्रम सेठ एक साक्षात्कार में कहते हैं 'I Wish More Writers Would Fight For A Big Advance' Vikram Seth http://www.outlookindia.com/full.asp?fodname=20090720&fname=AVikram+Seth&sid=1 पर विक्रम अंग्रेजी में लिखते हैं उनका आशय यह आवहन ... ललकार
 
मोहन राणा - Mohan Rana